औषधियों की गुलामी स्वीकार न करें।
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अप्राकृतिक आहार−विहार अपनाकर ईश्वर प्रदत्त सुदृढ़ शरीर यन्त्र को बीमार करना− बीमारी के कारणों को दूर न करके जीवनी शक्ति को नष्ट करने वाली औषधियों पर निर्भर होना−ऐसा कुचक्र है जिससे रोगों की जड़ कटती नहीं वरन् और भी अधिक मजबूत होती है।
दवाओं के मारक गुण केवल बीमारी को ही नहीं मारते वरन् उनकी दुधारी तलवार जीवनी शक्ति पर भी चलती है जो हमारे आरोग्य और दीर्घजीवन की आधार शिला है।
अव्यवस्थित और अनुपयुक्त रहन−सहन अपनाने से शरीर में जो टूट−फूट होती है उसकी क्षतिपूर्ति का प्रायश्चित्य ही रोग कष्ट के रूप में दिखाई पड़ता है। ऐसे अवसरों पर उचित यही है कि शरीर पर अनावश्यक भार डालना बन्द करें, विश्वास करें और रुग्ण पाचन प्रणाली की थकान मिटाने के लिए उपवास जैसे तरीके अपनायें। इस सीधे मार्ग को छोड़कर तात्कालिक दर्द मिटाने की आवश्यकता पूरी करने के लिए तीव्र दवाओं के प्रयोग की धूम मचा दी जाती है। इससे तत्काल तो कुछ चैन पड़ता है पर वह क्षणिक राहत पीछे बहुत कष्टकारक सिद्ध होती है। रोग की विषाक्तता दवाओं की विषाक्तता के साथ मिलकर रोगी को एक प्रकार से सदा के लिए अपने चंगुल में फंसा लेती है।
इस वस्तुस्थिति को समझने का जिनने भी प्रयत्न किया है उन्होंने दवाओं की निर्भरता से बचने का−औचित्य समझाया है और कहा है−‘‘समयानुसार औषधियों का न्यूनतम उपयोग तो किया जा सकता है, पर उनका उन्मूलन करने के लिए उस भूल को सुधारना चाहिए जिसके कारण रोगों की उत्पत्ति होती है।’’
इंटर नेशनल फेडरेशन आफ हाइजिनिस्ट ने अब से 100 वर्ष पूर्व लिखे हुए डॉ0 रसल टी0 ट्राल के विचार प्रकाशित कराये हैं। लेखक महोदय अपने समय के अति प्रख्यात और प्रामाणिक डॉक्टर थे पर पीछे उन्हें औषधि चिकित्सा से अरुचि हो गई और रोगियों को केवल अपने आहार−विहार में परिवर्तन की शिक्षा देकर उनकी कष्ट निवृत्ति में महत्वपूर्ण सहायता देते रहे। उनने रोगियों को औषधियों का अन्ध भक्त बनाये जाने की तीव्र भर्त्सना की है और कहा है कि जो डॉक्टर लोग के कारण तलाशने और उससे छुटकारे का चिरस्थायी मार्ग नहीं बताता और मात्र औषधि देकर टाल देता है वह रोगी के प्रति अपने नैतिक कर्त्तव्य का पालन नहीं करता।
डॉ0 इरासम्स डार्विन ने लिखा है−‘‘मेरा विश्वास है कि निकट भविष्य में चिकित्सा जगत में एक क्राँति होने वाली है। चिकित्सक अगले दिनों दवाओं का उपयोग अनिवार्य स्थिति में ही करेंगे। उनका मुख्य काम रोगी की उन भूलों का पता लगाना होगा जिनके कारण कि उसे बीमार पड़ना पड़ा। चिकित्सक भूल को सुधारने भर का परामर्श दिया करेंगे और यह बताया करेंगे कि प्रकृति के अनुरूप चलने के अतिरिक्त स्वास्थ्य संकट के निवारण का और कोई उपाय नहीं है।
डॉ0 जे॰ एच॰ टिल्डन माने हुए ऐलोपैथ सर्जन थे। उन्होंने वृद्धावस्था में औषधि चिकित्सा छोड़कर रोगियों को मात्र स्वास्थ्य परामर्श देने का धन्धा बदल लिया था। वे कहते थे हम डॉक्टर लोग बीमारी की दवा तो देते हैं, पर उन बुरी आदतों से नहीं रोकते जो बीमारी के मूल में चट्टान की तरह अड़ी बैठी हैं। जब तक जड़ को न काटा जायगा पत्ते तोड़ने से कोई उपयुक्त समाधान नहीं निकलेगा।
