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Magazine - Year 1960 - Version 2

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कठिनाइयों से घबराना क्या?

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(डॉ. लक्ष्मी नारायण टण्डन ‘प्रेमी’ एम. ए.)

सुख, सुविधाएँ नहीं वरन् सतत प्रयत्न और कठिनाइयाँ मनुष्य का निर्माण करती हैं। परिस्थितियों से जूझने, अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करने, आगे बढ़ने, जीवन में सफलता पाने आदि की प्रेरणा हमें कठिनाइयों से मिलती है। कठिनाइयों से परिचित हो जाने के पश्चात वे उसे शत्रु नहीं वरन् मित्र लगती हैं। एक शायर का कथन हैं ‘मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझ पर कि आसाँ हो गई।’

जीवन का कोई भी तो ऐसा क्षेत्र नहीं हैं जहाँ कठिनाइयों का सामना करने से आप बच पावें। जीवन एक कर्म-भूमि है, एक युद्ध क्षेत्र है। यहाँ वीरों की भाँति उनसे लड़ो पराजित करो। एक महापुरुष के प्रेरणार्थक शब्द देखिए :-

“विश्व के विस्तृत युद्ध-क्षेत्र में तुम एक बेजुबान गूँगे पशु की भाँति न हो जिसे जहाँ चाहे हँकाया जा सके वरन् इस युद्ध में तुम एक वीर की भाँति लड़ो। बिना कठिनाइयों से लड़े, बिना उन्हें जीते, छुटकारा कहाँ? ये कठिनाइयाँ, ये ठोकरें, हमारी सबसे बड़ी मित्र, गुरु तथा मार्ग प्रदर्शक होती हैं।

एक समझदार तो कठिनाइयों का स्वागत करता है। तुम आओगी तभी तो मेरे आन्तरिक गुणों, साहस, शीलता तथा प्रतिभा को प्रकाश में आने का अवसर मिलेगा।

प्रसिद्ध अँग्रेजी लेखक जान हंटर ने कहा है कि ‘क्या कोई ऐसा मनुष्य है जिसका हृदय कठिनाइयाँ तोड़ देती हैं, जो तूफान के आगे झुक जाता है? ऐसा मनुष्य संसार में बहुत कम मिल सकेगा। क्या कोई ऐसा मनुष्य है जो विजय पाने की कामना रखता है? इस प्रकार का आदमी कभी असफल नहीं होगा?’

आलसी, निकम्मे, पराश्रित, भाग्य का रोना रोने वाले, दुर्बल हृदय मनुष्य को सफलता कभी वरमाला नहीं पहनाती। कठिनाइयाँ हमें सर्वोत्तम अनुभव और आशावर्धक प्रेरणा देती हैं। हमारी भूलें, हमारी त्रुटियाँ ही हमारी गुरु, हमारी पथप्रदर्शक बनती हैं। तो फिर कठिनाइयों से घबराना मूर्खों का काम है।

चार्ल्स जेम्स फाक्स कहा करते थे कि वह ऐसे आदमी से अधिक आशा करते हैं जिसे असफलता प्राप्त हुई हो और तब भी वह अपने प्रयत्नों में निरंतर लगा रहे, बनिस्बत उस पुरुष के जिसका जीवन सफलताओं से पूर्ण हो। “जिसके सामने कठिनाइयाँ आयेंगी ही नहीं, वह तो निश्चिन्तता से टाँग पर टाँग रखे बैठा रहेगा। वह और कहते हैं कि यह बुरा नहीं है यदि तुम मुझे बताओ कि उक्त नव युवक को अपने प्रथम भाषण में सफलता मिल गई। वह अपने प्रथम सफलता से संतुष्ट हो सकता है। पर मुझे एक ऐसा नवयुवक दिखाओ जिसे पहले प्रयत्न में सफलता न मिली हो और तब भी वह निरन्तर प्रयत्नशील रहा हो। निश्चय ही मैं दूसरे वाले युवक का पक्ष लूँगा और मेरा विश्वास है कि वह अपने जीवन में आगे चल कर अधिक सफलतायें पायेगा बनिस्बत इस मनुष्य के जिसे प्रथम प्रयत्न में ही सफलता मिल गई थी।”

सफलता, यह भी हो सकता है कि इत्तफाक से भी मिल गई हो। अन्धे के हाथ बटेर लगना कहावत प्रसिद्ध भी है। ऐसा आदमी पूर्ण निश्चिन्त हो कर बैठा रहेगा। वह सोचेगा, कि अब मुझे हाथ पैर हिलाने की क्या आवश्यकता हैं। भाग्य तो यों ही मेरे ऊपर सदय है और मुझे तो बिना परिश्रम, प्रयत्न किए ही सफलतायें मिलती रहेंगी। यही झूठा विश्वास उसके पतन का कारण भी बन सकता है।

हममें समझदारी जितनी असफलता के फलस्वरूप आती है, उतनी सफलता के फलस्वरूप नहीं। हार्नटूक कहा करते थे कि अपने देश से अधिक परिचित मैं इसलिए हो पाया हूँ क्योंकि मैं बीच−बीच में मार्ग भूल जाता था। इस विद्वान का कहना है कि अपने अन्वेषण-कार्य में जब बहुत बड़ी बाधा उपस्थित पाता था तब प्रायः होता यही था कि अपनी खोज के तट पर ही आ लगता था।

