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Magazine - Year 1976 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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विचार मात्र कल्पना नहीं शक्ति के पुँज हैं।

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प्रो0 एलीशाग्रे ने अपनी पुस्तक “मिराकल्स आफ नेचर’ में लिखा है−प्रकाश की तुलना में विचार विद्युत की प्रवाह गति कहीं अधिक है। अभी यन्त्रों के द्वारा उसे नापा और देखा नहीं जा सका तो भी यह एक तथ्य है कि विचार मात्र कल्पनाओं का उभार न होकर एक शक्तिशाली पदार्थ हैं। उसकी गति तथा क्षमता ज्ञात भौतिक शक्तियों में सबसे अधिक है।

लुइस क्राउन ने लिखा है− ताप, विद्युत आदि की ऊर्जा केवल भौतिक पदार्थों को ही नरम−गरम करती और उनमें परिवर्तित कर सकती है, पर विचार विद्युत न केवल व्यक्ति विशेष को वरन् समूचे वातावरण को ही आश्चर्यजनक मात्रा में परिवर्तित कर सकती है। चेतना को प्रभावित कर सकने वाली क्षमताओं में विचारों का ही प्रथम स्थान है वे अपने उद्गम स्थल को−विचारक को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं और फिर अपने समीपवर्ती क्षेत्र पर असर डालते हुए असीम दूरी तक बढ़ते चले जाते है। प्रेरक व्यक्तित्व की प्रतिभा के अनुरूप उनकी सामर्थ्य का स्तर रहता है। तदनुसार अन्यान्य व्यक्तियों और प्राणियों पर उनका प्रभाव पड़ता है।

विचारधारा को सही रखकर हम सुखी और समुन्नत जीवन जी सकते हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रह सकते हैं। किन्तु यदि मस्तिष्कीय क्षेत्र को अवांछनीय कूड़े−करकट से भर लिया गया तो उसकी सड़ाँद से नस−तस विषाक्त हो जायगी। शरीर सन्तुलन गड़बड़ा जायगा और साधारण जीवन की दैनिक समस्याओं का सही हल ढूँढ़ सकना भी सम्भव न रहेगा।

जीवन एक सुनियोजित सुरुचिपूर्ण, सुरम्य वाद्य यन्त्र है। इसे बजाने की कला जिसे आती है वे उसकी स्वर लहरी का आनन्द स्वयं लेते हैं, अपनी कलाकारिता की छाप छोड़ते हैं और दूसरों पर उसका उत्साहवर्धक प्रभाव डालते हैं। किन्तु जिन्हें बजाना नहीं आता वे कर्ण कटु कर्कशता उत्पन्न करते हैं, स्वयं निन्दित होते हैं और उस बहुमूल्य साज को कुसमय ही तोड़−मरोड़कर रख देते हैं।

जीवन एक बहुमूल्य मोटर है जो इसे चलाना जानते हैं वे सुखपूर्वक लम्बी यात्रा करते हैं और अभीष्ट लक्ष्य तक जल्दी ही जा पहुँचते हैं परन्तु जिन्हें उसे चलाना नहीं आता वे अनाड़ी ड्राइवर किसी पेड़ से टकराकर−खड्ड में गिराकर उस कीमती मशीन का कचूमर निकाल देते हैं और अपने हाथ−पैर तोड़ लेते हैं। अस्वस्थ शरीर, उद्विग्न मन, पारिवारिक कलह, आर्थिक असन्तुलन, शत्रुओं के उपद्रव, लोकापवाद, अकाल मरण एवं असफलताजन्य शोक−सन्ताप इस बात के चिह्न हैं कि जीवन रूपी मोटर के कलपुर्जे किसी दुर्घटना में टूट−फूट गये हैं। अनाड़ी संचालक ही इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है अन्यथा जीवन, जीवधारी के लिए हर घड़ी आनन्द और उल्लास देते रहने वाला ईश्वरीय वरदान ही है। इसे अभिशाप में बदल देने का दोष उसके संचालक को ही दिया जा सकता है जिसने उसके रख−रखाव में और चलाने में सावधानी नहीं बरती।

शरीर के कलपुर्जे यों अपने आप अपना काम करते दिखाई पड़ते हैं पर गहराई में देखने पर प्रतीत होता है कि उनका संचालन प्राण चेतना द्वारा होता है। अव्यक्त मन, शरीर की समस्त गतिविधियों का संचालक और नियामक है। प्राण के शरीर से निकल जाने पर काया के समस्त अवयव एवं पदार्थ यथावत् बने रहने पर भी स्तब्ध हो जाते हैं और सड़ने लगते हैं। हाथ−पैर चलाने, सोचने, बोलने आदि की क्रियाएँ तो चेतन मन द्वारा संचालित होती हैं, पर रक्त−संचार, श्वास−प्रश्वास, आकुंचन−प्रकुंचन, याचना निस्सरण आदि काम अचेतन की प्रेरणा से अनायास होते दीखते हैं, पर उनके पीछे भी अव्यक्त मन की स्वसंचालित प्रक्रिया ही काम करती रहती है। एक शब्द में शरीर की स्थिति और प्रगति पर मन का पूर्ण नियन्त्रण रहे तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।

