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Magazine - Year 1965 - Version 2

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आत्मा की आवाज सुनो और उसका अनुसरण करो

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जब कभी आकस्मिक ऐसा आभास हो कि आपको किसी ने आवाज दी हो, और आस-पास देखने ओर खोजने पर भी पुकारने वाले का पता न चले तो निश्चित रूप से यह समझ लीजिए कि आपको अपनी अन्तरात्मा ने आवाज दी है, और उस आवाज का केवल एक ही डडडड है “कि ऐ अमुक! अपने को समझ ओर मुझको पहचान!” अपने को समझने का अवसर दे। यह देखो कि हम अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं या नहीं? यदि नहीं तो तत्काल ही विवेचना कीजिए उन्हें उन्हें सुधारिए ओर एक नये उत्साह से लक्ष्य की ओर बढ़ते जाइये! आत्मा तुम्हारे भीतर तुम्हारे से विवरण लेने के लिए डडडड है, साथ ही वह एक डडडड डडडड एक डडडड लिए तुम्हारे डडडड प्रकाश बिखेर रही है। डडडड डडडड तुम्हारे डडडड में डडडड डडडड हो जाता है जब की आँख बन्द डडडड चलता है। जिसकी आंखें ठीक खुली डडडड उसके सामने अन्धकार का कोई प्रश्न नहीं है। कोई डडडड डडडड डडडड करने डडडड अपनी ओर डडडड करने का डडडड ही देना है। आत्मा की आवाज भी लिए कभी-कभी सुनाई देती है कि मनुष्य डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड सचमुच हो। समय डडडड से डडडड रहा है इसलिए वह डडडड से सावधान हो कर जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ता है। जिसने आत्मा डडडड आवाज सुनी, इसका अनुकरण किया उन्होंने ही मानव जीवन को सार्थक बनाया है और जो जीवन की उपेक्षा करते रहे उन्होंने डडडड कर पछताने डडडड जाना पड़ा है।

ऋषि विरु बल्लुवर

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होती है कि फिर उनके लिए औरों के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।

भगवान का प्रेम जीवन के सत्य को देखता है। भगवान का प्रेम मनुष्य के शिव को देखता है। भगवान का प्रेम आपके जीवन के सौंदर्य को देखता है। आप परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं, अतः उनके हो जाने में उनके गुणों का उभार आपके जीवन में होना स्वाभाविक है। गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, ताप्ती, नर्मदा, गोदावरी आदि नदियाँ तब तक स्थल-खण्ड में इधर-उधर विचरण करती रहती हैं जब तक उन्हें नदियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जाता। उनकी शक्ति और सामर्थ्य भी तब तक उतनी ही होती है किन्तु जब वे सब मिलकर एक स्थान में केन्द्रीभूत हो जाती हैं तो उनका अस्तित्व समुद्र जितना विशाल, रत्नाकर जैसा सम्पन्न, सिंधु सा अनन्त बन जाता है। अपने आप को परमात्मा में समर्पित कर देने पर मनुष्य का जीवन भी वैसा ही अनन्त, विशाल, सत्य, शिव एवं सुन्दर हो जाता है। उन्हें पाकर मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है।

मनुष्य की जगत् में उत्पत्ति हुई है, इसमें भगवान् का प्रेम ही हेतु है। निश्छल भाव से वे मनुष्य का भरण-पोषण करते रहते हैं। अन्न, फल-फूल, जल, वायु, अग्नि, ताप, वर्षा वृक्ष-वनस्पति, प्रकाश आदि की व्यवस्था करने वाले परमात्मा के हृदय की गति को जो न पहचान सके, वह अभागा है। मनुष्य के लिए डडडड असंख्य अनुदान जुटाने में परमात्मा का प्रेम का ही परिचायक है। उन्होंने अपने प्राणों को विश्व के हित और कल्याण के लिये उत्सर्ग किया है। फिर मनुष्य यदि उन उपकारों का बदला न चुकाये तो उसे हृदय हीन ही कहा जायेगा। परमात्मा को प्रेम की भूख है। वे प्रेम के प्यासे होकर हर प्राणी के द्वार-द्वार भटकते घूमते हैं। जहाँ उन्हें डडडडनिर्मल प्रेम मिल जाता है वहीं वे रम जाते हैं और अपनी सभी शक्तियों की चाभी उसे ही सौंप देते हैं।

