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Magazine - Year 1967 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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आवेश ग्रस्त होने में ही भलाई है।

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आवेश एक प्रकार का क्षणिक उन्माद है। पागल व्यक्ति जिस प्रकार कोई काम करते समय उसका परिणाम नहीं सोच पाता, उत्तेजना ग्रस्त मनुष्य का विवेक उसी प्रकार नष्ट हो जाता है। आवेगावस्था में किया हुआ काम कभी ठीक नहीं होता। गलती, भूल और उत्तेजना अथवा क्रोध करने वाला अपने कल्याण की आशा नहीं कर सकता।

लड़ाई-झगड़े, मार-पीट, तोड़-फोड़, तथा सत्य-आत्महत्या आदि जितने भी दुष्ट कार्य हैं सब उत्तेजना के ही प्रतिफल हैं। उत्तेजना का आवेग एक क्षण में ही जीवन भर के प्रेम, मित्रता तथा सदभाव को नष्ट कर देता है। जीवन-भर एक दूसरे को प्राणों से अधिक प्रेम करने वाले पति-पत्नी उत्तेजना के वशीभूत होकर एक-दूसरे से घृणा करने लगते हैं। मित्र एक दूसरे के शत्रु बन जाते हैं उत्तेजना के वशीभूत होकर मनुष्य प्रिय जनों की हत्या कर डालता है और उसी के आवेग से संचालित होकर अपनी वस्तुओं को नष्ट कर डालता है, सम्पत्ति फूँक देता है और आत्महत्या तक कर डालता है।

उस उत्तेजना को पागलपन के सिवाय और क्या कहा जायेगा, जो जीवन-भर के स्नेह तथा सम्पत्ति को नष्ट कर डालती है। जो माता-पिता संतान को इतने लाड़-प्यार से चलाते हैं वे ही कभी उत्तेजना के वशीभूत होकर उसकी हत्या तक कर डालते हैं। क्षणिक उत्तेजना में आकर मनुष्य ऐसे अकरणीय कार्य कर डालते हैं जिसके कारण उन्हें जीवन-भर पछताना पड़ता है। एक क्षण की उत्तेजना मनुष्य को आजीवन दरिद्री बना देती है,जेल भिजवा देती है। आजीवन जेल में सड़ने और फाँसी के तख्ते पर लटकने वाले किसी न किसी आवेग अथवा उत्तेजना के वशीभूत हुये होते हैं। उत्तेजना का वेग समाप्त होने पर स्वयं ही मनुष्य को अपनी गलती अनुभव होने लगती है किन्तु तब उसके पास पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाता। एक क्षण की उत्तेजना मनुष्य को आजीवन जलन, आत्मग्लानि अथवा पश्चात्ताप के हवाले कर देती है। जीवन के इस भयानक दुर्भाग्य, उत्तेजना से मनुष्य को सदा सावधान रहना चाहिये।

मन की शाँत अथवा एक संतुलित अवस्था में मनुष्य बहुत-सी अग्रिम बातों को भी अदृष्टिगोचर कर देता है किन्तु उत्तेजनाजन्य असन्तुलन की दशा में वह भ्रम तथा सन्देह मात्र में ही अनर्थ कर डालता है। उत्तेजनाग्रस्त मनुष्य की विवेक बुद्धि नष्ट हो जाती है। उन क्षणों में वह एक पागल की तरह परिणाम सोचे बिना ही काम कर डालता है।

शाँति एवं सन्तुलन ही मनुष्य का सहज गुण है। अपने इसी गुण के कारण वह इतना सृजन सम्पादित कर सका है। उत्तेजना अथवा आवेग उसका प्रकृत स्वभाव रहा होता तो संसार सृजन के स्थान पर खण्डहरों से भरा होता। उत्तेजना मनुष्य का आरोपित विकार है जो किन्हीं ऐसे कारणों से उत्पन्न हो जाता है जिन पर शाँत मन से विचार नहीं किया गया होता है। आज संसार में जहाँ भी विनाश एवं ध्वंस के चिन्ह दिखाई देते हैं वे सब मनुष्य के क्षणिक आवेश अथवा उत्तेजना के ही प्रमाण हैं। हिंसा, द्वोष तथा युद्ध आदि ध्वंसक दोष एकमात्र उत्तेजना के ही परिणाम है। संसार के राष्ट्रनायक एवं शासक जब तक शाँत एवं संतुलित मस्तिष्क से समस्याओं पर विचार करते और उनका समाधान सोचते रहते हैं तब तक शाँति बनी रहती है। किन्तु ज्यों ही वे असन्तुलन अथवा उत्तेजना के वशीभूत होते हैं संसार में विनाश तथा नरसंहार का संवाहक युद्ध का ताण्डव होने लगता है क्षणिक उत्तेजना के फलस्वरूप होने वाले विनाशक युद्ध के बाद जब मनुष्य का उन्माद उतरता है तब वह अपने को भयानक भुखमरी, बेकारी तथा व्याधियों के बीच पाता है। अपनी क्षणिक उत्तेजना का ध्वंसात्मक परिणाम देख कर तब उसके पास पछताने के सिवाय और कुछ नहीं रह जाता। सदियों की संचित, उसकी सारी सम्पदायें नष्ट हो चुकी होती हैं।

