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प्रेम और वासना का अन्तर-
प्रेम और वासना का प्रमुख अन्तर यह है कि प्रेम एक निष्काम, निर्विकार एवं अविकार अनुभूति है, जिसकी पुलक हृदय से आत्मा पर्यन्त व्याप्त रहती है। वह एक-रस और एक-स्थिति मय रहता। किन्तु वासना शरीराकाँक्षिणी होती है। यह परिवर्तनशील तथा सुख-दुःखमय और क्षणिक होती है।
प्रेम एक आकर्षण है और वासना एक पिपासा। प्रेम अपने आलम्बन को अधिक सुन्दर, अधिक चिरजीवी और पवित्र बनाता है। किन्तु वासना उसको असुन्दर, अल्पजीवी और अपवित्र बनाती है, प्रेम पोषक और वासना-शोषक तत्व है। प्रेम अपने पात्र को अमर बना कर जहाँ स्वयं भी अमरत्व प्रदान करता है, वहाँ वासना उसको मृत्यु का अभिशाप दें कर स्वयं भी मृत्यु का आलिंगन कर लेती है। प्रेमपूर्ण ईश्वरीय तत्व और वासना अनाध्यात्मिक कलुष।
-स्वामी विवेकानन्द
क्या तीसरा विश्व-युद्ध निकट ही है?
इस समय मनुष्य जाति बड़े संकट और भय की अवस्था में होकर गुजर रही है। हम पिछले-2 महायुद्ध देख चुके हैं, जिनमें करोड़ों लोग मारे गये और हजारों अरब की सम्पत्ति का नाश किया गया। अब युद्धशील राष्ट्रों की मारक और नाशक शक्ति पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ गई है। उस समय जो काम एक वर्ष में हो सकता था, वह अब एक महीने में ही हो सकता है। अणु शक्ति के अस्त्र और दूरगामी राकेटों ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि यदि कोई युद्धोन्मादी राष्ट्र चाहे तो दो दिन में चौथाई दुनिया को तहस-नहस कर सकता है। इस महाविनाशकारी शक्ति का ख्याल रखते हुए जब हम तीसरे महायुद्ध की निकटवर्ती संभावना का समाचार पढ़ते हैं तो हृदय में अकस्मात् एक अभूतपूर्व आतंक का संचार हो जाता है।
संसार की राजनैतिक समस्यायें भी आजकल इतनी अधिक उलझनपूर्ण बन गई हैं कि कौन देश किसका मित्र और किसका शत्रु है, यह कह सकना बड़े-बड़े जानकारों के लिए भी कठिन है। अभी तक संसार के दो विरोधी शिविरों के नेता-अमरीका और रूस माने जाते हैं और इन्हीं दोनों के पास सबसे अधिक अणु-अस्त्र है। अमरीका के सैन्य विशेषज्ञ कई बार कह चुके हैं कि हमारे पास इतनी सामग्री है कि पूरी दुनिया को दो-चार दिन में ही नष्ट कर सकते हैं। लगभग ऐसा ही दावा रूस भी दूसरे शब्दों में करता रहा है, और इसमें संदेह नहीं कि यदि अणु-अस्त्रों का खुलकर मनमाना उपयोग किया गया, तो दुनिया के आधे आदमी दो-चार दिन में और शेष दो-चार महीने में समाप्त हो जायेंगे। इसके बाद जो व्यक्ति किन्हीं छोटे टापुओं या ध्रुव प्रदेश में बच जायें तो उनकी संख्या कुछ हजार या लाख से अधिक नहीं हो सकती।
पिछले कुछ वर्षों में कई बार ऐसे अवसर आ चुके हैं जबकि विश्वयुद्ध की स्थिति बिलकुल निकट आ गई थी। वियतनाम की छोटी-सी लड़ाई के कारण ही अमरीका अपने अणुबमों को एक-दो बार हवाई जहाजों में रखकर प्रयोग करने को तैयार हो चुका है। पर जैसा हम बतला चुके हैं कि इन शस्त्रों का प्रभाव ऐसा सर्वनाशक और भीषण है कि उसका अन्तिम परिणाम सोचते हुए सबका कलेजा काँपता है। इसलिए बार-बार मौका आने पर भी वह किसी-न-किसी तरह टल जाता है।
पर कहावत कि ‘बकरे की माँ कब तक ¹खेर मनायेगी’ ये युद्ध की धमकियाँ और आशंकायें कब तक टलती रहेंगी। जब तक झगड़े के झूठे या सच्चे कारण मौजूद हैं और दिलों के भीतर जहर भरा हुआ है, तब तक किसी भी दिन इस मनुष्य निर्मित ज्वालामुखी फूटने का दृश्य दिखाई पड़ सकता है। यद्यपि विश्वव्यापी घटना के लिए कुछ भी कर सकना एक सामान्य मनुष्य की सीमा से बाहर की बात है और इसलिए उससे चिन्तित होना भी निरर्थक है, तो भी ऐसा समय कब तक आ सकता है इसे जानने की- इस संबंध में कुछ अनुमान करने की उत्सुकता होना अस्वाभाविक नहीं।
