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Magazine - Year 1959 - Version 2

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कन्फ्यूशियस के उपदेश

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(श्री साँवलिया बिहारी वर्मा)

चीन के निवासी बौद्ध धर्म के अनुयायी माने जाते हैं, पर इसके सिवाय वहाँ अन्य मतों के मानने वाले भी पाये जाते हैं। मुसलमानों की संख्या कई करोड़ है और ईसाई भी पर्याप्त हैं। पर वहाँ का मुख्य धर्म ‘कन्फ्यूशियस’ है, जिसमें ‘ताओ’ धर्म के सिद्धान्तों का भी समावेश हो गया है।

‘कन्फ्यूशियस’ चीन के एक विख्यात धर्म-प्रचारक तथा सिद्ध पुरुष हो गये हैं। चीनी लोग उन्हें ‘कुंगफुतेज’ के नाम से पुकारते हैं। चीन देश की सभ्यता को प्रतिष्ठित करने वालों में ‘कुंगफुतेज’ का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इस धर्म में तथा बुद्ध की शिक्षाओं में पारस्परिक विशेष भेद न होने के कारण, इन दोनों का प्रचार साथ ही साथ हुआ। चीन के निवासी साँसारिक व्यवहारों के लिए ‘कुंग’ के सदुपदेशों में श्रद्धा रखते हैं, साथ ही पारलौकिक विषयों के लिये बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं। इस प्रकार चीनी सभ्यता और संस्कृति का मूलाधार दोनों धर्मों की सम्मिलित शिक्षा है। इन दोनों धर्मों की शिक्षा दूध-पानी की तरह मिलकर चीनवासियों के जीवन में इस प्रकार घुल-मिल गई हैं कि इन दोनों के प्रभाव का पृथक कर सकना दुस्तर है।

कुंग; बुद्ध के समकालीन थे। उनका जन्म ईसा से 551 वर्ष पहले हुआ था। 17 वर्ष की आयु तक पुरातत्व विद्या, गान-विद्या आदि में दक्षता प्राप्त करने पर पठन-पाठन समाप्त किया। तत्कालीन राजा ‘चाव’ इन से बड़ा प्रभावित हुआ और अनेक ऊँचे पदों पर कार्य करते हुये 51 वर्ष की अवस्था में ये राज्य के प्रधान मंत्री नियुक्त किये गये। अपने सदुपदेशों को व्यवहार में लाकर इन्होंने लोगों को चकित कर दिया। देश से चोरी, डकैती का नाम मिटने लगा, लोगों ने घरों में ताला लगाना बन्द कर दिया, सर्वथा शान्ति विराजने लगी। किन्तु लोभी, अत्याचारी सामन्तों को यह पसन्द न आया और उनके षड़यन्त्रों के फलस्वरूप आप मन्त्री-पद से हटा दिये गये। 73 वर्ष की आयु में आपका देहान्त हुआ। आपके 500 शिष्यों ने गुरु की समाधि पर तीन वर्ष तक शोक मनाया और आपके उपदेशों का खूब मनन किया, तथा दूर-दूर के देशों में आपकी नीतिमय शिक्षा का प्रचार किया।

कुंग के सिद्धांत :-

कुंग ने मनुष्य जीवन की ओर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने स्वर्ग, ईश्वर आदि की चर्चा ही नहीं की। उनके एक शिष्य ‘ची-लू’ ने पूछा—”भगवन्, मैं ईश्वर की सेवा किस प्रकार कर सकता हूँ?” उत्तर में कुँग ने कहा—”जब तुम्हें यह ज्ञान नहीं कि मनुष्य की सेवा किस प्रकार की जाय, तब देवों की सेवा के विषय में किस प्रकार पूछ सकते हो?” पुनः शिष्य ने पूछा—”भगवन्, मृत्यु के सम्बन्ध में सम्यक् रूप से विचार प्रकट कीजिये?” कुंग ने उत्तर दिया—”प्रिय ची-लू, जब तुम्हें जीवन के विषय में पर्याप्त ज्ञान नहीं है, तब तुम्हें मृत्यु के सम्बन्ध में कैसे ज्ञान हो सकता है?” पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि कुंग ने ईश्वर अथवा परलोक के अस्तित्व से इनकार किया। आत्मा के पुनर्जन्म पर उन्हें विश्वास था। फिर भी उन्होंने परलोक के सुधारने की उतनी चिन्ता नहीं की, जितनी इहलोक को सुधारने की। मनुष्य सामाजिक जीव है, वह समाज में रहता है, पनपता है और अन्त में नष्ट हो जाता है। उसका समाज के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बना हुआ। अतः समाज की उन्नति से उसकी उन्नति होगी। वैयक्तिक उन्नति मानव जीवन का लक्ष्य नहीं, यह तो सामाजिक जीवन का फल है।

