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Magazine - Year 1959 - Version 2

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हमारे व्रत धारण की पृष्ठभूमि

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अखण्ड ज्योति के गत अंक में पाठकों और परिजनों को केवल एक पत्रिका के पाठक न रह कर नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान के महान मिशन को सफल बनाने में सहयोग देने का आह्वान किया गया। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसका समुचित स्वागत किया है।

वह जीवन ही क्या, जिसमें परमार्थ के लिए कोई स्थान न हो। वह मनुष्य ही क्या जो अपने पीछे कुछ आदर्श और अनुकरणीय उदाहरण न छोड़ जाय। मानव जीवन की जिम्मेदारी महान है। केवल आजीविका उपार्जन करते रहना यह तो निर्जीव जीवन है। जिनके भीतर कुछ चेतना, जागृति एवं ज्योति होती है उनका जीवन क्रम केवल साँसें पूरी करने में समाप्त नहीं होता उनकी अन्तरात्मा स्वयं ऊँची उठती है और दूसरों को ऊपर उठाने में अपने लक्ष की पूर्ति अनुभव करती है।

यों भौतिक दृष्टि से अपने आपको अधिक शक्ति ,संपत्ति एवं सत्ता से सम्पन्न बनाने में अनेकों लोग सफलता प्राप्त कर लेते हैं। जो ऐसी सफलता नहीं भी प्राप्त कर पाते वे भी इसके लिए जी तोड़ प्रयत्न करते ही रहते हैं। अधिक धनी मानी बनने के लिए कौन प्रयत्न नहीं करता, यह तो चींटी और दीमक भी करती हैं। पर धन्य उसी का जीवन है जिसने अपनी अन्तरात्मा के सद्गुणों को विकसित करने में सफलता पाई-जिसने अपने समाज को, राष्ट्र को, विश्व मानव को अधिक गौरवान्वित अधिक सुख शान्तिमय परिस्थितियों में पहुँचाने का प्रयत्न किया। यही जीवन दर्शन है। जिसने इस तथ्य को समझा और व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित किया वस्तुतः वही सच्चा बुद्धिमान है। यों हर आदमी अपने को चतुर और बुद्धिमान कहता है पर इस क्षण-भंगुर शरीर के समाप्त होने पर जिन गतिविधियों के लिए आत्मा को पश्चात्ताप नहीं प्रसन्नता अनुभव हो, वस्तुतः सच्ची बुद्धिमत्ता वही है।

अखण्ड-ज्योति परिवार विवेकवानों का-सहृदय और सद्भावना युक्त सज्जनों का एक कौटुम्बिक संगठन है। जो लोग अखण्ड ज्योति को एक अखबार मानते हैं और इसके पाठकों को “कुछ बाँचने के शौकीन” मानते हैं वे वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित ही कहे जा सकते हैं। सच बात यह है कि अखण्ड ज्योति एक विचार दीपक है जिसके प्रकाश में दुनिया के कौने-कौने में से ऐसे लोग खोजकर एक सूत्र में पिरोये गये हैं—जिनमें आत्मकल्याण एवं परमार्थ की समुचित भावना विद्यमान है। इस प्रकार की एक–सी अभिरुचि एवं प्रकृति के लोगों का एक कौटुम्बिक संगठन ही अखण्ड ज्योति परिवार है। सद्ज्ञान की—विवेक एवं सद्विचारों की देवी—गायत्री—और सत्कर्म-परमार्थ एवं आदर्शवाद के प्रतीक-यज्ञ-देवता को उपास्य मानकर यह परिवार अपने विचारों और कार्यों को उस दिशा में प्रस्फुटित करता है, जिसमें मानव जीवन की सच्ची सफलता सन्निहित है। अखण्ड ज्योति पत्रिका द्वारा ऐसी ही चेतना एवं प्रेरणा देने का प्रयत्न किया जाता रहता है।

