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Magazine - Year 1957 - Version 2

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धर्म तंत्र का मूल तत्व

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मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसने अन्य जीवों की अपेक्षा जो उन्नति की है उसका प्रधान कारण उसकी सामाजिक सामूहिक मनोवृत्ति है। मिल-जुल कर काम करने और एक दूसरे को सहायता देने के स्वभाव ने ही शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, विज्ञान, शिल्प आदि अनेक दिशाओं में मनुष्य को बढ़ाया है। विवाद, कुटुम्ब, जाति, सम्प्रदाय, राष्ट्र, सभा, सम्मेलन, संगठन आदि इसी मनोवृत्ति के आधार पर बने हैं।

मनुष्य ने यह भली प्रकार जान लिया है कि वह एक दूसरे से अलग-अलग होकर नहीं, मिल- जुल कर एक दूसरे को सहयोग देकर ही आगे बढ़ सकता है। अपनी कठिनाइयों और कमियों को दूर कर सकता है।

इस सामूहिकता की मनोवृत्ति को ‘देव’ तत्व कहते हैं। क्योंकि इस भावना को बढ़ाने में त्याग, संयम, सेवा, प्रेम, उपकार आदि गुणों की आवश्यकता पड़ती है। इसके विपरीत एक और मनोवृत्ति मनुष्य में काम करती है जिसे ‘स्वार्थपरता’ कहना चाहिए। इसकी प्रेरणा दूसरों से अपने लिए अधिकाधिक लाभ लेना, और बदले में कम से कम देने की इच्छा प्रबल होती है। फलस्वरूप बेईमानी, छल, शोषण, अन्याय, संग्रह, विलासिता आदि की वृद्धि होती है। इस मनोवृत्ति को ‘असुर’ तत्व कहते हैं। यह दोनों ही देव, असुर मनोवृत्तियाँ परस्पर निरंतर संघर्ष करती रहती हैं। गीताकार ने तत्वतः इस देवासुर संग्राम का वर्णन किया है और अर्जुन को निमित्त बना कर जन-साधारण को असुरता-स्वार्थपरता को पराजित करने और केवल लोक-हित को विजयी बनाने के लिए आन्तरिक संघर्ष करते रहने का निर्देश किया है।

परिस्थितियों के कारण कभी देवत्व प्रबल हो जाता है तो कभी असुरता की चढ़ बनती है। व्यक्तिगत जीवन की भाँति, सामूहिक जीवन में भी यह उतार चढ़ाव आते रहते हैं। कोई काल सज्जनों की अधिकता का होता है तो किसी में दुर्जनों की भरमार रहती है। सतयुग कलियुग आदि का यही आधार है। बात यह है कि मनुष्य के अन्दर असुरता, पाशविकता, स्वार्थपरता की मात्रा अधिक रहती है। निम्नगामी मनोवृत्तियाँ सरल और प्रबल होती हैं उन्हें बढ़ते देर नहीं लगती। ऊर्ध्वगामी, देवत्व प्रधान प्रवृत्तियाँ कठिन और परिणाम में मन्द, सौम्य एवं साधारण होती है जिनके कारण भौतिक दृष्टि से अधिक लाभ मिलते नहीं दीखते इस लिए उनमें उतना आकर्षण नहीं होता जितना असुरता के सिद्धान्तों में। इसलिए बहुधा मन की प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्वार्थ साधन की ओर ही अधिक रहती है। पानी को फैलाया जाए तो वह नीचे की ओर बिना किसी प्रयत्न के बह निकलेगा किन्तु यही पानी को ऊपर चढ़ाना हो तो उसके लिए अनेक प्रकार के साधन जुटाने पड़ते हैं तब कहीं धीरे-धीरे थोड़ी सफलता मिलती है।

आसुरी तत्वों की प्रबलता और देवत्व में सौम्यता के कारण बार-बार ऐसे अवसर आ जाते हैं कि व्यक्तियों में तथा समाज में सामूहिकता की प्रवृत्ति घट जाती है और स्वार्थपरता बढ़ जाती है। उस असंतुलन की स्थिति को संभाल कर संतुलन कायम करने के लिए कोई महापुरुष देवदूत, अवतार आते हैं और बुराइयों को घटाने, अच्छाइयों को बढ़ाने के अपने उद्देश्य को पूरा करके चले जाते हैं। यह तो हुई विशेष परिस्थितियों को, विशेष रूप से समाधान करने वाले विशेष महापुरुषों की बात। को नियंत्रित करने और देवत्व को प्रोत्साहन देने के लिए कुछ आत्माओं को प्रयत्न करते रहना होता है यदि यह प्रयत्न न हों तो भ्रष्टाचार अत्यन्त तीव्र गति से फैलता है और जन-मन की स्थिति असुरता से आच्छन्न हो जाती है।

