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Magazine - Year 1965 - Version 2

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कृपया अन्न की बरबादी न कीजिये

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First 21 23 Last
हमारा देश इन दिनों जितना अधिक अन्न संकट से पीड़ित है उतनी गम्भीर और कोई दूसरी समस्या नहीं है। प्रति वर्ष 70 लाख टन से भी अधिक खाद्यान्न विदेशों से मँगाना पड़ता है फिर भी राशन व्यवस्था भली प्रकार से पूरी नहीं हो पाती। यदि किसी कारणवश यह विदेशी आयात बन्द हो जाय तो हजारों लोगों के भूख से मरने की नौबत आ सकती है। राष्ट्र के इस अन्न-संकट काल में अन्न की बरबादी को एक महान् नैतिक-अपराध तथा देशद्रोह ही कहा जा सकता है। अन्न की उपज बढ़े, विदेशों से क्रय किया जा कर देश-वासियों को उदर पोषण की सुविधायें मिलें यह तो अच्छी बात है किन्तु इस अन्न-संकट के जमाने में अन्न का अनावश्यक खर्च और बेतुकी बरबादी भली नहीं कही जा सकती है। उससे व्यक्ति समाज और राष्ट्र सभी का अहित हो जाता है।

एक ओर अनेकों को पेट भरना मुश्किल हो रहा है दूसरी ओर अधिकांश बच्चों को जिगर, तिल्ली, अपच की बीमारियाँ घेरे हुये हैं। इन बीमारियों का मूल कारण है अति भोजन। पेट की आवश्यकता से अधिक आहार देकर भोजन तो बरबाद करते ही हैं रोगों को अलग से निमंत्रण देते रहते हैं। एक ओर अन्न की बर्बादी, दूसरी ओर औषधियों की माँग और आर्थिक असंतुलन-सभी मिलकर सामाजिक विकास के मार्ग में आड़े खड़े हो जाते हैं। छोटे बच्चों को कम आहार दिया जाय, अधिकाँश दूध मट्ठा जैसे पेय पदार्थ दिये जायँ तो इससे उनकी खेलने की शक्ति बनी रहती है, फलस्वरूप शारीरिक अवयवों का विकास और रक्त में तेजस्विता की तेजी से वृद्धि होती है। बच्चे खूब स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। अभिभावक भी निश्चिन्त और अपने कार्यों में भली प्रकार लगे रहते हैं। अन्न-बर्बादी का एक स्रोत है बालकों का अति भोजन। इसे दूर करें तो उसके साथ अनेकों दूसरी समस्यायें भी दूर होती हैं। बालकों को परिमित भोजन देने की आदत डाल दी जाये तो अनेक रोगों से बचेंगे और खाद्यान्न की बचत होगी।

यह बुराई बालकों में ही हो सो बात नहीं । उनकी आहार की मात्रा की दृष्टि से यह अपव्यय तो बहुत ही कम समझा जाता है। पर अधिक उम्र के लोगों में भी कुछ ऐसी गलत धारणायें होती है कि जो अधिक खाता है वह अधिक स्वस्थ रहता, थाली में भोजन छोड़ना भी बड़े होने का लक्षण मानते हैं। एक कमजोरी यह भी है कि थाली में एक बार में अनेक स्वादों के अनेक भोजन सजाते हैं। इससे भी अति भोजन और अन्न की बरबादी ही होती हैं। यह मानना गलत है कि अति-भोजन से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। मनुस्मृति में इस सम्बन्ध में लिखा गया है—

अनारोग्य-मनायुष्यमर्स्वगं चाति भोजनम् ।

अपुण्यं लोक विद्विष्टम् तस्मात्तत् परिवर्जयेत्॥

अर्थात्—अति भोजन स्वास्थ्य के विनाश का कारण, आयु नाश करने वाला, स्वर्ग का विरोधी, पुण्य नष्ट करने वाला तथा अपयश प्रदान करता है। अतः उससे दूर रहें और मितभोजी बनें।

स्वल्पाहारी व्यक्ति सदैव ही निरोग रहते हैं उनकी आयु लम्बी होती है, संयम सध जाता है, शारीरिक व मानसिक शक्तियाँ प्रदीप्त होती हैं और साँसारिक सुख प्राप्त होते हैं। पर अति-भोजन से अपच, अजीर्ण, बद्ध-कोष्ठ रक्त विकार आदि बीमारियाँ ही पैदा होती हैं। उपवास का प्रयोजन अति भोजन से उत्पन्न पाचन संस्थान की थकावट को दूर कर उसे कार्य सक्षम बनाना होता है अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि अति-भोजन स्वास्थ्य और बल प्रदान करता है वरन् इसके विपरीत जो कम खाते हैं उन्हें ही आयुर्बल, उत्तम स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है।

अति भोजन अन्न की बरबादी के अतिरिक्त और कुछ नहीं। अतः यह सभी का राष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी है कि वे आहार में आवश्यकता से कुछ कम मात्रा ही लिया करें और सप्ताह में कम से कम एक प्रहर का आँशिक उपवास भी किया करें।

