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Magazine - Year 1980 - Version 2

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जन मानस के परिष्कार की प्रक्रियाजब प्रोढ़ स्थिति तक पहँचेगी तो प्रशिक्षण औ परिवर्तन का तन्त्र भी मानवी संख्या तथ परिस्थिति का ध्यान में रखते हुए समर्थ एवं विशाल बनाना पड़ेगा। आरम्भ तो छोटे से ही होता है। अग्नि प्रज्वलत के लिए माचिस या चिनगारी ही अग्रणी होती है। उद्यान खाद में दृष्टिगोचर होते हैं नर्सरी पहले बनती है। भव्य भवन खड़े होने से उनके नक्से या माँडल ही सामने आते हैं। गायत्री नगर की गतिविधियों को नव युग का शुभारम्भ श्रीगणेश ही कहना चाहिए।

धरती पर र्स्वग का अवतरण सम्भव है या नहीं ? मनुष्य में देवत्व का उदय कोरी कल्पना है या शक्य भी ? इन प्रश्नों का उत्तर वाणी से देने पर किसी का समाधान नहीं होगा। जन-जन को विश्वास दिलाने और उत्साह बढ़ाने के लिए प्रयोगशाला का आश्रम लेना पड़ेगा। परीक्षण और प्रतिफल ही इन दिनों समाधान कारक हो सकते हैं। प्रश्नों के इस कोलाहल में इतना कुछ कहा, दिखाया गया है कि लोगो को कानों पर विश्वास नहीं रहा। अब प्रमाणिकता की मान्यता आँखो के निर्धारण पर आ टिकी है। ऐसी दशा में विज्ञान को हि प्रयोगशालाओं का आश्रय नहीं लेना पड़ रहा है वरन् व्यवहार और निर्धारण की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए भी प्रयोगशालाओं की शरण में ही जाना पड़ेगा।

विश्व परिवार को किस प्रकार का प्रशिक्षण, परिर्वन, प्रचलन एवं निर्धारण किये जायं, उनका परीक्षण भी कसौटी पर कसा हुआ होना चाहिए। इसी प्रयोजन के लिए गायत्री नगर बना है, अब उसमें देव परिवार के लिए गायत्री नगर बना रहें हैं, अब उसमें देव परिवार बसाया जाना है। देवालयों में यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। इमारत बनती है। प्रतिमा गढ़ी जाती है। पूजन वेदी तक पहुँचाई जाती है। इतना सब अध चुकने के उपरान्त ही पड़ितों को प्राण-प्रतिष्ठा की उपाचार सामग्री लेकर वहाँ पहुँचना होता है प्राण-प्रतिष्ठा का कृत्य को चुकने के उपरान्त ही प्रतिमा की आर्चा, अराधना आरम्भ होती है। गायत्री नगर का देवालय माना जाय तो देव परिवार को उसकी प्राण प्रतिष्ठा कह सकतें है।

होटल धर्मशाला भरनी होती हो तो तीर्थस्थानों में जहाँ यात्रियों के लिए सिर छिपाना कठिन पड़ता है। वहाँ गायत्री नगर में भीड़ भरना तनिक भी कठिन नहीं था। इशारा करते ही 24 लाख की विरादरी अपने लोगों के लिए बने विश्राम स्थल में पर्यटन के नितित्त, विश्राम की सुविधा के निमित्त दस बिना खर्च के सुरम्य आश्रम में भरी ही रहती। कभी कहीं तिल रखने की भी जगह न मिलती। प वैसा किया जाना नहीं है। धर्मशाला और प्रयोगशाला, पाटशाला में क्या अन्तर होता है, यह जानने वाले ही यह समझा सकते हैं कि गायत्री नगर न मुसाफिर खाना है और न सराय। उसका ढाँचा नवयुग के अनुरुप नागरिक ढालने की फैक्ट्ररी का स्वप्न लेकर ही खड़ा किया गया है अब उत्पादन आरम्भ होने से पहले कुशल कारीगरों की तलाश हो रही है।

