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Magazine - Year 1960 - Version 2

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मानवता के लक्षण

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(पं. वेदप्रिय वेदालंकार)

तन्तुँ तन्वन् रजसो भानुमिन्विहि,

ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धियाकृतान्।

अनुल्बणं वयत जोगुवामयो,

मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥

-ऋक्. 10।53।6

“हे अग्ने! हमारे यज्ञ को बढ़ाते हुए सूर्यमंडल (प्रकाश) में पहुँचो। जिन ज्योतिर्मय मार्गों को श्रेष्ठ कर्मों द्वारा पाया जाता है, उनकी रक्षा करो, देवताओं को यज्ञ में बुलाओ और उपस्थिति विघ्नों को दूर करो (अथवा विघ्न रहित कार्यों का विस्तार करो! (मनुर्भव) मनुष्य बनो और (दैव्यं) देव हितकारी (जनम्) जन-संतान को उत्पन्न करो।”

वेदों की सब से बड़ी विशेषता, जिसे भारतीय और विदेशी, दोनों प्रकार के विद्वानों ने स्वीकार किया है, यही है कि उसमें कहीं सम्प्रदायवाद का चिन्ह नहीं मिलता। उसमें जितने उपदेश दिये गये हैं, वह मनुष्य मात्र के लिये हैं। उसमें न तो कहीं किसी दूसरे धर्म का नाम आया है और न किसी की निन्दा और अपनी प्रशंसा की गई है। उसमें तो केवल ऐसे कर्तव्य और मार्गों का निर्देश किया गया है जिससे मनुष्य अपना और दूसरों का कल्याण कर सके। यह एक बहुत बड़ा अन्तर है, जो वेद को संसार के समस्त धर्म ग्रन्थों से उच्च ठहराता है। अन्य सब ग्रन्थों में किसी एक मत की प्रशंसा की गई है उसी को सत्य बता कर ग्रहणीय ठहराया है और उसके सिवा अन्य सबको मिथ्या अथवा भ्रमपूर्ण बताया है। इससे एक तो यह बात सिद्ध होती है कि वेद वास्तव में सर्वाधिक प्राचीन है जब कि संसार में किसी अन्य मतमतान्तर का अस्तित्व न था। अगर उस समय कोई अन्य धर्म होता तो वेद में उसकी आलोचना की गई होती, उसकी भलाई-बुराई दिखाई गई होती, अथवा कम से कम अपने अनुयायियों को उससे दूर रहने की चेतावनी दी होती। पर जब ऐसी कोई बात कहीं नहीं मिलती तो हम इसी निर्णय पर पहुँचते हैं कि वेद वास्तव में मानवीय सभ्यता के आदि में प्रकट हुये और उनमें जो कुछ कहा गया है वह मनुष्यों के स्वाभाविक कर्तव्य और अधिकारों को दृष्टि में रख कर ही कहा गया है।

उपर्युक्त मन्त्रदृष्टा ऋषि ने मनुष्य को उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा की है जिससे वह स्वयं देव बन कर संसार में दैवी प्रकृति के व्यक्तियों के निर्माण में सहायक हो सके। मानव-समाज अभी विकास की अवस्था में है और प्रकृति के तीनों गुणों में से मनुष्यों पर रज और तम का प्रभाव विशेष रूप से देखने में आता है। ऐसे मनुष्य समाज पर अपना प्रभाव जमाने अथवा स्वार्थ-साधन के उद्देश्य से प्रायः धर्म-विरुद्ध, नीति विरुद्ध कार्यों पर उतारू हो जाते हैं। यह देव प्रकृति के सात्विक पुरुषों का ही काम है कि वे उत्कृष्ट आदर्श उपस्थित करके समाज को निम्नगामी होने से बचायें और उसे उच्च स्थिति की तरफ ले जायें। इसलिये भावी-संतान को नीति चरित्र, कर्तव्य की ऐसी व्यावहारिक शिक्षा देना कि वह महान् उत्तरदायित्व का पालन कर सके, समाज की सबसे बड़ी सेवा है।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये वेद ने पहला साधन यह बतलाया है कि “तन्तु तन्वन् रजसो भानुमिन्विहि” अर्थात् “तुम साँसारिक कार्यों को करते हुए सदैव प्रकाश (ज्ञान) का आश्रय लो।” जो कार्य ज्ञान पूर्वक किया जाएगा उसका परिणाम कभी अशुभ नहीं हो सकता, उसका शुभ फल देर में या शीघ्र अवश्य मिलेगा। मनुष्य का पहला लक्षण ज्ञान ही है और मनुष्य तथा पशु में मुख्य अन्तर यही है कि पशु को ज्ञान, विवेक, बुद्धि नहीं होती। जो मनुष्य ज्ञान से काम नहीं लेता अथवा अज्ञान में रहना ही पसन्द करता है उसे मनुष्य की बजाय पशु कहना ही अधिक उपयुक्त है।

