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Magazine - Year 1980 - Version 2

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आत्मा का अस्तित्व इन्कारा नहीं जा सकता

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भारतीय तथा विश्व के अन्य सभी धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता है। यह दूसरी बात है कि मरणोत्तर जीवन कितना लम्बा होता है और उस अवधि में किस प्रकार निर्वाह करना पड़ता है। मतभेद इन्हीं बातों पर ह। पुनर्जन्म को अस्वीकारा किसी ने भी नही-भले ही उसक लिए प्रलयकाल जितनी लम्बी प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया हो। धार्मिकों की तरह पुरातन दर्शनशास्त्र भी पुर्नजन्म के समर्थक रहे है। उन चार्वाक जैसों की संख्या नगण्य है, जिनमें आत्मा के अस्तित्व से इन्कार करने के साथ-साथ एक ही साँस में पुर्नजन्म की मान्यता का भी सफाया कर दिया।

कठिनाई आधुनिक वैज्ञानिकों ने उत्पन्न की है जिन पदार्थ को ही सब कुछ माना और आत्मा के अस्तित्व से इन्कार कर दिया । जब आत्मा ही नहीं तो पुनर्जन्म किसका ? आस्तिकता के सभी सिद्धान्त आत्मा की अमरता और ईश्वर की न्याय व्यवस्था के साथ जुड़ते हैं। यदि इन दो तथ्यों को अमान्य ठहरा दिया जाये तो फिर चेतना की स्वतन्त्र सता की समाप्ति हो जाती है। और संसार मात्र रासायनिक पदार्थों का ऐसा खिलौना भरा रहा जाता है। जो परमाणु कम्पनों की हलचलों से प्रभावित होकर एक निरुद्देश्य उछल कूद भर करता रहता है।

ये प्रसंग दार्शनिक विचार भर का रहा होता तो उसे बुद्धिमानी की मानसिक कसरत के लिए छोड़ा भी जा सकता था। किन्तु कठिनाई यह है कि आस्तिकता की अस्वीकृति के बाद नैतिक क्षैत्र में अराजकता फैल जाती है। शासकीय नियन्त्रण इतना समर्थ नहीं हो सकता कि वह अवाँछनीय गतिविधियों और दृष्परिणामों को रोक सके भी। उन्हें न अपनाने के लिए सर्वसाधारण को सहमत कर सके। ईश्वरीय सत्ता-मरणोत्तर जीवन-कर्म जैसी आस्थाएँ मनुष्य को पाप से डरने और पुण्य के प्रति श्रद्धालु होने की पृष्ठभूमि बनाती है। इस मान्यता के अभाव में मनुष्य नीति-अनीति का विचार क्यों करेगा ? उसमें दूरदर्शिता कहाँ है कि अनीति अपनाने से होने वाली हानियों की भावी कल्पनाओं को कर सके और उस भय से आत्म-नियन्त्रण करने की बात सोच सके। आमतौर से प्रत्यक्ष लाभ को ही सब कुछ समझा जाता है। अनीति अपनाने में तात्कालिक लाभ है-ये सभी जानते हैं। भविष्य के छडर से ही कुछ अंकुश रह पाता है। यदि इस सर्न्दभ में बची हुई आस्थाओं को समाप्त कर दिया जाये तो फिर नीति धर्म की चर्चा चलते रहने पर भी लोग उस अनुशासन को सच्चे मन से स्वीकार न करेंगे और मर्यादाओं का बाँदध टूटता चला जायेगा। उच्छृंखलता पनपेगी और उपयागी नीति नियमों को नष्ट-भ्रष्ट करके रख देगी। ऐसी दशा में मनुष्य की समर्थता, सम्पन्नता एवं बुद्धिमता का उपयोग निकृष्ट स्वार्थों की पूर्ति के निमित ही होता चला जायेगा। भावना क्षेत्र की इस अराजकता का दुष्परिणाम इतना भयंकर होगा जिसकी आज तक कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब आस्तिकता की मान्यताएँ किसी रुप में बनी रहने पर भी इतना अत्याचार पनपता है तो उस अनुशासन के उठ जाने पर तो मनुष्य के मत्स्य न्याय का दर्शन ही चल पड़ेगा फिर संयम, सदाचार की-उपकार परमार्थ की न तो कोई आवश्यकता प्रतीत होगी न उपयोगिता। ऐसे समाज में प्रगति की आशाएँ समाप्त ही समझनी चाहिए। अनाचार का एक मात्र परिणाम दुर्गति ही हो सकती है। इस प्रकार नास्तिकता की अराजकता का दार्षनिक प्रतिपादन किसी प्रकार ओंधे-सीधे तर्कों द्वारा कर भी दिया जाये तो भी परिणिति को ध्यान में रखने पर सही उचित प्रतीत होता है कि इस भावनात्मक अनुशासन को स्थिर रहने देने में ही भलाई है।

