नेता नहीं, नागरिक चाहिए
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(श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’) सन् उन्नीस सौ बीस-इक्कीस के जमाने में एक विज्ञापन पढ़ था, “ क्या आप स्वराज्य चाहते है? तो लेक्चर देना सीखिये।” इश्तहार छपवाने वाला कोई पुस्तक विक्रेता था, जो इस विज्ञापन के जरिये अपनी किसी किताब की बिक्री बताना चाहता था और गालिबन, किताब से नेताओं के भाषणों का ही संकलन भी थे। तब से इस देश में व्याख्यानों की भी ऐसी झड़ी रही है जैसी झड़ी अब मेघ की भी नहीं लगती है। पिछले वर्षों में अपने देश में व्याख्यान लगातार बरसते रहे है और वृष्टि करने वाले नेताओं की तादाद भी बेशुमार रही है। आजादी के लड़ाई के दिनों में देश के सामने ले देकर एक ही सवाल था कि विदेशी शासन कैसे हटा जाए। मगर, यह सवाल जरा टेढ़ा पड़ता था, क्योंकि हुकूमत से लड़ने का अर्थ अपनी जान और माल पर संकट को निमंत्रण देना था। इसलिए, जो लोग भी अपनी थोड़ी या बहुत कुरबानी देने को आगे आये, उन्हें जनता ने नेता कह कर पुकारा। जनता के पास और था ही क्या जिसे लेकर वह कुरबानी की इज्जत करती। नेताओं से भरा देश लेकिन आजादी के बाद जब देश के सारे काम नेताओं के हाथ में आ गये तब उन्हें पता चला कि अभी तक इस देश ने नेता ही पैदा किये है, नागरिक नहीं। व्याख्यान सुनते-सुनते इस देश ने व्याख्यान देने की आदत सी डाल ली है। जहाँ तक व्याख्यान के मजमून पर अमल करने का सवाल है, वह परिपाटी स्वतन्त्रता के आगमन के साथ ही समाप्त हो गई। अब यहाँ के लोग कर्म को कम, वाणी को अधिक महत्व देते है। हर किसी की यही अभिलाषा है कि वह दूसरों को कुछ उपदेश दे, मगर खुद किसी भी उपदेश पर अमल करने को वह तैयार नहीं है। यों, देश के नवनिर्माण के ज्यादा काम ठप पड़े है, क्योंकि जो सचमुच, देश के नेता है वे काम नहीं करना जानते और जो काम करना जानते है उन्हें हाथ व पाँव हिलाने की अपेक्षा जीभ की कैंची चलाने में ही अधिक आनन्द आता है। नेता बनने की धुन का यह पहला असर है जिसे हिन्दुस्तान आज बुरी तरह भोग रहा है। फिर भी यह सच है कि देश के नेता, देश के शिक्षा विशेषज्ञ और बच्चों के माता पिता, सभी चाहते है कि स्कूलों और कालेजों में पढ़ने वाले हमारे सभी बच्चे और नौजवान किसी न किसी क्षेत्र में नेता बनने की तैयारी करें। लेकिन क्या किसी ने यह भी कभी सोचा है कि अगर सारा समाज नेता बनने की तैयारी में लग गया तो नेताओं की पीछे चलने वाले लोग कौन रह जायेंगे? और क्या नेताओं से भरा हुआ देश कोई अच्छा देश होता है? कल्पना कीजिए कि देश का एक एक आदमी जवाहरलाल हो गया है। तो फिर यहाँ का एक-एक आदमी सोचेगा, योजना बनाएगा और बहस करेगा। लेकिन, तब इन चालीस करोड़ जवाहरलालों को भोजन कौन देगा? उनके लिए कपड़े कौन बुनेगा? और मुश्किल तो यह है कि उनकी मोटरें कौन चलाएगा। जवाहरलाल बनने में और तो सब ठीक है, कठिनाई सिर्फ इतनी है कि जवाहरलाल कुदाल नहीं चला सकता, हथौड़ा नहीं उठा सकता और ज्यादातर वह अपनी मोटर भी आप नहीं हाँकता है। “बड़ों की बात सुनो, उनकी नकल मत करे। यह कहावत किसी भारी अकलमन्द ने कही होगी लेकिन अब तो बड़ा और छोटा, यह भेद सुनते ही लोगों को गुस्सा आ जाता है। जिस जमाने का एक ही नारा हो कि सब लोग समान हैं, बस जमाने में एक या दस को बड़ा और बाकी को छोटा बताना तङग-नजरी नहीं तो और क्या है? हर आदमी सिर्फ बराबरी के असूल पर आगे बढ़ने को बेकरार है। नतीजा यह है कि जो जहाँ है, वहीं कुढ़ रहा है, वह वहीं जल रहा है।