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Magazine - Year 1964 - Version 2

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र का वर्णन करते हुए आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है “द्वि शरं नाभि झंवतें, रामों द्विरनाभि भापते” श्रीराम दो-बार बाण नहीं छोड़ते न दो-बार बोलते हैं। उनका एक ही बाण लक्ष्य को बेध डालता है इसलिए तो राम-बाण अचूक माना गया है। बाण की तरह ही राम का वचन भी एक ही होता है। एक बार कहा जाता है, उसी शब्द में काम पूरा हो जाता है अर्थात् एक बार कही हुई बात ही महत्वपूर्ण, तथ्यपरक, सही-सही होती है जिससे पुनः बोलने की आवश्यकता ही नहीं रहती।

वैज्ञानिक परीक्षणों से यह सिद्ध हो गया है कि शब्द की शक्ति अनन्त और महान् है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि शब्द सम्पूर्ण शक्ति के साथ घनीभूत होकर निस्सृत होगा तो वह अपना दृश्य प्रभाव अवश्य ही पैदा करेगा। महर्षि वाल्मीकि में राम जन्म से कई वर्ष पूर्व रामायण लिखी किंतु बाद में राम ने उसी चरित्र का आचरण किया। महर्षि वशिष्ठ के शब्दों ने विश्वामित्र के हृदय की कालिमा, रागद्वेष को धोकर उन्हें ब्रह्मर्षि बना दिया ऋषियों की अमृत वाणी सुनकर क्रूर निर्दय डाकू भील महर्षि बन गये। महान् राजनीतिज्ञ, सर्वसमर्थ शक्तिमान श्रीकृष्ण को महासती गान्धारी के शाप वचनों से प्रभावित होकर अपने कुल को नष्ट होते हुए देखना पड़ा। जंगल के पशु की तरह शिकारी के हाथों मरना पड़ा। गुरु वचन से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के आख्यान भी कम नहीं है। वैदिक, पौराणिक, धार्मिक ऐतिहासिक आख्यानों में वरदान शाप आदि के असंख्यों उदाहरण भरे पड़े हैं। शस्त्र चूक सकता है। गोली का निशाना गलत हो सकता है क्योंकि वे स्थूल परिस्थितियों पर अधिक निर्भर होते है। किंतु शब्द की शक्ति अचूक होती है यदि वह ठीक-ठीक स्थिति में छोड़ा गया हो। शंकराचार्य, बुद्ध, राम, कृष्ण, गाँधी, दयानन्द आदि महापुरुषों के आह्वान पर असंख्यों लोग उमड़ पड़े थे। इनके शब्दों में वह जादू था कि लोग उसी के अनुरूप कार्य करने को विवश हो जाते थे।

दूसरी ओर ऐसे भी लोगों की बड़ी भारी भीड़ को देखा जा सकता है जो चिल्ला-चिल्लाकर पुकार-पुकार कर महत्वपूर्ण बाते कहते हैं, लम्बे-चौड़े व्याख्यान देते हैं, मानव समाज के उत्थान और कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, किंतु अधिक दूर न जाकर उनके जीवन के निकटतम क्षेत्रों में भी कोई परिवर्तन नहीं हो पाता। इतना ही क्यों उनके व्यक्तिगत जीवन में भी वे तत्व दिखाई नहीं देते जिनके लिए वे कहते फिरते हैं, दूसरों को उपदेश देते हैं।

इसका प्रमुख कारण शब्द की शक्ति का ह्रास हो जाना है। बिना चेतना के शरीर यन्त्र बेकार होता है। ड्राइवर के अभाव में अच्छी से अच्छी मोटर भी यात्रा का प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकती। बिना ज्योति के तेलबाती-युक्त दीपक का कोई महत्व नहीं होता। ध्वनि-प्रेषक आकाशवाणी केंद्रों के अभाव में रेडियो का कोई महत्व नहीं रह जाता। बजाने की क्षमता के बिना अच्छे से अच्छा साज भी व्यर्थ है। बोलकर, लिखकर लोग अनेकों शब्द शृंखला व्यक्त करते है किंतु वे सर्वथा निर्जीव ही सिद्ध होती हैं, यदि उनके साथ शब्द में रहने वाली मूल शक्ति सन्निहित नहीं हो। भाषण, प्रवचन, उपदेश आदि में शब्दों की स्थूल प्रक्रिया जोड़ गाँठ, भयंकर रोमाँचकारी, मनोरंजक शब्दों का प्रयोग तो खूब हो किंतु शब्द के साथ रहने वाली आध्यात्मिक शक्ति, ओज, चैतन्य जीवन न हो तो उसका महत्व घुने हुए अनाज, चेतना रहित शरीर से अधिक नहीं होता जिसे लोग सुनने के बाद विस्मृति के गर्त में दफना देते हैं।

राकेट छोड़ने के लिए विशेष केन्द्र होते हैं, कारतूस भी छोड़ने के लिए लम्बी नली युक्त बन्दूक की आवश्यकता पड़ती है। राकेट को समतल जमीन पर रखकर यों ही छोड़ दिया जाय तो इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा न लक्ष्य भेद ही। इसी तरह कारतूस को भी बिना बन्दूक के छोड़ देना कौतूहल मात्र बना रह जायगा। वरन् कभी तो हानि भी हो सकती है। ठीक इसी तरह शब्द का उच्चारण करने वाले केन्द्रों का भी उपयुक्त और महत्वपूर्ण होना आवश्यक है। इसके साथ ही शब्द भी शक्तिशाली, प्रभावकारी, उत्कृष्ट होने चाहिए। अपूर्ण राकेट, सड़ा गला कारतूस कितने ही अच्छे माध्यम से छोड़ा जाय उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा।