यह तो गुण-अवगुण की परिणाम प्रतिक्रिया की बात हुई। अब तथ्यों की दुनिया में प्रवेश करने और उनक गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करने पर भी आस्तिकता के समर्थन में ऐसी सच्चाइयाँ समाने आ खड़ी होती हैं जिससे इन्कार करना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। परोक्ष को चदि प्रत्यक्ष के बिना मान्यता नहीं मि सकती तो ऐसे प्रमाण भी कम नहीं हैं जो बताते हैं कि आत्मा की मरण के साथ ही समाप्ति की जो बात वैज्ञानिक क्षेत्रों में कही जाती है, वह सच नहीं है।

पुनर्जन्म के प्रत्यक्ष प्रमाण इतने अधिक हैं कि उन्हें हर कसौटी पर कसा और सही पाया जा सकता हैं कितने ही बालक अपने पूर्व जन्म का विवरण बताते पाये गये है। जाँचने पर यह पाया गया है कि बच्चे को वैसी धूर्तता किसी ने सिखाई नहीं है, वरन् उसने सहज स्वभाव से ही अपनी पूर्व स्मृति का परिचय दिया है। यह कोई कल्पना तो नहीं है उसकी जाँच पड़ताल इन घटनाक्रमों में इस प्राकर की जाती रही है कि यदि कहीं कुछ छद्य हो तो उसका पर्दाफाश होने में देर न लगे। पुरानी ऐसी घटनाएँ जो मात्र सम्बद्ध व्यक्तियों की जानकारी से ही हो सकती थी। इन बालकों द्वारा बताया जाना, स्थानों, वस्तुओं तथा घटानाओं का वर्णन करना यह बताता है कि इसमें कल्पना या छद्य नहीं तथ्य ही प्रत्यक्ष है।

पुनर्जन्म के विवरण भारतवर्ष में आये दिन उपलब्ध होते रहेत है। यहाँ उन पर आर्श्चय भी नहीं हातो। पर ईसाई, मुस्लमान प्रधान देशों के लिए तो यह अतीव आर्श्चयजनक है, क्योंकि उनकी महाप्रलय के बाद ही जन्म होने की मान्यता है। यदि मध्य में कोई जन्म लेता है तो उससे उने पूर्वाग्रहों को आघात पहुँचता है। इस प्रकार के प्रमाण उन वैज्ञानिकों के लिए भी एक चुनौती हैं जो मनुष्य को एक चलता-फिरता पौधा मानते है और मरण के साथ ही उसकी सत्ता समाप्त हो जाने की बात कहते है। यदि आत्मा का-चेतना को-कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है और मरण के बाद ही उसका अन्त हो जाता है तो पुर्नजन्म कैसे सम्भव होगा ? यदि पुनर्जन्म सिद्ध होता है तो आत्मा का अस्तित्व सिद्ध हो जाता और नास्तिकता की आधी जड़ कट जाती है। फिर मात्र कर्मफल मिलने न मिलने की बात शेष रह जाती है से उसके लिए उच्चस्तरीय मनाविज्ञान द्वारा वे तथ्य ही समर्थक बन जाते है जिनमें छद्य, दुराव, अन्दद्वन्द्व, दुहरे व्यक्तित्व, अनाचार, अपाध, दुश्चिन्तन आदि के जाल में फँसे रहने वालों को अनेकानेक शारीरिक, मानसिक अधिव्याधियों में फँस जाने और निकृष्ट स्वभाव आचरण के कारण व्यावहारिक जीवन में पग-पग पर ठोकरें खाने और कष्ट सहने की बात कही गई है। कर्म फल में कुछ तो शासकीय और सामान्य व्यवस्था भी सहायक सिद्ध होती है।

