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Magazine - Year 1960 - Version 2

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नारी को अविकसित न रखा जाए

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मनुष्य जाति दो पहियों से चलने वाली गाड़ी के समान है। यदि दोनों पहियों में समानता हो तो गाड़ी ठीक प्रकार चलती है। इन पहियों में थोड़ा अंतर हो तो किसी प्रकार काम भी चल सकता है, पर वह अंतर यदि बहुत ज्यादा हो, एक पहिया बहुत बड़ा और दूसरा बहुत छोटा हो तो गाड़ी ठीक प्रकार न चल सकेगी। किसी प्रकार कुछ घिसट भी सकी तो उसे गाड़ी की सफलता एवं सार्थकता न कहा जाएगा।

स्त्री और पुरुष दोनों के सुविकसित होने से गृहस्थ की गाड़ी ठीक प्रकार चलती है। पर आज नारी की उपेक्षा करके पुरुष की ही सफलता को पर्याप्त मान लिया गया है। नारी के जिम्मे जो काम छोड़े गये हैं वे धन की प्रधानता वाले इस समाज में तुच्छ माने जाते हैं और यह अनुभव किया जाता है कि इनके लिए नारी का सुशिक्षित या सुसंस्कृत होना आवश्यक नहीं है। कामसेवन, संतानोत्पादन, शिशुपालन, भोजन बनाना, गृहव्यवस्था यह मोटे-मोटे चार काम उसके जिम्मे दिखाई पड़ते हैं। पर सबसे बड़ा वह कार्य किसी की दृष्टि में नहीं है कि वह परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के बालक से लेकर वृद्ध तक के, मन को उल्लास एवं आनन्द से भरे रह सकती है और उनके अन्तःस्थल को छूकर मानवता के सभी आवश्यक गुणों को विकसित कर सकती है। नारी की महानता का वास्तविक पहलू यही है।

यदि उपरोक्त चार कामों पर भी दृष्टिपात किया जाए तो वे भी ऐसे तुच्छ या उपेक्षणीय नहीं हैं कि उनके लिए घटिया मानसिक स्तर की नारी को ही पर्याप्त मान लिया जाए। सन्तानोत्पादन में नारी का दायित्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है, वह अपने शरीर में से बालक का शरीर और अपने स्वभाव में से बालक का स्वभाव बनाती है। यदि उसका शरीर निरोग न हो, यदि उसका मस्तिष्क विकसित न हो, यदि उसका स्वभाव सुसंस्कृत न हो तो निम्न स्तर की, गिरे स्वास्थ्य वाली, दुर्गुणी, मूर्खा, फूहड़ नारी लगभग उसी स्तर के बालक उत्पन्न करेगी। यों कहने को वह सन्तान उत्पन्न करती रहेगी पर उस प्रजनन से परिवार की न तो शोभा बढ़ेगी न कीर्ति न समृद्धि। वरन् पूर्वजों की संचित कीर्ति और सम्पत्ति में पलीता लगाने वाली ही सिद्ध होगी।

काम सेवन जैसे तुच्छ विषय को ही लीजिए। उसकी सार्थकता भी केवल रूप यौवन पर निर्भर नहीं है वरन् अन्तःकरणों की एकता एवं सच्ची आत्मीयता पर ही निर्भर है। और यह दोनों बातें उन्हीं नर-नारियों में संभव हैं जिनकी मनोभूमि का समुचित विकास हुआ। अन्यथा केवल वह सब इन्द्रिय विकार का एक भौंड़ा अभिनय मात्र रहेगा। पशु पक्षियों में भी काम सेवन होता है, उसमें आनंद केवल इन्द्रिय द्वारों तक ही सीमित रहता है। परस्पर प्रेमभाव बढ़ाने या एक दूसरे को अन्तः आदान प्रदान करने से उस क्रिया का उनके लिए कुछ भी महत्व नहीं होता। काम सेवन के बाद ही वे दोनों साधारण सी बात पर लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हैं। यदि मनुष्य की मनोभूमि भी वैसी ही निम्न कोटि की हो तो उस काम सेवन प्रक्रिया में उन कुछ क्षणों तक एक पाशविक सुखानुभूति इन्द्रिय द्वारों तक रहेगी। इतने मात्र से मानव अन्तःकरण कदापि संतुष्ट नहीं हो सकता। इन्द्रिय विकार की उत्तेजना में आत्मिक तन्मयता एवं एकता की जो अनुभूति है वही कामसेवन की सफलता है। इस सुख की आवश्यकता अनुभव करने और उसके योग्य मनोभूमि बनाने का कार्य विकसित अन्तःकरणों का है-कामी एवं विषयों लोगों का नहीं। इस दृष्टि से भी अविकसित नारी पर्याप्त नहीं। कामवासना में यदि कुछ आनन्द है तो उसकी अनुभूति विकसित अन्तःकरण वाले नर-नारी ही कर सकते हैं। नारी को अविकसित, असंस्कृत रखकर जो काम वासना का रसास्वादन करना चाहते हैं वे गलती पर ही हैं।