शब्द की शक्ति अल्प, निष्प्राण, कुँठित होने का एक प्रमुख कारण है उसका दुरुपयोग करना। बिना आवश्यकता के, बिना प्रसंग बोलना, जरूरत से अधिक बोलना, हर समय उल्टे-सीधे बकते रहना शब्द की शक्ति को नष्ट करना है। असंयम से कोई भी शक्ति क्षीण हो जाती है, निर्जीव और निष्प्राण बन जाती है। वाणी का असंयम ही शब्द शक्ति के कुँठित होने का एक बड़ा कारण है।

शब्द शक्ति को संग्रहीत करने, उसे घनीभूत बनाने के लिए मौन, मितभाषण का अवलम्बन लिया जाना चाहिए। ऋषि जीवन भर एक ही सूत्र अथवा मंत्र की साधना करता है और लम्बी साधना के बाद ब्रह्ममय शब्द की अपार शक्ति को अनुभूति कर उसका उद्घोष प्रथम बार वाणी से करता है। एक आज की स्थिति है कि मेले ठेले में, बाजार सड़कों पर सामान्य लोग ब्रह्मज्ञान और तत्वज्ञान की ऊंची-ऊंची बातें करते हैं। थोड़े बहुत पढ़-लिखकर या सुनकर अपने आपको विद्वान, ज्ञानी ध्यानी न जाने क्या-क्या समझने लग जाते हैं। स्टेज, माध्यमों में लोग बोलने की होड़ में व्यग्र रहते है। फलस्वरूप स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि लोगों को शब्दों के प्रति अविश्वास और संदेह होने लग गया है। कई लोग तो भाषण, प्रवचनकर्ताओं के नाम से ही चिढ़ते है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि शब्दों के अनावश्यक प्रयोग से आज हमारी शब्द शक्ति कुँठित, निर्जीव, निष्प्राण होती जा रही है। लोग अपनी स्वार्थ साधना, चालाकी, धूर्तता को छिपाने के लिये बड़े मीठे बोलते हैं। शब्दों के जाल में न मालूम क्या-क्या करते है। किस-किस को फँसाते हैं। किंतु इतना निश्चित है कि यह मनुष्य का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। शब्द की शक्ति प्रतिष्ठा को नष्ट कर देना मनुष्य का बड़ा अहित है, जिसने एक गम्भीर समस्या खड़ी कर दी है। शब्द शक्ति के माध्यम से बोलचाल के द्वारा बड़े-बड़े काम, सहज की पूर्ण हो जाते हैं और बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी। किंतु समाज में इसके सदुपयोग से शब्द शक्ति के प्रति अविश्वास संदेह घृणा पैदा हो जाना विघटन, द्वेष, संघर्ष को जन्म देता है। बातचीत की मर्यादा टूटने के बाद ही परस्पर प्रतिक्रिया संघर्ष याने हिंसा और ताकत का इस्तेमाल शुरू हो जाता है, जिसमें से विनाश की दावाग्नि फूट निकलती है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी बात कही जाय जो लंबे अनुभव ज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी हो, सबके लिए उपयुक्त आवश्यक और मर्यादित हो उस सम्बन्ध में विचार सुलझे हुए हों तभी वह उपयोगी महत्वपूर्ण और हितकर सिद्ध हो सकेगी।

शब्द शक्ति के कुँठित होने का एक कारण उसे किसी निजी स्वार्थों से जोड़ देना भी है। आजकल विज्ञापन, प्रचार का युग कहा जाता है। प्रचार, विज्ञापन भी शब्द शक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम है, किसी तत्व को व्यापक बनाने के लिए इसकी आवश्यकता भी होती है। किन्तु जब वह किन्हीं स्वार्थ, निजी हितों एवं गलत दृष्टिकोण से ग्रस्त हो तो शब्द की शक्ति, महत्ता, प्रतिष्ठा को क्षीण कर देता है। आज व्यक्तिगत कार्य, व्यापार से लेकर दलगत संगठन के लिए प्रचार में विज्ञापन का आधार लिया जाता है और उसमें उल्टे-सीधे हथकण्डों को अपनाकर व्यक्तिगत या दलगत स्वार्थों की सिद्धि का मूल ध्येय भी रखा जाता है। किन्तु इससे शब्द की मूल प्रतिष्ठा शक्ति नष्ट होकर वह बाजारू बन जाता है। उससे किसी का कोई विशेष हित नहीं होता न लोगों पर अच्छा प्रभाव ही पड़ता है। यदि कुछ मानसिक उत्तेजना मिले तो वह अस्थायी और कौतूहलजनक ही होती है। इसके साथ ही संदेह, शंका आदि को पोषण मिलता है। समाज में विग्रह पैदा होता है। यही कारण है कि इस स्वार्थ भरी विज्ञापन-बाजी से समाज ऊबता जा रहा है, लोगों के दिल संदेहों से भर रहे हैं।

शब्दों में जीवन तभी होता है जब वे हृदय की अंतर्गुहा से आत्मा के संसर्ग से निस्सृत हो। शब्दों का और जीवन पद्धति का सुन्दर समन्वय हो। जो बात कही जाय पूरे दिल से कही जाय। वही बोला जाय जिसका प्रयोग जीवन में विवेक की कसौटी पर खरा उतर चुका है। उन शब्दों में फिर किसी को संदेह नहीं होगा। न उनके दो अर्थ ही निकलेंगे जिससे समाज में भ्रम शंका का वातावरण पैदा हो। शब्द की प्रतिष्ठा, शक्ति, जीवन इसी में निहित है।

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