मरणोत्तर जीवन की पुष्टि आस्तिकता का आधा पक्ष समर्थन कर देती है। उसक बाद ईश्वर की सिद्धि एवं कर्म व्यवस्था की बात कुछ अधिक कठिन नहीं रह जाती। कठिनाई तो तब पड़ती जब भौतिकवाद का वह प्रतिपादन सही सिद्ध होता जिसस पदार्थ को ही सब कुछ माना गया है। उसकी रासायपिनक हलचलों की प्राणियों की उत्पत्ति और समाप्ति का कारण कहा गया है। ऐसी नास्तिकता यदि सही है तो फिर पुनर्जन्म की घटनाओं का कोई अस्तित्व दृष्टिगोचर वनहीं होना चाहिए। यदि होता है तो उस प्रतिपादन को अमान्य ठहराना होगा जिससे चेतना का-आत्मा का-अस्तित्व अस्वीकारा गया है।

विश्व विख्यात वैज्ञानिक डा0 इयानस्टीवेंसन नपे जब अनुवंशिकता-विषयक प्राप्त समस्त जानकारियों में व्यक्तित्व को सर्वांग निर्माण में अपूर्ण पाया तो, पुनर्जन्म में उनकी रुचि बढी। अभी तक उन्होंने ‘दि साइकियाट्रिक इक्जामिनेशन’ 1969 में और ‘दि डायागोनिस्टिक इन्टरव्यू’ (1970) में नाम पुस्तकें प्रकाशित की हैं। डा0 स्टीवेंसनप की लगन व प्रमाणों की खोज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रभावित होकर वर्जोंनिया विश्व विद्यालय में उन्हें अपने यहाँ मनोविज्ञान का प्रोफेसर नियुक्त किया। इस बीच उन्होंने विश्व में विभिन्न राष्ट्रों से जानकारियाँ एकत्र कर अपने कार्य को इतना विस्तृत किया कि क्जीराँम्स के आविष्कारक प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्व0 डा0 चेस्टर कार्लसन उनके प्रमुख समर्थक बन गये थे। उनके निष्ठापूर्ण प्रयत्नों एवं एकत्रित प्रमाणों की सत्यता से प्रभावित होकर विश्व वैज्ञानिकों की संस्था- “द अमेरिकन एसोसिएशन फार द एडवाँस मेन्ट आफ साइन्स” ने अमेरिकन परामनोवैज्ञानिक संस्था को अपने साथ सम्बद्ध कर लिया।

जार्जवाशिंगटन विश्व-विद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग के डा0 गार्डनर मर्फी की मान्यता है कि आज तक विश्व में डा0 स्टीवेंसन के समान पुनर्जन्म के सम्बन्ध में कोई अन्प्य वैज्ञानिक नहीं है। डा0 स्टकर्ड, डा0 स्मीडलर, डा0 रिप्ले आदि है।

पुनर्जन्म की बढती मान्यताओं से प्रभावित होकर ब्रिटेन के दैनिक अखबार ‘डेली एक्सप्रेस’ ने कुछ वर्षों पूर्व अपने पाठकों से जिन्हें उनके पूर्व जन्म की स्मृतियाँ हों सप्रमाण भेजने का निवेदन किया था। इस निवेदन का परिणाम यह हुआ कि मात्र ब्रिटेन से ही एक हजार से अधिक घटनाओं का संकलन हो गया। उनमें कुछ प्रमुख घटनाएँ ये है।

डेरिक सेन्ट जूलियन-ब्राउन जिन्हें चित्रकारी का विशेष शोक था। इनकी अपनी कलाकृतियों में एक ऐसा लहरदार जीना विशेष प्रमुख है जिसके एक किनारे में एक युवती खड़ी दरवाजे को खटखटाती है तथा जीने के मध्य एक युवक की लाश पड़ी है। श्री ब्राउन का कहना है कि वह मृतक लाश मेरी ही है मेरा कभी एक नाम ‘यंग्स मैक्रकलाम’ थ और तब मैं स्कटट लैण्ड में 1472 में पैदा हुआ था। 1464 ई॰ में वह इटली युद्ध करने गया था।