कितना हृदय-हीन है मनुष्य, जो परमात्मा से भोग की वस्तुयें माँगता है। साँसारिक स्वार्थ भ्रम है, उनमें स्थिरता डडडड जिस क्षण आप परमात्मा के प्रेम को अपनाने के लिए डडडड डडडडउद्धत हो जाते हैं उसी क्षण भगवान् के प्रेम का आपके जीवन एवं क्रियाओं में सक्रिय होने का अवसर प्राप्त हो जायेगा।

लौकिक दृष्टि से अपनी कामनायें पैदा करना ही तो हमारी भूल है इसी से मनुष्य अपने मूल-लक्ष्य से भटकता और आनन्द से वंचित होता है। आत्मा को शरीर मानने से उद्देश्य में गड़बड़ी पैदा होती है। शरीर आत्मा का वाहन, सेवक और उपकरण मात्र है जिस पर सवार होकर जीवात्मा इस नन्दन-वन के असीम-आनन्द का सुखोपभोग करने आया है। यह सुख परमात्मा में ही ओत-प्रोत है और उसी के हो जाने पर मिलता है। अपने मालिक, स्वामी पिता और सर्वस्व से दूर रहकर मनुष्य को सुख मिल भी कहाँ सकता है? हम शरीर नहीं आत्मा हैं। प्रेम आत्मा की आध्यात्मिक प्यास है। उसे प्रेम में ही आनन्द मिलता है। और सच्चा प्रेम, पूर्ण प्रेम, पवित्र प्रेम, परमात्मा में ही मिल सकता है। इससे भिन्न में डडडड वासना कहलाता है, क्योंकि उसमें शारीरिक सुख की प्रधानता और स्वार्थपरता रहती है। शारीरिक भोग की दृष्टि से किया हुआ प्रेम निम्न श्रेणी का है उसमें पवित्रता और आत्म-त्याग की भावना नहीं होती।

एक राजकुमार की बड़ी मार्मिक कहानी है। उसके नगर में नटों का बेड़ा आया था। बेड़े में एक अत्यन्त रूपवती युवती थी। राजकुमार उस पर आसक्त हो गया और इसी दुःख में वह दुःखी होकर अत्यन्त दुर्बल पड़ गया। राजा ने अपने बेटे की इच्छा जानी तो नट-राज के पास विवाह प्रस्ताव भेज दिया। नट ने एक शर्त लगा दी कि यदि राजकुमार नटों की कला से पूर्ण दक्ष होने तक उनके दल में रहे तो वह सम्बन्ध स्वीकार कर सकता है। राजकुमार ने शर्तें मान ली। अनेक वर्षों तक घोर परिश्रम करने के बाद वह नट-कला में प्रवीण हो गया। पहला प्रदर्शन उसका वाराणसी के राजदरबार में होना था। राजकुमार एक ऊँचे बाँस में चढ़कर किसी उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन कर रहा था। उसी समय उसने दूर एक मकान में उससे भी अधिक सुन्दर मातायुवती को किसी साधु को भिक्षा देते हुये देखा। उसने देखा उस महात्मा के मुख पर कितना सरल व वात्सल्य का भाव है। क्षुद्र प्रेभमडडडड पर राजकुमार को बड़ी घृणा हुई और उसने अधिक श्रेष्ठ सौंदर्य की प्रति-मूर्ति परमात्मा के साथ अधिक उत्कृष्ट स्तर का प्रेम करना आरम्भ कर दिया।

अवास्तविक सौंदर्य के लिए राजकुमार जिस प्रकार नट बन जाता है उसी तरह संसार के प्राणी आत्महित से विमुख होकर साँसारिक पदार्थों से आनन्द ढूंढ़ते है पर मिलता कुछ नहीं। न ही ईश्वर से प्रेम ही हो पाता है और न डडडड शारीरिक हित ही सुरक्षित रहते हैं। नैसर्गिक, आत्मिक शारीरिक वयाडडडडड भावात्मक आदि किसी भी अभाव से परमात्मा का प्रेम श्रेष्ठ है, महान् है।

