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Magazine - Year 1961 - Version 2

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आप कितना मानसिक आघात सहन करते है

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( डा. रामचन्द्र महेन्द्र, एम.ए.,पी.एच.डी.)

हमारे सामने मानसिक आघात से मृत्यु के दो उदाहरण हैं, जो बार-बार स्मृति में हरे हो आते हैं। हमारे एक विवाहित शिष्य की मृत्यु बड़ी रहस्यमय हुई। उनकी पत्नि बीमार हुई। तीन-चार बच्चों के पिता थे। यथेष्ट चिकित्सा के बाद भी स्त्री चल बसी। पति महाशय असीम हार्दिक वेदना में वशीभूत हो गए। लोग छाती फाड़-फाड़ कर चिल्लाते हैं, सिर पीट लेते हैं, डूब मरते हैं, उनके आँसू नहीं सूखते, पर इन महाशय ने ऐसा कोई रुदन स्पष्ट नहीं किया। पत्नि का दाह कर्म करके वे गुमसुम से हो गए। हम लोग गमी करने भी गए, फिर भी वे सुस्त-गुमसुम ही बैठे रहे, बाहर आना-जाना भी न हुआ। मित्रों के साथ भी उनका दिल हलका न हुआ। कई नए रिश्ते भी आए, मित्र दुबारा उनसे विवाह का आग्रह करते रहे। पर वह गुमसुम, निष्क्रिय! उनका चेहरा पीला पड़ता गया रक्त कम होता गया। और पत्नि की मृत्यु के कोई आठ दिन बाद, जब पत्नि की मृत्यु भोज की तैयारियाँ हो रही थी, हमने बड़े दुःख से उनकी मृत्यु का समाचार सुना। सन्न रह गये! वे पत्नि की मृत्यु से हुए मानसिक आघात को सहन नहीं कर पाए थे। प्रबल मानसिक आघात ने उनके अचेतन जगत् पर ऐसा हानिकारक प्रभाव डाला कि उन्हें निराशा और वेदना (मेलेन्कालिया) का रोग हो गया। उनका हँसना, उठना, बैठना, खाना-पीना और मिलना-जुलना सब कुछ जैसे बन्द हो गया था। नींद की तो भारी कमी हो गयी थी। रोने-पीटने से जो शोक की मात्रा कम हो जाती है, उसके अभाव में वह चल बसें।

मानसिक आघात से आत्म-हत्या

दूसरा उदाहरण एक नवीन आत्म-हत्या का है। एक चालीस वर्षीय गृह-पत्नि जिनकी कन्या एम. ए. के पास हैं, वस्त्रों में मिट्टी का तेल छिड़क आग लगा कर जल गई। सर्वत्र तहलका मच गया। पुलिस आई, मालूम हुआ कि उनके पति दफ्तर गए हुए थे और कन्याएँ स्कूल में थी। तहकीकात करने से मालूम हुआ कि यह बड़ी अमीर की पत्नि थी। प्रारम्भिक जीवन बड़े ऐश-आराम में व्यतीत हुआ था। दुर्भाग्य से पति को सट्टे की कुटेव लगी। उसमें सब कुछ धन हार गए और सेठ के यहाँ लगी हुई पुरानी नौकरी भी छूट गयी। गरीबी के अभाव पूर्ण दिन आ गए। पति पर भी भयंकर मानसिक आघात लगा, पर वे तो उसे किसी भी प्रकार सहन कर गए। उसकी पत्नि रह-रहकर अपनी पुरानी अमीरी और वैभव का जीवन याद किया करती थी और आठ-आठ आँसू बहाया करती थी। उन्हें बड़ी ही निराशा और पति के प्रति क्रोध की अनुभूति हुई। जीवन नीरस हो गया। चलना फिरना और बोलना-चालना बन्द सा हो गया। उनके दिमाग में तरह तरह के ऊल-जलूल विचार उत्पन्न होने लगे। वे अपनी नई गरीबी की बदली हुई परिस्थिति से समझौता नहीं कर पाई। पति-पत्नी की अनबन चलती रही। एक दिन पति की अनुपस्थिति में प्रबल आवेग के फलस्वरूप वे आत्म-हत्या कर बैठी। मूल में उनकी मृत्यु का कारण अपने मानसिक आपत्ति को सहन न कर पाना था।