यों आहार−विहार का भी स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है और एक हदतक अन्न, जल, वायु, श्रम, विश्राम, आदि भी− स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। पर सबसे अधिक प्रभाव मानसिक स्थिति का पड़ता है। उद्विग्न मनःस्थिति बनी रहने पर किसी सुसंयत रहन−सहन वाले व्यक्ति का भी निरोग रह सकना सम्भव नहीं, जबकि अस्त−व्यस्त, रीति−नीति अपनाये रहने पर भी प्रसन्न चित्त व्यक्ति अपने शरीर की कामचलाऊ स्थिति का बनाये रहते हैं। शरीर को निरोग और सुदृढ़ बनाये रहने में सबसे बड़ी भूमिका सन्तुलित, सन्तुष्ट एवं उल्लसित मनःस्थिति की होती है। बीमारी का और कोई कारण न होने पर भी मनोविकारग्रस्त व्यक्ति स्वयं ही अपने आरोग्य का हनन कर लेते हैं। तलवार का घाव खाकर शरीर अपनी क्षतिपूर्ति देर−सवेर में कर लेता है, पर मानसिक आघातों की पटक खाकर कोई कठिनाई से ही अपने पैरों आप खड़ा हो पाता है।

मनःक्षेत्र में उतार−चढ़ाव निरन्तर आते रहते हैं। वस्तु, व्यक्ति और परिस्थिति की दशा एक जैसी नहीं रहती है उनमें प्रकृति चक्र से परिवर्तन होते रहते हैं। इन परिवर्तनों का क्या प्रभाव ग्रहण करें? क्या न करें? घटना−क्रम पर किस दृष्टि से सोचें, किससे न सोचें जिन्हें यह सब नहीं आता वे अवाँछनीय निष्कर्ष निकालते हैं और अनुपयुक्त प्रभाव के दल−दल में जा फँसते हैं। ऐसे ही लोग तनिक−तनिक से उतार−चढ़ावों में अपना सन्तुलन गँवा बैठते हैं। बेतरह रोते−कलपते हैं−क्रोध आवेश में आकर मन्द अथवा उग्र स्तर की हत्या, आत्म−हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं।

भाव−तरंगों को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं− एक सृजनात्मक और दूसरी ध्वंसात्मक। सृजनात्मक भावनाओं में प्रसन्नताओं सन्तुष्टि, आशा, हिम्मत, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा आदि की गणना की जा सकती है। ध्वंसात्मक में क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, निराशा, खीज आदि को गिना जायगा। सृजनात्मक भावनाएँ शरीर पर उत्साहवर्धक प्रभाव डालती हैं। इसके विपरीत ध्वंसात्मक चिन्तन से उद्विग्न मस्तिष्क अपनी कार्य क्षमता गँवा बैठता है− किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उबरने की राह पाने में अपंग, असमर्थ बन जाता है। उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते हैं जिन्हें अपनाने पर नई उलझनें पैदा होती हैं और दल−दल में अधिक गहरे पाँव फँसते जाते हैं।

विपत्ति अकेली नहीं आती−वह अपने साथ कठिनाइयों का पूरा परिवार लेकर चलती है। इस मान्यता में बहुत कुछ तथ्य इस आधार पर रहता है कि अवांछनीय मनोदशा में बौखलाया हुआ मनुष्य भूल पर भूल करता जाता है, साथ ही नये−नये संकटों को आमन्त्रित करके अपने सिर पर लादता जाता है। शरीर पर तो इस उद्विग्न मनःस्थिति का दुष्प्रभाव पड़ना तो पूर्णतया निश्चित है।

प्रसन्नता की मनःस्थिति में हमारी आँखें चमकने लगती हैं, चेहरा गुलाबी हो जाता है, गालों पर पुलकन उभरी हुई दिखाई पड़ती है और समूचा चेहरा नये सौन्दर्य से सुसज्जित प्रतीत होता है। इस स्थिति का व्यक्ति सहज ही आकर्षक प्रतीत होता है। सुखानुभूति में जो तृप्ति और सन्तुष्टि होती है वह किसी भी व्यक्ति को प्रभावशाली बनाती है, उसकी ओर लोग सहज ही खिंचते चले जाते हैं।

इसके विपरीत क्रोध के आवेश में मनुष्य कांपता हुआ, हांफता हुआ चीखता हुआ− डरावना प्रतीत होता है। उसके होठ सूख जाते हैं और वाणी से ऐसे शब्द निकलते हैं जिनसे न कुछ लाभ होता है न प्रयोजन की सिद्धि। उलटे आरोप, अपमान का ऐसा विद्रूप वातावरण बन जाता है, जिससे क्रोध के मूलकारण की अपेक्षा कहीं अधिक क्षति उठानी पड़ती है। एक घण्टा क्रोध की स्थिति में रहने पर एक दिन के तेज बुखार में रहने से अधिक शक्ति नष्ट होती है। क्रोध के उफान में शरीर का स्वाभाविक संचालन बेतरह लड़खड़ा जाता है। पाचन, मल विसर्जन, निद्रा, भूख, प्यास आदि समस्त सहज नित्य कर्म अस्त−व्यस्त हो जाते हैं। रक्त में इतने विषैले तत्व घुल जाते हैं जितने कि हलके किस्म का विष खाने पर देखे जाते हैं।