हर वस्तु से एक मैल निकलता है। समय-समय पर उसकी सफाई न की जावे तो गन्दगी और बीमारी फैलती है। बर्तन, कपड़ा, मकान, शरीर आदि किसी भी वस्तु को लें-उन पर मैल जमने की प्रक्रिया होती रहती है। मिट्टी, साबुन, बुहारी, जल आदि वस्तुओं से उनकी जल्दी-जल्दी सफाई करनी पड़ती है। यदि सफाई की यह क्रिया बन्द कर दी जावे तो यह वस्तुएं मलीनता से भर जाती हैं। मानवीय मन तथा समाज की भी यही स्थिति है। मन में भी एक प्रकार की गन्दगी और मलीनता उत्पन्न होती रहती है जिसे स्वार्थपरता, वासना, तृष्णा आदि नाम दिये जाते हैं। इसकी सफाई जल्दी-जल्दी न की जाती रहे तो मन की यह गन्दगी बहुत बढ़ जाती है और कुछ ही दिनों में वह बढ़ी हुई मानसिक मलीनता वाला व्यक्ति एक प्रकार से विषाक्त रक्त वाले छूत के रोगी की तरह, अपने लिए ही नहीं, निकटवर्ती अन्य लोगों के लिए भी हानिकारक एवं कष्टकारक बन जाता है। उसकी बुरी नीयत, बुरी आदत, बुरी भावना, बुरी विचार धारा, उससे इस प्रकार के कार्य बलात् कराती रहती है जो दूसरों के लिए, समस्त समाज के लिए कष्टकारक होते हैं। अपने भौतिक लाभ की बात सोचते रहने से मनुष्य के स्वभाव में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, असत्य, दंभ, आलस्य, चोरी, अनीति, निष्ठुरता आदि अनेकों बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं और वे बुराइयाँ जब मनः क्षेत्र से बाहर निकल कर वाणी तथा क्रिया में प्रकट होती हैं तो उनका रूप कलह एवं कुकर्म के रूप में ही सामने आता है।

यह प्रवृत्ति एवं प्रक्रिया जब अधिक लोगों में अधिक मात्रा में बढ़ जाती है तब लोगों में प्लेग, हैजा, चेचक आदि महामारियों की तरह “सामाजिक अनाचार” का रोग फैल जाता है और उसके कष्टकारक परिणाम से सभी लोग नाना प्रकार के दुख पाते हैं। चोरी, बेईमानी, अनीति, हत्या, लूट, व्यभिचार, उद्दंडता, आलस्य, शोषण, विलासिता, संघर्ष, द्वेष आदि की अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ अनेक रूपों में फूट पड़ती हैं। जिससे व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सर्वत्र अशान्ति दीख पड़ती है। घर, परिवार, मुहल्ले, ग्राम, देश, राष्ट्र, समाज अनेक छोटी-मोटी घटनाओं एवं परिस्थितियों को लेकर आपस में टकराते, घायल होते, दुख पाते और बर्बाद होते हैं।