अगले दिनो सामान्य नागरिकों को भी मानसिक आरोग्य लाभ करने के लिए बुलाया जायगा। पर इससे पहेले डाक्टर, कम्पाउण्डर, ड्रेसर, हैल्पर, नर्स, चौकिदार, सफाईदारों की व्यवस्था होनी आवयश्क है। मरीज धस पड़े, न चिकित्सक हों, न व्यवस्थापक, तब तो सुधार क्या होगा। पूरा नरक बन जायगा। प्रीति भोज के लिए अतिथियों को बुलाने में इतनी कठिनाई नहीं होती, जितनी कि हलवाई तथा खाद्य सामग्री की व्यवस्था बनाने में। गायत्री नगर की प्रशिक्षण प्रक्रिया से लाभ उठाने के लिए आने वालों की कमी नहीं रहेगी। सुसंस्कारिता की आवश्यकता अब समझी जा रही है। इसके बिना हर व्यक्ति भूत और हर धर शमशान बना हुआ है। सुधार का विश्वास दिलाया जा सके तो भले मनुष्य लाखों करोड़ो की संख्या में शान्ति के आश्रम स्थल में प्रवेश पाना चाहेगें।

जहाँ का कथन अविश्वस्त माना और विज्ञापन समझा जाता हो वहाँ की बात दूसरी है, पर जिन पत्रक्ताओं के वचन ऋचाओं की तरह श्रद्धास्पद माने जाते हों-जहाँ की कथनी करनी में एकता विगत चालीस वर्षो से निरन्तर परखी जाती रही हो, उनका आमन्त्रण न तो अविश्वस्त की न कभी शान्ति कुन्ज में कमी रही है। और न रहेगी। स्थान जैसे-जैसे बढ़ा है शिक्षार्थी उससे अधिक अनुपात से बढ़ते रहें है कि यहाँ स्थान की सदा कमी पड़ती है। गायत्री नगर बनने के बाद भी वह प्रतिबन्ध जारी रहेगा। इसके पीछे एक ही तथ्य है, आमन्त्रण के पीछे आगन्तुकों का सुनिश्चित हित साणन। इस तथ्य को जब भुक्तभोगी एक दूसरे को अपने अनुभव सुनाते हुए बताते है तो प्रामाणिकता और भी अधिक बढ़ जामी है। फलतः आगन्तुकों की शिक्षार्थियों की कमी नहीं रहती। अब जबकि प्रशिक्षण में उत्कृष्टता और उपयोगिता का अनुपात और भी अधिक बढ़ा संख्या में आना चाहेंगे। इसमें सन्देह की तनिक भी गुँजाइश नहीं है।

निमार्ण का प्रथम चरण पूरा होते ही उन कारीगरों की आवश्यकता पड़ रही है जो ढिलाई का कारखाना चालाने की बहुमुखी आवश्यकातएँ पूर्ण कर सके। यह द्वितीय चरण पूरा होते ही फिर निर्धारित तथ्य को पूरा कर सकने वाली गतिविधियों का चल पड़ना सरल हो जायगा। यह विद्यालय ऐसा नहीं है जिसमे मात्र क्लास चलाने वाले प्रवक्ताओं से काम चल सके। नोट लेने वाले और रटने में लगे रहने वाले छात्र भी तो इस पाठशाला में पढ़ने नहीं आने वाले हैं। ऐसी दशा में प्रवक्तताओं से काम चलने वाला नहीं है यदि वैसा हो सका होता तो तलाश की दोड़ धूम करने, की तनिक भी आवश्यकता न पड़ती। वे थोड़ा पैसा खर्च करके भी नियुक्त किये जा सकते थे। हर स्तर की प्रतिभएँ बाजार में मौजुद हैं। मर्जी का माल मिलने में कहीं किसी को कोई कठिनाई नहीं होती। फिर गायत्री नगर के प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त अध्यापक ढूँढना और उन्हे अपनी ड्यूटी पूरी करने योग्य बना दिना कुछ भी कठिन न होता, किन्तु बात ऐसी है नहीं। काय व्यक्तित्वों को ढालने एवं परिष्कृत करने का है। उसके लिए अध्यापक एवं कारीगर भी ऐसे होने पर फिर इस फैक्ट्र्ररी के चल पड़ने और उत्पादन का ढेर लगने में कोई कठिनाई शेष नहीं रह जायगी।

