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Magazine - Year 1960 - Version 2

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गायत्री की सहस्र शक्तियाँ

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(क्रमशः-2)

आग्नेयी

गायत्री को अग्नि स्वरूपा कहा गया है। अग्निहोत्र-यज्ञ के द्वारा वह प्रतिष्ठित पूजित एवं परितुष्ट होती है। जिसके अन्तरात्मा में प्रवेश करती है उसे समुचित उष्णता, प्रतिभा, स्फूर्ति, तेजस्विता प्रदान करती है। जैसे अग्नि में पड़ने वाली प्रत्येक वस्तु उसी के जैसे गुण और रूप की बन जाती है, उसी प्रकार गायत्री रूप अग्नि में प्रवेश करने वाला साधक भी उस आदि शक्ति की विशेषताओं से भर जाता है। अग्नि जैसे कूड़े करकट को जला देती है वैसे ही साधक के मल आवरणों को, पाप तापों को, कुविचार कुसंस्कारों को गायत्री रूपी अग्नि भी जला डालती है। अग्नि प्रकाशवान है, साधक के अन्तःकरण में भी अज्ञानान्धकार को समाप्त करने वाला प्रकाश उत्पन्न होता है। ताँत्रिक विधान के अनुसार गायत्री मंत्र से अभिचारात्मक ‘आग्नेयास्त्र’ भी बन सकता है, जो प्रचण्ड गोला बारूद के ढेर से भी अधिक दाहक एवं नाशक शक्ति से भरपूर होता है।

आसन स्थिता

एक स्थान पर निष्ठा पूर्वक बैठने को, मन को जगह-जगह न हिला-डुला कर एक ही लक्ष्य पर चित्त केन्द्रित करने को आसन कहते हैं। गायत्री शक्ति का अवतरण उन्हीं मनः क्षेत्रों में होना संभव है जो साँसारिक कामनाओं और मानसिक उद्वेगों एवं आवेशों से चंचल नहीं रहते वरन् शान्ति, स्थिरता, निष्ठा, सन्तोष और प्रसन्नता को धारण कर एकाग्रतापूर्वक आत्मोन्नति की दिशा में प्रयत्नशील रहते हैं। गायत्री आसनस्थिता इसलिए कही गई है कि उसका अनुग्रह चंचल अस्थिर मति के लोगों को नहीं वरन् उन लोगों को प्राप्त होता है जो स्थान, भवना लक्ष्य और आकाँक्षा के दृष्टि से स्थिर है एवं दीर्घकाल तक धैर्य के साथ प्रेम पूर्वक साधना संलग्न रहते हैं।

अंतर ध्वान्ति नाशिनी

संसार के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्रों में अनेक ध्वान्तियाँ और भ्राँतियाँ फैली हुई हैं। इसके कारण आये दिन नानाविधि अनाचार और संघर्ष होते रहे हैं। इन्हीं के कारण लोग दिग्भ्रान्त होकर अपने लिए हितकर सरल मार्ग को भूल जाते हैं और उलटी दिशा में चल कर उत्थान के स्थान पर पतन का और सुख के स्थान पर दुख का वरण करते हैं। जैसे संसार में अनेक ध्वान्तियाँ और भ्रान्तियाँ है वैसे ही मनुष्य के अंतःकरण में भी जीवनोद्देश्य के संबंध में भारी अंधकार एवं भ्रम भरा होता है। लोग न तो जीवन के सही लक्ष्य को समझ पाते हैं और न उसको प्राप्त करने में संलग्न होते हैं। इस आन्तरिक विपन्नता को गायत्री दूर करती है। अन्धकार को हटा कर प्रकाश उत्पन्न करना तथा उलझनों को सही रूप से सुलझाना गायत्री शक्ति का प्रधान कार्य है।