यों नदी नालों में होकर असीम मात्रा में पानी बह कर व्यर्थ जाता रहता है। पर यदि उसका सदुपयोग करना होता है तो उस जल को काम में लाने के लिए अनेक व्यवस्थाएँ बनानी पड़ती हैं। घाट, बाँध, नहर, पम्प, नाव, जहाज आदि साधनों की सहायता से वह भयंकर जलधारा जिससे हानि की ही आशा की जाती थी-बदल कर बड़ी उपयोगी एवं लाभदायक बन जाती है। यदि यह उपाय न किए जायं तो नदी नालों से लाभ मिलना तो दूर उलटे वे अनेक प्रकार से बाधक बनेंगे। यही बात मनुष्य की प्रवृत्तियों के संबंध में भी है। उसके भीतर से जो असुरता-स्वार्थपरता-हर घड़ी फूटती रहती है उसे नियंत्रित करने के लिए घाट, बाँध, नहर आदि की तरह धार्मिक-नैतिक-दैवी-भावनाओं के नियंत्रण स्थापित करने पड़ते हैं। यह तंत्र जब तक मजबूत रहता है-लोग एक दूसरे के प्रति अधिक उत्तम व्यवहार करते हैं, एक दूसरे के लिए त्याग और प्रेम का परिचय देते हैं फलस्वरूप सब के मन प्रसन्न रहते हैं, सामाजिक सुव्यवस्था कायम रहती है और साथ ही भौतिक उन्नति के साधन भी बनते हैं। पर जब यह धर्मतंत्र शिथिल होने लगता है तब असुरता की प्रवृत्ति अन्तरात्मा के भीतर सौम्य गति से कार्य करने वाली दैवी वृत्ति को परास्त करके अपनी प्रभुता स्थापित कर लेती है। और इस पृथ्वी पर नरक के दृश्य उपस्थित हो जाते हैं। नर-तनु व्याघ्र ही हाट-बाजारों में, घर-द्वार में, खेत-खलिहानों में, सभा-संस्थाओं, मन्दिर, मस्जिदों में, दफ्तर-राजद्वारों में, घूमते दिखाई पड़ते हैं। अपनी कुटिलता को छिपाने के लिए बातें बढ़-चढ़ कर बनाते हैं पर उनके कार्यों पर बारीक निगाह डालते ही नाक को सड़ा देने वाली गन्दगी उड़ती दिखाई पड़ती है।

जब धर्म तंत्र अधिक अस्त-व्यस्त हो जाता है तब उसकी मरम्मत करने के लिए- बड़े देवदूतों-अवतारों-पैगम्बरों-महापुरुषों के रूप में अत्यन्त प्रभावशाली आत्माएं आती हैं और अपने महान व्यक्तित्व, प्रबल पुरुषार्थ, एवं सद्पुरुषों के सहयोग से उस अव्यवस्था को रोक कर पुनः उस देवत्व की सामूहिकता की भावना को जन-मन में प्रवाहित कर देने में सफलता प्राप्त करती है। पर यह तो उस समय की बात है जब दुर्घटना की घोर विपन्न स्थिति आ जाए। साधारण समय में अवतारों की नहीं, ऋषियों की आवश्यकता रहती है। उन्हें ही ब्राह्मण भी कहते हैं। इस श्रेणी के व्यक्ति अपने आपको तप-त्याग, संयम, ज्ञान, उदारता एवं लोक-हित जैसी प्रवृत्तियों को कूट-कूटकर अपने अन्दर भरते हैं और एक मजबूत बाँध की तरह सुदृढ़ आधार पर खड़े होते हैं। फिर वे एक वज्र शिला की भाँति जन मानस की धारा को उचित दिशा में मोड़ने के लिए दृढ़ता पूर्वक अड़ जाते हैं। अपनी सीमित सामर्थ्य के अनुसार सीमित क्षेत्र वे चुनते हैं पर उसी क्षेत्र में अपने श्रेष्ठ व्यक्तित्व, उच्च आदर्श एवं प्रचण्ड पुरुषार्थ द्वारा सहस्रों मनुष्यों के भीतर असुरता-स्वार्थपरता-को घटाने एवं देवत्व-सामूहिकता को बढ़ाने में सफलता प्राप्त करते हैं। यह ब्राह्मण एवं ऋषि ही किसी जाति की सच्ची सम्पत्ति होते हैं। इनका मूल्य सोने की खानों और रत्न-राशियों से भी असंख्य गुना अधिक होता है। जिस देश में, जिस समाज में, सच्चे ब्राह्मण पैदा करते रहने की प्रसव शक्ति होती है उसकी विजय वैजन्ती सदा दशों दिशाओं में फहराती रहती है।