गायत्री नगर में देव परिवार बसने की बात क्यो कही गई ? इस आमन्त्रण आहवान की आवयश्कता सि लिए पड़ गई ? इसका उत्तर ऊपर की पंक्तियों से मिल जाना चाहिए। इस आहवान की पूर्ति में साधक और साध्य दोनों का समान हित साधन है। साधक वे जो इस सृजन सेवा में संलग्न होगें। साध्य वह जिसे नव सृजन का पुण्य प्रयोजन कह सकते हैं। देव परिवार की तरह गायत्री नगर में बसने वालो से इन दोनों ही प्रयोजनों की पूर्ति भली प्रकार हो सकेगी। जो बसेंगे वे अध्ययन अध्यापक का स्वार्थ और परमार्थ के समन्वय का-ढलने और ढालने का दुहरा लाभ प्राप्त कर सकेंगे। ऐसा लाभ जो आज की परिस्थिति में अन्यत्र कदाचित ही कही, किसी को मिल सके। आत्मोर्त्कष की ऐसी व्यावहारिक और उच्चस्तरीय व्यवस्था ढुँढ सकना सम्भ्रव न हो सकेंगे। विवेकवानों को ऐसी सर्वागीण उपयुक्तता कदाचित ही कहीं मिल सके। भावुक भक्तों की बात दूसरा है वे कहीं भी रम सकते है।

साध्य का हित-साधन भी इसी में है कि भावनात्मक दृष्टि पे ऊँचे स्तर के लिए अध्यापन का काम करें। स्पष्ट है कि यह अध्यापन वाणी से कम और व्यवहार से अधिक होगा। वातावरण किसी स्थान के निवासियों की गतिविधियों से ही बनता है। इस प्रयास में उच्च-शिक्षतों को नहीं चरित्रवानों की व्यवहार में उत्कृष्टाता बनाये रहने वालों की आवश्यकता पड़ेगी। इस स्तर के व्यक्ति बाजार में नहीं मिल सकतें। अखण्ड-ज्योति की प्रेरणाओं को जो लम्बे समय से हृदयंगम करते रहे है, जिनने उसके प्रतिपादनों का गम्भीरता पूर्वक अवगाहन किया है-वे ऐसा अवसर प्राप्त करनें के भी इच्छुक होंगे जिससे मान्यताओं को गतिविधियों में, आदतो में सम्मिलित कर सकना सम्भव हो सके। वस्तुतः इस स्तर के लोग ही प्रस्तुत आहवान को स्वीकार कर सकेंगे और वे ही उपयोगी भी सिद्ध होंगे।

बताया जा चुका है कि गायत्री नगर में बसने वालों को अपनी दिनचर्या में साधना, स्वाध्याय संयम और सेवा के चारों तत्व समन्वित रखने होंगे। आत्मोर्त्कष की सच्ची साधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मात्र भजन का एकाँगी उपक्रम चेतना को परिष्कृत एवं समु़त्रत करने का, उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। मार्गदर्शन, प्रचलन और वातावरण की अनुकुलता में ही उच्चस्तरीय साधना क्रम चल सकता है। अटपटी परिस्थितियों में न मन लगता है और न ही सुनिश्चित क्रम चलता है। जिन्हें उसके एि उचित श्रम साधना करने में आपत्ति न होवें अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गायत्री नगर निवास में समुचित सन्तोष प सकेंगे। यो पूर्ण तो एक भगवान है। अपूर्णता के कुछ अंश तो हर व्यक्ति और हर स्थान में कुछ न कुछ पाये ही जायेंगे।