इष्टदा

इष्टदा अर्थात् अभीष्ट वस्तुओं को प्रदान करने वाली। कामनाओं और उनकी पूर्ति के बीच में जितना अन्तर है उतना ही दुःख इस मनुष्य जीवन में समझना चाहिये। जिसकी कामनाएँ तृप्त हैं उसे ही सुखी माना जा सकता है। आकाँक्षा और परिस्थिति का ताल मेल मिलता रहे, दोनों साथ साथ रहें तो सदा प्रसन्नता एवं आनन्द की दशा बनी रहेगी। इस स्थिति को जीवन में बनाये रखने में गायत्री बहुत ही सहायक होती है। जो कामनाएँ अपने प्रारब्ध, पराक्रम, योग्यता एवं परिस्थिति के अनुकूल हैं, उनकी पूर्ति के लिए साधन जुट जाते हैं और जो आकाँक्षाएँ अपनी सीमा और औकात से बाहर की हैं या शीघ्र ही पूर्ण होने वाली नहीं हैं तो उनके सम्बन्ध में सन्तोष उत्पन्न हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्नति के लिये प्रयत्न और पुरुषार्थ करने की प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है, वरन् यह है कि अपनी शक्ति कल्पना के महल खड़े करने और उनकी पूर्ति न होने पर दुखी होने में नष्ट करने की अपेक्षा वर्तमान से पूर्ण सन्तुष्ट और उत्तम भविष्य के लिए प्रयत्नशील रहने में हमारा मन लगता है। ऐसी मनोभूमि के लोग उन्नति भी करते हैं और सुखी तथा सन्तुष्ट भी रहते हैं। उनकी इष्ट कामना पूर्ण ही रहती है।

इन्दु रूपिणी

इन्दु रूपिणी-चन्द्रमा के समान रूप वाली। चन्द्रमा को शान्ति और शीतलता का, प्रेम और सौंदर्य का देवता माना गया है। इसकी ज्योत्स्ना भी इन्हीं गुणों वाली है। गायत्री में भी ऐसी ही विशेषताएँ हैं। जिस प्रकार शरद पूर्णिमा की चाँदनी सारी पृथ्वी पर अमृत छिड़क देती है। उसी प्रकार गायत्री की पुण्यमयी किरणों के लिए जिस साधक ने अपने अंतर्द्वार खोल दिए हैं उसमें भी सर्वत्र ऐसा ही अमृत छिड़का मिलता है। चन्द्र चकोर की प्रीति प्रसिद्ध है, आत्मा भी जिस प्रीति की प्यासी है वह दिव्य प्रेम धारा गायत्री के द्वारा ही उसे प्राप्त होती है। समस्त मन्त्र नक्षत्रों के बीच गायत्री चन्द्रमा के समान अपनी सर्वश्रेष्ठता के साथ सुशोभित है।

इषुसंधान करणी

इषु कहते हैं धनुष-बाण को। उसका सन्धान करने वाली गायत्री की चोट बड़े से बड़े धनुष बाण से भी अधिक होती है। जैसे लक्ष्य वेधी बाण अपने लक्ष्य पर अचूक निशाने की तरह लगते हैं और जिस पर चोट करते हैं उसे भूमिसात् बना देते हैं, इसी प्रकार गायत्री शक्ति का प्रयोग भी जिस लक्ष्य के लिये किया जाता है वह निष्फल नहीं जाता। लौकिक एवं पारलौकिक प्रयोजनों में जिन्होंने गायत्री का आधार ग्रहण किया है उन्हें कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ा।

प्राचीन काल में जो आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, पाशुपत अस्त्र, सम्मोहनास्त्र आदि अस्त्र-शस्त्र युद्धों में प्रयुक्त होते थे उनमें मन्त्र शक्ति का ही प्रधान आधार रहता था। ब्रह्मदण्ड-ब्रह्मास्त्र आदि अस्त्र युद्ध में तो नहीं वरन् ब्राह्मणत्व की, ब्रह्मयज्ञों की रक्षा के लिये काम आते थे, इन्हीं पर ब्रह्मतेज आधारित था। परशुराम के कन्धे पर जो फरसा रहता था, जिससे उन्होंने 21 बार समस्त संसार को दिग्विजय किया था, वह यही गायत्री शक्ति सम्भव ब्रह्मदण्ड था। गायत्री को इस प्रकार शस्त्रास्त्र के रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।