मनुष्यता को सार्थक करने के लिये दूसरा आदेश वेद ने यह दिया कि “ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्” अर्थात् जिन ज्योतिर्मय (ज्ञान अथवा प्रकाश) मार्गों से हम श्रेष्ठ कर्म करने में समर्थ हो सकते हैं, उनकी रक्षा की जाए। मनुष्य का काम केवल अकेले ही ज्ञान सम्पादन करने से नहीं चल सकता, वरन् उसको संसार में सर्वत्र ज्ञान प्रसार की चेष्टा करनी चाहिए। यदि बहुसंख्यक लोग अज्ञानी ही बने रहे तो उनके उल्टे सीधे कामों से ज्ञानियों को भी अवश्य कठिनाई में पड़ना होगा। मनुष्य केवल अपने कृतकर्मों का ही परिणाम नहीं भोगता वरन् जिस समाज में वह रहता है उसके सामूहिक कर्मों का प्रभाव उस पर अवश्य पड़ता है। मनुष्य स्वयं चाहे जैसी स्वच्छता से रहे अगर उसके आस-पास के अधिकाँश व्यक्ति गन्दे रहते हैं, दूषित पदार्थों का उपयोग कर वातावरण को बिगाड़ते हैं तो उसका कुप्रभाव न्यूनाधिक परिमाण में उस स्वच्छता वाले व्यक्ति को भी सहन करना पड़ेगा। इसलिये वेद ने आज्ञा दी है कि प्रकाश (ज्ञान) के मार्गों की इस प्रकार रक्षा की जाए कि जिससे सभी लोग उनका उपयोग करके श्रेष्ठ कार्य करने में समर्थ हो सकें।

ज्ञान के पश्चात् कर्म का नम्बर आता है। ज्ञान की आवश्यकता इसीलिये है कि मनुष्य जो कर्म करता है वह उचित और लाभदायक ढंग से किये जाएं। अगर हम ज्ञान की बातों को केवल सुनते और कहते ही रहें और कर्म के रूप में उनका उपयोग न करें तो हमारा वह ज्ञान “मिथ्या” अथवा व्यर्थ ही है। इसी बात को लक्ष्य में रखकर उपर्युक्त मन्त्र में “अनुल्बणं वयत जोगुवामयः” का उपदेश दिया गया है कि “कार्य में उपस्थित होने वाले विघ्नों को दूर करो अथवा ऐसी ज्ञान युक्त विधि से काम करो जिससे कार्य में विघ्न अथवा कठिनाइयाँ उत्पन्न न हों। मनुष्य जन्म लेकर कर्म तो करना ही पड़ेगा, उससे तो मनुष्य किसी दशा में छूट ही नहीं सकता। पर एक मनुष्य कार्य को ऐसे ढंग से करता है कि उससे उसका और दूसरों का भी लाभ होता है और कुछ ऐसे भी काम करने वाले हैं जो दूसरों का ही नहीं अपना भी अहित कर डालते हैं। संसार में “अपने पैरों पर आप ही कुल्हाड़ी मारने” वालों अथवा “जिस पेड़ पर चढ़े हैं उसी को काटने” वालों की कमी नहीं है। ऐसे ही अज्ञानी जन समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होने का कारण बनते हैं और सार्वजनिक हित को हानि पहुँचाते हैं। मनुष्यत्व के सच्चे अभिलाषी व्यक्ति का परम कर्तव्य है कि वह स्वयं ऐसे समाज विरोधी कार्यों से बचे और दूसरों को भी उनसे दूर रखने की बराबर चेष्टा करता रहे।

जो मनुष्य इस वेदोपदेश को हृदयंगम करके ज्ञान-मार्ग पर चलें, उसी के अनुकूल कर्म करें, दूसरे लोगों में भी ज्ञान का प्रचार करें और तदनुकूल जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दें, वे ही मनुष्य नाम के अधिकारी हो सकते हैं। मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य और लक्षण “परोपकार” बतलाया गया है और उनके लिये सम्यक् ज्ञान का होना अनिवार्य है। जो मनुष्य नियम पूर्वक लगातार इस मार्ग पर चलता रहेगा और अपनी शक्ति तथा सामर्थ्य का उपयोग अपने साथ ही अपने संपर्क में आने वाले समस्त लोगों के हितार्थ करता रहेगा तो वह समय आने पर “मनुष्य” से उठकर ‘देवत्व’ के दर्जे में पहुँच जाएगा। इस प्रकार का ‘देवत्व’ किसी के कहने-सुनने अथवा उपाधि प्रदान करने से नहीं मिल सकता, वरन् उसका साधन सतत् सत्य-मार्ग का अनुयायी बना रहना और परोपकार का पूर्ण ध्यान रखना ही है। ऐसे ही देवत्व को प्राप्त मनुष्य अपने आचरण, मनोबल और शुभ संकल्पों के प्रभाव से अपनी सन्तान को अपने से भी अधिक शुभ गुण सम्पन्न बनाकर जनता के लिये मार्ग-दर्शक ‘देवों’ का निर्माण करने में समर्थ हो सकते हैं।

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