हिन्दू धर्म का वास्तविक स्वरूप
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हिन्दू धर्म की एक बहुत बड़ी विशेषता “तर्क-प्रेम” है। यहाँ के विद्वानों ने विश्व की समस्याओं का जो समाधान किया है वह किसी एक व्यक्ति के कथन या किसी एक धर्म-पुस्तक के आधार पर नहीं है, वरन् चार-पाँच हजार वर्ष तक लगातार दार्शनिक और धार्मिक समस्याओं पर निष्पक्ष भाव से विचार करके उन्होंने कुछ निष्कर्ष निकाले हैं। इसे ब्राह्मण सभ्यता कहते हैं, क्योंकि इसका संचालन उन ब्राह्मणों के हाथ में था जो किसी बात का निर्णय करते समय मन के किसी विकार या लोभ से विचलित नहीं होते थे और आत्मा के सच्चतम् सिद्धान्तों की खोज करते थे।
जगत की जिस विशेषता ने हिन्दू दार्शनिकों को सत्य के अनुसंधान की ओर आकर्षित किया, वह है इसकी-अनित्यता। उन्होंने देखा कि हम जिस जगत को देखते हैं उसमें बराबर परिवर्तन होता रहता है।
उन्होंने अपने मन में प्रश्न किया कि- “क्या वह अनित्यता ही संसार का वास्तविक सत्य स्वरूप है, अथवा इस परिवर्तन और विनाश की कोई सीमा भी है?” उन्हें उत्तर मिला-”जगत में एक ऐसी वस्तु भी है जो नित्य है, अविनाशी है-वह है परब्रह्म।” हम सब के जीवन में कभी ऐसा समय आ जाता है जब हम इस अनन्त सत्य की अनुभूति करते हैं, जब हमें इस महान रहस्य का किंचित आभास मिलता है। जब हमारे जीवन में कोई बहुत बड़ी शोकपूर्ण घटना होती है और जब हमें ऐसा प्रतीत होने लगता है कि हम बिल्कुल दीन, हीन और सर्वथा अनाथ हैं, उस समय भी हमारे हृदय में स्थित परमात्मा हमें बराबर यह अनुभव कराता है कि ये साँसारिक दुःख, आपत्तियाँ तो उस बड़े नाटकीय क्षुद्र घटनाएं मात्र हैं जिसका अंत शक्ति, सौंदर्य और प्रेम में होगा। उपनिषद् स्पष्ट वाणी में कह रहे हैं कि -”यदि इस विश्व में आनन्द न होता तो यहाँ कोई जीव प्राण धारण ही कैसे करता?” वास्तव में यह दिखलाई पड़ने वाला जगत उसी एक ब्रह्म की तरह-तरह के रूपों में अभिव्यक्ति है, जो समस्त सृष्टि का आधार है।
इस प्रकार अति प्राचीन काल से एकेश्वरवाद ही हिन्दू धर्म का मुख्य आदर्श रहा है। ऋग्वेद में सर्वत्र उस एक ही परमात्मा-”एकम् सत्” का जिक्र आया है जिसका वर्णन पंडित लोग नाना रूपों में करते हैं। उपनिषदों में बताया गया है कि एक ही ब्रह्म अनेक रूपों में प्रकट होने के कारण अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। त्रिमूर्ति-ब्रह्मा, विष्णु, महेश की कल्पना महाकाव्य रचने वालों ने की और पुराणों के लेखकों ने उसे खूब अच्छी तरह पक्का कर दिया। सृष्टि के तीन गुण-सत, रज, तम से ही इन देवताओं की कल्पना की गई। विश्व के रक्षक विष्णु-परमात्मा के सत्व-प्रधान रूप हैं, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा उसी ईश्वर के रजोगुण प्रधान रूप हैं, और सृष्टि संहारक शैव उसी ईश्वर के तमः प्रधान रूप को प्रकट करते हैं। एक ही ईश्वर के तीन विभिन्न गुणों को विकसित करके तीन विभिन्न व्यक्ति बना दिया गये हैं और इनमें से प्रत्येक अपनी ही विशेष शक्ति से काम करता है। इस विचार से रमा, सरस्वती और उमा की भी कल्पना कर ली गई। सच तो यह है कि ये सभी गुण एक ही परमात्मा में इस प्रकार मिले हुये हैं कि हम यह भी नहीं कह सकते कि परमात्मा निर्गुण है। एक ही अज्ञेय, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान ईश्वर भिन्न-भिन्न लोगों को भिन्न-भिन्न प्रकार का प्रतीत होता है। एक प्राचीन शास्त्र का कहना है कि साधकों की सुविधा के लिए ही निराकार परमात्मा को साकार कल्पित कर लिया गया है।
