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Magazine - Year 1959 - Version 2

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मानवता और गायत्री

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(श्री स्वामी सदाशिव जी महाराज, प्रज्ञान-मन्दिर, अहमदाबाद)

[आजकल जिस समय में होकर हम गुजर रहे हैं वह मानव जाति के इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसे हम निश्चित रूप से ‘युग-परिवर्तन’ के काल की संज्ञा दे सकते हैं। इसमें शाँति या अशाँति-किसी मार्ग से एक “नई दुनिया” की रचना होकर रहेगी, जिसमें काल क्रम से उत्पन्न हो गई विकृतियों को दूर करके समयानुकूल “संविधान” को लागू किया जायगा। यद्यपि इस समय संसार में पश्चिमी देशों की प्रधानता है और वहीं की वैज्ञानिक सभ्यता, जल, थल, आकाश में प्रभुता स्थापित किए हुये है, पर उस अतिशीघ्र आने वाले भावी-युग की सभ्यता की स्थापना वैदिक विज्ञान सम्पन्न भारतीय ही करेंगे। इसी विषय का विवेचन दिव्य विज्ञान के ज्ञाता विद्वान लेखक ने किया है। उन्होंने अपने लेख में दैवी जगत का जो गूढ़ रहस्य प्रकट किया है, वह तो एक साधारण पाठक के लिए अत्यन्त दुरूह और बोधगम्य न होने और साथ ही बहुत लम्बा होने से छोड़ दिया गया है पर गायत्री प्रचार की आवश्यकता के सम्बन्ध में उनके उपयोगी सुझावों को इस लेख में विशेष रूप से स्थान दिया गया है।]

संसार में एक भयंकर और खराब समय आता दिखलाई पड़ रहा है। पर साथ ही दुष्टता की ओर दुष्टों की अवधि भी समीप ही जान पड़ती है। जैसे खेत में बहुत सी बेकार घास पैदा हो जाती है और उसी के बीच-बीच में उपयोगी अन्न का पौधा भी होता है, इसी प्रकार संसार में सर्वत्र भरे पड़े दुष्टों के साथ-साथ थोड़े से सदाचारी सत्पुरुष भी पृथ्वी तल पर फैले हुये हैं। आगामी भयंकर काल में से उन सदाचारी पुरुषों को बचाना आवश्यक है और इसके लिए ऐसे सत्पुरुषों का एक सुदृढ़ महा-संगठन बनना ही हमारा कर्तव्य है।

इस समय अति विकसित भौतिक विज्ञान की कृपा से समग्र विश्व समाज नीति, राजनीति की दृष्टि से शृंखला-बद्ध हो चुका है और इसीलिए आज पृथ्वी का कोना-कोना क्रिया और प्रतिक्रियात्मक आन्दोलन से आन्दोलित हो रहा है। वैज्ञानिक आविष्कारों द्वारा प्रस्तुत सुख-सामग्री, कुछ अपवादों को छोड़कर पृथ्वी के प्रत्येक भाग में पहुँच चुकी है। पूर्वकाल के महासिद्ध पुरुषों ने ही वर्तमान समय में वैज्ञानिकों का रूप धारण करके ‘प्रेयस’ (भोग) सामग्री को मनुष्य मात्र के लिये सुलभ बना दिया है और इस प्रकार समस्त संसार को अपने जाल में घेर लिया है। हम शाश्वत सनातन धर्मावलम्बी ब्राह्मण गण भी इन ‘प्रेयस कामी’ वैज्ञानिकों से उपकृत हुये हैं। अब उस ऋण (अधम ऋण) का बदला महाऋण के रूप में चुकाने का अवसर आ पहुँचा है।

जिस प्रकार कोई मोक्षाभिलाषी धनवान व्यक्ति बाह्य धन सम्पत्ति द्वारा किसी संत की सेवा करके मुक्ति मार्ग का पथिक बन जाता है, उसी प्रकार इन योगभ्रष्ट सिद्ध प्रेयसकामी वैज्ञानिकों ने, भाँति-भाँति की प्रेयस-सामग्री द्वारा भारतीय ऋषियों की सेवा करके, ‘श्रेयस’ का अधिकार प्राप्त कर लिया है। यह सत्य है कि अभी तक केवल ‘श्रेयस’ मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति भारत में ही पाये जाते थे, पर अब जो परिवर्तन का समय आ रहा है उसमें यह एकाधिपत्य भारतवर्ष का ही नहीं रहेगा वरन् अन्य देशों में भी इस ‘श्रेयस’ भाव का प्रचार हो जायगा।

