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Magazine - Year 1960 - Version 2

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अवकाश के समय का सदुपयोग कीजिए।

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(श्री अगरचन्दजी नाहटा)

संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है समय क्योंकि जो समय बीत जाता है उसे वापस नहीं प्राप्त किया जा सकता। प्राणियों के जीवन का समय सीमित है। और उसका एक-एक पल बड़ी तेजी से छीजता जा रहा है। अञ्जलि-जल की तरह प्रतिक्षण छीजते हुए समय का एक दिन अन्त आ ही जाता है और हमारे सारे भावी मनोरथ यों ही धरे रह जाते हैं। वैसे भी लोगों की प्रायः यह शिकायत रहती हैं कि क्या करें। काम तो बहुत से करने हैं पर समय नहीं मिलता हैं। बहुत से काम जिन्हें हम बहुत ही महत्व के एवं उपयोगी समझते हैं, करना चाहते हुए भी उन्हें समयाभाव से नहीं कर पाते। समय का मूल्य आँकना बड़ा ही कठिन है। एक क्षण भर के प्रमाद, आलस्य या देरी से हम बहुत बार महान लाभ से वंचित रह जाते हैं।

वैसे तो मनुष्य हर समय कुछ न कुछ प्रवृत्ति करता ही रहता है पर सभी प्रवृत्तियाँ आवश्यक, उपयोगी एवं लाभप्रद नहीं होतीं। जीवनयापन के लिए कुछ प्रवृत्तियाँ तो अनिवार्य होती हैं पर विचार करने पर पता लगता है कि अनावश्यक और असद्प्रवृत्तियों में भी हम बहुत सा समय व्यर्थ खो देते हैं। हर समय मनुष्य काम ही काम करता है। ऐसी बात भी नहीं। हमारा बहुत सा समय बेकार और निकम्मा जाता है। काम करते करते या काम पूरा कर लेने के बाद विश्राम की भी आवश्यकता होती है जिससे काम करने की शक्ति का पुनः संचय होता है। प्रकृति ने ही ऐसा विधान बना रखा है कि दिन में काम करे और रात में नींद लेकर विश्राम भी करें, जिससे दिन भर के लिये किए काम की थकावट दूर हो जाए और दूसरे दिन पूरी ताजगी के साथ पुनः काम में जुटा जावे। प्रवृत्तियाँ भी सब समय मनुष्य एक ही प्रकार की न करके अनेक प्रकार की करता है। जैसे-कोई भी व्यक्ति केवल खड़ा ही खड़ा नहीं रह सकता। थोड़े समय बाद बैठने की आवश्यकता भी हो जाती है। हर व्यक्ति कुछ समय खेल कूद में बिताता है, कुछ समय विचारों की गहराई में और कुछ समय बात-चीत में। इस तरह मन, वचन और काया अर्थात् इन्द्रियों का उपयोग विविध प्रकार से होता रहता है। कुछ समय तक आँखें निरन्तर देखने का काम करती हैं पर थोड़े समय बाद ही नेत्रों को बन्द करने या विश्राम देने की आवश्यकता हो जाती है। इस तरह काम और विश्राम दोनों में समय बीतता जाता है। पर विश्राम का अर्थ आलस्य या निकम्मों का निठल्लापन नहीं, विश्राम काम के लिए ही हो।

प्रकृति के साथ साथ मनुष्य ने भी अपनी सुविधा के लिए काम के समय के साथ अवकाश का समय भी निकाल रखा है। जैसे सप्ताह में सात दिन काम करके रविवार को छुट्टी मनाई जाती है ताकि मनुष्य काम से ऊब न जाए और अपने बचे हुए अन्य प्रकार के काम छुट्टी के दिन पूरे कर सके। मनोरंजन, मिलना-जुलना, कहीं आना जाना, आवश्यक सामान खरीदना आदि कार्य जिन्हें वह 6 दिनों में नहीं कर सका, वह 7 वें छुट्टी के दिन कर सके। इसी तरह बहुत से और भी छुट्टी के दिन होते हैं जिन दिनों में उसे निश्चित कार्य से अवकाश मिलकर अन्य कार्य करने की सुविधा मिल जाती है। विद्यार्थियों को भी परीक्षा से पहले कुछ दिन परीक्षाओं की अच्छी तरह तैयारी करने के लिए (छुट्टी के) मिल जाते हैं। इसी तरह परीक्षाओं के बाद भी लम्बी छुट्टियाँ मिलती हैं ताकि परीक्षा के दिनों में जो उन्हें अधिक श्रम करना पड़ता है उसकी थकावट दूर हो। इधर परीक्षाओं का परिणाम घोषित करने के लिए अध्यापकों आदि को भी समय मिल सके। इसी तरह अमुक वर्षों तक कार्य कर लेने के बाद सरकार की ओर से भी व्यक्ति को अवकाश तथा निवृत्ति मिल जाती है जिससे अवकाश के समय में वह अपने इच्छित काम कर सकें।