किसी द्वन्द्व के समय जो व्यक्ति जितना अधिक शाँत एवं सन्तुलित रहता है, वह उतना ही लाभान्वित होता है। उत्तेजनाग्रस्त व्यक्ति आपे से बाहर होकर अपनी हानि कर लेता है। उसकी उत्तेजना उचित-अनुचित का विचार नहीं करने देती। वह छोटी-सी बात लेकर बड़े-बड़े अनुचित व्यवहार कर डालता है। किसी झगड़े में शाँत एवं अनुत्तेजित रहने वाला ही जीतता है। जन-समुदाय उसके पक्ष में हो जाता है। उत्तेजनापूर्ण व्यवहार करने वाला जनमत को अपने विरुद्ध कर लेता है, अपने बनते हुए काम को बिगाड़ लेता है। उसका जोर-जोर से बोलना, गाली-गलौज करना अथवा आवेश में आकर मारपीट पर उतारू हो जाना उसे सहज ही अपराधी बना देता है और वह बहुधा न्याय का अधिकार खो देता है।

अदालत में उत्तेजित हो जाने वाला वकील अपने मुवक्किल की हानि करता है। आवेशग्रस्त व्यवसायी अपने व्यापार को मन्द कर देता है। असहनशील नौकर अपने मालिक को नाराज करके उन्नति की संभावनायें खो देता है। आवेश वान विद्यार्थी गुरु का आशीर्वाद और गुरु शिष्य की श्रद्धा से वंचित हो जाया करता है। उत्तेजनाग्रस्त मनुष्य हर प्रकार से, हर क्षेत्र में हानि उठाया करते हैं।

उत्तेजनाग्रस्त मनुष्य अपने गौरव, गरिमा तथा गम्भीरता को खो देता है। बात-बात में बिगड़ उठने, झुंझला पड़ने और आपे से बाहर हो जाने वाला व्यक्ति अपने से छोटों का भी आलोचनापात्र बन जाता है। हर आदमी उससे बात करने से बचता है। उत्तेजना हल्के मानसिक धरातल की द्योतक है। हल्की मनोभूमि वाला कटु बात तो दूर बहुधा साधारण से विनोद तक में लड़ने-झगड़ने को तैयार हो जाता है।

उत्तेजना का यह विकार प्रायः अहंकार अथवा निराशा से उत्पन्न हो जाता है। अहंकारी व्यक्ति अपने को अनावश्यक महत्व दिया करता है। वह किसी से बात करते समय इस बात पर ध्यान रखता है कि कोई बात उसकी शान के खिलाफ तो नहीं कहीं जाती है। प्रतिक्षण ऐसा ध्यान रहने से उसे थोड़ी ही देर में कोई-न-कोई ऐसी बात मिल जाती है, जो उसके मनोनुकूल न हो। ऐसी स्थिति में उसे भभकते देर नहीं लगती और वह तत्काल प्रतिवादी से उलझने को तैयार हो जाता है। यद्यपि उत्तेजना प्रधान स्वभाव से व्यक्ति से लोग सावधान होकर ही बातचीत करते हैं और यथासंभव इस बात का प्रयत्न करते हैं कि कोई ऐसी बात न निकल जाये, जिससे अमुक व्यक्ति उत्तेजित हो जाये, तथापि अहंकार के दोष से आवेशी व्यक्ति कोई-न-कोई ऐसा कारण निकाल ही लेता है जिससे उसे अपने अहं को व्यक्त करने का अवसर मिल जाये। अहंकार के कारण उत्तेजित हो उठने वाले को लोग आधा पागल समझते हैं।

निराशा को पश्रय देने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में कटुता आ जाती है जिसके कारण उसे हितकर अच्छी बात भी कभी-कभी बुरी लगती है। अपने विषय में दिए गए उपदेश, व्यक्त की गई सद्भावना तथा प्रस्तुत किया गया परामर्श विष जैसा ही लगता है। अपने हित की बात सुनकर भी आवेशी व्यक्ति उत्तेजित हो उठता है। निराशा से पीड़ित व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है, जिसके कारण उसके हृदय पर अनुकूल बात की प्रतिक्रिया भी प्रतिकूल होती है।

उत्तेजना एक बहुत बड़ी मानसिक कमजोरी है। इसका जन्म क्रोध, आवेग, ईर्ष्या अथवा प्रतिशोध भावना से होता है। आवेशी व्यक्ति का विवेक शिथिल हो जाता है। उसमें उचित-अनुचित का निर्णय करने की क्षमता नहीं रहती। जरा-सी अप्रियता होते ही वह पराकाष्ठा तक उत्तेजित हो उठता है और कभी ऐसी भयानक बात कर डालता है, जिससे उसका सारा जीवन ही असफल हो जाता है। उत्तेजना एक भयानक मानसिक रोग है। इससे बचे रहने में ही मनुष्य का हित है। आवेश जीव-विकास के मार्ग का भयानक रोड़ा है, जिसको मनुष्य स्वयं ही अपने हाथ अटकाया करता है।

