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Magazine - Year 1976 - Version 2

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मनुष्य की प्राण ऊर्जा और उसका अभिवर्धन

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मनुष्य एक हँसने, बोलने, सोचने और निर्णय निर्धारण करने वाला कल−कारखाना है। किसी भी कारखाने को चलाने के लिए ‘शक्ति’ की जरूरत पड़ती है। इसे तेल, भाप, कोयला, बिजली आदि के सहारे ताप रूप में प्राप्त किया जाता है। प्राणियों द्वारा धकेले जाने पर भी यह शक्ति प्राप्त होती है। शरीर का कार−खाना भी शक्ति चाहता है। इसके लिए उसे ईश्वर का दिया हुआ स्वसंचालित यन्त्र प्राप्त है’ अन्न, जल और वायु के ईंधन से यह भट्टी गरम भर होती है, इससे आगे का सब कुछ अपने आप चलता है। पेट में पाचक रासायनिक द्रव्य अन्न से नहीं अपने परम्परागत शक्ति स्रोतों से उत्पन्न होते हैं। आहार तो उन स्रोतों को धकेलने वाली गर्मी भर उत्पन्न करते हैं।

यों चेतना का केन्द्र मस्तिष्क माना गया है और उसका पोषक रक्त संस्थान हृदय कहा गया है। हृदय को सामग्री पेट से मिलती है। पेट को भरना मुँह का काम है। मुँह के लिए साधन हाथ जुटाते हैं। यह चक्र तो चलता ही है, पर असल में पूरा शरीर ही शक्ति भण्डार है। यह शक्ति असामान्य विद्युत स्तर की है। असामान्य इस अर्थ में है कि वह भौतिक बिजली की तरह अन्धी दौड़ नहीं लगाती वरन् सामने वाले को देखकर ही अपनी गतिविधियाँ फैलाती, सिकोड़ती है।

मानवी विद्युत हर व्यक्ति की अपनी विशिष्ट संपत्ति है। वह इसी के आधार पर ऐसे अनुदान देता है− ऐसे आदान−प्रदान करता है जो पैसे या किसी वस्तु के आधार पर उपलब्ध नहीं हो सकते। एक व्यक्ति से दूसरा प्रभाव ग्रहण करता है यह तथ्य सर्वविदित है। संगति की महिमा गाई गई है। कुसंग के दुष्परिणाम और सत्संग के सत्परिणामों को सिद्ध करने वाले उदाहरण हर जगह पाये जाते हैं। यह प्रभाव मात्र वार्तालाप व्यवहार, लोभ या दबाव से उतना नहीं पड़ता जितना मनुष्य के शरीर में रहने वाली बिजली के आदान−प्रदान से सम्भव होता है।

ताप और बिजली का गुण है कि जहाँ अनुकूलता होती है वह वहाँ अपना विस्तार करती और प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती है। प्राणवान शक्तिशाली व्यक्तित्व अपने से दुर्बलों को प्रभावित करते हैं। यों दुर्बल भी अपनी न्यूनता के कारण समर्थों में सहज करुणा उत्पन्न करते हैं और उन्हें कुछ देने के लिए विवश करते हैं। बच्चे को देखकर माता की छाती से दूध उतरने लगता है− मन हुलसने लगता है इस प्रकार शक्तिवान अपने से दुर्बलों को अनुदान देकर घाटे में नहीं रहते। उदारताजन्य आत्म−सन्तोष से उनकी क्षतिपूर्ति भी हो जाती है। दूध पिलाने में माता को प्रत्यक्षतया घाटा ही है, पर वात्सल्यजन्य तृप्ति से उसकी भी भावनात्मक पूर्ति हो जाती है।

मनुष्य को एक अच्छा खासा चुम्बक कहें तो कुछ अत्युक्ति न होगी। चुम्बक का कार्य है आकर्षण। वह अपनी कला द्वारा अन्य लोहे के पदार्थों को आकर्षित करता है। उनको अपना जैसा बनाने का प्रयत्न करता है। एक और विशेषता चुम्बक की है। यह यदि टुकड़ों−टुकड़ों में भी विभक्त कर दिया जाये तो हर टुकड़े की वही विशेषता बनी रहेगी। एक टुकड़े को एक धागे में बाँधकर यदि अधर में लटकाया जाय तो इसके दोनों सिरे क्रमशः उत्तर−दक्षिण की तरफ ही रहेंगे। चाहे जैसी परिस्थिति आ जाय अपनी दिशा नहीं बदलेंगे। स्थिरता का सहज गुण चुम्बक में है। इसीलिए जलयानों या वायुयानों में ‘कम्पास’ के सहारे ही दिशा−ज्ञान का बोध होता है।

