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Magazine - Year 1961 - Version 2

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आखिर अहंकार किस बात का?

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(श्रीमती ज्ञानवती देवी जी)

अहंकार एक मानसिक शत्रु है जो मन रूपी पुष्प को नष्ट कर डालता है। यह प्रत्येक प्रयत्न के फूल में विनाशकारी कीट की भाँति है। यह आत्मा के उपवन को तुषारापात की भाँति नष्ट कर डालने वाला है।

सबसे खतरनाक बुद्धिमत्ता का अहंकार है, क्योंकि यह परिपक्व और सुविकसित मन में पाया जाता है। यह अत्यन्त चतुर और धोखेबाज भी है। स्त्री और पुरुष अपनी उच्च शिक्षा, योग्यता और विचारशीलता के कारण अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते है। उनके मन में इस भाव के उत्पन्न होते ही दूसरों को हेय समझने का भाव उठ खड़ा होता है। मैंने बहुधा ऐसे लोगों को इस प्रकार कहते हुए सुना है, ‘इनका स्तर मेरे स्तर से नीचा है।’

कुछ अहंकारी लोग इस प्रकार के भाव को ‘दया’ कह कर पुकारते हैं। यहाँ तक कि जो लोग उनके समान विचार नहीं रखते उन्हें अपना “कमजोर भाई” कह कर पुकारने में संकोच नहीं करते।

इस प्रकार का अहंकार अनेकों आधुनिक सुधारों का अभिशाप बन गया है। ऐसे सुधारकों को कौन नहीं जानता जो अपने प्रति असीम उत्साह और उन लोगों के प्रति जो उनके विचारों से सहमत नहीं है, दया दिखलाते हैं। यह दया यहीं तक सीमित नहीं रहती, प्रत्युत वर्तमान तथा प्राचीन काल के उन महान स्त्री पुरुषों के प्रति भी दिखाई जाती है जिन्होंने उनके सुधारों को अंगीकार नहीं किया। जब ऐसे लोग अपने कार्य को स्वयं निन्दनीय बना देते हैं तब विपत्तियों के विरोध का सामना करना पड़ता है तथा उन पर अनेक लाँछन लगाए जाते हैं जब वे तुरन्त अपने उद्देश्य के लिए शहीद हो जाते हैं। वे इस बात को भूल जाते हैं कि यह सब उन्हीं के विचारों का परिणाम है। उन्होंने जो कुछ बोया था उसी को काट रहे हैं।

एक बार मैंने सुना कि एक जोशीले नवयुवक ने एक वृद्ध तथा गम्भीर दार्शनिक से, जो उसके विचारों से सहमत नहीं था, का, “मैं ईमानदारी और पूरे उत्साह के साथ इस सत्य की रक्षा करूँगा

इस बात का उत्तर उस दार्शनिक ने गम्भीरता पूर्वक दिया-हे नवयुवक, सत्य की अथवा सत्य के सम्बन्ध में अपनी राय की रक्षा करने के लिए तुम इतने उत्साहित हो?”

जब लोग सत्य को जान लेते हैं तब वे उसकी रक्षा के लिए कभी चिन्तित नहीं रहते। सत्य तो अपनी रक्षा स्वयं है, उसे किसी की रक्षा की आवश्यकता नहीं। जिन्होंने किसी सुन्दर बात को खोज निकाला है वे कभी इस सम्बन्ध में ढिंढोरा नहीं पीटते। वह सुन्दरता चुपचाप उस व्यक्ति के जीवन और चरित्र से आप ही आप व्यक्त होती रहती है। जीवन और चरित्र का महत्ता से कोई इंकार नहीं कर सकता।

बातें और वाद विवाद बालू पर लिखे अक्षरों के समान हैं जो कभी भी मिटाये जा सकते हैं।