शिशु पालन साधारण कार्य नहीं है। नन्हे से बालक का शरीर अत्यन्त कोमल होता है, उसे ठीक तरह बढ़ने देने के लिए संतुलित दिनचर्या, आहार एवं नियमों का पालन आवश्यक है। इसे सुशिक्षित नारी ही समझ सकती है। गर्भावस्था के दिनों से ही शिशु-पालन शुरू हो जाता है। बालक को क्या खिलाना और कैसी मनः स्थिति से रखना, इसका समुचित ज्ञान होने के लिए शरीर शास्त्र, आरोग्य शास्त्र, आहार शास्त्र एवं मनोविज्ञान शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है, ताकि उसी आधार पर जननी अपने आहार विहार को व्यवस्थित करके गर्भस्थ बालक का निर्माण और पोषण आरम्भ करे। यह कार्य फूहड़ स्त्रियाँ नहीं कर सकतीं। उन्हें इन विषयों का ज्ञान ही नहीं है तो कैसे जान पायेंगी कि उनकी किन शारीरिक और किन मानसिक क्रियाओं का बालक पर क्या असर पड़ेगा?

जन्म होने के पश्चात् कई वर्ष तक बालक की पूरी-पूरी सावधानी रखनी होती है। इसी सावधानी के आधार पर बालक की शारीरिक और मानसिक प्रगति सम्भव है। इस सम्बन्ध में क्या करना, क्या न करना इसका ज्ञान न हो तो बेचारी जननी क्या करे? उलटा सीधा जो उसकी समझ में आता है करती रहती है, फलस्वरूप उनकी अज्ञानता बालकों को रोगग्रस्त कर देने या मृत्यु के मुख तक पहुँचा देने का भी कारण होती है। पाश्चात्य देशों के बालक हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर होते हैं, न रोते हैं, न बीमार पड़ते हैं वरन् कमल के फूल की तरह उठते और खिलते चले आते हैं! दूसरी ओर भारतवर्ष है जहाँ बालक जन्म से ही रोगी रहने का अभिशाप लेकर आते हैं। उनका ठीक प्रकार पोषण गर्भावस्था में न हुआ तो नींव वहीं से कमजोर हो कर आती है। फिर जन्म के बाद अज्ञानता पूर्ण पालन पोषण के कारण उन्हें दस्त, नाक बहना, ज्वर, जिगर, तिल्ली, सूखा, अफरा, आँखें दुखना, रोना, चेचक पड़ना आदि न जाने कितने रोग लग जाते हैं। उपचार ज्ञान न होने से स्त्रियाँ भूत पलीत, दई देवता और भी न जाने क्या टंट घंट करती रहती हैं फलस्वरूप बच्चे मृत्यु के मुख में सरकते रहते हैं। भारत की बाल मृत्यु संख्या संसार में सबसे अधिक है। इसका एकमात्र कारण हमारी नारी की अविद्या ही है। पाश्चात्य देशों में जहाँ नारी सुविकसित है बच्चों के रोगी रहने की, बाल मृत्यु की समस्या नाम मात्र को ही दिखाई देती है।