भगवान बहुत थोड़े से प्रसन्न हो जाते हैं। थोड़ी सी व्याकुल आराधना, जिसमें जीवात्मा अपनी स्थिति को भूल कर अपने आपको उन में मिला दे, बस उसी प्रेम के भूखे हैं भगवान! व्याकुलता उसी के लिये होती है जिसे चित्त चाहता है। मनुष्य परमात्मा की ओर तभी उन्मुख हो सकता है जब वह अपने आपको सदैव आत्मा की दृष्टि से देखे। आत्मा का चिन्तन करने से ही ईश्वर-प्रेम प्राप्त पैदा होता है। आत्मा का परमात्मा से चिर-सम्बन्ध है, अतः आत्मस्वरूप की जानकारी के साथ उनके साथ उनका प्रेम डडडड जागृत होना भी स्वाभाविक ही है।

परमात्मा के प्रेम डडडड अद्भुत शक्ति है। उसी के सहारे मनुष्य डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड प्रत्येक दुख पर विजय प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार से दुष्टता निवारण दया से ही जाता है उसी तरह से सच्चे प्रेम के प्रभाव से दुर्विचारों का नाश हो जाता है। डडडड डडडडप्रेम में भक्ति है, डडडड डडडडसुख और आनन्द है किन्तु यह कथन डडडड डडडड डडडड केवल निस्वार्थ परमात्मा के प्रेम से ही है। प्रभु डडडड डडडडमनुष्य के जीवन बिना आन्तरिक शुद्धता और भावनात्मक परिष्कार नहीं हो पाता।

मनुष्य का और परमात्मा का सम्बन्ध पिता और पुत्र का सम्बन्ध होता है। बृहद् परमात्मा का एक रूप आत्मा है उनका चिर सम्बन्ध है। “पिता नोऽसि” का ही मन्त्र अतः मनुष्य को सुख दे पाता है। यह मेरा पिता है। उन्हीं से उन्हीं से कहूँगा,जिन्दगी डडडड मांगूंगा, उन्हीं से हठ करूंगा। उन्हीं से हर डडडड मांगूंगा। बार-बार डडडड आत्मबोध की याचना उन परमपिता से करूंगा। मनुष्य जीवन में इन मूल मन्त्रों का समावेश हो जाय तो डडडड उसका मनुष्य तन जीवन सार्थक हुआ समझना चाहिए।

स्वामी का सेवक से, राजा का प्रजा से, पिता का पुत्र से, जो सम्बन्ध होता है, उसमें अस्वाभाविकता नहीं होती। अतः वहाँ व्यवहार भी निष्कपट होता है। पुत्र में पिता का ही प्राण संचरित होता है अतः वहाँ कोई बनावटीपन नहीं होता। परमात्मा और मनुष्य का प्रेम भी वैसे ही आधार भूत और डडडड छल रहित होता है। इसी कारण उसकी प्रतिष्ठा और उसका आनन्द है।

“वेश्रोमुण्डोकपनिषद् में प्रश्न किया गया है कि “डडडड केन प्राणः प्रथमः प्रेडडडडतियुक्त?” अर्थात् प्राण को किसके द्वारा प्रेम प्राप्त हुआ है। प्रश्न के उत्तर में बताया है- जो महा प्राण डडडडडडडड उनके द्वारा। महाप्राणा परमात्मा की स्थिति का डडडड संकेत है।

मनुष्य अपने आप में बहुत ही छोटा अल्प शक्ति और सामर्थ्य वाला है। पग-पग पर उससे गलतियाँ और डडडड अशुद्धियाँ होती रहती हैं। पर जब कभी वह अपने आपको उस परम पिता को ही अनन्य भाव से सौंप डडडड सम्मान देता है तो उसकी सारी डडडड कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं।

भगवान् के प्रेम के सहारे जियें वनडडडड भगवान के प्रेम के जीवित रहें। ने उन्हीं के स्मरण, चिन्तन और आदेश पालन को प्रमुख अपने जीवन का धर्मान समझें। डडडडकिसी भी डडडडनिराशा में भगवान् का प्रेम महान् है। इसी बात को गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है, “ऐ मनुष्य! डडडड डडडडतू सम्पूर्ण धर्मों का पग पग डडडड डडडड परित्याग कर केवल मेरी शरण में आ जायेगा। मैं तेरे सभी पापों का बिना डडडड विनाश कर तुझे पवित्र तथा डडडड बंधन मुक्त कर दूँगा।”

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