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Magazine - Year 1959 - Version 2

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तपोभूमि में युग निर्माण-इंजीनियरों का प्रशिक्षण

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नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए एक ठोस प्रयत्न

गत अंक में तपोभूमि में साँस्कृतिक विद्यालय खुलने की चर्चा थी। अब यह शिक्षा कार्यक्रम इसी बसन्त पंचमी से विधिवत् आरम्भ किया जा रहा है। राष्ट्र-निर्माण के लिए जिस प्रकार इंजीनियर, सैनिक, चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिल्पी, कलाकार, अध्यापक, उत्पादक, विशेषज्ञ आदि महत्वपूर्ण व्यक्तियों की भारी संख्या में आवश्यकता होती है उसी प्रकार युग-निर्माण के लिए-जनता का मानसिक एवं नैतिक स्तर ऊँचा रखने के लिए सुयोग्य, सच्चे एवं सेवाभावी जन-नायकों की आवश्यकता होती है। तपोभूमि का यह विद्यालय राष्ट्र की इसी महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा करने के लिए अग्रसर हो रहा है।

छात्रों के व्यक्तिगत गुणों को विकसित करने का प्रयत्न सबसे पहले किया जायगा। सचाई, ईमानदारी, उदारता, परिश्रमशीलता, मधुरता, संयम, शिष्टाचार, सेवा भावना के सद्गुणों का, प्रतिभा का, स्वभाव का, चरित्र का सुव्यवस्थित निर्माण इस प्रकार किया जायगा कि वह अपनी विशेषताओं के कारण समीपवर्ती लोगों का दिल जीत सके और उन पर अपना गहरा प्रभाव स्थापित कर सके।

जन समाज की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक, आदि अनेकों समस्याओं पर अनेक दृष्टिकोणों द्वारा तुलनात्मक अध्ययन कराया जायगा ताकि छात्र समस्याओं के विभिन्न पहलुओं पर विचार करके सुस्थिर धारणा बना सके और जनता की अनेक शंकाओं का समाधान कर सके। रामायण और गीता का विशिष्ट अध्ययन कराया जायगा। वेदों की महत्वपूर्ण शिक्षाओं का सार कैसी अद्भुत शैली के साथ इन दो ग्रन्थों में मौजूद है, इन ग्रन्थों को, उनसे सन्निहित आधारों को युग-निर्माण का माध्यम किस प्रकार बनाया जा सकता है, इस तथ्य को समझने का अच्छा अवसर छात्रों को मिलेगा।

स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए दैनिक खेल-कूद, व्यायाम, आसन, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, लाठी चलाना आदि का शिक्षा क्रम रहेगा। स्काउटिंग, फस्ट एड, शरीर विज्ञान, आहार शास्त्र, हाइजिन, रोगी परिचर्या, घरेलू सामान्य चिकित्सा आदि की शिक्षा देकर यह प्रयत्न किया जायगा कि छात्र स्वयं स्वस्थ रहें और अपने सम्बन्धियों को निरोग रखे।

सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने योग्य योग्यताओं में लेखनी, वाणी और रचनात्मक संगठनात्मक कार्यप्रणाली यह तीन बातें मुख्य हैं। वाणी की शक्ति तोप तलवारों से अधिक है। जिसने बोलना सीख लिया उसने बहुत कुछ सीख लिया। लेखनी की शक्ति इससे भी अधिक है। उसमें स्थायित्व अधिक है। दूर देशों तक फैले हुए असंख्य जनसमुदाय को चिर काल तक प्रभावित करते रहने की शक्ति लेखनी में ही है। रचनात्मक एवं संगठनात्मक कार्यों द्वारा जनता का उत्साह उभारा जाता है और उसे एक विशेष दिशा में कार्य संलग्न किया जाता है। जन नेतृत्व के लिए इन तीनों की योग्यताएँ प्राप्त करना, इनके आधार पर भूत रहस्यों को समझना आवश्यक है। तपोभूमि विद्यालय में इन तीनों ही बातों का समुचित शिक्षण होगा।