मानसिक आघात सहन करने की शक्ति

हमारे जीवन में मानसिक आघात दिन रात आते रहते हैं। ये छोटे और बड़े सभी तरह के हो सकते हैं। प्रायः देखा जाता है कि कुछ व्यक्ति तो इसे आसानी से सह लेते हैं, पर दूसरे उन्हीं में पागल और निराश तक हो उठते हैं। अंधापन, पेट के रोग, पेचिश, दस्त और क्षय रोग आदि शारीरिक व्याधियों के शिकार हो जाते है, खाना- पीना सोना तक छोड़ देते हैं, जीर्ण सिरदर्द के रोगी हो जाते हैं, कभी- कभी हिस्टीरिया पागलपन मूर्छा के रोगी हो जाते हैं।

इन मानसिक आघातों को सहन करने की सबकी शक्ति अलग- अलग है। कभी- कभी देखा जाता है कि बड़ी उम्र के व्यक्ति छोटी- छोटी बातों पर मानसिक दु:ख का अनुभव करते हैं। उसी से परेशान हो उठते हैं। अपने जीवन को शून्य बना लेते हैं।

मनुष्य के गुप्त मन में जो मानसिक ग्रन्थियाँ होती हैं, उनके कारण अनेक घटनाओं का तो बहुत शीघ्र प्रभाव पड़ता है, जबकि दूसरों का मामूली- सा आघात को बढ़ाने या घटाने में महत्त्वपूर्ण कार्य करता रहता है। जब दु:ख और रोने- पीटने का वातावरण होता है, तो जिसके यहाँ गर्मी हुई है, उसका मानसिक आवेग बहुत बढ़ जाता है। साधारण चीजें को भी यह बहुत बढ़ा- चढ़ा कर महसूस करता है। हमारे यहाँ गमी मनाने और सहानुभूति प्रदर्शित करने जो व्यक्ति आते हैं, गमगीन व्यक्ति के गुप्त मानसिक घावों को कुरेद कर वास्तव में दु:ख पहुँचाते हैं। वेदना को बहुत बढ़ा देते हैं। इस प्रकार अनजान में ही वे आपके भागी बनते हैं और रोगी के अनेक गुप्त मनोजनित रोगों को बढ़ा देते हैं। बेचारा रोगी इन देखने वालों के गुप्त संकेतों पर निर्भर रहता है। वे क्षुद्र बातें ही चुपचाप उस पर अधिकार कर लेती हैं। निर्बल मन पर इन अनर्थकारी संकेतों का दूषित प्रभाव पड़ता रहता है। जब मानसिक भार बहुत एकत्रित हो जाता है, तो यह किसी भयंकर मानसिक रोग के रूप में फूट पड़ता है। यह मन की अधोगामी अवस्था का सूचक है।

मानसिक आघात लगने पर साधारण मन वाले या दुर्बल इच्छा शक्ति वाले आदमी निराशा, शोक घबराहट, क्रोध, कायरता, भय या चिन्ता आदि के विषादात्मक आवेशों से ग्रस्त हो जाते हैं। यह भी मनुष्य की एक कमजोरी है। इस उद्वेग में फँसकर मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है, और वह अनिष्टकारी अशुभ परिस्थितियाँ स्वयं पैदा कर लेता है।

एक विद्वान का कथन है कि विषादोद्वेगों वह क्षेत्र बहुत बड़ा है। अधिकांश मनुष्यों को काल्पनिक विवाद ही घेरे रहते हैं और वे उनके कारण निरन्तर परेशान रहते हैं। चिन्ता -भय, शोक, घबराहट, बेचैनी, अस्थिरता, निराशा, आशंका, हीनता, कायरता आदि के विषादात्मक विचार जब किसी के मस्तिष्क में प्रवेश करते हैं, तो वह एक प्रकार से आधा पागल हो उठता है। उसे सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें, क्या न करे ?? धैर्य, साहस, विवेक इन चारों बातों से वह हाथ धो बैठता है। यह मानसिक स्थिति स्वयं इतनी खतरनाक है कि बाहरी घटनाएँ और परिस्थितियाँ जितनी हानि पहुँचा सकती हैं, उनकी अपेक्षा अनेक गुना अनिष्ट इस आन्तरिक उद्विग्नता से हो जाता है। शोक की अधिकता से नेत्रों की ज्योति कम होकर गठिया, बहुमूत्र, पथरी रोग तक होते देखे गए हैं ।। पागलपन के तो सैकड़ों केस देखे जाते है।