ईर्ष्या, घृणा और प्रतिशोध की भावनाएँ क्रोध का मन्द किन्तु स्थिरता वाला रूप है। क्रोध ज्वार की तरह आता है और थक जाने पर भाटे की तरह उतर जाता है किन्तु प्रतिशोध उस आग की तरह है जो धधकती तो नहीं, पर सुलगती रहती है और धीरे−धीरे मोटे शहतीर को भी भस्मसात करके छोड़ती है। जिसके प्रति द्वेष−भाव मन में सँजोया गया था उसे कितनी हानि पहुँचाई जा सकी और उस हानि से उसका कितना अहित हुआ, यह रहता तो कठिन है, पर इतना निश्चित है कि दुर्भावनाएँ अपने में भरे रहने वाला व्यक्ति अपने आप का शारीरिक और मानसिक अहित बहुत बड़ी मात्रा में कर चुका होता है। तेजाब जहाँ रखा जाता है उस जगह को गलाता है− आग जहाँ रहती है उस स्थान को पहले जलाकर तब आगे बढ़ती है। घृणा एवं ईर्ष्या का प्रतिफल भी ऐसा ही होता है।

पागल कुत्ते के काटने से जो असर होता है वही विषैला प्रभाव किसी के क्रोध आवेश में भरकर काट लेने पर हो सकता है, कारण कि क्रोधान्ध मनुष्य की शारीरिक स्थिति लगभग पागल कुत्ते जैसी ही हो जाती है।

चिन्ता, भय, निराशा जैसे अवसाद जीवन रस के प्रवाह में असाधारण व्यवधान उपस्थित करते हैं। रक्त संचार में शिथिलता आ जाती है। माँस−पेशियों का सिकुड़ना, फैलना अपने स्वाभाविक क्रम की अपेक्षा धीरे होता है−पूरी साँस ग्रहण करना और छोड़ना भी नहीं बन पड़ता। अशक्तता बेतरह आ घेरती है। निराश व्यक्ति के चेहरे पर छाई हुई पीलेपन की मुर्दनी देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बहुत कुछ गँवा चुका है। कोषाणु अपनी गतिविधियाँ शिथिल कर देते हैं फलतः शरीर का हर कलपुर्जा अशक्त दिखाई पड़ता है, लगता है उससे दैनिक निर्वाह का क्रम कठिनाई से ही आगे चलाया जा रहा है। ऐसी दशा में किसी बड़े पुरुषार्थ की आशा ही क्या की जाय? और कठिनाई से पार निकलने के लिए जिन दुस्साहस भरे प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ती है उनकी सम्भावना क्यों कर बन पड़े?

मानसिक वृत्तियों का अवाँछनीय उतार−चढ़ाव किसी को निस्तेज, अशक्त एवं रुग्ण बना सकता है। अवसादग्रस्त मनुष्य अपंग स्थिति में पड़ा हुआ उपहासास्पद बनकर रहेगा। यदि वह उत्तेजनाग्रस्त रहता है तो विक्षिप्त हो सकता है। मनः शास्त्री क्रेन्स डेल मोरे ने स्नायु शूल, अजीर्ण, गठिया, दमा, जुकाम, स्नायु दुर्बलता, गुल्म, हिस्टीरिया, पक्षाघात जैसे अनेक रोगों का कारण उद्विग्न मनःस्थिति को सिद्ध किया है और औषधि उपचार से निराश रोगियों को उनकी मनःस्थिति में परिवर्तन करके नव−जीवन प्रदान किया है। वे अपने दीर्घकालीन प्रयोग परीक्षाओं के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि तीन चौथाई शारीरिक बीमारियाँ रोगी की मानसिक अस्त−व्यस्तता के कारण उत्पन्न होती हैं। सही कारण न जानने और सही उपचार न ढूँढ़ने के कारण वे प्रायः अनेक चिकित्सकों की शरण में जाकर भी निराश रहते हैं। अच्छा होता कि कोई उनके मनः क्षेत्र को टटोलता और वहाँ बँधी हुई गाँठों को खोलकर उन्हें आरोग्य प्राप्त करने का सहज तरीका बताता।

धार्मिक जीवनयापन का स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत महत्व है क्योंकि उस प्रकार का विश्वास रखने वाले व्यक्ति सहज ही सद्भावनाओं को चरितार्थ करने के लिए अपने आपको अधिक प्रशिक्षित करते हैं तद्नुसार उन्हें प्रेम, दया, क्षमा, उदारता, संयम, सन्तोष आदि सृजनात्मक सद्भावनाओं का लाभ मिलता रहता है और अपेक्षाकृत कम बीमार पड़ते हैं।

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