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Magazine - Year 1965 - Version 2

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अहंकार का परित्याग करिये

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जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति में अहंकार एक प्रबल शत्रु है क्योंकि सभी भेद “अहम्” भावना से ही उत्पन्न होते हैं, जिसके उत्पन्न होते ही काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार उठ खड़े होते हैं। इन्हें बाहर से बुलाना नहीं पड़ता। अहंकार स्वतः भेद-बुद्धि के प्रसंग से इन्हें अन्तःस्थल में पैदा कर देता है। मनुष्य परिस्थितियों को दोष देता है या किसी दूसरे व्यक्ति के मत्थे दोष मढ़ने का प्रयत्न करता है, किन्तु यह दोष अपने अहंकार का है जो अन्य विकारों की तरह आपको साधन-भ्रष्ट बना देता है। अतः आप इसे ही मारने का प्रयत्न करिये।

अहंकार का नाश करने में मनुष्य को सर्व प्रथम तत्पर होना चाहिये क्योंकि यही सारे अनर्थों का मूल है। रावण की शक्ति का कुछ ठिकाना न था, कंस का बल और पराक्रम जगत् विख्यात है। दुर्योधन, शिशुपाल, नैपोलियन, हिटलर आदि की शक्तियों के आगे संसार काँपता था किन्तु उनका अहंकार ही उन्हें खा गया। मनुष्य को पतन की ओर ले जाने में अहंकार का ही हाथ रहता है। श्रेय के साधक को इससे दूर ही रहना चाहिये। भगवान् सबसे पहले अभिमान ही नष्ट करते हैं। अहंकारी व्यक्ति को कभी उनका प्रकाश नहीं मिल सकता।

अहंकार एक प्रकार की संग्रह वृत्ति है। अहं के योग से मनुष्य जगत की प्रत्येक वस्तु पर एकाधिकार चाहता है। उसका लाभ वह अकेले ही उठाना चाहता है। किसी दूसरे का हस्तक्षेप करते या लाभ उठाते देख कर वह जल-भुन उठता है और प्रतिकार के लिये तैयार हो जाता है। जब तक यह पाप पराकाष्ठा तक नहीं पहुँच जाता तब तक भले ही कोई शोषण, दमन, अपहरण तथा अनैतिक भोग भोगता रहे किन्तु अन्ततः सभी लोग उसका साथ छोड़ देते हैं। साधन और परिस्थितियाँ शीघ्र ही विपरीत हो जाती हैं, तब मनुष्य को हार माननी पड़ती है, मुँह की खानी पड़ती है और कभी-कभी तो सर्वनाश के ही दर्शन करने पड़ते हैं।

परमात्मा किसी भी वस्तु का संग्रह नहीं करता। वह लोक हितार्थ अपने दान अनुदान विस्तीर्ण करता रहता है। इसी में उसे आनन्द मिलता है। मनुष्य की महानता भी इसी में है कि अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को दान-रूप में विकीर्ण करता रहे। इसी से उसे सच्चा आनन्द प्राप्त हो सकता है। किन्तु जब यह दानवृत्ति संकीर्ण होकर केवल अपने भोग तक ही सीमित हो जाती है तो उसे अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इन बाधाओं को नष्ट करने में उसे शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है। जहाँ तक संचय परोपकार के लिये किया जाता है वहाँ तक अहंभावना उचित है, पर उसे पर-पीड़न से रहित होना चाहिये। शुद्ध भाव से वस्तुओं का संग्रह और उन्हें लोक कल्याण के लिये दान कर देने में कोई हानि नहीं वरन् इस से आत्मा विकसित होती है। पर यहाँ भी साँसारिक-यश की कामना का विग्रह उत्पन्न हो सकता है अतः दान की वृत्ति भी उदार और निरहंकार होनी चाहिये।