डॉ0 मेलविल कीथ ने अपनी पुस्तक ‘रायल रोड टू हैल्थ’ पुस्तक में बताया है कि दवाओं पर अधिकाधिक निर्भर रहने की प्रवृत्ति लोगों को दिन−दिन जीवनी−शक्ति रहित बनाती जा रही है इसका परिणाम उन्हें अन्ततः चिरस्थायी रुग्णता के रूप में भुगतना पड़ेगा और समय से पूर्व ही मरने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
डॉ0 डबल्यू एन॰ ह्वाइट कहते हैं−‘‘चिकित्सा के नये आधार खड़े किये जाने चाहिए जिनमें रुग्णता के कारणों का निवारण करने का परामर्श एवं दबाव मुख्य होना चाहिए।’’
इंग्लैंड के सम्राट् सप्तम एडवर्ड के शाही चिकित्सा सर फ्रेडरिक ट्रेवर्स का परामर्श था कि जो डॉक्टर दवाओं की निरर्थकता को समझते हुए इलाज करता है असल में वही सच्चा डॉक्टर है।
प्रो0 ईवान्स के अनुसार डॉक्टर का अर्थ है−ज्ञानवान आचार्य। शारीरिक रोगों की कष्ट निवृत्ति के सम्बन्ध में उन्हें चाहिए कि रोगी को उन पापों से मुक्ति दिलाये जिनके कारण वह अब बीमार होकर आया है और भविष्य में फिर इसी प्रकार बीमार पड़ता रहेगा।
डॉ0 मेजान्डी, डॉ0 विलियम हार्वर्ट, डॉ0 फील्डिंग, डॉ0 विलियम ब्राउन आदि अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के चिकित्सा शास्त्री इस बात पर जोर देते हैं कि वर्तमान जादूगरी के आधार पर टिकी हुई चिकित्सा पद्धति में आमूल−चूल सुधार होना चाहिए और अनुभव किया जाना चाहिए कि सामयिक रोग पीड़ा को हटा देना ही चिकित्सा का उद्देश्य नहीं है। सच्चा इलाज वह है जो रोग मुक्त रहने की रीति−नीति को गले में उतार सके, जिसके कारण किसी को बीमार ही न होना पड़े और बीमार पड़ भी जाय तो डाक्टरों का सहारा न लेना पड़े।
प्रो0 एच॰ जी0 कॉक्स ने लिखा है−− “बीमारों की बुद्धिमानी इस बात में है कि वे कम से कम औषधियाँ सेवन करें।”
प्रो0 जे0 एन॰ कारसन का कथन है−− अच्छे होने वाले रोगियों के बारे में हम यह नहीं कह सकते कि वे दवाओं से ही अच्छे हुए हैं। वस्तुतः प्रकृति हर रोग के निवारण में तत्परतापूर्वक लगी रहती है और अधिकतर रोगी उसी की कृपा से अच्छे होते हैं। श्रेय मुफ्त में ही औषधियों को मिल जाता है।
योगी अरविंद तथा श्री माताजी के लेखों का एक संग्रह ‘ए प्रेक्टिकल गाइड टु इन्टीरिगल योग’ पुस्तक रूप में छपा है। उसमें एक स्थान पर श्री अरविन्द ने व्यक्त किया है−ऐलोपैथी के लिए मेरे मन में कोई स्थान नहीं है। डॉक्टर लोगों में आवश्यकता से अधिक मात्रा में औषधियाँ देने की प्रवृत्ति पाई जाती है। रोगों के मूल कारण पर ध्यान देकर रोगी को अपना आचरण सुधारने पर वे जोर नहीं देते। दवाओं के चमत्कारी गुणों का अन्ध−विश्वास उनके मन में भरा रहता है। यही उनकी चिकित्सा की मूलभूत त्रुटि है जिनके कारण उस इलाज से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। शरीर की निरोधात्मक जीवनी−शक्ति घटाने के कारण यह इलाज अन्ततः घाटे का सौदा ही सिद्ध होता है।
महात्मा गाँधी ने लिखा है−थोड़ी भी तबियत खराब होने पर हकीम, डाक्टरों के पास दौड़ने की हमारी आदत हो गई है। हम लोगों का ऐसा विश्वास है कि बिना औषधि प्रयोग के बीमारी अच्छी नहीं हो सकती। यह एक महान भूल है जिसके फलस्वरूप अनेकों नई विपत्तियाँ सामने आ खड़ी होती हैं। रोगों का उपचार तो होना चाहिए, पर उसमें औषधि प्रयोग व्यर्थ है। व्यर्थ ही नहीं कुछ अवस्थाओं में तो वह जीवन और स्वास्थ्य के लिए भयावह भी है।