गत बीस वर्षों में ‘अखण्ड ज्योति’ परिवार द्वारा सद्विचारों के प्रचार एवं सज्जनों को इस पत्रिका के माध्यम से एक संगठित सूत्र में पिरोने का काम किया है। यह कार्य सचमुच ही महत्वपूर्ण है। पर केवल इतने तक ही सीमित रहने से काम न चलेगा। हमारा उदीयमान राष्ट्र- अज्ञानान्धकार की लम्बी रात्रि को पार करके आशामयी ऊषा का दर्शन करने में समर्थ हुआ है। इस पुनीत बेला में जब सब ओर निर्माण की पुकार है तब हम अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन भी चुपचाप नहीं बैठ सकते। पिछले अन्धकार युग में जहाँ हमारी विभिन्न प्रकार की क्षति हुई है वहाँ नैतिक और साँस्कृतिक क्षति भी कम नहीं हुई। इन जख्मों को पूरा करने के लिए जिस मरहम की आवश्यकता है उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

सोमनाथ के टूटे हुए मन्दिर की हमने प्रचुर धन व्यय करके मरम्मत कर ली। प्राचीनकाल जैसा न सही—कम से कम टूटे हुए खंडहर की हीन दशा में पड़ा रहने देने से, उसे संभाल लिया। क्या भारत माता का नैतिक एवं साँस्कृतिक मंदिर ऐसा ही टूटा पड़ा रहेगा? नहीं, इसकी भी मरम्मत करनी होगी। प्राचीन काल के ऋषियुग जैसी स्थिति तक न पहुँचा जा सके, तो भी इतना तो करना ही होगा कि हमारा समाज संसार के अन्य समाजों की अपेक्षा सच्चरित्रता में, सद्गुणों में, सज्जनता में, सत्कर्मों में पीछे न रहे। हम सदा से अग्रिणी रहे हैं। संसार का मार्गदर्शन करते रहे हैं, सारे मानव समाज को अपने उच्च आदर्शों में अनुप्राणित करते रहे हैं। हमारे लिए यह उचित न होगा कि भारत की इस मूलभूत विशेषता को अस्त-व्यस्त, नष्ट-भ्रष्ट पड़ा रहने दें। सोमनाथ मंदिर से भी अधिक गौरवमयी हमारी साँस्कृतिक महानता खेदजनक अवस्था में पड़ी रहे तो यह हम सबके लिए एक लज्जा की ही बात होगी।

अखण्ड ज्योति परिवार को अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान है। शत्रु चढ़ आये और सेना हाथ पर हाथ रखे बैठी रहे, आग से घर जलते रहें और ‘फायर ब्रिगेड’ वाले खड़े तमाशा देखते रहें, दंगा होता रहे और पुलिस वाले हंसते रहें, तो यह उसके लिए एक बड़ी लज्जा की बात होगी। जो जिस कार्य का विशेष रूप में उत्तरदायी है उसकी उपेक्षा असहनीय होती है। वे साधारण लोग जिनके ऊपर विशेष उत्तरदायित्व नहीं है, यदि उपेक्षा करें तो क्षमा किये जा सकते हैं पर वे समझदार और जिम्मेदार लोग जो उन बुराइयों को रोक सकते हैं, न रोकें—जो लाभ पहुँचा सकते हैं वे न पहुँचावें तो निश्चय ही—उन्हें अधिक अपराधी माना जायगा। खेती सूखती रहे और नहर का पानी, सींचने के लिए उपलब्ध न होने दे तो उस अफसर की निन्दा ही की जायगी। अखण्ड ज्योति परिवार की भी यही स्थिति है, उसके पास वह व्यक्ति हैं-वह सामान है-जिनके द्वारा इस महान राष्ट्र की महान नैतिक एवं साँस्कृतिक परम्पराओं को पुनः प्रतिष्ठापित किया जा सकता है। यदि हम लोग आलस्य एवं उपेक्षा वश अपने कर्तव्य में विमुख होते हैं तो कर्तव्यहीनता के वैसे ही अपराधी बनते हैं जैसा कि एक फौजी कप्तान युद्ध के आवश्यक कर्तव्यों की उपेक्षा करने पर ‘कोर्ट मार्शल’ का दंड पात्र बनता है। उपेक्षा, लापरवाही और कर्तव्य हीनता भी विशिष्ट व्यक्तियों के लिए उतना ही बड़ा अपराध है जितना सामान्य व्यक्तियों के लिए चोरी, लूट, हत्या आदि दुष्कर्मों को भयंकर कुकृत्य समझा जाता है।