यह स्थिति तब आती है जब अपना कर्त्ता-भाव पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। कर्त्तव्य तो सभी करते हैं किन्तु जो अपने अधिकार ईश्वर के लिये छोड़ देते हैं और समष्टि रूप से इस बात के लिये राजी हो जाते हैं कि-”इस संपूर्ण का कर्त्ता-धर्ता परमात्मा ही है, उसी की शक्ति , संकल्प और प्रेरणा से संसार की गतिविधियाँ चल रही है, मनुष्य तो निमित्त मात्र है, मशीन के एक छोटे से पुर्जे की तरह उसे चलते रहने में ही गौरव अनुभव करना चाहिये।” यद्यपि मशीन में उस पुर्जे का भी उतना ही महत्व है उसके बिना सारी मशीन तक ठप हो सकती है किन्तु उसका भी अस्तित्व तो आखिर उस मशीन में ही है और उस पुर्जे के सहयोग मात्र से है।

यदि ऐसा न समझा जाय तो मनुष्य-मात्र में जो प्रेम, सहयोग और मैत्री की भावना कायम है वह न रहे और मनुष्य अकेला दुःख पाता रहे। संसार के निन्यानवे प्रतिशत दुःख अहंभावना के परित्याग के साथ ही मिट जाते हैं क्योंकि तब स्वार्थ का भाव मिट जाता है। उस स्थिति में दुःख पास नहीं आता। यह संसार ही स्वर्ग के समान सुखमय हो जाता है।

फिर जीवात्मा का अपना अस्तित्व भी तो कुछ नहीं है जिनके लिये वह अहंकार करे। दर्पण, जल या स्फटिक में जिस प्रकार सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है, जीव की चेतना भी उसी तरह परमात्मा का प्रतिबिम्ब मात्र है। देखने में स्वच्छ वस्तुओं पर पड़ने वाले प्रतिबिम्ब-प्रकाश में भी वही विशेषताएँ विद्यमान होती हैं जो सूर्य में, किन्तु दर्शक यह जानते हैं कि प्रतिबिम्ब का अस्तित्व तभी तक है जब तक सूर्य है। सूर्य के न रहने पर प्रतिच्छाया भी समाप्त हो जाती है, उसी तरह मनुष्य के अन्तस्थल में भी परमात्मा प्रकाशित है उसे आत्म-शक्तियों के रूप में अपने भीतर अवस्थित समझना चाहिये। यह शक्तियाँ आत्म-कल्याण के लिये मिली हैं और इसी में उनका सदुपयोग भी होना चाहिये। शास्त्रकार ने इसे और भी स्पष्ट किया :—

कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्त् प्रतिविम्बकः।

प्राणानाँ धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते॥

अहंकार का अन्त करने में प्रत्येक मनुष्य स्वाधीन और समर्थ है, जिनके उत्कर्ष से स्वार्थीपन, एकाधिकार की उद्दण्ड भावना नष्ट हो जाती है। पराधीनता तथा असमर्थता उसी के लिये है जो इन शक्तियों, सामर्थ्यों तथा योग्यताओं को अप्राप्त समझता हो, उन पर विश्वास न करता हो। जीवात्मा तत्व ज्ञान को समझे और पदार्थों से विमुख होने का प्रयास करे तो अहंकार अपने आप मिटने लगता है। स्वच्छ जल में प्रतिबिम्ब भी साफ नजर आता है। पवित्र और निर्मल आत्मा में भी दैवी प्रकाश स्पष्ट झलकता है। वहाँ लोभ, मोह के मनोविकार उदय नहीं होते, फलस्वरूप अहं-वासना का अन्त स्वतः ही हो जाता है। अहंकार तभी तक जीवित है जब तक साँसारिक वस्तुओं से आसक्ति है। यह लगाव घटा कि अभिमान समाप्त हुआ।

