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Magazine - Year 1959 - Version 2

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मानव-जीवन में समन्वयवाद की आवश्यकता

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(श्री गोविंद प्रसाद त्रिपाठी ‘अनल’ एम. ए.)

संसार के प्रत्येक भाग में और विशेषतः सभ्य देशों में अनेक प्रकार के ‘वाद’ या सिद्धाँत पाये जाते हैं, जैसे राजतंत्रवाद, साम्राज्यवाद, अधिनायकवाद, प्रजातंत्रवाद, समाजवाद आदि। इसी प्रकार धार्मिक क्षेत्र में भी अनेक प्रकार की विचारधारायें प्रचलित हैं जो एक दूसरे से टकराती रहती हैं। इस प्रकार के ‘वादों’ का एक खास लक्षण यह होता है कि वह अपने विचार वालों का तो स्वागत करता है, और दूसरी प्रकार के विचार वालों से घृणा करता है अथवा कम से कम उदासीन रहता है। यह अवस्था मानव-समाज की सुख-शाँति की दृष्टि से वाञ्छनीय नहीं है, क्योंकि इसमें मनुष्यों में पृथकता का भाव उत्पन्न होता है और वे पारस्परिक सहयोग के अमूल्य तत्व से वंचित हो जाते हैं। इसलिये बुद्धिमान मनुष्यों का कर्तव्य है कि वे मतभिन्नता के रहते हुये भी अपने विचारों में समन्वय को स्थान दें और ऊपरी साधारण मतभेदों को महत्व न देते हुए मानव मात्र की एकता के सिद्धाँत को दृष्टिगोचर रखें।

ऐसे समन्वयवाद के दो स्वरूप हो सकते हैं- एक आध्यात्मिक और दूसरा भौतिक। आध्यात्मिक समन्वयवाद आत्मज्ञान के आधार पर ‘महासमन्वय’ (ब्रह्म) और “समन्वित” (जीव व जगत) की तात्विक एकता की बात को स्वीकार करता है। “योगवसिष्ठ” में इसकी व्याख्या करते हुये स्पष्ट रूप से कहा गया है-

इमे समुद्राः गिरयः ब्रह्माँडानि जगंति हि।

मम अन्तकरणस्य एव खंडाः वहिः स्थिताः॥

अर्थात्-”ये समुद्र, पर्वत, ब्रह्माण्ड और जगत मेरे ही अन्तःकरण के खण्ड हैं, जो बाहर स्थित हैं।”

इससे पृथक आध्यात्मिक समन्वय के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में भौतिक समन्वयवाद का विशेष हाथ है। वह मनुष्य समाज के बीच सब प्रकार सामंजस्य की स्थापना द्वारा उसका कल्याण चाहता है और जगत में फैली हुई अनेकता, विविधता एवं भेद दृष्टि को यथासंभव कम करना चाहता है।

इस प्रकार भौतिक समन्वयवाद का रूप एक सामाजिक दर्शन या विज्ञान का सा है। उसका समर्थन तर्क और न्याय के आधार पर भी होता है। मानव-धर्म शास्त्रकार ने कहा है कि “यस्तर्केणानु-संधत्तेस वेद धर्म नेतरः।” अर्थात् धर्म वह है जिसका अनुसंधान तर्क द्वारा होता है। समन्वयवाद का आधार तर्क है अतएव वह सच्चा धर्म है।

सत्कार्य का मूल है-मानव मस्तिष्क का सद्विचार। समन्वय एक सत्कार्य है, अतएव उसकी प्रतिष्ठा के लिये सद्विचार अथवा सद्भावना की बहुत बड़ी आवश्यकता है। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अनेक उपायों द्वारा समाज में समन्वय स्थापन की चेष्टा की जाती है, पर उसमें पूर्ण सफलता नहीं मिलती। इसका एकमात्र कारण मनुष्यों के मन में सद्विचारों का अभाव ही होता है।

दुराग्रह समन्वयवाद के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। मनुष्य की रूढ़िग्रस्त या उग्र-बुद्धि दुराग्रह का मूल कारण होती है। इस प्रकार की बुद्धि में सत् और असत् तथा उचित और अनुचित का निर्णय करने की योग्यता नहीं होती। रूढ़ावस्था में वह अडिग और उग्रता के समय आवश्यकता से अधिक चंचल होती है। ऐसी दशा में समन्वय का कल्याणकारी मार्ग ढूंढ़ सकना असंभव होता है। अतएव समन्वय के लिये दुराग्रह का परिहार और सत्य का आग्रह होना अनिवार्य है।

व्यावहारिकता भी समन्वयवाद का मुख्य आधार है, क्योंकि कार्य-व्यवहार का मार्ग अवरुद्ध होने पर समन्वय का महत्व नहीं माना जा सकता। समन्वय की पूर्ण सिद्धि इसी अवस्था में है जब विश्व के विचारों और कार्यों में अनेकरूपता होते हुए भी व्यष्टि और समष्टि का कार्य-व्यवहार बन्द न हो। इसी प्रकार समत्व का विवेक समन्वयवाद के आधारभूत तत्वों में प्रधान है। इससे मनुष्य के मन में समानता और न्याय की भावना उत्पन्न होती है। जहाँ इस प्रकार का विवेक नहीं है वहाँ वैमनस्य, संघर्ष और अशाँति का होना अवश्यम्भावी है।