वक्तृत्व कला के अंतर्गत साधारण बातचीत का ढंग, लोगों को प्रभावित करने वाले तथ्यों का ज्ञान, भाषण के समय, भाव-भंगिमा, संक्षिप्त और सारगर्भित बात करना, वार्तालाप में मनोरंजन की मर्यादा, सभाओं में व्याख्यान तथा गोष्ठियों में प्रवचन करने के अन्दर, शंकाओं का समाधान, तर्क प्रमाण और उदाहरणों की प्रचुरता का ध्यान रखना आदि तथ्यों को समझना आवश्यक है। भाषण के समान ही-वरन् उससे भी कुछ अधिक गायन का महत्व है। जिन्हें भगवान ने मधुर कंठ दिया है, वे संगीत और गायन के आधार पर जनता को भाव तरंगित करके किसी विशेष दिशा में आसानी से मोड़ सकते हैं।

विद्यालय में भाषण और गायन की-सामान्य संगीत की-आवश्यक शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है।

लेखनी विभाग के अंतर्गत-निबन्ध रचना, विज्ञप्तियाँ, परिपत्रिकाएँ तथा पुरस्कार लिखना, ग्रन्थ, निर्माण, अनुवाद, पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखना, सम्पादन, पुस्तक प्रकाशन, प्रकाशित साहित्य का विक्रय, विज्ञापन, लेखक की कठिनाइयाँ, पुस्तक प्रकाशन में हानि के कारण, अखबारों को असफल बनाने वाले खतरे आदि वे बातें भी सिखाई जायेंगी, जो वर्षों के अनुभव से ही आती हैं तथा जिनकी शिक्षण व्यवस्था भारत में अन्यत्र कहीं नहीं है।

इस संस्था के तत्वावधान में सैकड़ों पुस्तकों का लेखन प्रकाशन हुआ है। अपना निज का अच्छा प्रेस है। ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ निकलती है तथा अगले मास में ‘जीवन यज्ञ’ नामक एक उच्च कोटि का पाक्षिक पत्र निकलने जा रहा है। इन पत्रिकाओं के परिवर्तन में सैकड़ों पत्र पत्रिकाएं आते हैं, जिन्हें देखने, पढ़ने और समझने से पत्रकारिता सम्बन्धी अनेक बातें सहज ही समझ में आ सकती हैं।

लेखक, प्रकाशक और पत्रकार बनने की महत्वाकाँक्षा रखने वाले के लिए प्रेस व्यवसाय सम्बन्धी जानकारियाँ प्राप्त करना भी आवश्यक है। प्रेस चलाना एक सम्मानास्पद, थोड़ी पूँजी से चल सकने वाला तथा अच्छे लाभ का व्यवसाय है। इस व्यवसाय की आरम्भ से अन्त तक पूरी सैद्धान्तिक तथा क्रियात्मक शिक्षा विद्यालय में दी जायगी। कम्पोजिंग, करेक्शन, छपाई, प्रूफ रीडिंग, बाइंडिंग, स्टीचिंग, रबड़ की मुहरें बनाना आदि कार्यों को सीखने के बाद अपना प्रेस खोलना सरल है ही। विशेष परिस्थितियों में किसी प्रेस में नौकरी करके भी अपनी आजीविका कमाई जा सकती है।

रचनात्मक एवं संगठनात्मक कार्य, लोक सेवा, समाज में फैली हुई बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा संस्थाओं का संचालन, लोक मानस तैयार करना, शिक्षण शिविर चलाना, सामूहिक श्रमदान, उत्सव आयोजनों का प्रबन्ध एवं व्यवस्था, जनता को एकत्रित करना, उत्साहवर्धक प्रदर्शन आदि लोक सेवाओं के कार्यों की बारीकियाँ समझाई जायेंगी, जिनका जानना साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है।