इड़ा पिंगल रूपिणी

ब्रह्मरंध्र से लेकर कुण्डलिनी तक, सहस्रार-कमल से लेकर मूलाधार तक ब्रह्मनाड़ी में होकर दो विद्युत शक्ति प्रवाह निरन्तर बहते रहते हैं। इसमें से एक ऋण (नेगेटिव) है दूसरी धन (पॉजिटिव) है। इन्हें सूर्य शक्ति और चन्द्र शक्ति भी कहते हैं। योग की भाषा में इनके नाम इड़ा और पिंगला हैं। यह दायें-बायें नासिका स्वरों के साथ प्रवाहित होती हैं। जैसे बिजली से चलने वाले सारे यन्त्र दो प्रकार के ठण्डे और गरम तारों के मिलन पर ही अपनी सक्रियता बनाये रखने में समर्थ होते हैं, उसी प्रकार मनुष्य का शारीरिक और मानसिक संस्थान भी इन दोनों इड़ा पिंगला नाड़ियों पर अवस्थित है। यह दोनों प्रवाह गायत्री के ही लोम विलोम रूप हैं। इसलिए उसे इड़ा रूपिणी कहा गया है।

ईश्वरी देवी

ईश्वर को यों भाषा की दृष्टि से पुल्लिंग माना जाता है, पर वस्तुतः वह लिंग भेद से बाहर है, उसे न नर कहा जा सकता है न नारी। विद्युत, वाष्प, अग्नि, सर्दी, गर्मी आदि को भाषा की दृष्टि से किसी लिंग में गिन लिया जाए पर उन्हें तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो नर-नारी की कसौटी पर कसकर किसी भी पक्ष का घोषित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे स्त्री-पुरुष दोनों के लक्षणों में रहते हैं। ईश्वर के संबंध में भी यही बात है। उसे भक्त अपनी भावना के अनुसार ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ माता, पिता जो चाहे सो कह सकता है। इस प्रकार ईश्वर को पुल्लिंग बोधक शब्द में सम्बोधन न करके यदि ईश्वरी इस स्त्रीलिंग सूचक शब्द से कहा जाए तो इससे कुछ भी दोष नहीं आता।

जिस प्रकार सूर्य और उसकी तेजस्विता एक ही वस्तु है, अलग लगने पर भी वस्तुतः एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं, इसी प्रकार ईश्वर की दिव्य शक्ति चेतना एवं सक्रियता जिसे गायत्री के नाम से पुकारते हैं किसी भी प्रकार भिन्न नहीं हैं। इसी से उसे ईश्वरी देवी कहते हैं।

उषा

जिस प्रकार प्रभात काल होने पर ब्रह्म मुहूर्त में पूर्व दिशा में उषा का उदय होता है-पौ फटती है-हलका-हलका लाल पीला प्रकाश फैलकर सूर्य के उदय होने की पूर्व सूचना देता है तथा प्राणिमात्र में जगने-उठने और चलने की प्रेरणा प्रदान करता है, उसी प्रकार मानव अन्तःकरणों में छाई हुई सघन अज्ञान अन्धकार की निशा को समाप्त करने के लिए गायत्री शक्ति उषा के रूप में उदय होती है। जिसके भीतर यह उदयन शुरू हुआ नहीं कि उसे अपने अन्दर परमात्मा की दिव्य किरणें काम करती हुई परिलक्षित होती हैं। आत्मकल्याण के लिए सजगतापूर्वक कटिबद्ध होने की किसी दैवी प्रेरणा का अनुभव उसे वैसे ही होता है जैसे उषा उदय होने पर चिड़ियों तक को अनुभव होता है और वे अनायास ही प्रभु का नाम लेकर चहचहाने लगती हैं एवं घोंसले की सीमा में बैठी न रहकर अनन्त आकाश में उड़ने का आनन्द लेने को कटिबद्ध हो जाती हैं। आध्यात्मिक उषा-गायत्री श्री-साधक के मनः स्तर में ऐसी ही ज्योति, प्रेरणा, स्फूर्ति तथा तत्परता उत्पन्न करती है।