दार्शनिक मनोवृत्ति के व्यक्ति उदार विचारों के होते हैं। उसी की प्रेरणा से विभिन्न श्रेणी के व्यक्तियों की बुद्धि के अनुसार हिन्दू लोग विभिन्न सम्प्रदायों में दोष नहीं समझते। भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न धर्मों या मतों के अनुयायी बनें यह तो बिल्कुल स्वाभाविक ही है। डंडे या तलवार के जोर से किसी का धर्म परिवर्तन कराना हिन्दू-मस्तिष्क को सर्वथा निरर्थक बात जान पड़ती है। जब आर्य लोग इस देश के उन आदि-निवासियों से मिले जो भाँति-भाँति के देवताओं की पूजा करते थे तो उन्होंने एकाएक उनके मतों को दबा देने की बात नहीं सोची क्योंकि उनके मत से आखिर सभी लोग उसी एक परमात्मा की तलाश में हैं। भगवत् गीता का कथन है कि-”यदि कोई उपासक भगवान के श्रेष्ठतम स्वरूप तक नहीं भी पहुँच सका है, तो भी वह उसकी प्रार्थना को अस्वीकार नहीं करते।” हिन्दू दार्शनिक यद्यपि स्वयं बहुत ऊँचे आदर्श का पालन करते थे, पर वे यह भी जानते थे कि साधारण मनुष्य एकाएक उन तक नहीं पहुँच सकते। इसलिये उन्होंने आदि निवासियों पर किसी प्रकार का बर्बरतापूर्ण बल प्रयोग नहीं किया, वरन् बड़ी सावधानी से उनके विचारों का विकास करने लगे। अज्ञान के कारण लोक में जिन नीचे दर्जे के देवताओं की उपासना हो रही थी, उसे भी उन्होंने स्वीकार कर लिया, केवल इतना कहा कि वे सब भी उसी एक परम महान ईश्वर के अधीन हैं-
अष्सु देवा मनुष्याणाँ, दिवी देवा मनीषिणाम्।
बातानाँ काष्ट लोष्टषु, बुद्धास्त्वात्मिन देवतः॥
“कुछ लोगों के देवता जल में, कुछ के स्वर्ग में, और कुछ के लकड़ी, पत्थर आदि साँसारिक पदार्थों में पाये जाते हैं, पर विद्वान अपने सच्चे परमात्मा को अपनी आत्मा में ही पाते हैं।” इसी प्रकार के एक अन्य
श्लोक में कहा गया है-
अग्नौ कृत्यवतो देवो, हृदि देवो मनीषणाम्।
प्रतिमा स्वोल्पल बुद्धिनाम् ज्ञानिनाँ सर्वतः शिवः॥
“कर्मशील व्यक्ति का ईश्वर अग्नि में, भावुक का भगवान हृदय में, मन्द बुद्धि का मूर्ति में एवं ज्ञानी का परमात्मा सर्वत्र ही निवास करता है।”
हिन्दू धर्म तथा दर्शन में माना जाता है कि समय-समय पर आने वाला सृष्टि और प्रलय का चक्र उस एक ही विश्वात्मा के विकसित तथा संकुचित होने का चिह्न है। वह विश्वात्मा सदा अपरिवर्तनशील भी रहता है, और परिवर्तनशील भी। समस्त संसार उसी ईश्वर का व्यक्त अथवा दिखाई पड़ने वाला रूप है। सायणाचार्य का कहना है कि “परमात्मनःसर्वेऽपि पदार्थाः-आविर्भावोपाधेयाः” अर्थात् संसार में दिखलाई पड़ने वाले समस्त पदार्थ परमात्मा के आविर्भाव के उपाधेय हैं। ये पदार्थ भिन्न-भिन्न दर्जों में बाँट दिये गये हैं। “इनमें से जो साँस लेते हैं वे श्रेष्ठ, उनमें वे श्रेष्ठ हैं जिनके मस्तिष्क या बुद्धि का विकास हुआ है, उनमें वे श्रेष्ठ हैं जो ज्ञान का प्रयोग करते हैं, और सर्वश्रेष्ठ वे हैं- जिन्होंने प्राणिमात्र में ब्रह्म की एकता का अनुभव कर लिया है अर्थात् जो समस्त प्राणियों को ब्रह्म का अंश और इस प्रकार आ भवत् समझते हैं” (मनु.)
मनुष्य के भीतर जो अनन्त की भावना है वह इस ‘सान्त’ (अन्त होने वाले) संसार के नाशवान रूप से संतुष्ट नहीं होती। मनुष्य के दुःखों का वास्तविक कारण यही है कि वह अपने भीतर ईश्वर को नहीं देख पाता। अपने भीतर की अनन्त की भावना को हम जीवन में जितना अधिक व्यवहार में लाकर दिखला सकेंगे, हम उतने ही उच्च समझे जायेंगे। इस प्रकार की अनन्त भावना की बहुत प्रबल अभिव्यक्तियाँ पूर्ण ईश्वर का संसार में प्रकट होना नहीं है। वे तो उसी महान शक्ति की उच्च अभिव्यक्तियाँ। जिनकी सामान्य अभिव्यक्ति मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों में पाई जाती है। गीता का वचन है कि-”यद्यपि ईश्वर सभी पदार्थों में है, पर वह विशेष रूप से उसी पदार्थ में व्यक्त होता है जिसमें महत्ता पायी जाती है।” हिन्दू धर्म किसी ऐसे परमात्मा में विश्वास नहीं करता जो अपने सिंहासन पर बैठा-बैठा प्रत्येक व्यक्ति को जाँचता है और उसके भले बुरे कर्मों का निर्णय किया करता है। हिन्दू धर्म के अनुसार वह ईश्वर मनुष्य में ही है, और वह कर्म करके उन्नति के किसी भी शिखर पर चढ़ सकता है।

