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Magazine - Year 1964 - Version 2

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इच्छा शक्ति की प्रचण्ड क्षमता

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जीवन की सफलता-असफलता, उत्कर्ष, अपकर्ष, उन्नति, अवनति, उत्थान-पतन सब मनुष्य की इच्छाशक्ति की सबलता और निर्बलता के ही परिणाम हैं। सबल, दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न लोगों को अभद्र, विचार, कुकल्पनायें, भयानक परिस्थितियाँ उलझने भी विचलित नहीं कर सकती। वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हैं। उनके विचार स्थिर और निश्चित होते हैं। उन्हें बार-बार नहीं बदलते। प्रबल इच्छाशक्ति से शारीरिक कष्ट भी उन्हें अस्थिर नहीं कर सकते। ऐसे व्यक्ति हर परिस्थितियों में अपना रास्ता निकाल कर आगे बढ़ते रहते हैं। अपने व्यक्तिगत हानि लाभ से भी प्रभावित नहीं होते।

दृढ़ इच्छाशक्ति मानसिक क्षेत्र का वह दुर्ग है जिसमें किसी भी बाह्य परिस्थिति, कल्पना, कुविचारों का प्रभाव नहीं हो सकता। दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न व्यक्ति जीवन के भयंकर झंझावातों में भी अजेय चट्टान की तरह अटल और स्थिर रहता है। ऐसा मनुष्य सदैव प्रसन्न और शान्त रहता है। जीवन का सुख स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रसन्नता, शान्ति उसके साथ रहते हैं।

पितामह भीष्म अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर सारे शरीर के बाणों से छिदे रहने पर भी छह माह तक शरशैय्या पर पड़े रहे और चेतन बने रहे। दूसरे इस तरह के व्यक्ति भी होते हैं जो अपने तनिक से घाव-चोट में चिल्लाने लगते हैं, बेहोश हो जाते हैं कई तो भय के कारण मर तक जाते हैं। सत्यव्रती हरिश्चन्द्र अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों की परीक्षा की घड़ी में अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण ही निभा सके थे। दूसरी ओर कई लोग जीवन की सामान्य सी परिस्थितियों में रो देते हैं। हार बैठते हैं। जीवन की सम्भावनाओं का अन्त कर डालते हैं।

महाराणा प्रताप जिन्होंने वर्षों जंगलों की खोहों में जीवन बिताया, बच्चों सहित नंगे भूखे प्यासे भटकते रहे, किन्तु इसके बावजूद भी दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे वह अजेय वीर शक्तिशाली मुगल सल्तनत को चुनौती देता रहा और झुका नहीं। थोड़ी ही संख्या में दुबले पतले क्रान्तिकारियों ने भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को जो तूल दिया और विश्व-व्यापी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी वह उन वीरों की दृढ़ इच्छा शक्ति का ही परिणाम था। फाँसी की सजा सुनने पर भी जिनका वजन बढ़ा, फाँसी के तख्ते पर पहुँचकर जिन्होंने अपनी मुस्कराहट से मौत के भावयुक्त स्वाँग का गर्व चूर कर दिया, यह सब उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति की ही करामात थी।

संसार में जितने भी महान कार्य हुए, वे मनुष्य की प्रबल इच्छाशक्ति का संयोग पाकर ही हुए। दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न व्यक्ति ही महान कार्यों का संचालन करता है। वहीं नवसृजन, नवनिर्माण, नवचेतना का शुभारम्भ करता है। अपने और दूसरों के कल्याण विकास एवं उत्थान का मार्ग खोजता है।

निर्बल इच्छाशक्ति वाले मनुष्य अपने या दूसरों के लिए कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकते। ऐसे लोगों के मन में अनेकों सन्देह, कुकल्पनायें, कुविचार पैदा होने लगते हैं। उनके निश्चय बार-बार बदलते हैं। एक काम को अधूरा छोड़कर, दूसरे को हाथ में लेते हैं फिर दूसरे को छोड़कर तीसरे को करने लगते हैं। छोटी-छोटी कठिनाइयों में उलझ कर ही परेशान होने लगते हैं। निर्बल इच्छाशक्ति से अपने और दूसरों के अकल्याण की भावनाएं निर्बाध गति से आने-जाने लगती है। परीक्षा में बैठने पर असफलता का भय सताने लगता है। व्यापार करने पर घाटे के भय से चिन्तित एवं परेशान होने लगते हैं। अंधेरे में चलने पर भूत, चोर, गुण्डे का डर खाने लगता है। घर में कोई बीमार पड़ जाय तो सोचा जाता है कही मर नहीं जाय। इस तरह दुर्बल इच्छाशक्ति के कारण मनुष्य तरह-तरह की आशंका, शंका कल्पित भय, चिता परेशानियों से परेशान दुखी उद्विग्न एवं अशान्त रहता है। हीन भावनाओं से ग्रस्त हो निराशा, अवसाद, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष से युक्त हो जाता है।