उड्ड प्रभा

उड्डप्रभा-नक्षत्रों की रोशनी। तारागणों की रोशनी देखने में छोटी और तनिक सी मालूम देती है पर वैज्ञानिक यंत्रों से देखने पर पता चलता है कि वह जितनी मालूम होती है वस्तुतः उससे असंख्यों गुनी अधिक है। “अल्फा सैंटोरो” जो हमसे सबसे निकट तारा है, पृथ्वी से इतनी दूर है कि इसके प्रकाश को हम तक आने में 8 वर्ष लगते हैं जब कि प्रकाश एक सैकिण्ड में 1850000 मील चलता है। जो तारे हमें जरा से दीखते हैं उनमें से हजारों ऐसे हैं जो पृथ्वी तो बेचारी क्या चीज-सूर्य से भी हजारों गुने बड़े हैं जबकि हमारा सूर्य ही हमारी इस पृथ्वी से ढाई लाख गुना बड़ा है।

तात्पर्य यह है कि तारे तथा उनकी रोशनी दीखती जरूर नन्हें से हैं पर वस्तुतः वे इतने बड़े हैं कि उनके विस्तार की कल्पना मात्र से सिर चकराने लगता है। गायत्री के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसे थोड़े से अक्षरों का एक जरा सा मन्त्र कहा जा सकता है पर वस्तुतः उसकी महत्ता हमारी कल्पना शक्ति की सामर्थ्य से बहुत अधिक बड़ी है।

ऊर्ध्व केशी

अर्थात् जिसके बाल ऊपर को हों। यहाँ बालों से मतलब उन बालों से नहीं है जो सिर पर दीखते हैं और जिन्हें काढ़ा सँभाला जाता है, वरन् मस्तिष्क से निकलने वाली उन किरणों से आशय है जो विचार-प्रवाह के सूक्ष्म विद्युत तरंगों के रूप में निकलती रहती हैं। गायत्री से प्रभावित मस्तिष्क सदा ही ऊर्ध्वगामी विचार करता है। ऊपर की ओर, उच्च उद्देश्यों की ओर उसकी गति रहती है, नीच, पतनकारी, अधोगामी प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है और वह प्रवाह कुमार्ग की ओर न जाकर सन्मार्ग की दिशा में ही प्रवाहित रहता है। गायत्री अपने साधक को ऊर्ध्वगामी बनाती है और वह उच्चता की ओर दिन-दिन बढ़ते हुए अन्ततः ऊर्ध्व लोकों को ही प्राप्त कर लेता है।

ऊर्ध्वाधोगति भेदिनी

आत्म विकास की दिशा में बढ़ता हुआ साधक प्रारम्भ में सतोगुण की ओर, स्वर्गीय आनन्दों की ओर बढ़ता है। पर जब उच्च भूमिका में पहुँचता है तो त्रिगुणातीत हो जाता है। उसकी स्थिति परमहंस गति में, स्थितप्रज्ञता में, निर्विकल्प समाधि में हो जाती है। अधोगति से तो वह पहले ही छूट चुका था, इस उच्च स्थिति पर पहुँच कर वह सतोगुण जन्य स्वर्गादि सुख से भी विमुख हो जाता है और ब्रह्मानन्द से परमानन्द में लीन हो कर अविचल शान्ति का अधिकारी बनता है। इसी पूर्णावस्था तक पहुँचा देने वाली होने के कारण, समस्त शुभ-अशुभ भव-बन्धनों से युक्त कर देने के कारण गायत्री ऊर्ध्वाधोगति भेदिनी-अर्थात् ऊँची-नीची गतियों को समाप्त कर देने वाली कही जाती है।