धर्म तंत्र का कलेवर अत्यंत विस्तृत हैं। वेद, शास्त्र, दर्शन, स्मृति ,पुराण आदि के सहस्रों ग्रन्थ मौजूद हैं। जप, तप, संयम, ध्यान, साधन आदि के अनेक विधान हैं। तीर्थयात्रा, ब्रह्मभोज, दान-पुण्य, कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, त्यौहार, संस्कार आदि अनेक कर्मकाण्ड हैं। इन सब का एकमात्र उद्देश्य यह है कि व्यक्ति अपनी अन्तरात्मा में ऐसे विचार, विश्वास, भाव एवं संस्कार धारण करे जिनके द्वारा उस की व्यक्तिगत स्वार्थपरता घटे और लघुता को महत्ता में-आत्मा को महान आत्मा-परमात्मा में विकसित करने की प्रेरणा मिले। सब के अन्तः करण में निवास करने वाली-प्राणिमात्र की एकता की सच के साथ आत्मभाव स्थापित करने की-विश्व मानव की उपासना ही, ईश्वराधना का तत्व ज्ञान है। इस दार्शनिक तथ्य को अध्याय, सत्संग, साधन, कर्मकाण्ड, दान-पुण्य आदि अनेक प्रकारों के माध्यम से हृदयंगम करने का प्रयत्न किया जाता है। परम्पराओं के अनुसार धर्म तंत्र के यह विधि-विधान तो चलते रहते हैं पर कालान्तर में उनके भीतर छिपे हुए- सिद्धान्तों, आदर्शों और तथ्यों को लोग भूलने लगते हैं। ब्राह्मणों-ऋषियों का कार्य इन उपचारों की सहायता से जन-साधारण की अन्तरात्मा में देवत्त्व की मनोवृत्ति को प्रदीप्त करना होता है। साधारण जनता के उथले मानसिक स्तर को देखते हुए वे अनेक आयोजनों की व्यवस्था करते हैं पर मूल लाभ एक ही रहता है कि मनुष्य अपनी शक्तियों से केवल अपना ही लाभ न सोचे-उसे अपनी क्षमता द्वारा दूसरों का हित करते रहने के महान तथ्य का भी ध्यान रहे-कम से कम दूसरों के अधिकारों का अनीतिपूर्वक हनन तो न करे। मनुष्यों की यह मनोवृत्ति जितनी ही प्रबल होती जाती है उतनी ही सुख-शान्ति की संभावना संसार में बढ़ती जाती है।

धर्मतंत्र की स्थापना एवं व्यवस्था का उद्देश्य यही है। अरबों रुपयों के विशाल भवन, देव-मन्दिर इसी दृष्टि से बने हैं। करोड़ों रुपयों का वार्षिक खर्च सन्त-महंत, पंडे, पुजारी, साधु ब्राह्मण अनेकों माध्यमों से जो कुछ करते हैं उसका उद्देश्य मूल यही है अवतार भी इसी कार्य के लिए होते हैं। साधु-ब्राह्मण भी इसीलिए तप त्याग करते हैं। पर आज तो स्थिति दूसरी हो रही है। धर्म-तंत्र का कलेवर खड़ा है, इमारतें खड़ी हैं, कर्मकाण्ड और विधि-विधान भी होते हैं, साधु ब्राह्मणों की 56 लाख मनुष्यों की एक बड़ी सेना भी मौजूद है, पर उद्देश्य का- आदर्श का लक्ष्य का-पता नहीं। फलस्वरूप जन-मानस के अन्तस्तल में धार्मिकता की आध्यात्मिकता की-श्रद्धा की-भावनाएं दिन-दिन शिथिल होती जाती हैं।

हमें स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य की व्यक्तिगत और संसार की सामूहिक सुख-शान्ति उस की अन्तरात्मा में निवास करने वाली सामूहिक पर, एक दूसरे के लिए त्याग और सहयोग करने की भावना पर ही निर्भर है। पाशविक वृत्ति-स्वार्थपरता पर नियंत्रण स्थापित करना ही असंख्य प्रकार के कष्टों पर विजय प्राप्त करना है। चूँकि यह कार्य भौतिक नहीं आन्तरिक है इसलिए इसे राजदंड आदि किसी बाह्य उपाय से पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए तो धर्म-तंत्र ही सर्वश्रेष्ठ प्रक्रिया है। इसकी रचना के लिए सत्पुरुष अपना जीवन बलिदान करते हैं और इसी के लिए भगवान तक दौड़े आते हैं। हमें इस धर्म-तंत्र की वर्तमान दुरावस्था पर विचार करना होगा और उसे पुनः सुव्यवस्थित करने के लिए मजबूत कदम उठाना होगा। तभी संसार की सुख-शान्ति को स्थिर रखने वाली मनुष्य की एकमात्र दैवी प्रवृत्ति-सामाजिक एवं सामूहिकता को सुव्यवस्थित रखा जा सकेगा।

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