मानसिक आघात एक तूफान की तरह आता है। जोर की आँधी आने पर जिस तरह साधारण पेड़ पौधे घास या मामूली घर टूट- फूट जाते हैं, घरों की छतें उड़ जाती हैं, उसी प्रकार विषाद की अवस्था में सैकड़ों अपना विवेक त्याग कर अर्द्ध- विक्षिप्त से बन जाते हैं। इसका कारण मन की कमजोरी है।

आघातों को सहन करने की शक्ति बढ़ाइये-

यह संसार कठोरताओं और कटुताओं की पाठ- शाला है। यहाँ पग- पग पर विरोध और विपत्ति से जूझना पड़ता है; पाशविक वृत्तियों से निपटना पड़ता है। न जाने किस- किस रूप में हमारे शत्रु भरे पड़े हैं, न जाने कितने प्रकार की हानियाँ (( धन, जन, यश, प्रतिष्ठा आदि) सहन करनी पड़ती हैं। साँसारिक जीवन में प्रतिदिन हम अनेक प्रकार के क्लेशों से पीड़ित रहते हैं।

परन्तु फिर भी धैर्य और साहस से नब्बे प्रतिशत कठिनाइयाँ हल हो सकती है। मन बड़ दगाबाज है। ढीला छोड़ने पर निर्बल बनता है, शरीर को निर्जीव-सा कर देता है किन्तु यदि तना हुआ अपने वश में रखा जाए, साहस, धैर्य, प्रयत्न और पुरुषार्थ से परिपूर्ण रखा जाए, तो यही मन हमारी बड़ी सहायता करता है। आघात को सहन करने की अद्भुत ताकत भी उत्पन्न कर देता है। अतः आपको जब यह लगे की आप मानसिक आघात के पंजे में आ रहे है, तो तुरंत सावधान हो जाइए। मन का ढीलापन दूर कीजिए और अपने पुरुषार्थ को तीव्रता से उद्दीप्त कीजिए।

आप मन में यह सोचिए कि “ जो उत्पत्ति यकायक मुझ पर आ गई है, मैं उस से पराजित या परास्त नहीं हूंगा। एक खिलाड़ी की तरह खेल खेलूँगा। हार गया तो कोई परवाह नहीं करूँगा मैं जानता हूँ की आपत्तियाँ इसी प्रकार आती रहती है, किंतु मुझ जैसे पुरुषार्थी उनके सामने विचलित नहीं होते हैं। मैं कायर नहीं हूँ मैं साहसी हूँ, वीर हूँ। पुरुषार्थी हूँ। इस मानसिक आघात का मुझ पर कोई भी दूषित या हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ सकता। मैं तो कर्म मार्गी हूँ। कर्म करना मेरे हाथ में हैं, हार-जीत ईश्वराधीन है। अतः मैं प्रत्येक स्थिति में आनन्द का अनुभव करता हूँ और कड़ुवा और मीठा जैसा भी होता है, रस लेता हूँ।”