इन विचारों के उठने का कारण इसराईल राष्ट्र के एक आत्मदर्शी विद्वान् प्रो.- हरार की भविष्यवाणी है, जो आजकल ही समाचार-पत्रों में छपी है। यों तो ‘भविष्य वक्ताओं’ की हमारे और दूसरे देशों में कमी नहीं है। हमारे यहाँ तो ला¹ो पेशेवर भविष्य बतलाने वाले (ज्योतिषी) मौजूद हैं, फिर भी प्रो. हरार इस श्रेणी से ऊंचे हैं। वे उन लोगों में से हैं जिसके लिए कहा जाता है कि ईश्वर ने उन्हें पूर्वजन्मों के सत्कर्म के फलस्वरूप भविष्यों को देख सकने और उससे कुछ निश्चित निष्कर्ष निकालने की शक्ति प्रदान की है। उनकी अनेक महत्वपूर्ण भविष्यवाणियाँ अभी तक सत्य सिद्ध हो चुकी हैं। प्रो. हरार ने हिटलर की मृत्यु का दिन पहले ही बतला दिया था और दो भूकम्पों तथा एक विनाशकारी समुद्री तूफान की सूचनायें भी पहले से ही दें दी थीं। अब आगामी 4 वर्षों के लिए उन्होंने जो कुछ कहा है, उसका साराँश संक्षेप में यह है-
1. राष्ट्रपति जान्सन अमरीका के 1968 के चुनाव में पराजित होंगे।
2. वियतनाम का युद्ध 1969 में समाप्त हो जायेगा जिसमें अमरीका सफल होगा।
3. सन् 1968 में मिश्र के राष्ट्रपति नासिर की हत्या कर दी जायेगी।
4. 1969 में अरबों तथा इसराईल के बीच युद्ध छिड़ेगा जिसमें दोनों को काफी हानि हो जाने के पश्चात् संधि हो जायेगी।
5. सन 1970 में रूस और चीन के बीच मंगोलिया और साइबेरिया के प्रश्न पर युद्ध होगा जिसमें अणु-अस्त्रों प्रयोग किया जायेगा और जिसका प्रभाव समस्त एशिया पर पड़ेगा।
6. 1970 में ही एक भीषण तूफान आयेगा जिससे सीरिया, लेबनान, जोर्डन और अधिकाँश इसराइल नष्ट हो जायेगा।
प्रो. हरार ने इन भविष्यवाणियों को अनेक साक्षियों के सामने किया है और इनका टेप रिकार्ड भी भर लिया गया है।
प्रो. हरार ने केवल रूस और चीन के युद्ध का जिक्र ही किया है जो सम्भवतः उनके सीमा संबंधी विवाद से संबंधित होगा। यह झगड़ा इस समय भी चल रहा है और एकाध बार मामूली लड़ाई भी हो चुकी है। यह असंभव नहीं कि सन् 1970 तक यह अधिक उग्र रूप धारण कर ले। पर वर्तमान परिस्थिति का विश्लेषण करने से हमको प्रतीत होता है कि यदि यह लड़ाई सन् 1970 में आरंभ भी हो गई, तो भी इसकी वृद्धि और विस्तार धीरे-धीरे ही होगा और 5-7 वर्ष में विश्वव्यापी रूप धारण करके निर्णायक स्थिति में पहुँचेगी। इस संबंध में अमरीका की प्रसिद्ध संत महिला जीन डिक्सन का भविष्य कथन भी जो डेढ़-दो वर्ष पहले प्रकाशित हुआ था, काफी महत्वपूर्ण है। यह महिला भारतवर्ष के बटवारे, महात्मा गाँधी के मारे जाने, कैनेडी की हत्या आदि प्रमुख घटनाओं की ठीक भविष्यवाणी करके लोगों को चकित कर चुकी है। आगामी संकट के विषय में उसकी सम्मति इस प्रकार हैं-
‘कुछ समय बाद चीन रूस पर आक्रमण करेगा। आरंभ में यह युद्ध सीमा-संघर्ष जैसा रहेगा, तुरन्त ही विश्वयुद्ध के रूप में नहीं बदलेगा, पर आगे चलकर यही समस्या बढ़ते-बढ़ते विश्वयुद्ध का रूप धारण कर लेगी, जिसमें रूस और अमरीका मिलकर चीन के विरुद्ध लड़ेंगे। यह विश्वयुद्ध 1980 तक होगा। इसकी आग में सारी दुनिया के लोगों को झुलसना पड़ेगा। यह ऐसा भयंकर होगा कि वर्तमानकालीन साधन-सामग्रियों को ही नष्ट नहीं कर देगा वरन् मनुष्यों के विचारों, मान्यताओं, आदर्शों एवं रहन-सहन को भी बदलकर रख देगा। तब तक नवीन उत्कृष्ट, आध्यात्मिकता पर आधारित सभ्यता का विकास होगा जिसमें विश्वशाँति अक्षुण्ण रहेगी।’
मैक्सिको के एक ज्योतिषी-’अमाया अरथ’ ने भी 1971 तक विश्व का सूत्रपात होने की भविष्यवाणी की है। उसका कहना है कि यह समय इस शताब्दी में सबसे अधिक विनाशकारी होगा। 1971 के प्रथम रविवार को मैक्सिको नगर पूर्णतः नष्ट हो जायेगा।