थाली में जूठन छोड़ने की आदत भी अत्यन्त निकृष्ट होती है। इसका कारण भी अति-भोजन की प्रवृत्ति, प्रियता या परोसने वालों की असावधानी ही कही जायगी। इसमें एक अंश दोष स्त्रियों का भी है कि वे आवश्यकता से अधिक भोजन तैयार कर लेती हैं फिर उसका अधिकाँश भाग जूठन में बर्बाद होता है या उसे कई दिन तक खाया जाता है। देहातों में तो यह रीति चल पड़ी है कि प्रातः काल चारपाई से सोकर उठते ही बच्चों को पहले दिन की बासी रोटियाँ दे दी जाती हैं। यह सारा कुछ बर्बादी का ही लक्षण है। इसमें एक ओर तो बहुत-सा भोजन कटोरियों और नापदानों में बह जाता है दूसरी ओर उदर में विकार बन कर फूटता और स्वास्थ्य की समस्या जटिल बना डालता है।

चाहिये यह कि थाली में कम भोजन परोसा जाय और यदि परोस दिया जाय उसे छोड़ा न जाय। बाद में यदि थोड़ी-सी भूख शेष रह जाती है तो पेट का उतना हिस्सा खाली रखना कोई बुरी बात नहीं है, उससे किसी का शरीर कमजोर नहीं होगा। अधिक भूख लगे तो थोड़ा-थोड़ा भोजन दो के बजाय तीन बार किया जा सकता है किन्तु एक बार में ही आवश्यकता से अधिक भोजन थाली में परोस लेना, फिर उसे जूठन के रूप में छोड़ना या अधिक उदरस्थ कर जाना यह सभी आदतें हानिकारक हैं। मनुष्य को दिन में दो बार भोजन करना चाहिये और वह भी जितना हल्का और सुपाच्य रहे उतना ही अच्छा।

पार्टियों, सहभोजों, विवाह-बारातों, ब्रह्म भोजों में तो अन्न की और भी दुर्दशा देखने को मिलती है। भारतवर्ष में गोत्र और वंश के नाम पर चलने वाले भोजों में इतने अधिक आदमी इकट्ठा हो जाते हैं कि बेचारे मेजबान की सारी कोठियाँ ही खाली कर जाते हैं। भोज करने वाले इसे अपनी शान, और पुण्य वृद्धि का साधन मानते हैं कि इस तरह बाद में उन्हें कितना पारिवारिक संकट उठाना पड़ता है यह किसी से छुपा नहीं। घर वाले भूखों मरें, बालकों का विकास रुकें , कर्ज बढ़े आदि अनेकों परेशानियाँ उठती हैं।

बड़े-बड़े भोजों में अन्न की बरबादी एक अक्षम्य अपराध है। किसी भोज में यदि 100 व्यक्ति भी सम्मिलित हों और प्रति व्यक्ति औसत एक छटाँक अपव्यय माना जाय तो 100 छटाँक अर्थात् सवा छह सेर अन्न की बरबादी हुई। 46 करोड़ की आबादी वाले देश में यदि ऐसे 10 हजार पार्टियाँ और उत्सव प्रति वर्ष के हिसाब से रखे जायँ तो 62500 सेर अर्थात् 1562 मन 20 सेर अन्न केवल जूठन में चला गया। यह अनुमान कम से कम है फिर एक साथ इतने व्यक्ति बैठकर खायें और उनका औसत आधा सेर प्रति व्यक्ति की खुराक रखी जाय तो अन्न की बर्बादी हजारों टन तक पहुँचेगी। यह बर्बादी विदेशों से मँगाये जा रहे खाद्यान्न से किसी भी तरह कम न होगी। हमारे ऊपर लादने वाला विदेशी कर्जे का बोझ हमारी अज्ञानता के कारण ही है अन्यथा अपने देश में अन्न की पैदावार खपत से कम होती हो यह नहीं कहा जा सकता है। यदि उचित रीति से खर्च किया जाय तो यहाँ की खाद्यान्न की पूर्ति की समस्या यहीं हल हो सकती है और इससे विदेशों से मँगाने की परेशानी और खर्च की भी बचत हो सकती है।

इस अति भोजन और अनुशासित “जेवनार” पद्धति का आर्थिक दृष्टि से विचार करना बहुत जरूरी है। इससे हमारा अधिक पैसा बर्बाद होता है। इस बात को लोग समझें और इस अपव्यय को रोकें तो हमारा काफी धन बचे और राष्ट्रीय संपत्ति का अपव्यय रुके। दवाओं आदि पर जो खर्चे का अनावश्यक दबाव पड़ता है वह भी न पड़े और हमारे रहन-सहन का स्तर भी ऊँचा हो।

अति भोजन, जूठन, भोज अथवा अविवेकपूर्ण दान किसी भी तरह अन्न की बर्बादी हो तो इसे एक घोर अनैतिक अपराध ही कहेंगे। यह मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन में भी कठिनाइयाँ पैदा करता है और उससे राष्ट्रीय आर्थिक-व्यवस्था में भी दबाव पड़ता है ऐसी स्थिति में इसे रोकना भी एक धर्मकृत्य बन गया है। हम इस राष्ट्रीय समस्या को हल कर सकें तो शेष समस्यायें अपने आप ही हल हो जायेंगी।

युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

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