कर्म और चरित्र जीवन रूपी चट्टान पर खुदे हुए स्पष्ट अक्षर हैं।

यह तो बुद्धिमत्ता के अहंकार की बात हुई जिसके कारण स्त्री और पुरुष अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं। जब ऐसे लोग अपने को उन लोगों की अपेक्षा, जो उनके विचार से सहमत नहीं हैं, उच्च स्तर पर समझने लगते हैं, तब यह अहंकार अत्यन्त आपत्तिजनक रूप धारण कर लेता है।

परन्तु इससे भी भयानक आध्यात्मिक अहंकार है। क्योंकि यह बुद्धिमत्ता के अहंकार से अधिक चतुर है और अत्यन्त सरलता से अपने शिकार को धोखा देने में सफल हो जाता है।

इस आध्यात्मिक अहंकार के कारण ही लोग ऐसे लोगों को जो उनके विचारों से सहमत नहीं, ''अरक्षित'' समझते हैं।

आध्यात्मिक अहंकार के कारण ही लोग इस प्रकार कह उठते हैं, ''संसार में सभी बातें गलत हो रही हैं, सभी उल्टी हो रही हैं। और संसार को सही रास्ते पर लाना हम लोगों के ही वश की बात है। हम लोगों के ही पास आध्यात्मिक उन्नति की कुञ्जी है।''

कभी- कभी लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि किस प्रकार यह संसार इतने हजार वर्षों तक चलता रहा जब कि इन लोगों का तथा इनके धर्म का कहीं नाम निशान तक न था।

यह आध्यात्मिक आदेश है ''प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अपेक्षा दूसरों का अधिक सम्मान करना चाहिए ।'' परन्तु यह स्पष्ट है कि इस आदेश का पालन करना अत्यन्त कठिन है।

मनुष्य में आपस में भेदभाव उत्पन्न करने वाले इस आध्यात्मिक अहंकार से दूर रहिए।

सभी धर्म अच्छे हैं। सभी धर्म अच्छाई, पवित्रता और सद्गुणों रूपी एकमात्र मार्ग उस ईश्वर तक पहुँचने का बतलाते हैं।

सब लोग उस महान प्रकाश की खोज में हैं और जितना कुछ उस महान प्रकाश का अंश उन्हें प्राप्त हो गया है, उसी के अनुसार अपनी जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

''महापुरूष को अपने को सब प्राणियों का सेवक समझना चाहिए।''

उन बातों को सोचना जिनका ज्ञान हमें नहीं है, बुद्धिमत्ता के अहंकार को जीतने का सबसे अच्छा उपाय है। उस विस्तृत ज्ञान के समुद्र के विषय में विचार कीजिए जिसके विस्तार का हमें कुछ भी ज्ञान नहीं है। जब आईजक न्युटन जैसे परम ज्ञानी ने विषय में इस प्रकार कहा था, तो हम लोगों के लिए तो कुछ कहना ही नहीं-

''मैं विस्तृत ज्ञान रूपी समुद्र के किनारे खेलता हुआ एक शिशु हूँ। विस्तृत ज्ञान रूपी समुद्र मेरे सामने फैला हुआ है जिसके बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता।''

हमारी शिक्षा और ज्ञान की सीमा कुछ भी हो, भले ही हम दूसरों की अपेक्षा कुछ अधिक जानते हों, पर शिशु के समान ही हैं। यदि हम आज दो तीन अक्षरों वाले शब्दों का उच्चारण कर लेते हैं तो हमें यह न भूलना चाहिए कि कल हम भी क, ख, ग सीख रहे थे।

यदि हमें आध्यात्मिक अहंकार के उत्पन्न होने का भय हो अथवा यह अहंकार उत्पन्न हो गया हो तो हमें पवित्रता, अच्छाई, पूर्णता और शक्ति के उस स्तर तक अभी हम नहीं पहुँच सके हैं और न इस छोटे से जीवन में पहुँचने की आशा करने का साहस ही कर सकते हैं। और

''जो खड़ा है उसे इस बात से सावधान रहना चाहिए कि कहीं वह गिर न पड़े।''

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