विद्यालय में प्रवेश के नियम बड़े सरल हैं। लगभग मैट्रिक योग्यता के 18 से 50 वर्ष के भीतर आयु के निरोग, परिश्रमी, सदाचारी एवं अनुशासन प्रिय छात्र इसमें प्रवेश पा सकेंगे। यों साधारणतः भोजन व्यय का भार जो लगभग 15), 20) मासिक पड़ने की संभावना है, छात्रों से स्वयं ही उठने की आशा की गई है, ऐसा ही नियम भी रखा गया है। पर जो छात्र केवल इसी कठिनाई के कारण शिक्षा से वंचित रह रहे होंगे उनके लिए भोजन प्रबन्ध भी तपोभूमि की ओर से कर दिया जायगा।

यों साधारणतया शिक्षार्थियों तथा उनके अभिभावकों की रुचि इस बात में होती है कि कालेज की डिग्री प्राप्त कर नौकरी करली जाय और गुजारे का प्रश्न हल किया जाय। पर कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो केवल रोटी की बात तक ही सीमित न रहकर मानव जीवन की महानता के अनुरूप गौरवपूर्ण जिन्दगी जीने की बात सोचें। तपोभूमि विद्यालय ऐसे शिक्षार्थियों के लिए उपयुक्त अवसर है। यों इस शिक्षा क्रम को पूरा करने वाला आजीविका की दृष्टि से भी भूखा नंगा नहीं रह सकता। प्रवचन, वक्तृत्व, लेखन, प्रेस व्यवसाय आर्थिक समस्या को भी हल करने को हैं-पर मुख्यतया यह शिक्षा महापुरुष बनने की, लोक नायक बनने की-मानव जीवन के अनुरूप गौरवपूर्ण स्थिति प्राप्त करने की, सेवा मार्ग अपनाकर लोक परलोक सँभालने की शिक्षा है।

युग निर्माण के लिए ऐसे महापुरुषों, धर्म मर्यादा बनाने वाले इंजीनियरों की आज भारी आवश्यकता है। इसी कमी को पूरा करने के लिए यह विद्यालय स्थापित किया गया है। अखण्ड-ज्योति एवं गायत्री परिवार के सदस्य इस योजना को बनाने में सहयोग करें। जो इस प्रकार के जीवन में प्रवेश करने में अभिरुचि रखते हों उनके लिए यह अलभ्य अवसर है। हमें आशा है कि परिवार के अनेक सदस्य इस शिक्षा से लाभ उठाने के लिए आगे आवेंगे।

प्रत्येक पाठक का कर्तव्य है कि विद्यालय के लिए सुयोग्य छात्र तलाश करें। प्रत्येक क्षेत्र में यहाँ के शिक्षित छात्र होंगे तो उधर उनके प्रयत्न से धर्म जागृति का कार्यक्रम उत्साहपूर्वक चलेगा। इसलिए गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा तथा परिवार का प्रत्येक सदस्य यह प्रयत्न करें कि जो इस शिक्षा के उपयुक्त हों उन्हें इस शिक्षा के लिए उत्साह एवं प्रेरणा देकर मथुरा भिजवाने का प्रयत्न करें। यहाँ के शिक्षित हजारों छात्र प्रत्येक क्षेत्र में हों तो ही तपोभूमि का महान् लक्ष्य पूरा होगा। अयोग्य छात्रों की आवश्यकता नहीं सुयोग्य छात्र ही उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकते हैं। विद्यालय में उपयुक्त छात्रों का प्रवेश करना एक आवश्यक कार्य है जिसे पूरा करने में हम सबको शक्तिभर प्रयत्न करना चाहिए। बसन्त पंचमी से आरम्भ होने वाले के लिए जो छात्र तैयार हों उनके आवेदन पत्र जल्दी ही भिजवा देने चाहिएं।

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