इच्छाशक्ति की दुर्बलता से कई लोग अपने आपको कल्पित रोगों से त्रस्त समझकर परेशान होने लगते हैं। और हर उपचार में कोई न कोई मीनमेख निकालते हैं। रोग घट रहा हो तो भी उन्हें कही फिर न बढ़ जाय यह डर लगा रहता है। यदि परीक्षण किया जाय तो वास्तविक रोगियों की संख्या कम मिलेगी और इस तरह के कल्पित रोगों से ग्रस्त लोग अधिक मिलेंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इच्छा शक्ति की दुर्बलता से आज कल प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को किसी न किसी रोग से ग्रस्त ही समझता हैं। कई तो इतने परेशान रहते हैं मानो वे किसी भयंकर रोग से पीड़ित हैं और वस्तुतः बात ऐसी नहीं होती। दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे बड़े-बड़े रोगों के आक्रमण में से भी बचा जा सकता है और अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सकता है।

मनुष्य के सभी विचार भाव क्रिया स्वयं उसी तक सीमित नहीं रहते। इनका प्रभाव समस्त वातावरण पर भी पड़ता है। रेडियो-स्टेशन के ट्रान्समीटर से छोड़ी हुई ध्वनि तरंगें सर्वत्र फैल जाती हैं ठीक इसी तरह व्यक्ति के क्रिया-कलाप, हाव-भावों का भी प्रसार होकर वातावरण पर प्रभाव पड़ता है। ये संक्रामक होते हैं और दृश्य या अदृश्य रूप में एक व्यक्ति से चलकर दूसरों तक फैल जाते हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न व्यक्ति जिस समाज में होंगे वह समाज भी शक्तिशाली, दृढ़ और महत्वपूर्ण होगा। कायर डरपोक, दुर्बल इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति समाज में अपनी दुर्बलताओं का संचार करते हैं।

नेपोलियन बोनापार्ट के सिपाही अपने आपको नेपोलियन समझकर लड़ते थे। प्रत्येक सिपाही में नेपोलियन की इच्छाशक्ति काम करती थी। नेता जी सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज के तनिक से सैनिकों ने हथेली पर जान रखकर अंग्रेजी शासन से लड़ाई की। लोकमान्य तिलक ने भारत वर्ष को स्वराज्य मन्त्र की दीक्षा दी- “स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे।” और यही नारा प्रत्येक भारतीय का प्रेरक मन्त्र बन गया। एक दिन इसी मन्त्र ने हमें स्वतन्त्रता रूपी सिद्धि प्रदान की। यह मन्त्र कोई शाब्दिक व्याख्या मात्र नहीं था वरन् इसमें तिलक की दृढ़ इच्छाशक्ति का अपार चैतन्य सन्निहित था। मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रभाव चेतन जगत पर ही नहीं वरन् अचेतन पदार्थों पर भी पड़ता है। अपनी इच्छाशक्ति के बल पर ही मनुष्य पत्थर, धातु आदि की मूर्ति में भगवान का साक्षात्कार करता है। प्रबल इच्छाशक्ति के द्वारा मनुष्य जड़ चेतन, प्रकृति को भी प्रभावित कर सकता है।

निर्बल इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति समाज में भीरुता, कायरता, सन्देह, कुकल्पनाओं का संचार करते हैं। जिस देश के कर्णधार नेताओं की इच्छाशक्ति दुर्बल होगी तो वह वहाँ तक की प्रशासनिक मशीनरी और फिर जनता तक में फैल जायगी। जैसे अपने बारे में अहितकर बातें सोचने पर दुष्परिणाम पैदा होते हैं उसी तरह जिसके लिए बुरी बात सोची जायगी वह भी बुराई से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। यदि उसकी इच्छाशक्ति दुर्बल होगी तो वह सहज ही दूसरे द्वारा कुकल्पित दुर्भावनाओं का शिकार हो जायेगा। भूतों के भय से डरने वाले अपने संक्रामक विचारों से दूसरों में भी भूत के भय की भावना पैदा कर देते हैं। घृणा करने वाले दूसरों में भी घृणित विचारों का प्रसार कर देते हैं। लड़ाई के मैदान से भाग जाने वाला एक सिपाही कई सिपाहियों में मैदान छोड़ने की भावना पैदा कर देता है। इच्छाशक्ति की दुर्बलता भी उतनी ही संक्रामक है जितनी सबलता। जहाँ सबल इच्छाशक्ति के व्यक्तियों का बाहुल्य होगा वह समाज उन्नति-प्रगति की ओर सहज ही उठ जायेगा। जहाँ दुर्बल इच्छाशक्ति के लोग होंगे वह समाज पतन की ओर भी अग्रसर हो जायेगा।

हमें अपनी इच्छाशक्ति बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। साहस और धैर्य का अभ्यास करने से बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ भी सहज हो जाती हैं और पराक्रमी व्यक्ति आसानी से उन पर विजय प्राप्त कर लेते है। भीरु पुरुष तो कठिनाइयों में जितने त्रस्त होते है उससे अधिक उनकी आन्तरिक दुर्बलता ही कष्ट देती रहती है। मानव जीवन में दृढ़ इच्छाशक्ति एक अत्यन्त मूल्यवान सम्पत्ति है और इसे हम अधिकाधिक मात्रा में सम्पादित करें यही उचित है।

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