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Magazine - Year 1960 - Version 2

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कर्म से ही मुक्ति सम्भव है?

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(श्री भगवान सहाय वाशिष्ट)

कर्म के सम्बन्ध में तरह-2 की मान्यताएँ चली आ रही हैं। कई दर्शन कर्म को बन्धन मानते हैं और कर्मक्षेत्र से मुक्त होना, निष्क्रिय होना ही मुक्ति का अर्थ लगाते हैं। कर्म क्षेत्र को मिटा करके उससे प्राप्त निश्चिन्तता को मुक्ति समझते हैं। और इसी लिए ब्रह्म को निष्क्रिय बताते हैं। साँसारिक क्रिया क्षेत्र को माया कह कर उसका त्याग कर देते हैं। कर्म-मात्र को बन्धन मानते हैं और निष्क्रिय होना ही मुक्ति का द्वार समझा जाता है।

भारतीयों ऋषियों ने ब्रह्म-कर्म-मुक्ति का सूक्ष्म रहस्य जान लिया था। जिसके अनुसार कहा है :-

“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्या भिसंविशन्ति, तद् विजिज्ञासस्व सद ब्रह्म।”

ब्रह्म की उस विराट सत्ता की अनुभूति करने वाले ऋषि ने जब संसार की समस्त क्रिया शीलता के सम्बन्ध में मनन चिन्तन किया और अपने सूक्ष्म नेत्रों से देखा तो उन्हें इस समस्त क्रिया शीलता का आधार ब्रह्म ही दिखाई दिया। उपनिषदों का कर्म के सम्बन्ध में यही अनुभव सिद्ध एवं सत्य सन्देश है।

सृष्टि और जीवन की गहराई में पैठने वाले ऋषियों ने ब्रह्म को निष्क्रिय नहीं कहा। “परास्य शक्ति विधैव श्रूयते”-ब्रह्म से ही क्रिया होती है। उनके स्वभाव के मूल्य में ही क्रिया हैं कर्म हैं। कर्महीनता, निष्क्रियता, अवास्तविक है, ईश्वरीय विधान के विश्व नियम के विरुद्ध है, फिर वहाँ मुक्ति की आशा भी निरी कल्पना मात्र ही है। कर्म पथ पर चल कर ही मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है। आध्यात्मिकता की पहली शर्त ही ‘कर्म’ है। जिससे हमारी निष्क्रियता और उदासीनता नष्ट हो जाती है और तब ही जीव की सीमित चेतना, विश्व चेतना में प्रवेश करती है। कर्म पथ पर अविश्रान्त चल कर ही कर्मरत ब्रह्म में प्रविष्ट हुआ जा सकता है उससे एकाकार प्राप्त किया जा सकता है। उदासीनता और निष्क्रियता का अर्थ है हमारी आध्यात्म यात्रा अवरुद्ध हो गई।

कर्म द्वारा मुक्ति कैसे प्राप्त हो? कर्म साधना कैसे की जाए जिससे कर्म बन्धन रूप न बनकर मुक्ति बन जाए। इसका समाधान करते हुए ऋषियों ने कहा हैं-

“आनन्दा दह्येव खलु इमानि भूतानि जायन्ते आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसं विशन्ति।”

‘परमात्मा आनन्द स्वरूप हैं, उस आनन्द से ही समस्त भूत उत्पन्न होते हैं। जीवन धारण करते हैं सचेष्ट एवं रूपांतरित होते रहते हैं।’

परमात्मा स्वयं आनन्द स्वरूप हैं। उसके कर्म कलाप में भी आनन्द ही मूल उद्देश्य हैं अर्थात् आनन्द के लिये ही वह कर्मरत हैं। वह आनन्द स्वरूप आनन्द के लिये ही जीवों का सृजन करता है, सचेष्ट एवं रूपांतरित करता है।

विश्व भुवन में व्याप्त विश्वात्मा की कर्मशीलता के मूल में आनन्द ही है। आनन्द के लिये वह यह सृष्टि व्यापार चला रहा है इसीलिये वह कर्मरत होता हुआ भी मुक्त है, निर्विकार है, आत्मस्वरूप है आनन्द स्वरूप है।

वस्तुतः कर्म के मूल में दो भाव छिपे होते हैं। कर्म दो प्रकार से होता है एक तो अपने अभाव की पूर्ति अथवा किसी प्रयोजन के हेतु, दूसरे आनन्द से भी कर्म किया जाता है। इन दोनों दृष्टिकोणों में ही मुक्ति और बन्धन का रहस्य छिपा हुआ है।

जो कर्म प्रयोजन अथवा अभाव पूर्ति के लिए किया जाता है किसी कामना को लेकर, किया जाता है वही कर्म हमारे बन्धन का कारण है। भले ही वह कैसा भी कर्म है। आनन्द के लिये जो कर्म किया जाता है वह बन्धन नहीं होता। वास्तव में वही कर्म मुक्ति का साधन है। क्योंकि ब्रह्म के कर्म व्यापार के मूल में आनन्द है। जब हम भी आनन्द के लिए कर्म करेंगे तो उससे आनन्द स्वरूप की अनुभूति की प्राप्ति हो सकेगी।

जब हम अपने परिजनों अथवा दूसरों का कार्य करते हैं जिसमें दासत्व भाव नहीं होता अथवा अपना स्वयं का काम करते हैं जिससे राग द्वेष आसक्ति एवं अभाव जन्य कामनाओं का सम्बन्ध न हो तो उस कर्म में आनन्द की प्राप्ति होती है और वह हमें नहीं बाँधता। वह हमारे लिये मुक्ति द्वार हैं। इस आनन्द कर्म में हर समय रहते हुए भी हम मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं।