यह सारे लक्षण मनुष्य में भी पाये जाते हैं। यदि मन की प्रवृत्तियाँ सही ढंग से कार्य कर रही हों तो एक महान व्यक्ति बना जा सकता है। ठीक चुम्बक की तरह की सारी विशेषताएँ विकसित की जा सकती है। महान व्यक्तियों में इतना आकर्षण होता है कि वे जिस स्थान पर खड़े हो जाते हैं लोग अपने आप उनके चारों ओर एकत्रित हो जाते हैं।

चुम्बक की दूसरी विशेषता “एक रसता” की है। वह चाहे कितना विखंडित क्यों न हो जाय उसकी आकर्षण शक्ति कम नहीं होती। महान मनुष्य ऐसे ही होते हैं। वे बाह्य रूप से चाहे जितने छोटे हो जायें, परन्तु उनकी महानता में कोई अन्तर नहीं आता है। उनका व्यक्तित्व खण्डित नहीं होता है। वे अनेकों लोगों से एक साथ सम्बन्ध रखते हैं, परन्तु उनके व्यक्तित्व में अपने−पराये का−पक्षपात का कोई अन्तर नहीं आता। एक सूर्य अनेक घड़ों के जल में एक रूप ही दिखाई देता है।

चुम्बक की तीसरी विशेषता है दिशा के प्रति स्थिरता। इसके द्वारा सदैव ही उत्तर एवं दक्षिण दिशा का ज्ञान होता रहेगा, आप चाहे जहाँ चले जायें−आकाश में या समुद्र में कम्पास आपको दिशा ज्ञान अवश्य ही करायेगा। वही स्थिति विकसित व्यक्ति की भी होती है। यदि सद्प्रवृत्तियाँ जगा ली गई हैं, भावना एवं व्यक्तित्व का परिष्कार कर लिया गया है तथा उद्देश्य को गम्भीरता से गृहण करने की शक्ति पैदा कर ली गई है तो यह निश्चित है कि मनुष्य अपनी दिशा से कभी हिल नहीं सकता है। दूसरों को सही प्रेरणा प्रदान करने का काम भी तो चुम्बक के गुण की तरह ही है।

बड़ी से बड़ी विशेषताओं एवं महान गुणों से युक्त मनुष्य भी पतित क्रियाओं एवं विचारणाओं के अपनाने से गर्त में गिर जाता है और अपनी समस्त विशेषताएँ धीरे−धीरे खो देता है। ठीक इसी तरह जैसे चुम्बक को बार−बार पटकने तथा ऊपर−नीचे करने से उसकी आकर्षण शक्ति लुप्त हो जाती है, महान पुरुषों की भी पुण्य की पूँजी एवं प्रभाव उनके पतन के गर्त में गिरने में नष्ट हो जाते हैं।

धरती की चुम्बकीय शक्ति की तरह मनुष्य में भी एक सहज आकर्षण शक्ति विद्यमान है, उसका प्रयोग करके समर्थता एवं साधन सम्पन्नता प्राप्त की जा सकती है। मनुष्य यदि अपने चुम्बकत्व का प्रयोग करे तो उसे भी वैसे ही पुराण−वर्णित चमत्कार प्रस्तुत करने का अधिकार मिल सकता है। यदि तप, साधना के द्वारा आत्मबल को बढ़ा लिया जाय तो हम आज से हजारों वर्ष पहले घटित घटनाओं को भी यथार्थ रूप से आकाश मण्डल में सुन या देख सकते हैं। विज्ञान से तो अब यह सिद्ध ही हो चुका है कि जो भी ध्वनियाँ निसृत होती हैं वे कभी भी नष्ट नहीं होतीं।

अपनी इस पृथ्वी के चतुर्दिक् एक चुम्बक क्षेत्र व्याप्त है, उसी के सहारे वह समस्त ब्रह्माण्ड में फैली हुई तमाम आवश्यक विशेषताओं को इकट्ठी करती रहती है, यदि इस स्रोत से उसे यह अनुदान न प्राप्त होता तो उसका अक्षय भण्डार एक दिन अवश्य समाप्त हो जाता और साधन सम्पन्न कही जाने वाली धरती विपन्न एवं दीन−हीन की स्थिति में पहुँच जाती।

मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमता में वह चुम्बकत्व विद्यमान है, जिसके द्वारा वह असम्भाव्य कार्यों को भी कर सकता है। आँखों से न देख पाने वाले स्थानों की वर्तमान में घटित होने वाली घटनाओं का सचित्र वर्णन कर सकता है। एक स्थान से दूसरे स्थान को परस्पर संवाद आदान−प्रदान कर सकता है। इसके अतिरिक्त यदि हमने तप, साधना द्वारा प्रेरक क्षमता अर्जित कर ली है तो किसी दूसरे को प्रेरित कर लाभ पहुँचाया जा सकता है।