बड़े-बड़े कार्य, उच्च विचार, खोज, आविष्कार, आदि का जन्म कठिनाइयों के मध्य में ही हुआ है। किसी भी नेता की जीवनी आप देखें, किसी भी धर्म-क्षेत्र के किसी महापुरुष के जीवन का आप अध्ययन करें, आप देखेंगे कि कितनी भयानक कठिनाइयों का पहले उन्हें सामना करना पड़ा था। अंग्रेजी में कहावत है “असफलता, सफलता का स्तम्भ है।” असफलता की नींव पर ही सफलता की इमारत बनाई जाती है।

प्रसिद्ध अमरीकन प्रेसीडेन्ट वाशिंगटन ने जितने युद्ध जीते उससे कहीं अधिक हारे। पर वे कभी निराश नहीं हुए। इसी से अन्त में विजय श्री उन्हें ही प्राप्त हुई।

प्रसिद्ध लेखक सैमुअल स्माइल ने कहा है ‘आवश्यकता एक कठोर अध्यापिका हो सकती है परन्तु प्रायः पाया यही गया है कि वह सिखाती सर्वोत्तम है।’ यह सत्य है कि कठिनाइयाँ कोई नहीं चाहता, उसका सामना करने से कभी कतराना चाहते हैं-और यह स्वाभाविक भी है, पर जब वह सामने आ ही जाए तो उसका डट कर सामना करना चाहिए।

प्रायः हम अपनी शक्ति का ठीक से अन्दाजा नहीं लगा पाते। हम झिझकते हैं कि भला यह हम कैसे कर पायेंगे। परीक्षा देने के पूर्व विद्यार्थी घबराता है कि वह पर्चा कैसे करेगा। पर जब एक बार पर्चा उसके हाथ में आ जाता है तो वह हीन भावना, भय की भावना, निराशा की भावना दूर हो जाती है। उसकी बुद्धि और कलम चलने लगती है और वह पर्चा करके ही छोड़ता है।

दुर्भाग्य, कठिनाइयों का उज्ज्वल पहलू भी होता है। वे हमारे सामने हमारी वास्तविक शक्ति का परिचय, स्पष्ट चित्र रख देती हैं। यदि हम वास्तव में चरित्रवान हैं, यदि हममें वास्तविक क्षमता है तो हम उन लाभप्रद जड़ी-बूटियों की भाँति हैं जो जितनी ही फेंटी जाएंगी, मथाई जाएंगी, कूटी जाएंगी उतना ही लाभप्रद सुगन्धित सर्वोत्तम रस देंगी। कठिनाइयाँ हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाती हैं। वे हमें आत्म-नियन्त्रण सिखाती हैं। हमें सूझ-बूझ, साहस, बल, विश्वास देती हैं।

सैमुअल स्माइल ने कहा है कि ‘जीवन के युद्ध को प्रायः आगे बढ़कर ही लड़ना चाहिए। यदि बिना युद्ध के ही हमें सफलता मिलती है तो वह बिना सम्मान वाली विजय है। यदि कठिनाइयाँ न होंगी तो सफलता भी न होगी। यदि कोई ऐसी चीज नहीं हैं कि जिसके लिए प्रयत्न किया जाए, लड़ा जाए तो इसका अर्थ यह है कि कोई ऐसी वस्तु ही नहीं है जिसे प्राप्त किया जाए। कठिनाइयाँ दुर्बलों को डरा सकती हैं, परन्तु जो साहसी, बलवान तथा दृढ़ निश्चयी हैं उनके लिए तो वे प्रेरणा शक्ति हैं।

फल की चिंता मत करो-यही गीता सिखाती है। प्रयत्न करो। प्रयत्न करना, कर्तव्य करना ही तुम्हारे हाथ में है और बस यही चीज वास्तविक भी है, महत्वपूर्ण भी है। सच्ची असफलता उद्देश्य की प्राप्ति में असफल रहने में भी नहीं है, वरन् प्रयत्न न करने में या प्रयत्न न करने के बाद असफल होने पर हाथ पैर समेट लेने में है।

शेखचिल्ली की तरह सोचने से और अपनी आत्मा को धोखा देने से कोई लाभ नहीं है कि ‘अगर ऐसा होता तब मैं ऐसा करता।’ समझदारी, बहादुरी और मनुष्यता इसमें है कि जो और जैसा भी रूप है इस समय, उसी को क्षेत्र मान कर प्रयत्न करो, लड़ो। यदि प्रतीक्षा करोगे कि हमारी मनचाही परिस्थिति या वातावरण हो जाए तो सम्भव है कि तुम्हारा पूरा जीवन प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा में बीत जाए। केवल इच्छा करने मात्र से काम नहीं चलेगा, उस इच्छा को कार्य-रूप भी दो। एक शक्तिशाली प्रयत्न हजारों व्यर्थ इच्छाओं से श्रेष्ठ है। ‘अगर ऐसा होता’ ‘मगर वैसा हो’ आदि भूल जाओ। अगर-मगर निराशा और कमजोरी के चिन्ह हैं कर्म क्षेत्र में लंगोट कसकर कूद पड़ो। असंभव शब्द मूर्खों के शब्द-कोष में मिलता है। प्रारम्भ में कुछ भी सरल नहीं होता। अभ्यास कठिन से कठिन वस्तु को सरल कर देता है। कठिनाइयाँ क्रूर नहीं होती हमारी शत्रु नहीं होतीं। उनका बाह्य रूप भले ही कठोर हो पर उनका अन्तर कोमल होता है।

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