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Magazine - Year 1980 - Version 2

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परिस्थितियों के साथ मनः स्थिति का ताल-मेल

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परिस्थितियों से समायोजन एक कला है और साधना भी। इस कला का विकास कर लेने वाला व्यक्ति हर तरह की परिस्थिति में एक कलाकार की भाँति हंसता-हंसाता जीवन व्यतीत करता है। अपने दायित्वों को ठीक प्रकार पूरा करने में ही प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभवन करता है। नाटक के दृश्योंके समान जीवन को रंगमंच मानकर चलने पर व्यक्ति प्रतिकूलताओं अथवा अनुकूलताओं में अपना सन्तुलन बनाये रखते, उनसे अप्रभावित रहते है। ऐसे ही व्यक्ति सफल होते प्रगति करते देखे जाते है।

स्वभावगत अनुकूलताएँ ही उसे अभीष्ट होती है। प्रतिकूलताएँ अनभस्त होने से डरावनी लगती है। उन्हें जीवन का एक अनिवार्य पक्ष न मानकर मनुष्य भारी संकट के रुप में मान लेता है। सन्तुलन बनाने से मानसिक सन्तुष्टि का जो आधार बन सकता था वह पूरी नहीं हो पाता। परिस्थितियों की गुलामी चेतना को भी कमजोर बनाती है।

मन को बाह्य साधनों से अप्रभावित रखने वाला जीवन साधना का साधक ही प्रसन्न रहता और प्रगति करता है। एक खिलाड़ी की भाँति “हार-जीत” की परवाह न करते हुए निर्लिप्त बना रहता है। उसकी प्रसन्नता-अप्रसन्नता, सुख-साधनों पर, सफलता-असफलता पर नहीं टिकी होती। इस कला से अपरिचित बने रहने वाला व्यक्ति पग पग पर आवेशग्रस्त होता रहता है। अनगढ एवं असन्तुलित मन छोटी-मोटी प्रतिकूलताओं को सहन कर पाने में भी अपने को असमर्थ पाता है।

प्रतिकूलताएँ मानवी क्षमता के विकास की सशक्त माध्यम है। जबकि इस तथ्य से अनभिज्ञ व्यक्ति उन्हें शाप एवं अनुकूलताओं का वरदान मान लेने की भूल करते है। तथ्य तो यह है कि ‘मनुष्य की क्षता का’ समग्र विकास विषमताओं में ही होता है। पुरुषार्थ निखरता एवं अधिक सबल बनता है। अभ्यस्त ढर्रें की अनुकूलता प्रगति की नहीं अवगति का कारण बनती है। मनचाही स्थिति बने रहने से न तो पुरुषार्थ बन पड़ता न ही क्षमताओं का विकास हो पाता है। कई बार तो अवरोध व्यतिक्रम मनुष्य के पुरुषार्थ की परीक्षा के लिए ही आते है। उनके पीछे सफलताएँ छिपी रहती है, पर अवरोधों से घबरा जाने-प्रयत्न छोड़ बैठने से उनसे वंचित रह जाते है।

शास्त्रकारों ने मनोनिग्रह पर बहुत जोर दिया है। और उसे आत्मिक प्रगति एवं सुख-शान्ति का प्रधान उपाय माना है। भ्रमवश लोग एकाग्रता को मनोनिग्रह मान लेते है जबकि उसका वास्तविक अभप्रायः चिन्तन को अर्न्तमुखी बनाना है। बहिर्मुखी मनःपरिस्थितियों की अनुकूलता में सुखी और प्रतिकूलताओं में दुःखी रहता है। विश्व व्यवस्थ में इस प्रकार के परिवर्तन आते रहना नितान्त स्वाभाविक है। सदा दिन ही रहे रात न आवे ऐसी अपेक्षा करना र्व्यथ है। सफलता एवं अनुकूलता की सदा हस्तगत रहे यह भी सम्भव नहीं। ऐसी दशा में प्रतिकूलता में तो दुःख होता ही है। अनुकूलता में भी चैन नहीं पड़ता। अधिक पाने की आतुरता जब तृष्णा यालिप्सा बन जाती है तो उसका आवेश भी चित्त को विक्षुब्ध करता है और शान्ति को छिन्न भिन्न करके रख देता है।

बुद्धिमत्ता इसमें है कि अपने चिन्तन और लक्ष्य को ऊँचा रखा जाये और उत्साहपूर्वक उसके लिए निरन्तर कर्त्तव्यरता रहा जाये। कर्मनिष्ठा पर प्रसन्नता-अप्रसन्नता को आधारित कर लेना सदा प्रसन्न रहने का रहस्यमयी आधार है। दूरदर्शिता, पूर्ण योजना बनाना और परिस्थितियों को देख्रते हुए उनमें हेर-फेर करना उचित है। इतने पर भी आवश्यक नहीं है कि पुरुषार्थ का प्रतिफल अनुकूल ही हो। ऐसी दशा में मनुष्य के हाथ में इतना ही है कि वह स्थिति के साथ ताल-मेल बिठाये और कर्त्तव्य पालन पर अपने को गौरवान्वित अनुभव करने और प्रसन्न रहने का प्रयत्न करे।

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