जड़ अणुओं की गति एक प्रकार की विद्युत उत्पन्न करती है, उसमें जब चेतन सत्ता का समावेश होता है तो जीवन का−जीवधारियों का आविर्भाव होता है। ध्रुवों के क्षेत्र में चुम्बकीय तूफान उठते रहते हैं, जिनका प्रकाश ‘अरोरा बोरीलिस’, तेजोवलय के रूप में छाया रहता है। इसे पृथ्वी के साथ अन्य ग्रहों की सूक्ष्म−हलचलों का मिलन स्पन्दन कह सकते हैं। यही है वह पृथ्वी का ग्रहों के साथ प्रणय−परिणय जिसके फलस्वरूप कुन्ती के पाँच पुत्रों की तरह पाँचकी विविध−विधि हलचलें जन्म लेती हैं और उनके क्रियाकलाप एक से एक बढ़कर अद्भुत और शक्तिशाली बने हुए सामने आते रहते हैं। समुद्र का खारा जल जब धातु विनिर्मित नौकाओं तथा जलयानों से टकराता है तो उससे विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं। नौका विज्ञानी इस अनायास होते रहने वाले विद्युत उत्पादन से परिचित रहते हैं और उसकी हानिकारक लाभदायक प्रतिक्रिया से सतर्क रहते हैं।

ठीक इसी प्रकार शरीरगत जीवाणु भी ईथर एवं वायुमण्डल में भरे विद्युत प्रवाह से टकराते रहते हैं और विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जीव कोषों में उन धातुओं तथा रसायनों की समुचित मात्रा रहती है जो आघातों से उत्तेजित होकर विद्युत प्रवाह उत्पन्न कर सकें। यही कारण है कि हर मनुष्य में गर्मी ही नहीं रहती वरन् विद्युत प्रवाह की अनेक स्तरों की धारायें बहती रहती हैं। इन्हें यन्त्रों द्वारा भी भली प्रकार रखा जाना जा सकता है।

मानवी चुम्बक अन्तरिक्ष से बरसने वाले अनेक भले−बुरे अनुदानों को अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप स्वीकार−अस्वीकार करता है। वह जैसा कुछ स्वयं है उसी का चुम्बकत्व उसे इस विश्व ब्रह्माण्ड में अपनी जैसी सूक्ष्म धारा प्रवाह से अनायास ही संपन्न सज्जित करता रहता है।

डॉ. एच. एस. वर ने अपने साथियों सहित प्राणियों की जिस जैविक विद्युत के शास्त्र की संरचना की है उसमें प्राणिज विद्युत का आधार एवं क्रियाकलाप भौतिक बिजली से भिन्न हैं। वे प्राणिज विद्युत में इच्छा और बुद्धि का सम्मिश्रण भी मानते हैं भले ही वह कितना ही झीना क्यों न हो। इसी प्रवाह के कारण प्राणिज विद्युत अपने−अपने क्षेत्र में विशेष परिस्थितियों एवं साधनों की संरचना करती है। प्राण चुम्बकत्व पदार्थ में से अपने उपयोगी भाग को खींचता है− उसे अपने ढाँचे में ढालता है और इस योग्य बनाता है कि चेतना के स्वर में अपना ताल बजा सके। किस प्राणी के डिम्ब से किस आकृति−प्रकृति का जीव उत्पन्न हो इसका निर्धारण मात्र रासायनिक संरचना के आधार पर नहीं हो जाता वरन् यह निर्धारण रज और शुक्र कीटों के अन्दर भरी हुई चेतना के द्वारा होता है। इसी चुम्बकत्व से भ्रूण में विशिष्ट स्तर के प्राणियों की आकृति एवं प्रकृति ढलना शुरू हो जाती है। यदि ऐसा न होता तो संसार में पाये जाने वाले समस्त प्राणी प्रायः एक ही जैसी आकृति−प्रकृति के उत्पन्न होते क्योंकि अणुओं का स्तर प्रायः एक ही प्रकार का है। उनमें जो रासायनिक अन्तर है उसके आधार पर कोटि−कोटि वर्ग के प्राणी उत्पन्न होने और उनकी वंश परम्परा चलते रहने की गुंजाइश नहीं है अधिक से अधिक इतना हो सकता था कि कुछ थोड़ी सी−कुछ थोड़े से अन्तर की जीव जातियाँ इस संसार में दिखाई पड़तीं। वंश परम्परा और जीव−विज्ञान का जो स्वरूप सामने है उसमें प्राणि चुम्बकत्व की अपनी विशिष्ट भूमिका है।