ओलिवर बेलर ने अपने पूर्वजन्म के संस्मरणों के सम्बन्ध में ‘डेली एक्सप्रेस’ के सम्पादक को लिखा कि पूर्वजन्म में वह रेलवे विभाग में एक मजदूर के रुप में कार्य करते थे। उसका कार्य स्थल मिहर्स्ट था। 70 वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु हुई थी। ओलिवर वेलर ने तत्कालीन अपने विभागीय और गैर विभागीय लोगों के सम्बन्घ में भी बहुत-सी जानकारी दीं। ‘डेली एक्सप्रेस’ के सम्पादक ने उक्त कथन की निष्पक्ष जाँच हेतु मिडहर्स्ट नगर पालिका और रेलवे विभाग के कागजातों को देखने पर श्री ओलिवर वेलर द्वारा दी गई समस्त जानकारी सत्य पायीं।

एडवर्ड ने अपने पूर्वजन्म के संस्मरण में लिखा कि उसने 1685 ई॰ में सेजमूर की प्रसिद्ध प्रसिद्ध लड़ाई में एक सैनिक के रुप में भाग लिया था। उस समय उनकी उम्र 40 वर्ष की थी। इस लड़ाई में वह मारा गया था और अपने पीछे पत्नी क साथ दो लड़के छोड़ गया था। उस समय उनका नाम ‘जान फ्लेक्चर’ था। सकारी कागजात का मिलान करने पर उपरोक्त कथन बिलकुल सत्य पायास गया।

कर्नल लेकने जिनका पूर्वजन्म में कोई विश्वास न था। 1939 ई॰ में जब उन्हें रंगरुठ भर्ती करने के सिलसिल में बंगलौर भेजा गया। वहाँ पहुँचते ही उन्हें स्पष्ट स्मरण हो आया जैसे कल की बीती बात हो कि वह कभी एक अँग्रेज सैनिक थे और सुल्तान टीपू की सेनाओं से युद्ध किया था। युद्ध में वह बन्दी बना लिये गये थे। बाद में टीपू के सैनिकों ने उन्हें धक्का दे-देकर मार डाला था।

एक बार सम्मोहनावस्था में श्रीग्लेन फोर्ड 18वीं शदी की फ्रेंच भी नहीं जानते। इसी प्रकार उन्होनें सम्मोनावस्था में ही बहुत ही सुन्दर पियानो बजाया था। जबकि व्यक्तिगत जीवन में पियानो बजाना उन्हें नहीं आता। इस सम्बन्ध में श्री फोर्ड ने बतलाया कि 19वीं शदी में वह पियानो शिक्षक थे, जिसक संस्क्र उनके अचेतन मस्तिष्क पर पड़े हुए है और सम्मोहनावस्था में वह प्रकट होते है। पूर्व जीवन में वह जब पियानो शिक्षक थे तो क्ष्य रोग क कारण उनकी मृत्यु हुई थी। उन्होंने उस स्थान का नाम भी बताया जहाँ उन्हें दफनाया गया था। खोज करने पर वह स्थान और बातें सत्य पायी गई।

उनके व्यक्तियों ने विभिन्न क्षेत्रों में अल्प आयु में अपनी रुचि के अनुकूल दृढ विश्वास के साथ अपनी क्षमताओं को विकसित किया-16 वर्ष की आयु में जगत्गुरु शंकराचार्य सभी शास्त्रों के ज्ञाता हुए। 14 वर्ष की अवस्था में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शेक्सपीअर क नाटक मेकवेथ को बंगला भाषा में अनुदित कर दिखाया और बंगला नाटककार हरिश्चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपना प्रसिद्ध नाटक ‘अबुल हसन’ 14 वर्ष की अवस्था में ही लिखा। अंग्रेजी साहित्य की एक और बंगला कवियत्री तारादत्त ने भी 18 साल में महान ख्याति अर्जित की। सन्त ज्ञानदेव ने 14 वर्ष की अवस्था में भगवत गीता पर मराठी छन्दों में ज्ञानेश्वरी टीका लिखा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी 7 वर्ष की आयु में गूढ एवं रहस्यमय दोहे लिखे और 13 वर्ष की आयु में ही श्रीमती सरोजनी नायडू ने 1300 पंक्तियाँ की एक अंग्रेजी कविता लिखकर सम्पूर्ण अग्रेंजी सभ्यता को एक विशाल चुनौती दी है।