आवेश का रोग मनुष्य की जीवन-शक्ति का ह्रास किया करता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मनुष्य चार-पाँच घण्टे निरन्तर क्रोध में रहे तो उसके शरीर का लगभग 8 औंस रक्त जल जायेगा। उसके शरीर में इतना विष पैदा हो जायेगा, जितना कि दो तोला कुचला खाने से। आवेश प्रधान मनुष्य तो प्रायः दिन भर ही क्रोध से भरा रहता है। ऐसी दशा में उसका कितना रक्त जल जाता होगा इसका अनुमान कर सकना कठिन है। आवेशी व्यक्ति के मस्तिष्क में हर समय एक तनाव तथा एक गुबार भरा रहता है, जो अवसर पाकर दूसरे के साथ प्रकट होता है और यदि उसे ऐसा अवसर नहीं मिलता तो वह स्वयं अपने पर ही खीझा एवं झुँझलाया करता है, उसे स्वयं अपने कामों में ही गलतियाँ दिखाई देती हैं और अपने पर ही खीझ उठता है। मनुष्य की यह मनःस्थिति उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक चारों स्वास्थ्यों के लिए हानिकारक होती है।

संसार में अच्छी-बुरी, प्रिय-अप्रिय कड़ुवी तथा मीठी सभी प्रकार की परिस्थिति आती रहती है। इनको समभाव से सहन करने का अभ्यास उत्तेजना का एक अच्छा उपाय है। किसी से बात अथवा व्यवहार करते हुए अपने अहं भाव को कभी भी ऊपर मत आने दीजिए। अहंकार, आक्रोश तथा आवेग का बहुत बड़ा कारण है। निराशा, चिन्ता, द्वेष, ईर्ष्या तथा प्रतिरोध को प्रश्रय देने से मनुष्य का मानसिक धरातल बड़ा हल्का हो जाता है, जिससे वह साधारण-सी बात पर भी गर्म हो उठता है। उक्त मनोविकारों को अपने आस एक क्षण भी न ठहरने दिया जाये। उत्तेजना से मनुष्य को विषैले सर्प की तरह सावधान रहना चाहिये। एक क्षण की उत्तेजना आजीवन अनर्थ का कारण बन जाती है। मानसिक कष्ट एक कठिनाई को सौ बार सहन करके भी सहिष्णुता का अभ्यास करते रहना, व्यक्ति को शीघ्र ही मनस्वी बना देता है। उसका मन एवं मस्तिष्क सन्तुलित हो जाता है। कुछ ही समय में वह एक अनिवर्चनीय शाँति अनुभव करने लगता है।

जिस प्रकार सहिष्णुता का अभ्यास उत्तेजना का उपचार है, उसी प्रकार आहार संयम भी इस दिशा में बड़ा सहायक होता है। कटु, तिक्त, गरिष्ठ अथवा तामसी भोजन करने से मन-मस्तिष्क में ऊष्मा की वृद्धि हो जाती है, जो जरा-सा कारण पाते ही उत्तेजना के रूप में प्रकट होने लगती है। भोजन का प्रभाव मनुष्य स्वभाव पर अनिवार्य रूप से पड़ा करता है। शाँत, सात्विक तथा साधारण भोजन करने वाले व्यक्ति कम-से-कम उत्तेजित हुआ करते हैं।

अपना हित चाहने वाले व्यक्ति को उत्तेजना उत्पन्न करने वाले वातावरण से सदा दूर ही रहना चाहिए। क्रोधी, आवेशी, ईर्ष्यालु तथा द्वेषी व्यक्तियों का संपर्क भी इस मानसिक विकार का बड़ा कारण है। जिस प्रकार के व्यक्तियों का संग किया जायेगा अथवा जिस प्रकार के वातावरण में रहा जायेगा, स्वभाव स्वभावतः उसी ढाँचे में ढल जायेगा। सदाचारी, शाँत तथा सहिष्णु व्यक्तियों का संपर्क उत्तेजना का प्रतिभाशाली उपचार है।

उद्वेग अथवा उत्तेजना मनुष्य की बहुत बड़ी शत्रु है। यह हर क्षेत्र में नुकसान ही किया करती है। बुद्धिमान व्यक्ति हर उपाय तथा मूल्य पर इसका परित्याग कर दिया करते हैं। उत्तेजना के कारणों को छोड़कर शाँत, सन्तुलित एवं सहनशील बनिए, आप एक मधुर शीतलता के अधिकारी बनेंगे जिससे आपकी आयु, बल तथा सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी, आपकी उन्नति तथा सफलता के तार स्वयं ही अनावृत्त हो जायेंगे और आप एक सुखी जीवन जीने की स्थिति पा लेंगे।

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