भारतीय संस्कृति और साहित्य में समन्वय की भावना अति प्राचीन काल से है। वेदों में तो आप से आप समन्वय की भावना आ गई है। कर्म, उपासना और ज्ञान का जो समन्वित विवेचन उनमें किया गया है, वह इस बात का प्रमाण है। वैदिक काल के उपरान्त जब हम धार्मिक समन्वय से दूर जाने लगे तो बड़ा विरोध फैला, कर्म, उपासना और ज्ञान के पृथक-पृथक समर्थकों ने एक दूसरे की तीव्र आलोचना करना प्रारम्भ कर दिया। यह विरोध केवल विचार-गत ही न था वरन् कार्य और वस्तुगत भी था। “प्लवाह्मेते अदृढ़ा यज्ञ रूपा” आदि उक्तियाँ, जिनमें कर्म के अंतर्गत यज्ञ की आलोचना की गई है, इसी प्रकार की है। शंकराचार्य जी ने ज्ञान का समर्थन करने के लिये ‘कर्म’ का जो स्पष्ट विद्रोह किया उसे सभी विद्वान जानते हैं। उन्होंने कहा-

कर्मणा बध्यते जंतुः विद्यया च विमुच्यते।

तस्मार्त्कम न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः॥

पारस्परिक संघर्ष और विरोध की ये बातें विभिन्न आचार्यों द्वारा बहुत समय तक फैलाई जाती रही। तो भी हिन्दू धर्म के सर्वाधिक प्रचलित महत्व पृथक-पृथक स्वीकार किया गया था, जो समन्वय की भावना का ही द्योतक था।

बौद्ध युग में “समवायो एव साधु” अर्थात् आपस का मेल मिलाप ही अच्छा है-इस समन्वयवाद की भावना का सर्वत्र प्रचार था। इसी के द्वारा बुद्ध ने जातिगत असमानता और वैषम्य को अस्वीकार कर सभी धर्मावलम्बियों के बीच समन्वय की स्थापना की और सबके लिये आत्म-ज्ञान तथा धर्म का मार्ग खोल दिया।

बौद्धों के पतन के बाद ब्राह्मणों में आपसे आप समन्वय की भावना उत्पन्न हुई और उन्होंने बौद्धधर्म के मुख्य-2 सिद्धाँतों के साथ समन्वय स्थापित कर लिया, जिससे उनके और बौद्धों के बीच व्यवहार का मार्ग निकल आया। एक लेखक के मतानुसार वर्तमान हिन्दू धर्म वैदिक धर्म और बौद्धमत का समन्वित रूप ही है।

मुसलमानी काल में हिन्दी के संत और सूफी कवि, जिनमें कबीर और जायसी प्रसिद्ध हैं आध्यात्मिक और भौतिक समन्वय के बड़े पक्के समर्थक थे। सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक और संत-शिरोमणि गो. तुलसीदास ने भी समन्वय-सिद्धाँत का प्रचार किया था। ये सब महापुरुष जाति और धर्म के छोटे-मोटे भेदों को भुलाकर मानवता को ही सर्वप्रधान महत्व देते थे और इस प्रकार उन्होंने धार्मिक जगत में समन्वय का संदेश उच्च स्वर से घोषित किया। गुरु नानक ने अपने ग्रंथ-साहब में कहा है- “अव्वल अलह नूर उपजाया कुदरत के सब बन्दे। एक नुर से सब जग उपजाया कौन भले को मंदे।” इसी प्रकार तुलसीदास जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा-

सब मम प्रिय सब मम उपजाये।

सब ते अधिक मनुज मोहि भाये।

जाति-पाति कुल धर्म बड़ाई।

धन बल परिजन गुन चतुराई।

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।

मानहुँ एक भगति कर नाता ॥

इस प्रकार भारतवर्ष सदा से एक समन्वयवादी देश रहा है और यहाँ सदा ऐसे व्यक्ति उत्पन्न होते रहें हैं जो ऐसे समय या समझौते के समर्थक थे। यही कारण है कि संसार की अनेकों जातियाँ इस देश में आकर यहाँ के समाज में समाविष्ट हो गई और उनके द्वारा यहाँ को संस्कृति में कुछ नये उपयोगी तत्वों का भी समावेश हो गया। इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है। जिस जाति और धर्म के पूर्व पुरुषों ने सब मनुष्य ही नहीं प्राणीमात्र और पंचभूत की एकता का उपदेश दिया है वह तुच्छ मतभेदों को कब महत्व दे सकती थी ! यहाँ के धर्म का तो मूल सिद्धान्त ही समन्वय का सार है-

सर्वभूतेषु चात्मा नं, सर्वभूतानि चात्मनि। समं पश्यति आत्मयाजी, स्वराज्य मधि गच्छति॥

“जो सब प्राणियों में अनेकों और सब प्राणियों को अपने में देखता है वही मोक्ष को प्राप्त करता है।”

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