यह नहीं समझें कि इसके लिये कर्त्तव्य-कर्मों का सम्पादन अनावश्यक है। कर्म तो किये ही जाना चाहिये, साँसारिक भोग भी अनावश्यक नहीं बनाये गये हैं—किन्तु कर्मों में आसक्ति व भोगों में अनुराग का सर्वथा त्याग होना चाहिये। अपनी जैसी भी कुछ स्थिति है, उसी में सन्तोष का अनुभव करना मनुष्य की महान् जिम्मेदारी है। इसका पालन करने वाला सभी तरह के अभिमानों से विमुख हो जाता है।

परमात्मा अपनी शक्तियाँ पर-हिताय दान करता है। जीवन को भी सेवा का पालन वैसे ही करना चाहिये। सेवा वही कर सकता है जो किसी का अनादर न करे, किसी को दुःख न पहुँचावे। किसी के प्रति बुरे विचार जिसके मन में नहीं होंगे वही सेवा का सच्चा अधिकारी है। यह अधिकार जिसे मिल गया उसका अभिमान छूट गया। लोकोपकार ही उसके लिये इस संसार में शेष रह जाता है। उसे ही परमात्मा की सच्ची प्रेरणा मिलती है। इसके लिये यहाँ देना ही अधिक पड़ता है। अपनी सभी वस्तुयें दूसरों के लिये न्यौछावर कर देनी पड़ती है। तब इस अहंकार के सर्वस्व दान में ही असीम सुख का बोध होता है।

किन्तु यदि अहंकार का स्वभाव केवल मात्र लेने का बन जाय और दान-वृत्ति का अन्त हो जाय तो निर्लोभता नहीं रहती। वस्तुओं की ललक-लोलुपता बढ़ जाती है। इस जग में केवल रोना, झगड़ना और भय आदि ही दिखाई देने लगते हैं। दरिद्रता आ घेरती है और शाश्वत सुख से वंचित हो जाते हैं। तब देने की अपेक्षा लेने की महत्ता मालूम होती है। यह दुष्प्रवृत्तियाँ जितनी ही प्रबल होती हैं, यह बन्धन उतने ही मजबूत होते और जकड़ते चले जाते हैं।

परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की है, किन्तु वह इससे निर्बन्ध है। उसे भोग में आनन्द नहीं आया इसलिये अपने प्राणों को उत्सर्ग करना प्रारम्भ किया है। आत्मा भी विस्तीर्ण हो कर ही उन्मुक्त बनता है। ग्रहण बन्धन है क्योंकि उसमें अहंभाव है और त्याग मुक्ति है क्योंकि उसमें आत्मा विस्तीर्ण हो जाती है। इसलिये “अहं” तभी आत्मा का यथार्थ प्रकाश बनता है जब आत्मा उसे उत्सर्ग कर देता है।

मनुष्य अपने अधिकार की रक्षा का दावा तो कर सकता है किन्तु वह किसी के अधिकार छीनने का हकदार नहीं है। जो केवल अपना हित चाहते हैं और दूसरों के हितों की रक्षा नहीं करना चाहते, उनकी आवश्यकता न किसी व्यक्ति को होती है न समाज को। किन्तु जब वे अपने सारे अधिकार समाज के लिये सौंप कर अपने लिये केवल कर्त्तव्य, क्षमा और सन्तोष माँग लेते हैं तो उनका जीवन स्वाधीनता तथा प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है।

इस तरह मनुष्य की व्यक्ति गत शान्ति तथा सुन्दर समाज के निर्माण की दृष्टि से अहं का नाश आवश्यक है। इसी में स्वाधीनता, चिन्मयता तथा अमरत्व की उपलब्धि सन्निहित है। जिस मनुष्य के जीवन में अहंकार नहीं होता उसे प्रेम का आनन्द आत्म विभोर बना देता है। इस आनन्द की प्राप्ति के लिये आप यदि अहंकार का परित्याग कर सकें तो आप यह मनुष्य-शरीर सार्थक बनाने के अधिकारी हैं। इसी से आप को जीवन-लक्ष की भी प्राप्त हो सकती है।

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