जिस प्रशिक्षण के लिए गायत्री नगर बनाया गया उसमें सबसे अधिक प्रभावी तत्व एक ही होग-प्रेरणाप्रद वातावरण। यह जलवायु पर नहीं, वहाँ के निवासियों की मान्यताओं, भवनाओं और गतिविधियों पर निर्भर है। वातावरण प्राकृतिक द्रश्यों को सुविधा साधनों को एवं आकर्षक कार्यक्रमों को नहीं कहते। वह द्रश्य नहीं अद्रश्य होता है। कहीं के निवासियों क चिन्तनएवं व्यवहार में जितनी उतकृष्टा घूली रहेगी उसी अनुपात में वहाँ का वातावरण उच्चस्तरीय बनेगा। प्रेरणाएँ उसी से मिलती है। उतकृष्टता की दिशा में चलना, धकेलना एवं उछलना उसी आधार पर सम्भव होता है।

गाँधी जी के आश्रम में शिक्षार्थी-प्रायः निर्वाह की सामान्य दिनचर्या में ही अपने समय का अधिकाँश भाग पूरा करते थे। गुरुकुलों, आरण्यकों में पढाई कम और बढ़ाई अधिक होती थी। गढ़ाई को काम व्यक्ति विशेष इस प्रकार सम्पन्न करते हैं कि उनकी चेष्टा अपनी तथा साथियों की गतिविधियाँ उच्चस्तरीय बनाने में निरन्तर नियोजत रहती है। अवाँछनीयताओं के परिशोधन का नाम ही उत्कृष्टाता है। वह कहीं भंडार की तरह जमा नहीं होती वरन् अस्वच्छता से अव्यवस्थता से अहर्निश जूझने के फलस्वरुप पुण्य फल की तरह उपलब्ध होती है। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व यही रीति-नीति अपनाते और वातावरण बनातें हैं। कहना न होगा कि इसी ऊर्जा के सहारे अविकसितों को विकसित होने का अवसर मिलता हैं। प्ररेणा इसी प्रवाह से मिलती है। प्रमुखता परोक्ष की रहती है। प्रत्यक्ष प्रशिक्षण तो दिनचर्या को सही रखने और आवश्यक जानकारी देने भर का प्रयोजन पूरा करता है।

गायत्री नगर में बसने वाले उपरोक्त दोनों प्रयोजन पूरे करेंगे। उनकी साधना आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों पहियों के प्रगति पथ पर सवार होगी और द्रुत गति से आगे बढ़ेगी। वे अध्ययन और अध्यापन के अनेक प्रकार है। लेखन, पत्र व्यवहार, प्रचार, जनसर्म्पक प्रवचन आदि क्रिया-कलापों को इस अध्यापन कार्य के अर्न्तगत ही गिना गया है। शारीरिक श्रम के रुप में की गई अन्यों को प्ररेणा देने वाली गतिविधियाँ भी इस समग्र अध्यापन के अर्न्तगत ही आती है। इन बहुमुखी प्रयोजनों को गायत्री नगर में बसने वाले अपनी सुनियोजित दिनचर्या के आधार पर सतुलित रुप से सम्पन्न करते रहेंगे। फलतः आश्रम वासी तथा शिक्षार्थी दोनों हीं एक दूसरे से समुचित लाभ उठाते रहेंगे। आश्रम वासी शिक्षार्थियों के सहारे अपने कौशल परिपक्व कि शालीनता व्यवहार में किस प्रकार समन्वित रखी जा सकती है।

गायत्री नगर में बसने के लिए उन्हें बुलाया जा रहा है। जो मात्र सीखने की स्थिति तक सीमित न हो जो सिखा भी सकें। जो पाने के ही इच्छुक न हो कुछ दे भी सके। जिनमें नव सृजन की पात्रता बढ़ाने और योगदान देने की उत्कृष्टा भी जीवन्त हो। असफल जीवन से छुटकारे का आश्रय स्थल नहीं चरम पराक्रम के लिए गायत्री नगर को आधुनिक कुरुक्षैत्र बनाया गया है। उसमें अर्जुन भी चाहिए, और अभिमन्यु भी। अपने को टंटोल कर देख जिनमें जीवन हो वे ही उधर आने की बात सोचे। मृतकों का बोझा यहाँ कोन ढोयेगा ?