हम इस युग निर्माण की महत्वपूर्ण बेला में अपने रोजमर्रा के साधारण कार्यों से फुरसत न मिलने का बहाना बनाकर अपनी उपेक्षा एवं अश्रद्धा पर पर्दा डालने के प्रयत्न में देर तक सफल नहीं हो सकते। इस आत्म वंचना को कोई स्वीकार नहीं कर सकता। फुरसत उस काम के लिए नहीं मिलती, जिसे हम सबसे अधिक बेकार मानते हैं। जो कार्य अपनी दृष्टि में महत्वपूर्ण जँचते हैं उन्हें प्राथमिकता देते हैं और उनके लिए समय सबसे पहले मिलता है। पैसे की तंगी हो तो भी जो कार्य आवश्यक प्रतीत होते हैं उनके लिए अन्य खर्चें कम करके, यहाँ तक कि रोटी कपड़े में भी कमी करके, कर्ज लेकर भी उसे पूरा करते हैं। पर यदि कोई बात बेकार जंचे तो उसके लिए एक दो पैसा खर्च करना भी पहाड़ जैसा मुश्किल मालूम पड़ता है। आधा घंटे का समय मिलना भी कठिन दिखता है। यह एक स्पष्ट सच्चाई है। इसे छिपाया नहीं जा सकता है। अपने आपको धोखा देकर आत्म वंचना करते रहने से अपना मन समझाया जा सकता है कि “क्या करें, हमारी परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं कि अमुक शुभ कार्य करते।” पर वस्तुतः ऐसी बात बिलकुल भी नहीं है। हमें किसी कार्य का महत्व सच्चे मन से स्वीकार हो और उसे करने की सच्ची लगन हो, तो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी पर्याप्त साधन मिल सकते हैं।

राजा परीक्षित, केवल सात दिन की अवधि मिल जाने पर जीवन लक्ष पूरा करने में सफल हो गया था। शर शैया पर कराहते हुए भीष्म धर्मोपदेश करते रहने के लिए बहुत दिन तक शरीर धारण किये रहे। राजा कर्ण को युद्धस्थल में मृत्यु के मुँह में पड़ा होने पर भी ब्राह्मण को दान देने के लिए दाँतों में लगी सोने की कील मिल गई थी। सात दिन के भूखे उशस्ति-परिवार ने अपनी थाली में आई हुई रोटियाँ अपने से अधिक भूखे अतिथि चाँडाल को देकर-स्वयं भूखा रहना स्वीकार कर लिया था। इससे अधिक विपन्न परिस्थिति किसी की नहीं हो सकती। अश्रद्धा से, उपेक्षा से, आलस्य से यदि हम लड़ सकें तो अवकाश की साधनों की रंच भर भी कमी हमें नहीं रह सकती, यह अक्षरशः सत्य है।