वास्तविक बात यह है कि भारतीय वेद ही ‘श्रेयस’ विद्या है, जिसके तीन विभाग हैं। प्रथम “क्रियाशक्ति प्रधान संहिता-भाग,” द्वितीय “इच्छा शक्ति प्रधान मंत्र भाग,” तीसरा “ज्ञान शक्ति प्रधान उपनिषद् भाग“। पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक हमारे वेद के संहिता भाग से “क्रिया शक्ति” की गवेषणा करके ही भौतिक उन्नति की पराकाष्ठा तक पहुँच गये हैं। इधर कुछ भारतीय विद्वान पश्चिमी देशों में जाकर “ज्ञान शक्ति प्रधान उपनिषद् भाग“ का भी प्रचार कर आये हैं, जिससे वहाँ के वैज्ञानिक हमारे ज्ञान-मार्ग से भी कुछ-कुछ परिचित होते जाते हैं। पर जो वेद की “इच्छा शक्ति प्रधान मन्त्र-विद्या” है उससे अभी तक पाश्चात्य देशवासी वंचित है। वैसे मन्त्र-भाग के ग्रन्थ भी उनके पास हैं, पर उन मन्त्रों में जो “ऋषि देव और छन्द” का विज्ञान है उससे वे लोग अपरिचित हैं। यही कारण है कि अपने ज्ञान और विज्ञान का प्रयोग केवल “प्रेयस” पदार्थों की प्राप्ति में कर रहे हैं और “श्रेयस” मार्ग से दूर रहने के कारण वास्तविक सुख शान्ति के अधिकारी नहीं बन सकते हैं। उन लोगों ने भौतिक विज्ञान से उन्नति करते-करते एटम-बम और हाइड्रोजन बम जैसे भयानक संहारास्त्र बना लिये पर वे इस शक्ति का कल्याणकारी प्रयोग करने में असमर्थ हैं और इसलिए यदुवंश का संहार करने वाले “मूषल” के समान ही उसका प्रयोग पारस्परिक नाश के लिए करने को उद्यत हैं।

करीब पाँच हजार वर्ष से हमारी भारतीय वैदिक संस्कृति धीरे-धीरे विकृत-अति विकृत होती हुई नष्टप्राय होती जा रही है। अब उन अजर-अमर मन्त्र-दृष्टा ऋषियों का कुल भारतवर्ष में कहीं-कहीं अग्नि की चिंगारी की भाँति ही शेष बचा है। पर अनुकूल अवसर की सहायता पाकर यह चिंगारी ही फिर से प्रज्ज्वलित हो उठेगी और समस्त विश्व में वेद-विज्ञान सम्मत श्रेयस-धर्म का प्रचार करके मानव-जाति का हित-साधन करेगी।

वर्तमान समय में वे ही दिव्य देह धारी ऋषि महर्षि अलक्षित रूप से अपने कुल के स्थूल देहधारी सत्पुरुषों का संचालन कर रहे हैं। ऐसे सदाचारी सत्पुरुष अब भी पवित्र भारतभूमि में पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं और किसी प्रकार प्राचीन वैदिक संस्कृति का संरक्षण कर रहे हैं। पर वे भी इस वर्तमान मलिन और विपरीत संस्कार वाली नवीन संस्कृति से सर्वथा मुक्त नहीं हैं। मूलतः दिव्य आत्मा होने पर भी वे माता-पिता के दूषित रज-वीर्य के संस्कार से और आधुनिक समय की भ्रष्ट शिक्षा-दीक्षा के प्रभाव से “अर्ध भ्रष्ट” अवस्था में हैं। इसलिये वे वैदिक संस्कार में रुचि रखने पर भी उसके अनुकूल दिव्य-जीवन गठन में सफल नहीं हो रहें हैं।

आज आधुनिक विज्ञान की कृपा से “ज्ञान” अथवा ‘विद्या’ के नाम से अनेक ऐसी बातों का प्रचार हो रहा है जो मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित और हृदय को व्याकुल बना देती हैं। एक ही मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार की विचारधारा निरन्तर क्रियाशील रहने पर, चाहे कैसे भी स्थिर विचार का व्यक्ति क्यों न हो, पागलों की तरह प्रलाप करने लग जाता है। वर्तमान युग के बहुश्रुत विद्वानों की यही दशा है। इसी प्रकार एक ही हृदय में विभिन्न प्रकार की भाव-धारा उद्वेलित होते रहने पर, कैसा ही धैर्यशाली मनुष्य क्यों न हो, उन विपरीत धाराओं को पचाने में असमर्थ होकर व्याकुल एवं अशान्त रहता है। आजकल के बहुपठित धर्मपरायण ज्ञानी, भक्त या साधकों की यही दशा है।