आहवान के आरम्भिक दिनों में उन्हें प्राथमिकता दी जायेगी जिनके पास निर्वाह की अपनी आर्थिक सुविधा विद्यमान है। संचित पूँजी से पेन्शन से जो अपना गुजारा कर सकें। इसमें मिशन की दुर्लब स्थिति पर बोझ भी नहीं बढ़या और साथ ही साधकों की निस्वार्थ परमार्थ परायणता का प्रभाव भी बढ़ता है। इसके बाद उनका नम्बर आता है, जिनके पास अपनी व्यवस्था में थोड़ी बहुत ही कमी पड़ती है। उसकी पूर्ति मिशन द्वारा भी हो सकता है। इसके बाद उनका नम्बर है जिनके ऊपर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है। जिन्हें अपना ब्राह्मणोचित निर्वाह ही उपलब्ध करना है। प्राचीन काल में ब्रह्मचारी और वानप्रस्य ही प्रधान तथा अध्यात्म क्षेत्र में उतरते और जन कल्याण में मार्ग पर चलते थे। गृहस्थ परिवार पालते और उसी में से पथासम्भव लोक मंगल के लिए समय तथा साधनों का अशं दान सेवी आर्थिक दृष्टि से जितने हलके होंगे उतना ही उनके लिए तैरना और दौड़ना सरल पड़ेगा।

अपवाद के रुप में ऐसे दाम्पति भी मिशन के व्यय से निर्वाह चला सकतें है जिनकी पत्नियाँ भी कधें से कधाँ मिला कर अपनी योग्यतानुसार श्रम करने में तत्पर हैं। गुड़िया बन कर बैठी रहने वाली पत्नियों का भार स्वभवत- अखरने लगेगा। ऐसे गृहस्थ अभी इस प्रयोजन के लिए नहीं बुलाये जा रहे हैं जिनके ऊपर कितने बच्चों का उत्तदायित्व है, और जिनकी प्रजनन प्रक्रिया अभी भी जारी है। इसी प्रकार जो शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से जरा-जीर्ण अस्त-व्यस्त हो चुके हैं। वे सृजन सैनिकों की घुड़दौड़ में सम्मिलित होने और साथ दौड़ने में असमर्थ सिद्ध होगें।

जिन्हें प्रशिक्षण का जन सर्म्पक का व्यवस्था का अभ्यास है। जो अनुशासन के अभ्यस्त रहें हैं, जिन्हें चिन्तन और स्वाध्याय में रस आते है। जिनके स्वभाव में कटुता नहीं, जो निन्दा करने के स्थान पर सुझाव या सुधार के आधार प्रस्तुत कर सकतें हैं, ऐसीरचनात्मक प्रवृति ही यहाँ उपयोगी सिद्ध हो सकती है। जिन्हे छिद्रन्वेषण आक्षेप निन्दा भर्त्सना में ही रस आता है, ऐसे निषधात्मक प्रकुति के व्यक्ति यहाँ खप नहीं सकेंगे। अपना लक्ष्य सृजन है- विग्रह एवं विगठन नहीं। निषेधात्मक प्रवृति को तोड़ना भष्ट आता है बनाना नहीं, ऐसे यदि सुणर सकेंगे तो ही उनके पैर यहाँ जम सकेगें।

गायत्री नगर में बसने के लिए आरम्भ में प्रयोगात्मक रुप से ही आना चाहिए। न्यूनतम ती तहीने की बात सोच कर आया जाय। इतनी अवधि गुजर जाने के बाद ही यह निश्चय किया जाय कि स्थायी रुप से रहना है या नहीं। अनुकुलता और उपयुक्ता के आधार पर ही स्थायी नियर्ण लेना ठीक होगा।

जिन्हे देव परिवार में सम्मिलित होने और गायत्री नगर में बसने का उत्साह है उनके विस्तृत परिचय समेत आवेदन पत्र माँगे गये है। उन सभी को गायत्री जयन्ती सत्र में प्रत्यक्ष विचार विनिमय के लिए बुलाया गया है। जुलाई से देव परिवार में प्रवेश पाने वाले परिजनों की व्यवस्थित कार्य पद्धति आरम्भ हो जायगी।

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