वह अवसर अब आ गया—जब कि राष्ट्र के नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए हमें कटिबद्ध होना है। हमें स्वाध्याय की अभिरुचि है अखंड-ज्योति पढ़ते हैं—सो ठीक है। दैनिक भजन गायत्री उपासना करते हैं—सो भी ठीक है। साधु सज्जनों का मान सम्मान करते हैं सो भी उत्तम है। तीर्थ, व्रत, पूजन कीर्तन दान पुण्य करते हैं सो भी सराहनीय है। पर इतने तक ही सीमित हो जाने से काम चलने वाला नहीं है। यह साधन हैं—लक्ष नहीं। लक्ष तो आत्म कल्याण है। यह सभी उपचार, आध्यात्मिक दृष्टिकोण सद्गुण एवं सत्प्रवृत्तियाँ के विकसित करने के लिए है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम नियमित रूप से आत्म चिन्तन करें, अपने दोषों को ढूंढ़ निकालें और उनके स्थान पर स्वभाव में सात्विक तत्वों का समुचित मात्रा में समावेश करें। यह कार्य केवल विचारते रहने या पुस्तकें पढ़ते रहने से ही न हो सकेगा। कुछ सक्रिय कार्य करना पड़ेगा। सक्रिय कार्यों के करने में ही मनःभूमि पर गहरी छाप पड़ती है और उसका संस्कार बनता है। क्रिया के अभाव में सद्भावना भी केवल एक कल्पना या आकाँक्षा ही रह जाती है, उसकी न तो भीतर कोई छाप पड़ती है और न संस्कार बनता है।

आत्म कल्याण चाहने वालों के लिए जहाँ कथा कीर्तन, तीर्थ व्रत, जप, हवन आवश्यक हैं वहाँ सक्रिय समाज सेवा भी आवश्यक है। लोक सेवा से मुँह मोड़कर केवल भजन ही करते रहना न तो युक्तियुक्त है और न उससे लक्ष की प्राप्ति हो सकती है। प्राचीनकाल के एकोंएक ऋषि मुनियों का जीवन इस बात का साक्षी है कि उनने जितना समय भजन साधन में लगाया उससे कहीं अधिक श्रमदान कल्याण के लिए धर्मप्रचार एवं रचनात्मक सेवा कार्यों में किया है। यही परम्परा हमारे लिए भी अनुकरणीय हो सकती है।

सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ के मंगलाचरण के साथ-साथ अखण्ड ज्योति परिवार ने राष्ट्र के नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान का व्रत लिया है। अपना परिवार इस व्रत को लेकर ‘व्रतधारों’ बना है। इस व्रत से हम सब बँधे हुए हैं। अब पीछे हटने में न तो शोभा है और न सम्मान। जन समाज के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने, धार्मिकता, आस्तिकता- सहिष्णुता-विवेक शीलता, सामूहिकता, सदाचार, संयम, श्रम और सेवा की प्रवृत्तियों को विकसित करने का व्रत हमने आवेश में, उत्साह में या जल्दबाजी में नहीं लिया है। परिस्थितियों ने हमारे कंधे पर डाला है, इस जिम्मेदारी से हम इनकार नहीं कर सकते। वे प्रबुद्ध आत्माएं जिनमें त्याग और परमार्थ की-धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की चेतना मौजूद है उनका यह परम पवित्र कर्तव्य है कि जनसाधारण में इन तत्वों का विकास करें। जो अमीर स्वयं अमीरी भुगते और गरीबों को उसका कुछ भी लाभ न दे उस अमीरी को धिक्कार है। इसी प्रकार जो विवेकशील धर्म प्रेमी अपनी ही आत्मा से धर्म की ज्योति जलाते रहे दूसरों को उस स्वर्गीय स्थिति का आस्वादन कराने के लिए कुछ प्रयत्न न करें—उस धार्मिकता को धिक्कार है। इस आत्म धिक्कार से बचने के लिए ही अखण्ड ज्योति परिवार की प्रयुद्ध आत्माओं ने धर्म जागरण के लिए व्रत लिया है। हमारी आध्यात्मिक जिम्मेदारी एवं कर्तव्य बुद्धि ने ही हम सबको व्रतधारी बनने के लिए प्रेरित किया है। यह कोई आवेश या अत्युत्साह नहीं है।

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