कर्म की मुक्ति ही आनंद में है और आनंद की मुक्ति ही कर्म में है। दोनों ही अपनी पृथक-पृथक सत्ता से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते, इसीलिये उपनिषदों में कहा गया है जो केवल संसार कर्म में रत हैं वे अन्धकार में पड़े हुए हैं और जो केवल ब्रह्म ज्ञान में रत हैं वे उनसे भी अधिक अंधकार में हैं जहाँ बन्धन हैं। ब्रह्म हीन कर्म अथवा आनंद से रहित कर्म अन्धकार है और कर्म हीन ब्रह्म उससे भी अधिक शून्य और अन्धकार युक्त है। जिस ब्रह्म से सृष्टि का क्रिया कलाप चल रहा है, यह सब कुछ हो रहा है उस परमात्मा को इस सबसे विवर्जित करके मानना और साथ साथ स्वयं भी कर्म का त्याग करना नास्तिकता ही तो है। आनंद का धर्म ही जब कर्म है तो कर्म द्वारा उस आनंद स्वरूप के साथ ऐक्य प्राप्त हो सकता है। भगवान कृष्ण ने गीता में इसे ही कर्मयोग के नाम से अर्जुन को उपदेश दिया है।

जैसा कि ऊपर व्यक्त किया जा चुका है प्रयोजन से, अभाव पूर्ति के लिए, काम से यदि कर्म किया जाएगा, तो वही बन्धन का कारण बन जाएगा, जब कर्म अपने मूल साथी आनंद से बिछुड़ जाएगा तब वह आनंद से गिर जाएगा, जड़ बन जाएगा और बन्धन रूप सिद्ध होगा। जहाँ बन्धन हैं वहाँ मुक्ति नहीं। बंधन से ही गति अवरुद्ध हो जाती, जीवात्मा और विश्वात्मा के मिलन के मार्ग में दीवार खड़ी हो जाती है जो उसे आबद्ध कर उसकी गति को कुण्ठित कर देती है। और स्वार्थ, कामना पूर्ति का मेल ही कर्म को बंधन का कारण बना देता है। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में “कर्म जब हमें स्वार्थ की संकीर्णता में केवल लपेटकर रखता है तो भयंकर बंधन हो जाता है। तब हमारी शक्ति उस पराशक्ति के विरुद्ध चलती है। उस समय हम भूमा स्थिति की ओर उस विश्वात्मा की ओर अग्रसर नहीं होते। अपनी क्षुद्रता में आबद्ध हो जाते हैं। हमें वह विपरीत दिशा में ले जाती है।”

कर्म को स्वार्थ कामनाओं प्रयोजनों से मुक्त करके आनंद, परमार्थ की ओर ले जाना होगा। आनंद के लिए कर्म करना होगा। कर्म, कर्म के लिये करना होगा। हम छोटा या बड़ा जो कुछ भी कर्म करें उसका सम्बन्ध आनंद स्वरूप द्वारा संचालित विश्व क्रिया के साथ जोड़ देना होगा जिसका उद्देश्य ही आनंद है। और जब कर्म तथा आनंद का सम्मिलन होगा तभी मुक्ति भी सम्भव है।

एक पतिव्रता नारी के कर्म का मूल्य जब अपने स्वामी के प्रति प्रेम एवं उसकी सेवा होती है, जब वह स्वामी के आनंद को ही अपना आनंद समझकर वैसा ही बर्तती है, उसके समस्त क्रिया कलापों का उद्देश्य अपने स्वामी के लिए होता तब वह स्वयं आनंद का अनुभव करती है। यह कर्मयोग का ज्वलन्त उदाहरण है। किन्तु यदि इन्हीं कर्मों को वही स्त्री एकाकी स्वार्थ हित, अपने प्रयोजनार्थ, अपनी कामना के लिए करे तो परिणाम दुःख साध्य होगा।

महापुरुष का जीवन कर्तव्य परायण होता है, वे निरंतर भारी श्रम करते हुए भी आनंद शान्ति सुख का अनुभव करते हैं, जब केवल 6 घण्टे आफिस में साधारण श्रम करने वाले बाबू लोग थके माँदे हारे हुये एवं क्लान्त दिखाई देते हैं। इसमें कर्मयोग का ही रहस्य है, महापुरुष आनन्द के लिए कर्म करते हैं, अपने कर्मों की आहुतियाँ देकर निरंतर उस आनंद स्वरूप की पूजा करते रहते हैं और दफ्तर का एक बाबू ऑफिसर या अन्य कोई भी जो केवल प्रयोजन से कामना से कर्म को करता है, उसे कर्म बंधन बन जाता है जहाँ परेशानी क्लान्ति दुख पीड़ा ही है।

कर्म का उद्देश्य आनंद हो। हम जो कुछ कर्म करें, उसका स्वयं के लिए निवेदन न करके क्षण क्षण पद पद पर विश्वात्मा को समर्पित करते रहें। उस आनंदस्वरूप के लिये ही कर्म करें। भगवान ने गीता में उपदेश दिया हैं “यद् यत् कम प्रकुर्वीत तद् ब्रह्माँणि समर्पयात्” जो जो कर्म करें वह ब्रह्म को अर्पण करें। हमारे समस्त कर्मों का विसर्जन एकमात्र ब्रह्म में हो, अपनी आसक्ति कामना प्रयोजन से कर्म सर्वथा मुक्त हो, फलाशा का पूर्णतः त्याग हो, कर्म को विशुद्ध आनंद स्वरूप बनावें और तभी हम मृत्यु तीर्त्वा अमृत लाभ कर सकेंगे, उस आनंदस्वरूप के साथ ऐक्य हो सकेंगे। कर्मरत रहकर ही हमारे लिये मुक्ति प्राप्त कर सकना संभव हो सकता है।

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