छलाँग मारने की मनोवृत्ति''सब लोग आपस में बराबर हैं'' इस बात का लोगों ने गलत अर्थ लिया है। इस सूक्ति का मामूली अर्थ यह है कि सबको विकास का समान अवसर मिलना चाहिये, यह नहीं कि अवसर की प्रतीक्षा किये बिना, चाहे जहाँ इच्छा मात्र से पहुँच जाय। अवसर कोई ऐसी चीज नहीं है जो रोटी दाल की तरह सबके सामने परोसी जा सके। उसे पाने के लिए भी अपने गुणों का विकास करना होता है, तत्परता, मुस्तैदी और वीरता भी सीखनी होती है, और उम्र तथा तजुर्बों का भी इन्तजार करना पड़ता है। मगर नेतागिरी का चस्का लग जाने के कारण लोगों की इन्तजारी की लियाकत घट गई है और जिस जगह पर आदमी धीरे- धीरे और बड़ी कोशिशों के बाद पहुँचता है, उस जगह पर अब लोग छलाँग मार पहुँच जाना चाहते हैं।मगर लोग जो छलांग मार कर आगे बढ़ना चाहते हैं, उसका कारण क्या है ? कुछ तो यह कि कभी- कभी दूसरों को उन्होंने छलांग मारकर आगे बढ़ते देखा है और ज्यादातर यह कि वे काम करना नहीं हुक्म चलाना चाहते हैं।योजना बनाने और आदेश भेजने की सही जिम्मेदारी को वही निभा सकता है जो इन सभी कामों के तजुर्बे हासिल कर आराम की जगह पर पहुँचने के लिये बेचैनी ही इस बात का सबूत है कि यह अपने संगठन का अच्छा नेता नहीं बन सकता। जिसके चरित्र में धीरता नहीं, उससे बड़े दायित्व को योग्यता पूर्वक निबाहने की आशा नहीं की जा सकती। चूँकि कुछ अधीर लोग भी संगठनों के नेता बन गये हैं। इससे अधीरता नेतृत्व का गुण नहीं बन जाती ।। उल्टे इन तथाकथित नेताओं के आचरण से यही शिक्षा निकलती है कि जो समय से पूर्व नेता बन जाने को बेचैन है, उसे नेता की जगह पर कमी मत आने दो।नेतागिरी का लोभ एक दूसरी दृष्टि से भी मनुष्य को पवित्र बनाता है। जीवन की विशाल कर्मभूमि की ओर जरा नजर दौड़ाइये। सारा संसार नेतृत्व की अभिलाषा का शिकार हो रहा है। जो व्यापार में हैं, वे मुनाफाखोरी और घोरबाजारी करके धन में सबसे आगे निकल जाना चाहते हैं, जो नौकरी में हैं, अपने ऊपर वाले अफसर को ढकेल कर आगे आने को बेचैन हैं और जो सामाजिक या राजनैतिक क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, वे भी ऊपर के नेताओं को हटा कर खुद उनकी जगह ले जाना चाहते हैं। भाषण गर्जन, तिकड़म और छद्म झूठे वादे और धोखे की कसम से सारा सार्वजनिक जीवन कोलाहल से पूर्ण है। ये सबके सब नेतृत्व की अभिलाषा के दोष है। जब मनुष्य यह ठान लेता है कि अपने क्षेत्र में मुझे सबसे आगे बढ़ना है, तब साध्य का आकर्षण उसके भीतर प्रबल हो उठता है और साधन की महत्ता गौण हो जाती है। साधन की महिमा समझने वाला आदमी गलत राह से चलकर आगे आना नहीं चाहेगा, और नेतृत्व का लोभ साधन की महिमा को कम करता है, इसमें संदेह नहीं।अपनी रेखा को बड़ी करने के बदले, दूसरे की रेखा को छोटी बनाने की कुत्सित भावना भी नेतृत्व की आकांक्षा से जन्म लेती है। प्रतिद्वन्दिता की भावना मनुष्य के स्वभाव में दाखिल है, क्योंकि यह हमारी पशु या जीवधारी प्रवृत्ति से निकलती है। लेकिन, पशुओं के समान मनुष्य में केवल जीवन की ही प्रवृत्ति नहीं होती, दिमाग का मालिक होने के कारण वह सोच भी सकता है और हृदय तथा आत्मा रखने के कारण वह अपने विचार को निर्मल भी बना सकता है। क्या उसे