ऋषिवेद नमस्कृता

ऋषियों और देवताओं द्वारा अभिनन्दित गायत्री ही है। मनुष्य को ऋषि बना देने की क्षमता गायत्री में है। उसके पाशविक कुसंस्कार समाप्त होकर धर्म कर्तव्यों के अनुरूप विचार आचरणों की प्रधानता हो जाती है तो वह ऋषि कहलाने लगता है। ऋषि का गौरव प्राप्त कर लेना मनुष्य के लिए चक्रवर्ती शासक या कुबेर के कोष का अधिपति बन जाने से भी बढ़कर अधिक महत्वपूर्ण है। जब यह गौरवास्पद स्थिति प्राप्त होती है तो वह ऋषि इस उत्थान के मूल कारण गायत्री के लिये अत्यन्त कृतज्ञतापूर्वक नतमस्तक होता है। ऋषि से अगली पदवी देवता की है। दिव्य गुणों, दिव्य स्वभावों, दिव्य आचरणों के कारणों को बढ़ाते-बढ़ाते वह ऋषि ही आगे चल कर, अमर हो कर देवता बन जाता है, तब भी उसे यही अनुभूति होती है। इस उच्च स्थिति पर पहुँचने के लिये गायत्री-रूपी सीढ़ी ही सर्व प्रधान उसकी सहायिका रही है। उसके प्रति उसका मन निरन्तर शतशः प्रणाम करता रहता है। इन्हीं कारणों से गायत्री को ‘ऋषि देव नमस्कृता’ कहा जाता है।

ऋण हर्त्री

संसार में ऋण को सबसे बड़ा शत्रु कहा जाता है। इससे चिन्ता, अपमान आदि की जो विपन्न स्थिति पैदा होती है वह शारीरिक कष्टों से भी अधिक दुख देती है। इसका कारण कभी-कभी तो आकस्मिक आपत्ति एवं आवश्यकता भी होती है पर अधिकतर खर्चीला स्वभाव और किन्हीं विशेष अवसरों पर उत्साह में आकर अपनी परिस्थिति से अधिक खर्च कर डालना होता है। गायत्री उपासना में मनुष्य को यह सद्बुद्धि प्राप्त होती है कि वह अपनी आमदनी और मर्यादा से अधिक खर्च नहीं करता चाहे उसे इसमें कष्ट ही क्यों न उठाना पड़े। ऐसे लोग एक तो ऋण-ग्रस्त होते ही नहीं। यदि हो भी जाएं तो आवश्यक खर्चों से कमी करके उऋण होने का प्रयत्न करते हैं। सन्मार्गगामी साधक पर सदय होकर कभी-कभी माता ऐसा अनुग्रह भी करती है कि ऋण मुक्त होने के कोई आकस्मिक सुयोग सामने आ जावें। धार्मिक दृष्टि से देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण यह तीन ऋण प्रत्येक व्यक्ति पर होते हैं और इन्हें चुका कर ही वह भव-बन्धनों से छूट सकता है। माता उसे ऐसी प्रेरणा और आकाँक्षा प्रदान करती है कि सत्कर्मों द्वारा वह इन तीनों ऋणों को चुकाता हुआ मानव-जीवन का उद्देश्य पूर्ण करता है। इन्हीं कारणों से गायत्री को ऋण हर्त्री कहते हैं।

ऋषि-मण्डल-चारिणी

वस्तुतः गायत्री ऋषि मण्डल में निवास करने वाली ही है। दुष्ट, दुराचारी, वासना तृष्णा में उलझे हुए, अधोगामी प्रवृत्तियों के गुलाम न तो गायत्री की उपयोगिता जानते हैं, न मानते हैं, न उसको जीवन में धारण करने का प्रयत्न करते हैं। उनके लिए वह व्यर्थ की वस्तु है। हीरे का मूल्य घसियारा भला क्या समझ पावेगा, उसकी परख तो जौहरी ही कर सकते हैं। जिनमें विवेक की समुचित मात्रा है वे ही गायत्री का महत्व जानते हैं और उससे लाभ उठाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करते हैं। ऋषियों के समाज से ही गायत्री का आचरण होता देखा गया है इसी से वह ऋषिमण्डल चारिण है।

