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Magazine - Year 1964 - Version 2

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स्वाध्याय-आत्मा का भोजन

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मानव जीवन को सुखी, समुन्नत और सुसंस्कारी बनाने के लिये सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना अत्यन्त आवश्यक है। स्वाध्याय मानव जीवन का सच्चा सुहृद एवं आत्मा का भोजन है। स्वाध्याय से हमें जीवन को आदर्श बनाने की सद्प्रेरणा मिलती है। स्वाध्याय हमारे जीवन विषयक सारी समस्याओं की कुञ्जी है। स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।

संसार में जितने भी महापुरुष, वैज्ञानिक, सन्त महात्मा, ऋषि, महर्षि आदि हुए हैं, वे सभी स्वाध्यायशील थे। स्वाध्याय का अर्थ सत्साहित्य एवं वेद, उपनिषद्, गीता आदि आर्ष-ग्रन्थ तथा महापुरुषों के जीवन वृत्तान्तों का अध्ययन तथा मनन करना है। कुछ भी पढ़ा जाय उसे स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार-रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को छूना भी पाप समझना चाहिए।

सच्चा स्वाध्याय वही है, जिससे हमारी चिन्ताएँ दूर हों, हमारी शंका-कुशंकाओं का समाधान हो, मन में सद्भाव और शुभ संकल्पों का उदय हो तथा आत्मा को शाँति का अनुभव हो। हमारे शास्त्रों में स्वाध्याय का बड़ा महात्म्य बताया गया है। योग-शास्त्र में कहा गया है :-

स्वाध्यायाद् योग मासीत् योगात स्वाध्याय मामनेत।

स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते॥

अर्थात्- “स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।”

छान्दोग्योपनिषद् का कथन है :-

त्रयो धर्म स्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति।

अर्थात् - “धर्म के तीन स्कन्ध हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान।”

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :-

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाड्मयं तप उच्यते। 17। 15

अर्थात्-”स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है।”

छान्दोग्य उपनिषद् में ही आगे और लिखा है :-

‘आचार्य कुलाद्वेद मघीत्य यथा विधानं गुरो कर्माति शेषेणाभि समावृत्य कुटुम्बे शुचौदेशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिसन् सर्वभूतानि अन्यत्र तीर्येभ्यः सखल्वेषं वर्त्तयन् यावदायुषं ब्रह्म लोकमभि सम्पद्यते’। 8। 15। 1।

अर्थात्-”ब्रह्मचारी आचार्य कुल से आर्ष-ग्रन्थों को पढ़कर यथा-विधि सेवा सुश्रूषा आदि करता हुआ समावर्तन संस्कारयुक्त परिवार में रहकर पवित्र स्थान में स्वाध्याय द्वारा स्वयं अपने को, सन्तानों को एवं अन्य जनों को धार्मिक बनाता हुआ समस्त इन्द्रियों को, आत्मा के आधीन करता हुआ, तीर्थ-स्थानों के अन्यत्र भी प्राणियों की हिंसा न करता हुआ, समस्त आयु इस प्रकार बर्तता हुआ मोक्ष-पद का अधिकारी बन जाता है तथा जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।”

इस प्रकार हम पवित्र ग्रन्थों एवं सुविचारपूर्ण सत्साहित्य के पठन-पाठन द्वारा सदा स्वाध्याय कर अपने मन और बुद्धि को सुसंस्कृत बनाकर अपने जीवन को पवित्र बनाने का संकल्प धारण करें। सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय से हमारी आत्मा की सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होकर हमारे जीवन को सरस समुन्नत एवं दिव्य बना देती हैं।

शरीर को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाये रखने के लिए जिस प्रकार पौष्टिक आहार की आवश्यकता है उसी प्रकार मन और बुद्धि को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाये रखने के लिए उत्तमोत्तम ग्रन्थों का अध्ययन अनिवार्य है। अध्ययन एवं स्वाध्याय के लिए निम्न कोटि का साहित्य हानिकर होगा, उसी प्रकार जैसे अखाद्य एवं दूषित पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अतएव हमें इस सम्बन्ध में पूर्ण सतर्कता और सावधानी से काम लेना होगा। सच्चा स्वाध्याय वही है, जिसके द्वारा हमारा मन बाह्य विषयों से अलिप्त रहकर आत्मा के अनुसंधानों में प्रवृत्त हो एवं हमारी मानसिक दुर्भावनाओं, दुर्बलताओं तथा दूषित मनोविकारों का दमन हो सके, और हमारा मन एक अनिर्वचनीय अलौकिक आनन्द से परिप्लावित हो उठे।

मनुस्मृति में कहा गया है :-

स्वाध्याये नित्य मुक्तः स्यादैवे चैवहे कर्मणा।

अर्थात् - “स्वाध्याय और शुभ कर्म में मनुष्य सदा तत्पर रहे।”

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