इसका ज्ञान नहीं हो सकता कि केवल पशु-प्रवृत्ति के समीप होता जा रहा है? जो भी मनुष्य मानवीय आनन्द में वृद्धि करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह मनुष्यों में जो गुण है उनकी प्रशंसा में वृद्धि करे और जहाँ भी ईर्ष्या और द्वेष की लपटें उठ रही हैं उन लपटों को नीचे लाये। व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है, यह न तो अस्वाभाविक है, और न निन्दनीय। सिर्फ उसे यह देखते चलना है कि खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश में कहीं वह उन मूल्यों को तो नहीं कुचल रहा है जो एक मनुष्य के वैयक्तिक विकास से कई गुना अधिक मूल्यवान है। व्यक्ति का सुधार सर्वप्रथम लोगों के भीतर दिन रात नेतृत्व की आकांक्षा जगाते फिरना खतरनाक काम है और नेता बनने की कोशिश में लगे रहने से हर आदमी नेता बन भी नहीं सकता। बात कड़वी हो या मीठी, लेकिन आदमी वहीं तक जाता है, जहाँ तक जाने की उसमें मौलिक शक्ति होती है। ऐसा भी हुआ है कि इस नियम को तोड़कर लोग नेता के पद पर जा पहुँचे हैं। लेकिन ऐसे अपवादों के नतीजे अच्छे नहीं हुए, क्योंकि या तो वे बहुत जल्दी लुढ़क कर नीचे आ गये अथवा उनका नेता बना रहना इंसानियत के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ है। समाज का असली सुधार उसमें रहने वाले व्यक्ति का सुधार है। व्यक्तियों के ही बुरे या भले होने से हम समाज को बुरा या भला कहते हैं। मुख्य बात यह नहीं कि हम दूसरों को सुधारने का उपदेश दें, बल्कि यह कि सुधार की जो भी बातें हमारे मन में उठती हो, पहले हम उन्हें अपने चरित्र और स्वभाव पर लागू करे समाज की सुन्दरता दो चार नेताओं पर नहीं बल्कि वहाँ के व्यक्तियों के सुधार पर निर्भर करती है और नेता होता कौन है? अक्सर वह मनुष्य जो उन मूल्यों को अपने चरित्र और व्यक्तित्व में व्यावहारिक रूप देता है जिन मूल्यों की समाज को जरूरत होती है। सभ्यता के मूल्य में परिवर्तन करने वाले लोग पहले उन मूल्यों को स्वयं बरतते है। और जो ऐसा नहीं करते उन्हें समाज का हार्दिक सम्मान भी प्राप्त नहीं होता है। इसलिए वाजिब यही है कि समाज की जिन कुरीतियों से हमारी नाराजी है, उन्हें सबसे पहले हम छोड़ दे और जिन मूल्यों को हम समाज में लाना चाहते हैं उन्हें भी अपने वैयक्तिक जीवन में सबसे पहले हम ही बरतना शुरू करे समाज को योग्य नागरिकों की जरूरत है, नेताओं की नहीं। वाणी का संयम व्यास जो बोलते गये और गणेश जी लिखते गये। इस प्रकार जब महाभारत पूरा हो गया तो व्यास जी ने गणेश जी से कहा-मैंने चौबीस लाख शब्द बोले पर आप उस समय से सर्वथा मौन रहे। एक शब्द भी न कहा। गणेश जी ने कहा-बादरायण सभी प्राणियों में सीमित प्राण शक्ति है। जो उसे संयम पूर्वक व्यय करते हैं वे ही उसका समुचित लाभ उठा पाते हैं। संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम की प्रथम सीढ़ी है-वाचोमुक्ति अर्थात् वाणी का संयम। खाली पात्र दो मिट्टी के बर्तन आँगन में रखे थे। एक का मुँह ऊपर था दूसरे का नीचे। वर्षा हुई। जिसका मुँह ऊपर था वह बर्तन पानी से भर गया। जिसका नीचे था वह खाली रह गया। खाली पात्र साथी को भरा देखकर ईर्ष्या से कुलबुलाया और उससे लड़ने लगा। वर्षा फिर आई लड़ने वाले से कहा-प्रिय लड़ो मत, अपना मुँह ऊपर कर लो, तुम्हारा पेट भी वैसे ही भर दूँगी जैसा साथी का भरा है।