गुप्त मन को मजबूत कीजिए-

शरीर में नाना दुःखों एवं कमजोरियों की प्रतीति हमें अपनी गुप्त मन की सूक्ष्म क्रियाओं और उनकी छिपी हुई प्रतिक्रियाओं से होती है। अस्थिर और कमजोर मन वाला व्यक्ति पीड़ा से कान्त हो उठता है, दूसरा मन वाला व्यक्ति उसी कठिनाई को साधारण से झटके की तरह सहन कर लेता है। श्री रामचन्द्र के वन गमन पर दुर्बल हृदय महाराज दशरथ पुत्र-वियोग में ही मृत्यु को प्राप्त हुए थे, पर दृढ़ हृदय कौशल्या ने उसी पुत्र-वियोग को और चौदह वर्ष के लम्बे युग को सहन कर लिया था। कौशल्या जी निश्चय ही दृढ़ और सहनशील मन वाली वीर रमणी थी। कुछ व्यक्ति कड़वी औषधि शरबत की तरह गट-गट पी जाते है, तो कमजोर मन वाले उसी कुनैन को पीकर घण्टों उल्टा सीधा मुँह बनाया करते है। कुछ दुर्बल हृदय शहरी स्त्रियाँ प्रसव की काल्पनिक पीड़ा से भयभीत होकर सोच ही सोच में दुर्बल हो जाती है, दूसरी ओर दृढ़ मन वाली ग्रामीण स्त्रियाँ खेतों पर परिश्रम करते-करते प्रसव करती है और स्वस्थ रहती है। कुछ सर्दियों में ठण्डे पानी से स्नान करते है, तो कुछ ऐसे डरते है जैसे प्रत्यक्ष काल हो गया हो। इसका कारण मन की दृढ़ता या कमजोरी है।

आप मन में जिस दुःख को जैसा मान लें, वैसी ही कठिनाई एवं आन्तरिक दुःख का बोध होता है। सुख दुःख तो आपके मन की दो स्थितियाँ मात्र है। आप जिस स्थिति को मन में देर तक रखना चाहे, अपने दृढ़ आग्रह से रख सकते है। मन के क्लेश का निर्माण स्वयं आपके मन के गलत प्रयोग द्वारा ही होता है।

यदि आप मान लें कि अमुक बात से हमें बहुत कष्ट होगा, तो निश्चय ही उससे आपको बहुत कष्ट मालूम होगा। यदि हम मानें कि ऐसे-ऐसे कष्टों का हमारे ऊपर कोई असर नहीं होगा” तो निश्चय जानिए आप अनेक मानसिक आघातों को सहज ही सहन कर जायेंगे। अपने मन को मजबूत बनाने के लिए सदा दृढ़ मानसिक संकेत देते रहे।

उच्च स्वर से कहे, “ मैं वीर और साहसी हूँ। ईश्वरीय शक्ति से युक्त हूँ। साधारण झटकों को मेरे ऊपर कोई दूषित प्रभाव नहीं पड़ता। मुझे अनुभव हो चुका है कि मुझ से इन मानसिक आघातों को सहन करने की आत्म -शक्ति है। मैं अपने मन को इन तूफानों से विचलित नहीं होने देता। मैं शुद्ध हूँ। तेजस्वी हूँ। आनन्दमय हूँ। परम प्रकाशवान आत्म स्वरूप हूँ।'' इन संकेतों में विश्वास करें।

स्मरण रखिए, आपकी सहनशक्ति स्वयं आपके मन के भीतर है। कहीं बाहर नहीं है। जितनी दृढ़ता मन में आती जायगी। मन की सहन- शीलता के अनुपात में ही शरीर कमजोर या मजबूत बनता है। सारे दु:ख मानसिक हैं। मन का बल ही हमें धैर्यवान या अधीर बनाने वाला है। जहाँ मन सबल है, वहाँ मनुष्य मानसिक आघातों का भी स्वामी है।

जब कभी आपको मानसिक आघात हो, तो कुछ शारीरिक कार्य करें; टहलने जायँ; स्थान परिवर्तन करें; मित्रों के साथ गपशप करें, ठण्डे जल ने स्नान करें; संगीत या भजनों का गान करें। आपके घर में यदि बच्चे हों तो उनसे खेलें या कोई घरेलू कार्य ही करें। अनेक महापुरुषों ने बागवानी द्वारा अपने मानसिक आघातों को सहन किया है। स्मरण रखिए-

''मात्र तिष्ठ: पराङ मना:'' -अर्थर्ववेद ८।१।९ शिथिलता और अनुत्साह ठीक नहीं है। अकर्मण्यता और निराशा एक प्रकार की नास्तिकता है।

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