एक घटना जर्मनी की है। छः वर्षीय बालिका ‘लोना वेड फोर्ड’ का विश्व की पाँच प्रसिद्ध भाषाओं जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी, हिन्दी और जापनी की जानकारी है। वह धारा-प्रवाह से इन भाषाओं को बोल सकती है। इतनी कम आयु में इन भाषाओं को जानना स्वयं में एक आर्श्चय है। इसके लिए उक्त बालिका को किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं मिला था, फिर भी उसे उन भाषाओं के बोलने व लिखने पर अधिकार है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जन्म-जात प्राप्त यह प्रतिभा पूर्वजन्मों के संस्कारों का प्रतिफल है, जो इस जन्म में साकार हो उठी है।

वैचारिक हठवादिता का जोर घटने से जो चीजें धर्मास्था या अन्धविश्वास का ही विषय न रहकर वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में आती जा रही है, उनमें से एक हैं-पुनर्जन्म। छोटी-छोटी प्रयोगशालाओं को ही तथ्य की सत्यता का मापदण्ड मान लेने वाले वैज्ञानिक अब इस दिशा में सकारात्मक चिन्तन कर रहे ह।

अमेरीका के वर्जीनिया विश्वविद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डा0 इयन स्टिवेन्सन पिछले 30 वर्षों से इसी क्षेत्र में कार्य कर रहे है। विगत दिनों वे भारत आये थे और उन्होंने बताया कि विस्तृत सर्वेक्षण से संसार के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों का पता चला है, जहाँ पूर्वजन्म की स्मृतियों वाले बच्चे अपेक्षाकृत अधिक संख्या में जन्म लेते है। ये क्षेत्र हैं- श्री लंका, उत्तर भारत, बर्मा, थायलैंड, तुर्की, इन्डोनेशिया, उत्तर-पश्चिम अमेरीका। ऐसा क्यों हैं ? यह बात पाना कठिन है।

शरीर में उत्पत्ति शरीर की ही हो सकती है। किन्तु जीवात्मा शरीर नहीं है। शरीर से अलग वह एक चेतन अभौतिक पदार्थ है। शरीर मात्र कर्त्तव्य, भेक्तृत्व और ज्ञाक्त्व लक्षणों के प्रकाश का उपकरण ह। माता या पिता के शरीर में पुत्र के जीवात्मा की उत्पति मानना किसी भी प्रकार उचित नहीं है। क्याँकि एक तो सन्तान अपना स्वयं का व्यक्तित्व लेकर जन्मती है। उसमें बहुत से स्वभाव माता-पिता से मिलते-जुलते है, परन्तु सम्पूर्ण नहीं। अतः जीवात्मा का आरम्भ इस जीवन से नहीं होता अपितु इससे पूर्व की उसकी विद्यमानता सिद्ध हो जाती है। दूसे एक ही माता-पिता के दो बच्चों का मानसिक, वैज्ञानिक और शारीरिक विकास भिन्न होता है। वह सब विकास के एक ही तल पर नहीं होते।

इस प्रकार प्रत्येक बच्चा अपने व्यक्तित्व का आरम्भ से ही प्रकाशित कर देता है। एक ही परिस्थिति में पलते हुए भी उनके विकास भिन्न-भिन्न लाइनों पर होता है और आगे चलकर यह भिन्नता और स्पष्ट हो जाती है।

पीपल और बरगद क छोटे-छोटे बीज अलग-अलग तो है, पर उनमें बहुत बड़ा भेद नहीं है। खेत की भूमि एक-सी, जल-ऋतु एक सी होने पर भी एक पीपल का वृक्ष व एक बरगद का विशाल वृक्ष बन जाता है जिनमें बहुत अन्तर है। भिन्नता उन दोनों के मूल में थी। इस भिन्नता को जन्म के पश्चात् तलाश करना भूल है।

अतः शारीरिक जीवन का आरम्भ जीवात्मा का आरम्भ नहीं है।

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