ऋजु मार्गस्था

कल्याण के मार्ग में अवस्थित गायत्री ही है। ऋजु, आत्मकल्याण को कहते हैं, वह बिना किसी सुनिश्चित साधना मार्ग पर चले उपलब्ध नहीं हो सकता। उच्च विचार और उज्ज्वल चरित्र रखते हुए ऋजु मार्ग के पथिक को साधना संलग्न भी होना पड़ता है। यों अनेकों साधनाएं प्रचलित हैं, सन्तों ने अपनी अपनी सूझ-बूझ के अनुसार अनेकों साधन मार्ग तथा सम्प्रदाय चला रखे हैं, वे विभिन्न दिशाओं की ओर खींचते हैं और परस्पर भारी मतभेद से भी भरे हुए हैं। इन औंधे सौंधे मार्गों में से किन्हीं पर भटकते रहने से अनेकों व्यक्ति अपना बहुमूल्य समय भी बर्बाद करते हैं। साधना का सर्वश्रेष्ठ वेदोमत वही मार्ग है जिसको अब तक प्रत्येक ऋषि और तत्वदर्शी ने अपनाया है। अनादि काल से लेकर आज तक के शास्त्रवेत्ता एवं विज्ञ व्यक्तियों के द्वारा गायत्री उपासना का ही अवलम्बन स्वीकार किया जाता रहा है, उसे ही निर्भ्रान्त माना गया है। ऋजु मार्ग की सीधी सड़क को गायत्री ही कहते हैं।

ऐहकामुष्मि प्रदा

पारलौकिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तो गायत्री की उपयोगिता निर्विवाद है ही, इहलौकिक कामनाओं की पूर्ति में भी वह कम सहायक सिद्ध नहीं होती। यों तो वह अनुचित और असंबद्ध कामनाओं को शान्त कर देती है या फिर ऐसा सुझा देती है जिस पर चलकर मनुष्य अपनी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करने के साधन जुटा सके, वे दोनों में से कोई मार्ग क्यों न निकले, इतना अवश्य होता है कि साधक का मन कामना-सन्तप्त नहीं रहता, उसे किसी न किसी प्रकार मानसिक शाँति का द्वार अवश्य मिल जाता है।

ओतप्रोत निवासिनी

यों मन्दिर देवालयों में, वेदी चौकियों में, प्रतिमाओं तथा चित्रों में, अग्नियों में, वेद मन्त्रों एवं भावना सूत्रों से आवाह्न करके गायत्री शक्ति को विशेष स्थानों पर स्थापित किया जाता है और वहाँ उसकी पूजा अर्चना भी होती है। उपासना विज्ञान की दृष्टि से यह आवश्यक भी है। पर ऐसा न समझना चाहिए कि वह इसी स्थिति तक सीमित है। या कहीं किसी लोक विशेष के स्थान विशेष में निवास करती है। उसकी सत्ता सर्वत्र समाई हुई है। प्रत्येक पदार्थ में तथा प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःकरण में वह ओतप्रोत है। वह सर्वत्र है, कोई स्थान ऐसा नहीं जहाँ वह न हो। भावना द्वारा उसे कहीं भी प्रकट किया जा सकता है।

औपसन फल प्रदा

जिस प्रकार वर्षा, धूप आदि बिना बुलाये, बिना आमंत्रित किये चाहे जहाँ जा पहुँचते हैं और माँगने न माँगने पर भी अपना प्रसाद हर किसी को प्रदान करते हैं वह बात गायत्री में नहीं है। वह केवल उसे ही फल देती है जो उसकी उपासना करता है, साथ ही उपासना के परिमाण के अनुसार फल देती है। बछड़ा जब दूध पीने का उपक्रम करता है तभी उसे गाय दूध पिलाती है, यदि वह न पीना चाहे तो उसे दूध नहीं मिल सकता। फिर जितनी देर, जितनी तीव्र या मन्द गति से वह दूध पीता है उसी मात्रा में उसे उपलब्ध होता है। गाय बछड़े को दूध पिलाना चाहती है, पिलाती भी है पर उसकी मर्यादा उतनी ही होती है जितना बछड़े का प्रयत्न। ठीक यही बात गायत्री के सम्बन्ध में भी है, वह उपासना के अनुपात से ही फल-प्रद है। अनायास हर कोई बिना प्रयत्न के ही लाभ प्राप्त कर सके ऐसी छूट इस साधना में नहीं है।