भोजन की उपयोगिता लोग भूख बुझाने और जायका चखने के लिए समझते हैं। इसी दृष्टि से भोजन की किस्में चुनी और पसन्द की जाती है। पर वस्तुतः भोजन मनुष्य के जीवन-मरण का प्रश्न है। उसका रक्त, माँस, वीर्य, मस्तिष्क, आरोग्य, आयुष्य सभी कुछ भोजन पर निर्भर है। इस महत्वपूर्ण कार्य को हाथ में लेने वाले व्यक्ति को आहार विहार विज्ञान की विस्तृत जानकारी होनी चाहिए, ताकि वह केवल उपयोगी पदार्थों का आरोग्य की दृष्टि से ही चुनाव करे और स्वाद लगने वाली किन्तु हानिकारक वस्तुओं का रसोई में से बहिष्कार कर सके। इस ज्ञान के अभाव में अंट-शंट चीजें केवल स्वाद की दृष्टि से हमारी रसोई में स्थान पाती हैं। खर्च भी बढ़ता है, पेट भी खराब होता है और रोगों का भी शिकार बनना पड़ता है। इसी प्रकार पकाने की विद्या भी एक विशेष विद्या है। इसकी जानकारी के बिना बहुमूल्य लाभदायक वस्तुएँ जल-भुनकर कोयला मात्र, लाभ रहित बना दी जाती हैं। रबड़ी या खोया, दूध का कोयला मात्र है। दूध में जो पोषक जीवन-तत्व थे, वे सभी जलाने-भुनाने पर नष्ट हो जाते हैं केवल कोयला बचता है उसे ही लोग स्वादिष्ट मान कर चाव से खाते हैं। इसी प्रकार तेल, घी में तली-भुनी चीजें अपने स्वाभाविक जीवन तत्वों से वंचित हो जाती हैं। पैसा भी लगा और उपयोगिता भी हाथ से गई, यह दुहरी हानि पाक विद्या का शास्त्रीय ज्ञान न होने से ही होती है। गृहिणी यदि पाक-विद्या का वैज्ञानिक पहलू जानती हो तो स्वाद की अधिक चिन्ता किए बिना भोजन को अमृत रूप बना सकती है और उससे घर के सभी लोगों को निरोग, हृष्ट-पुष्ट एवं दीर्घजीवी बनाने में अत्यन्त महत्वपूर्ण योग दे सकती है। पर यह संभव तभी है जब नारी सुविकसित हो। अविद्या के अन्धकार में भटकने वाली बेचारी बेबस नारी जिसे दीन दुनिया का कुछ पता ही नहीं है केवल ढर्रे पर चलती रह सकती है, फिर उसका परिणाम जो भी हो सो होता रहे।

गृह व्यवस्था का कार्य भी छोटा नहीं है। उसके भी उतने ही विभाग हैं, जितने किसी राज्य सरकार के होते हैं। प्रत्येक विभाग पर समुचित ध्यान देने लायक जिनके मस्तिष्क हैं वे ही राज्य सरकार को कारखाने को, व्यवसाय को, संस्था को चला सकते हैं और उन्हीं के सुप्रबन्ध में गृहस्थ की व्यवस्था भी चल सकती है। काम छोटा हो या बड़ा हो, दोनों को ठीक तरह पूरा करने के लिये सुविकसित मस्तिष्क चाहिए। इसके बिना अविकसित मस्तिष्क जहाँ भी रह रहे होंगे, वहीं अव्यवस्था फैल रही होगी। गृहिणी का मानसिक स्तर यदि विकसित न हो तो वह घर के प्रबन्ध में बात-बात में भूल करेगी और हर कार्य में संभाल की अपेक्षा बिगाड़ ही होगा। गृह व्यवस्था के अनेक विभाग होते है। प्रत्येक में यदि थोड़ा-थोड़ा भी नुकसान हो तो सब मिलाकर काफी नुकसान हो जाता है। महीने या साल की गिनती की जाए कि कुल कितना नुकसान हुआ, इसका अन्दाज लगाया जाए और यह देखा जाए कि दूसरी सुयोग्य गृहिणी ने अपनी कुशलता से कितनी सँभाल एवं किफायत की तो पता चलेगा कि दोनों की मानसिक स्थिति के अन्तर ने घर की आर्थिक स्थिति तथा अन्य परिस्थितियों को बनाने व बिगाड़ने में काफी योगदान दिया है।