हमारे कथन का आशय यह नहीं है कि प्राचीन भारतवर्ष में “प्रेयसकामी” व्यक्ति थे ही नहीं। हम भली प्रकार जानते हैं कि उस युग में भी जो व्यक्ति केवल वेद के कर्मकाण्ड का अनुसरण करते थे वे “प्रेयसकामी’ थे, उपासना-काण्ड के अनुसरणकारी ‘प्रेयस-श्रेयस’ उभयकामी थे, एवं जो ‘ज्ञान-काण्ड के अनुसरण करने वाले थे वे केवल “श्रेयस कामी” थे। पर उस समय के समाज के नेताओं ने, जो निष्काम कर्म के तत्व को जानने वाले, पूर्ण श्रेयस मार्ग पर चलने वाले ऋषि मुनि थे, सब श्रेणियों के व्यक्तियों का ऐसा समन्वय कर रखा था कि समाज की व्यवस्था ठीक ढंग से कायम रहती थी। पर वर्तमान युग में समाज की बागडोर मुख्यतः “प्रेयस कामी” विद्वान-बुद्धिमान लोगों के हाथ में आ गई है और थोड़े से ‘श्रेयस-प्रेयस उभयकामी’ विद्वान उनकी सहायता करते रहते हैं। ये ही समस्त पृथ्वी के “श्रद्धावान और अश्रद्धावान” लोगों के ऊपर आधिपत्य कर रहे हैं। इसी से आज संसार पर तरह-तरह के दुखों और आपदाओं का प्रहार हो रहा है। जब तक शुद्ध “श्रेयस कामी” व्यक्तियों का इस आधिपत्य में सहयोग न होगा और अन्य लोग उनके बतलाये मार्ग का अनुसरण न करेंगे तब तक पतन और नाश से रक्षा नहीं हो सकती।

भारतीय वेद ही “ज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान’ का भंडार है और उस “प्रज्ञान-मन्दिर” में प्रवेश करने के लिये गायत्री-मंत्र ही “ भारतीय द्विजों” का प्राण है। पर आजकल इसकी विधियुक्त उपासना में अनेक बाधाएँ उपस्थित हो गई हैं। हमारे समाज में एक वर्ग तो ऐसा है जो सर्वथा वैदिक संस्कार रहित होने के कारण, पाश्चात्य वैज्ञानिक मोह से मोहान्वित होने के कारण, विद्या बुद्धि होने पर भी इस महत्वपूर्ण विचारणीय चर्चा से पृथक है, और इसे सर्वथा निरुपयोगी मानकर भारतीय वेद-विद्या की अवहेलना कर रहा है। दूसरा वर्ग उन विद्वानों का है जो कि वेद में श्रद्धा परायण हैं, परन्तु देश, काल और पात्र-सम्बन्धी ज्ञान से अपरिचित होने के कारण न तो परिस्थिति के अनुकूल अनुशासन तैयार कर सकते हैं व न अन्य शुभेच्छापरायण व्यक्तियों को सहयोग देते हैं, अपितु यथाशक्ति और यथामति विरोध करने लगते हैं।

तीसरा छोटा-सा वर्ग केवल “श्रेयस कामी” लोगों का अवश्य मौजूद है और वह वेद विद्या तथा गायत्री का प्रचार भी करता रहता है। पर वर्तमान समय में वैदिक प्रणाली में जो विवादास्पद वातावरण उत्पन्न हो गया है उसके कारण इन लोगों में भी विभिन्न प्रकार की साधन विधियाँ प्रचलित हैं। इससे उनके अनुयाइयों में शंका उत्पन्न हो जाती है कि किस को ठीक मानें। इतना ही नहीं इस वर्ग में विरोधी अन्य वर्ग वाले भी इस विभिन्नता को दिखलाकर उपासकों को बहका देते हैं, जिससे उदासीन होकर वे अश्रद्धावान बन जाते हैं।