कल-कंठिनी

मधुर वाणी वाली गायत्री है। ऋग्वेद में जिस मधु विद्या का वर्णन है वह गायत्री में सन्निहित मधुरता ही है। कटुता, कर्कशता, कठोर वचन बोलना, निन्दा, चुगली आदि जितने भी वाणी के, कंठ के दोष हैं उन्हें दूर करने में साधक निरन्तर ही प्रयत्नशील रहने लगता है और कुछ ही दिन में अपनी जिह्वा तथा भावना पर ऐसा नियंत्रण स्थापित कर लेता है कि किसी से दुर्वचन न कहे, हर किसी से मधुर और स्नेहयुक्त ही बोले तथा वैसा ही व्यवहार भी करे। कोयल को कल-कण्ठिनी कहते हैं उसकी मधुर वाणी सबको प्रिय होती है, गायत्री उपासना से भी हर किसी को यह कल-कंठ प्राप्त होता है। उसका स्वर कैसा ही रहे, स्नेह सौजन्य की समुचित मात्रा वचन में रहने से वह संगीत के समान हर किसी को मधुर लगता है, सभी उसकी इस वचन सज्जनता से प्रभावित होकर उसके प्रति प्रेम और आदर का व्यवहार करते हैं। यही वशीकरण मन्त्र भी है।

कल्याणी

कल्याण की करने वाली। कभी अकल्याण के उलटे प्रतिफल की सम्भावना गायत्री में नहीं है। कई तान्त्रिक कौल मन्त्र ऐसे होते हैं जिनमें उच्चारण या विधान सम्बन्धी कोई दोष रह जाए तो उसका परिणाम उलटा, हानिकारक हो जाता है, लाभ के स्थान पर हानि का, सिद्धि के स्थान पर विपत्ति का सामना करना पड़ता है। यह कठिनाई गायत्री साधना में नहीं है। उसमें कोई भूल या अशुद्धि भी हो जाए तो अधिक से अधिक इतनी हानि हो सकती है कि सत्परिणाम में कमी हो जाए, स्वल्प लाभ हो। पर ऐसी सम्भावना कभी भी नहीं है कि उससे कभी किसी का रंच मात्र भी अनिष्ट हो। वह हर किसी के लिए-बाल, वृद्ध, नर, नारी, गृही, विरक्त के लिए समान रूप से कल्याणकारक है।

काल रूपिणी

काल रूपिणी-अर्थात् समय-साध्य एवं विकराल भी। जैसे समय पर ही वृक्ष बढ़ते एवं फलते हैं, उसी प्रकार गायत्री साधना भी उतावली करने से नहीं, आवश्यक समय व्यतीत होने पर ही फल देती है। नियत समय पर साधना के लिये बैठना, उपासना के लिए जितना समय लगाना निश्चित किया हो उतना नियमित रूप से लगाना, जितने समय में वह सफल होती है उतने समय तक धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करना, यह सफलता के लिए आवश्यक शर्त है। काल के, समय के आधार पर गायत्री की सफलता निर्भर रहने के कारण उसे काल-रूपिणी कहा गया है। वह विकराल भी है। साधक के भीतरी दोष दुर्गुणों का ऐसे संहार करती है जैसे असुर निकन्दना दुर्गा ने महिषासुर आदि राक्षसों का किया था। वह साधक के सम्मुख उपस्थित कष्टों, विघ्नों एवं अनिष्टों को भी काल-रूपिणी बन कर मटियामेट करती है। उस विकरालता के सामने कोई अशुभ अनिष्ट ठहर नहीं सकता।

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