कोशिकाओं की आन्तरिक संरचना में एक महत्वपूर्ण आधार हैं−माईटो, कोन्ड्रिया। इसे दूसरे शब्दों में कोशिका का पावर हाउस−विद्युत भण्डार कह सकते हैं। भोजन, रक्त, माँस, अस्थि आदि से आगे बढ़ते बढ़ते अन्ततः इसी संस्थान में जाकर ऊर्जा का रूप होता है। यह ऊर्जा ही कोशिका को सक्रिय रखती है और उनकी सामूहिक सक्रियता जीव संचालक के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इस ऊर्जा को लघुत्तम प्राणांश कह सकते हैं। काय−कलेवर में इसका एकत्रीकरण महाप्राण कहलाता है और उसी की ब्रह्माण्डव्यापी चेतना विश्व प्राण या विराट् प्राण के नाम से जानी जाती है। प्राणाँश की लघुत्तम ऊर्जा इकाई कोशिका के अन्तर्गत ठीक उसी रूप में विद्यमान है जिसमें कि विराट् प्राण गतिशील है। बिन्दु−सिन्धु जैसा अन्तर इन दोनों के बीच रहते हुए भी वस्तुतः वे दोनों अन्योन्याश्रित हैं। कोशिका के अन्तर्गत प्राणांश के घटक परस्पर संयुक्त न हों तो महाप्राण का अस्तित्व न बने। इसी प्रकार यदि विराट् प्राण की सत्ता न हो तो भोजन पाचन आदि का आधार न बने और वह लघु प्राण जैसी विद्युतधारा का संचार भी सम्भव न हो।

इसी मानवी विद्युत का ही यह प्रभाव है जो एक दूसरे को आकर्षित करता है। उभरती आयु में यह बिजली कार्य आकर्षण की भूमिका बनती है, पर यदि उसका सदुपयोग किया जाय तो बहुमुखी प्रतिभा, ओजस्विता, प्रभावशीलता के रूप में विकसित होकर कितने ही महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। ऊर्ध्वरेता, संयमी, ब्रह्मचारी लोग अपने ओजस् को मस्तिष्क में केन्द्रित करके उसे ब्रह्मवर्चस के रूप में परिणत करते हैं। विद्वान दार्शनिक, वैज्ञानिक, नेता, वक्ता, योद्धा, योगी, तपस्वी जैसी विशेषताओं से सम्पन्न व्यक्तियों के संबंध में यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने ओजस् का प्राण तत्व का अभिवर्धन, नियन्त्रण एवं सदुपयोग किया है। यों यह शक्ति किन्हीं−किन्हीं में अनायास भी उभर पड़ती देखी गई है और उसके द्वारा उन्हें कुछ अद्भुत काम करते भी पाया गया है।

जर्मनी का अधिनायक हिटलर जब रुग्ण होता तो उसे सुयोग्य डाक्टरों की अपेक्षा एक ‘नीम हकीम’ क्रिस्टन का सहारा लेना पड़ता। उसकी उंगलियों में जादू था। दवादारु वह कम करता था, हाथ का स्पर्श करके दर्द को भगाने की उसको जादुई क्षमता प्राप्त थी। सन् 1898 में वह इस्टोनिया में जन्मा प्रथम विश्व युद्ध के बाद वह फिनलेण्ड नागरिक माना, पीछे उसने मालिश करके रोगोपचार करने की कला सीखी अपने कार्य में उसका कौशल इतना बढ़ा कि उसे जादुई चिकित्सक कहा जाने लगा। हिटलर ही नहीं, उसके जिगरी दोस्त हिमसर तक को उसने समय−समय पर अपनी चिकित्सा से चमत्कृत किया और भयंकर रुग्णता के पंजे से छुड़ाया। क्रिस्टन ने अपने परिचय और प्रभाव का उपयोग करके हिटलर के मृत्युपाश में जकड़े हुए लगभग एक लाख यहूदियों का छुटकारा कराया।

योग−साधना का उद्देश्य इस चेतना विद्युत शक्ति का अभिवर्धन करना भी है। इसे मनोबल, प्राणबल और आत्मबल भी कहते हैं। संकल्प शक्ति और इच्छा शक्ति के रूप में इसी के चमत्कार देखे जाते हैं।

अध्यात्म शास्त्र में प्राण−विद्या का एक स्वतन्त्र प्रकरण एवं विधान है इसके आधार पर साधनारत होकर मनुष्य इस प्राण विद्युत की इतनी अधिक मात्रा अपने में संग्रह कर सकता है कि उस आधार पर अपना ही नहीं अन्य अनेकों का भी उपकार, उद्धार कर सके।

योग−साधना इस मानवी विद्युत भण्डार को असाधारण रूप से उत्तेजित करती और उभारती है। यदि सही ढंग से साधना की जाय तो मनुष्य प्राणवान और ओजस्वी बनता है। उपार्जित प्राण विद्युत की ऊर्जा के सहारे स्वयं कितनी ही अद्भुत सफलताएँ प्राप्त करता है और दूसरों को सहारा देकर ऊँचा उठाता है।

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