भारतीय नारी की वर्तमान दुरवस्था प्रत्येक दृष्टि से अवाँछनीय है। उससे हमारी पारिवारिक एवं वैयक्तिक परिस्थितियों में ही विपन्नता नहीं आती वरन् सामाजिक जीवन पर भारी दुष्प्रभाव पड़ता है। जितनी संख्या पुरुषों की है उतनी ही स्त्रियों की भी है। जैसे हाथ, पाँव, आँख, कान, मन और मस्तिष्क पुरुषों के हैं वैसे ही स्त्रियों के भी हैं। जब पुरुष अपने पुरुषार्थ से इतना उपार्जन, निर्माण, प्रबन्ध एवं संघर्ष कर सकता है तो नारी भी कुछ न कुछ कर ही सकती है। गृह व्यवस्था को सँभालने के बाद भी उसके पास कुछ न कुछ क्षमता बचती ही है और उसका कुछ न कुछ उपयोग हो ही सकता है। इसके द्वारा राष्ट्र की सामर्थ्य और सम्पत्ति बढ़ ही सकती है। वे गृह उद्योगों में अपने बचे हुए समय को लगाकर या परिवार के अर्थ तन्त्र में किसी न किसी प्रकार का योगदान देकर परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने एवं राष्ट्र की सम्पत्ति को बढ़ाने में सहायता कर सकती हैं। करोड़ों नारियाँ जो अपना आधे से अधिक समय बेकार गँवाती हैं यदि उसका सदुपयोग कर सकें तो अरबों रुपयों की समृद्धि बढ़ सकती है।

जिस अविकसित स्थिति में नारी आज पड़ी है उसमें सुधार आरम्भ कर दिया जाए तो वह थोड़े दिनों में कुछ से कुछ बन सकती है। जब कि वे कैदी की तरह बन्द रहने और महत्वपूर्ण कार्यों की क्षमता से वंचित रहने के लिए विवश हैं तो उनसे कुछ आशा नहीं की जा सकती पर यदि उन्हें अवसर मिले तो पुरुषों की भाँति अगणित नारियाँ भी ऐसी निकलेंगी जो अपनी स्वाभाविक प्रतिभा से संसार को आश्चर्यचकित कर दें। अभी पिछले ही दिनों लंका की प्रधान मंत्री श्रीमती भण्डारनायके बनी हैं। यह प्रतिभा करोड़ों नारियों में मौजूद है पर उसे विकसित न होने देकर हम अपना उनका और सबका केवल अहित ही करते हैं।

यदि नारी को घर की चार दीवारी से बाहर जाकर संसार और समाज को समझने एवं आवश्यक अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिले तो वह प्रत्येक क्षेत्र में अपनी कुशलता का परिचय दे सकती है। यदि उसे समुचित शिक्षा मिले तो वह अपनी बौद्धिक क्षमता से परिवार के लिए एक श्रेष्ठ मन्त्री का काम कर सकती है। बच्चों की शिक्षा दीक्षा का बहुत काम वह स्वयं कर सकती है। यदि उसे आवश्यक शिक्षा और वातावरण प्राप्त होते तो हमारी सामाजिक प्रगति जो रुकी पड़ी है उसको वह आसानी से आगे बढ़ा सकती है।

संसार के अन्य देशों में जहाँ नारी को अवसर मिला है उसने शिक्षा, साहित्य, उद्योग, शासन, विज्ञान, समाज सेवा आदि विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है और जिन चार कार्यों को नारी के लिए भारतवर्ष में पर्याप्त माना जाता है उन्हें करते हुए भी अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं राष्ट्रीय सुख शान्ति को बहुत बड़ी मात्रा में बढ़ाया है। संसार के जिन देशों ने नारी उत्थान के द्वार खोले, उन्हें पुरुषों के समान ही शिक्षा दीक्षा एवं मनुष्य के स्वाभाविक अधिकारों को प्राप्त करने का अवसर दिया उन्होंने इस बुद्धिमत्ता का परिचय देकर कुछ खोया नहीं वरन् पाया ही है।

भारत का प्राचीन आदर्श नारी के प्रति असीम श्रद्धा और सम्मान का रहा है। वे हर क्षेत्र में पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिला कर साथ-साथ बढ़ती और बढ़ाती रही है। मध्य काल के अज्ञानान्धकार युग में जहाँ अनेक अव्यवस्थाएँ हमारे देश में फैलीं वहाँ नारी की प्रगति में अवरोध भी एक संकट के रूप से पनपा। अब समय आ गया है कि हम अपनी उस भूल को सुधारें नारी के विकास की आवश्यकता को अनुभव करें और इसके लिए सच्चे मन से प्रयत्नशील बनें।

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