अब प्रश्न यह रहता है कि हम अवकाश के दिन या समय का उपयोग किन कामों में करें। इस सम्बन्ध में हमारे भारतीय धर्मों में 4 आश्रमों में विभाजित जीवन में बड़ी सुन्दर व्यवस्था मिलती है कि ब्रह्मचर्याश्रम अर्थात् बाल्यावस्था में विद्याध्ययन अर्थात् योग्यता की प्राप्ति करके गृहस्थ आश्रम में अपने कौटुम्बिक जीवन के सुसंचालन में लगें। उसमें अर्थोपार्जन, सन्तानोत्पादन करने के बाद वानप्रस्थ आश्रम को स्वीकार किया जाए जिसमें सेवा एवं साधनामय जीवन रहें। परिवार के साथ व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक उन्नति भी करे। संकुचित कुटुम्ब की ममता से अपने को ऊपर उठाकर विश्व वात्सल्य के भाव को जागृत करें और सबके हित के लिये अपने जीवन को समर्पण कर दें। वास्तव में अवकाश के समय का उपयोग भी हमें अपनी आध्यात्मिक उन्नति एवं जन कल्याण में ही करना उचित है। विद्यार्थी अपने छुट्टियों के दिनों में आस-पास के अशिक्षित लोगों को शिक्षित बनाने का प्रयत्न करें। व्यर्थ ही इधर उधर घूमने और गप्पे मारने, ताश खेलने आदि में समय बर्बाद न करें। अच्छे-अच्छे ग्रन्थों के स्वाध्याय से अपने ज्ञान को परिपुष्ट करें और दूसरों को भी ज्ञान का दान दें। सेवाभाव से सबको सहयोग दें। पर आजकल हम यह देखते हैं कि लम्बी-लम्बी छुट्टियों से विद्यार्थियों का जीवन बरबाद सा होता है। वे इन दिनों में कई बुरी आदतें डाल लेते हैं। इससे घर वाले भी परेशान होते हैं और स्वयं का जीवन भी बिगड़ता है। वास्तव में उनके सामने कोई ध्येय एवं आदर्श नहीं होता कि इन छुट्टियों का उपयोग वे किस तरह से करें जिससे स्वपर-उभय का कल्याण सम्पादन हो।

अब से थोड़े वर्षों पहले शिक्षणालयों में छुट्टियाँ बहुत ही कम होती थीं। जब हम पढ़ते थे तब केवल प्रतिपदा को ही छुट्टी होती थी। उसके बाद महीने में चार छुट्टियाँ होने लगीं पर ग्रीष्मावकाश आदि की लम्बी छुट्टियाँ तो इधर कुछ वर्षों में ही बढ़ी हैं। इससे विद्यार्थियों को तनिक भी लाभ नहीं हुआ अपितु नुकसान हुआ है। आजकल वर्ष में 4-6 महीने तो छुट्टियों में ही बीत जाते हैं। यदि इतने समय में मनोयोग पूर्वक और पढ़ाई की जाए तो जिस श्रेणी में पहुँचने के लिए आज आठ वर्ष लगते हैं वह चार-पाँच वर्षों में ही पूरी हो सकती है। इन तीन चार वर्षों की बचत का भावी जीवन में बड़ा भारी महत्व है। शिक्षा का स्तर तो पूर्वापेक्षा बहुत ही गिर चुका है। पहले के पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थी आज की आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों से बहुत तेज होते थे। इस तरह विद्यार्थियों के अमूल्य जीवन की बरबादी को रोकने का राष्ट्रीय सरकार एवं उनके हितैषी पिता-माता एवं अध्यापकों का परम कर्तव्य होना चाहिये।

औद्योगिक क्षेत्र में भी हम देखते हैं कि रविवार आदि अवकाश के दिनों का उपयोग मजदूर आदि लोग शराब पीने, सिनेमा देखने आदि बुरी आदतों में ही करते हैं। उनको भी अपने अवकाश के समय के सदुपयोग की कला सीखनी चाहिए। उस दिन सब को सम्मिलित होकर अपने परिवार देश और राष्ट्र की उन्नति कैसे हो? उत्पादन कैसे बढ़े? बरबादी कैसे मिटे? इस सम्बन्ध में विचार विमर्श करना चाहिये। संत समागम, प्रार्थना, ईश्वर भजन-कीर्तन, अच्छे ग्रन्थों का पढ़ना, अपने बच्चों को कुसंस्कार से दूर कर सुसंस्कारित करना, पीड़ित एवं दुःखी व्यक्तियों की सेवा करके समय का सदुपयोग करना चाहिए। निवृत्त या अवकाश प्राप्त व्यक्तियों को भी इसी तरह स्व पर कल्याण में लग जाना चाहिए। जीवन का एक क्षण भी प्रमाद एवं बुरे कामों में न हो इसका पूरा विवेक रखना ही मानव कर्तव्य है।

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