कुँग के मतानुसार मनुष्य स्वभावतया अच्छा होता है और अच्छाई की ओर उसकी प्रवृत्ति होती है। अच्छाई की पराकाष्ठा सिर्फ सन्तों में हो सकती है। अतएव प्रत्येक मनुष्य को निष्काम-भाव से तथा ईमानदारी और तत्परता के साथ कर्तव्य पालन करना चाहिये। समाज के प्रत्येक प्राणी के साथ सद्व्यवहार करना हमारा परम धर्म है। माता-पिता के प्रति, दीनजनों तथा सेवकों के प्रति, भाई-बन्धुओं के साथ सहानुभूति रखने की सुन्दर शिक्षा देकर कुंग ने चीनी सभ्यता को बहुत ऊपर उठाया है।

कुँग ने शिक्षा पर विशेष जोर दिया। उनके मत से मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य अपने को समाज के लिये उपयोगी बनाना है। कुँग के एक शिष्य ने पूछा—”मान्यवर, सामाजिक गुण क्या हैं?” उत्तर मिला—”दूसरे से प्रेम करना।” दूसरे शिष्य ने पूछा—”भगवन्, क्या कोई ऐसा नियम है कि जिसका पालन जीवन पर्यन्त करना चाहिये?” उत्तर में कुँग ने कहा-”दूसरे के साथ ऐसा बर्ताव न करो, जैसा तुम दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहते।” इस प्रकार कुंग के उपदेश का साराँश आत्म-विश्वास और पड़ोसियों के प्रति उदारता है।

वे प्राणियों या देह से पृथक जीवात्मा का अस्तित्व मानते थे। उनका विश्वास था कि दिवंगत पुरुष की आत्मा बिना शरीर के ही रहती है। आत्मा न केवल मनुष्य में ही होती है, अपितु वायु, अग्नि, पहाड़, नदी आदि में भी होती है और सभी की पूजा होती है। सबका दर्जा स्वर्ग और मनुष्य के बीच का है। इन आत्माओं के साथ-साथ पिशाचों की भी सत्ता मानी गई है। कुँग मृत पितरों और शरीर रहित आत्माओं को इस प्रकार बलि प्रदान करते थे, मानों वे साक्षात् उनके सामने उपस्थित हों। इन आत्माओं का काम अपने उत्तराधिकारियों की रक्षा करना समझा जाता था।

कुंग के कुछ उपदेश नीचे दिये जाते हैं :—

(1)धनवान के लिये निरभिमान होना सहज है, किन्तु निर्धन के लिये संतोष प्रकट करना कठिन है।

(2) सदाचार के प्रति अनुराग, सौंदर्य के प्रति अनुराग की तरह, हृदय से होना चाहिये।

(3) अपनी तुलना में भी दूसरों को परखने का आत्मशासन रखो। इसी को मनुष्यता का सिद्धान्त कहते हैं।

(4) न्याय के प्रति प्रेम, विद्वता के प्रति आदर, तथा सदाचार मनुष्य को विशिष्ट पुरुष बनाने में समर्थ होता है।

(5) प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि अपनी वाणी पर संयम रखे और अपने आचरण के प्रति सजग रहे।

(6) संसार एक मुसाफिरखाना है।

(7) काम का आरम्भ करना मनुष्य के हाथ में है और उसे पूरा करना ईश्वर के हाथ में है।

(8) क्षण भर अपने क्रोध को दबाकर तुम जीवन भर के पश्चात्ताप से बच सकते हों।

(9) जिस प्रकार तुम दूसरों के दोष दिखाते हो उसी प्रकार अपने दोष भी देखो, दिखाओ। जिस प्रकार अपने आपको क्षमा कर सकते हो, उसी प्रकार दूसरों को भी क्षमा करो।

(10) आज्ञापालन सत्कार से कहीं उत्तम है।

(11) बीस वर्ष तक धार्मिक जीवन व्यतीत करना पर्याप्त नहीं है, किन्तु एक दिन भी बुराई करना बहुत बड़ा दोष है।

(12) बुद्धिमान पुरुष वचन देने में विलम्ब करता है, किन्तु वचन देने पर उसका पालन अवश्य करता है।

(13) आनन्द की तीन कुँजियाँ हैं-(1) दूसरों में दोष न देखना, (2) दूसरों की निन्दा न करना, न सुनना, और (3) दूसरों की बुराई न करना।

(14) मनुष्य का हृदय आइने के समान होना चाहिये, जिस पर समस्त वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ता है, किन्तु इससे उसमें मैलापन नहीं आता।

(15) कोलाहल न बाजार में है, न शाँति जंगल में, सब कुछ मनुष्य के हृदय में है।

(16) जब तुम जीवित प्राणी के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करने में असमर्थ हो तो मृत व्यक्ति के प्रति कर्तव्य का पालन किस प्रकार कर सकोगे?

(17) ज्ञानी पुरुष के लिए अपना चित्त स्वर्ग है, किन्तु अज्ञानी के लिए वह नरक है।

(18) सच्चा सद्भाव अपने संगियों के प्रति प्रेम करना है और सच्चा ज्ञान अपने साथियों को पहचानना है।

(19) जो ईश्वरीय नियम से अनभिज्ञ है वह श्रेष्ठ मनुष्य नहीं हो सकता।

(20) ज्ञानी मनुष्य सन्देह से, धार्मिक मनुष्य चिन्ता से और वीर मनुष्य मद से मुक्त रहता है।

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