बहुत से सज्जन यह प्रश्न उठाया करते हैं कि गायत्री के जप करने का किस को अधिकार है, और किसको नहीं? इस अधिकार, अनाधिकार का निर्णय भी स्वयं गायत्री-मंत्र ही कर रहा है। ‘ऊँ भूः भुवः स्वः’ अर्थात् हम भू लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक निवासी’ ‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि’ ब्रह्म से कीट पर्यन्त प्राणी मात्र को उत्पन्न करने में समर्थ, ऐसी महाप्राण रूपी महाशक्ति महामाया, जो चतुर्दश भुवन में “वरण” योग्य है तथा दैदीप्यमान तेजोमयी है, उसका हम सब ‘धीमहि’ ध्यान कर रहे हैं- अर्थात् हमारी जो व्यष्टि, तुच्छ स्वार्थपरायण बुद्धि है, उसे समष्टि, महत स्वार्थ परायण महत तत्व में विलीन कर रहे हैं। क्यों? धियो यो नः प्रचोदयात्” जिससे हम सबकी बुद्धि को ऐसी प्रेरणा प्राप्त हो कि हम अपना और दूसरों का कल्याणकारी “श्रेयस प्रेयस” उपाय निर्णय करने में समर्थ हो सकें।

चाहे कोई भी स्त्री-पुरुष क्यों न हो, जब तक वह व्यक्तिगत तुच्छ स्वार्थ को महत्व देता हुआ, अपनी ही स्वार्थ की सिद्धि में प्रयत्नशील रहता है, तब तक मूर्ख या बालक के समान ही अज्ञानी है। वह उस ‘ब्रह्मवर्चस’ स्वरूपिणी महाशक्ति शाली गायत्री देवी के तेज को सहन नहीं कर सकता, अतः उसे व्यक्तिगत स्वार्थ त्याग रूपी “द्विजत्व-संस्कार” को ग्रहण करके समाज-सेवा की प्रधानता का व्रत धारण करना चाहिये। ऐसे व्रतधारी द्विज ही गायत्री-मंत्र के महातेज का महान कार्यों में उपयोग कर सकते हैं।

इनमें जो प्रथम श्रेणी के द्विज हैं, उन्हें चाहिये कि नित्य गायत्री मंत्र का जप करते हुये ऐसी बुद्धि के लिये प्रार्थना करें जिससे वे अर्थ-शास्त्र में प्रवीण होकर श्रेयस को केन्द्र बनाकर “सामाजिक प्रेयस” के लिये उपाय ढूंढ़ सकें, ऐसे ‘द्विज’ वैदिक सिद्धान्तानुसार ‘वैश्व’ कहे जा सकते हैं।

जो दूसरी श्रेणी के ‘द्विज’ हैं, उनको गायत्री का वैज्ञानिक प्रयोग सहित जप करते हुये ऐसी बुद्धि के लिये प्रार्थना करनी चाहिये जिससे वे राजनीति शास्त्र में प्रवीण होकर श्रेयस भाव में स्थित होकर ही सम्पूर्ण देश या राष्ट्र की उन्नति-साधन में तत्पर रहें। ऐसे व्यक्ति ‘क्षत्रिय’ कहे जा सकते हैं।

जो तृतीय श्रेणी के द्विज हैं उनको ज्ञान-विज्ञान सहित नित्य-निरन्तर गायत्री-मंत्र का जप करते हुये ऐसी बुद्धि की कामना करनी चाहिये जिससे वे समग्र विश्व को-देश, काल, पात्र एवं जाति के अनुरूप-सुशृंखला युक्त धर्म-विधान देने में समर्थ हो सकें। ऐसे व्यक्ति वैदिक-विधान के अनुसार ‘ब्राह्मण’ वर्ण के कहे जायेंगे।

अतः गायत्री का अधिकार उसी को है जो व्यक्तिगत स्वार्थ को विसर्जन कर समाज-हित को महत्ता देता है, और समाज के हित में ही अपने हित का भी समावेश समझता है। इन तीनों श्रेणियों के अतिरिक्त जो व्यक्ति सरासार के विवेक से रहित और अल्प सामर्थ्य वाले हैं और समाज सेवा के लिये द्विजत्व का व्रत ग्रहण कर सकने में अशक्त हैं, वे ही द्विज श्रेणी के बाहर हैं और इसलिये गायत्री-मंत्र के भी अनाधिकारी हैं।

उपरोक्त लक्षणों वाले सज्जन व्यक्ति यद्यपि संख्या में थोड़े ही हैं, परन्तु यदि वे “संघबद्ध” होकर समग्र विश्व के कल्याण को अपना लक्ष्य बना कर क्रियात्मक रूप में मानव-समाज का मार्ग दर्शन करने लगें तो आशा है कि भारतीय वैदिक संस्कृति का उद्धार हो सकेगा और साथ ही समस्त विश्व को भी ‘श्रेयस प्रधान’ सुख शाँति की ओर अग्रसर कराया जा सकेगा।

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