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मनुष्य सेवा कराने नहीं, करने आया है-
तुम सब बड़े बनना चाहते हो, उत्तम होना चाहते हो, किन्तु मुझे ही उत्तम गुरु कहकर तुम न तो बड़े बन सकते हो और न उत्तम। उत्तम तो तुम तब बनोगे, जब उन बातों को अपनाओ जिनके कारण मुझे उत्तम मानते हो और कहते हो।
मैं तुमसे सच कहता हूँ-उत्तम संसार में और कोई नहीं, एक वह परमेश्वर ही उत्तम है, जिसने हम सबको बनाया और जिसे प्रसन्न करना ही हमारा ध्येय है।
इसलिये मैं फिर कहता हूँ- तुममें से जो बड़ा बनना चाहता है वह तुम सबका सेवक बने, जो प्रधान होना चाहे वह तुमको प्रधान माने और सेवा करे। क्योंकि मनुष्य के पुत्र ने इसलिये जन्म नहीं लिया कि वह दूसरों से सेवा कराये, बल्कि इसलिये आया है कि वह दूसरों की सेवा-टहल करे, उन्हें सुख दें और बंधन से छुड़ाने का प्रयत्न करे। जो दूसरों को बंधन से छुड़ाने की कोशिश करता है, उसके बंधन खुद खुल जाते हैं।
-बनार्ड शा
अपनों से अपनी बातें-