लंका में आयुर्वेद अनुसन्धानशाला का उद्घाटन करते हुए भारत के प्रधान मन्त्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने कहा था−‘‘मैं बहुत समय से औषधि सेवन से बचता आया हूँ।’’ खासकर विषाक्त औषधियाँ तो लेता ही नहीं और मैं सलाह देता हूँ कि किसी को ऐसी औषधियाँ नहीं लेनी चाहिए। स्वास्थ्य खराब होने पर मैंने औषधियों का सेवन किया तो उनसे लाभ हुआ या नहीं मैं नहीं कह सकता। हो सकता है कि मैं बिना औषधि सेवन के भी अच्छा हो जाता परन्तु औषधि सेवन के पश्चात जो प्रतिक्रिया हुई वह निश्चित रूप से मुझे अच्छी नहीं लगी।
मुझे जीव नाशक−एन्टीबायोटिक औषधियाँ तो बिलकुल पसन्द नहीं। मैं यह तो नहीं कहता कि वे बीमारी से भी अधिक खराब होती है, पर बहुत कुछ वैसी ही होती हैं। आजकल जो चमत्कारिक औषधियों का रिवाज चल पड़ा है वह तो बड़ा ही भयंकर है। कुछ औषधियों ने लाभ अवश्य पहुँचाया है, पर उनका भी अन्धाधुन्ध प्रयोग समाज की अपार क्षति कर चुका है। मैं चाहता हूँ कि अवाँछनीय औषधि व्यवसाय को रोकने के लिए कुछ किया जाय। मुझे यह बिलकुल पसन्द नहीं कि मानव समाज की पीड़ाएँ धनोपार्जन का साधन बनाई जायँ।
डॉ0 जूल्स दुवोस ने अपनी पुस्तक ‘मिराज आफ हैल्थ’ में लिखा है− उतावली में कुछ भी दवा लेने की अपेक्षा यह अच्छा है कि प्रकृति द्वारा रोग निवारण की प्रतीक्षा में बहुत समय तक बिना औषधि सेवन के ही रहा जाय।
फार्नहम हास्पिटल, सारे इंग्लैंड के मूर्धन्य चिकित्सक डॉ0 जान टाड ने उस देश के प्रख्यात पत्र डेली एक्सप्रेस में एक लम्बा लेख छपाकर चिकित्सक वर्ग से अनुरोध किया था कि वे रोग कीटाणुओं का स्वरूप और उनके मारक रसायन निर्धारित करने के दायरे से आगे बढ़ें और दूरगामी दृष्टि अपनाकर यह देखें कि व्यक्ति क्यों रोगी पड़ा और उस कारण के निवारण के लिए उसे अपने ढर्रे में क्या परिवर्तन करना पड़ेगा? जब तक रोगी और चिकित्सक जीवनचर्या में परिवर्तन करने की आवश्यकता अनुभव न करेंगे तब तक रोगों के उन्मूलन की दिशा में कोई प्रगति न हो सकेगी।
एक और अनुभवी स्वास्थ्य शास्त्री डॉक्टर हेरकल कृत्सर का लेख “हैल्थ एण्ड फ्रीडम” पत्रिका में छपा था जिसमें उनने लिखा है−बीमारियाँ सिर्फ इस बात का प्रमाण हैं कि शरीर गत जीवनी−शक्ति विजातीय द्रव्य को बाहर निकालने में जुटी हुई हैं। यह खतरे की नहीं भविष्य में अच्छी स्थिति आने की सूचना है। खतरनाक तो वे आदत हैं जो विषाक्त तत्वों को शरीर में उत्पन्न और जमा करती हैं। ध्यान उस गहराई पर दिया जाना चाहिए अन्यथा सामयिक लीपा−पोती से कोई स्थिर समाधान न निकलेगा।
न्यूयार्क कालेज के प्रो0 अलेक्जेण्डर स्टीवन्स और इंग्लैंड के शरीर शास्त्री डॉ. जानमेसन्ट दोनों ही इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि वर्तमान चिकित्सा पद्धति तक सीमित रहकर केवल रोगों के रूप, स्थान एवं कष्ट में हेरा−फेरी की जा सकती है। रोगों के उन्मूलन में कोई सहायता नहीं मिल सकती है। मेडीकल प्रेक्टिस एण्ड क्राइम’ ग्रन्थ में अँधेरे में ढेले फेंकते रहने वाले औषधि विज्ञान को अपराधों की श्रेणी में रखने का प्रयत्न किया गया है।
हमें दवाओं का अन्ध−भक्त, अन्ध−विश्वासी नहीं बनना चाहिए। विशेषतया ऐलोपैथिक दवाएँ तत्काल चमत्कार दिखाकर पीछे रोगी के शरीर को सदा के लिए विषाक्त बना दे उस खतरे से तो बचना ही चाहिए। रोगों का मूल कारण आहार−विहार की असावधानी है, उसे जब तक नहीं सुधारा जायगा चिरस्थायी स्वास्थ्य की प्राप्ति हो ही नहीं सकेगी।

