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Magazine - Year 1984 - Version 2

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सच्चा स्वार्थ पहचानना और अपनाना ही बुद्धिमता है।

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First 15 17 Last
पत्थर का कोयला एक विशेष स्तर पर पहुँचकर हीरा बन जाता है। यों अनगढ़ प्रयोग करने वाले उसकी अँगीठी जलाकर भी कमरे में रख लेते हैं और भोर होने से पहले ही उस विषैली गैस से मर चुके होते हैं। जबकि हीरा उपलब्ध करने वाले सुसम्पन्न भाग्यवान बनते हैं। लोहा, राँगा, सीसा अमुक जैसे सामान्य खनिजों का बाजारू मूल्य तुच्छ होता है पर उन्हें जब भस्म रसायन बना लिया जाता है तो संजीवनी बूटी का काम करते और महंगे मूल्य पर बिकते हैं। पीने का पानी भाप बनाकर जब ‘डिस्टिल्ड वाटर’ बना लिया जाता है तब उसकी गणना औषधियों में होती है। आदमी भी यों गली-कूचों में भीड़ लगाते और गन्दगी फैलाते रहते हैं पर जब उन्हें सुसंस्कारिता की साधना द्वारा महान बना लिया जाता है तो फिर ऋषि देवता कहाते- अपनी नाव पर चढ़ा कर असंख्यों को पार करते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है।

यहाँ चर्चा स्वार्थ के सम्बन्ध में की जा रही है। यह शब्द या प्रयोग इसलिए बदनाम हुआ है कि इसे लोग घटिया प्रयोजनों के लिए- घटिया ढंग से नियोजित करने लगे। अन्यथा अपनी भलाई करने के सिद्धाँत या प्रयास में कोई ऐसी बुराई नहीं है, जिसे अपनाना अनुचित कहा जाय। शरीर को ही सब कुछ मान बैठने- उसकी उच्छृंखल लिप्साओं को पूरा करने के लिए अनैतिक उपार्जन और अवाँछनीय उपयोग करने तक जब बात बढ़ जाती है तभी उस मर्यादा उल्लंघन को हेय कहा और दोष दिया जाता है। स्वार्थ के साथ घटिया दृष्टिकोण जुड़ जाने और उसके साथ अनाचार चल पड़ने से ही तहलका मचता और स्वार्थ बदनाम होता है। आक्रामक अनीति ही पाप कहलाती हो, सो बात नहीं। नैतिक कर्त्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों की अवहेलना भी निन्दनीय और दण्डनीय मानी गई है। स्वार्थान्ध व्यक्ति सदा आक्रामक ही हो और निरन्तर अपराध ही करता रहे ऐसा भी नहीं, फिर भी इस मनोरोग से पीड़ित वह व्यक्ति इतना कृपण और अनुदार हो जाता है कि उपार्जन को बन्दरिया की तरह मरे बच्चे को भी छाती से चिपकाये फिरता है। इतना नहीं सूझता कि औसत नागरिकों की तरह सादगी का निर्वाह करके कुछ बचाया जाय और उसे उन लोगों के लिए लगाया जाये जो ऐसी सहायता की कुछ बूंद पाने के लिए भी तरसते रहते और न मिलने पर पीड़ा एवं पतन का अभाव एवं पिछड़ेपन का त्रास सहते रहते हैं।

मनुष्य की अपनी गरिमा और विशेषता है। इसके साथ ही उसके ऊपर वैयक्तिक चरित्र निष्ठा और समाज गत उदार सहकारिता के उत्तरदायित्व भी जुड़े हैं। उनकी उपेक्षा अवहेलना करने पर सुसम्पन्न और समर्थ व्यक्ति भी अनाचरण के कुमार्ग पर चल पड़ता है। उद्धत अपव्यय के साथ दुर्व्यसन जुड़ जाते हैं। फिर समर्थों से सत्प्रयोजनों की जो आशा की जाती है उसकी भी उपेक्षा होती है। ऐसी अनगढ़ मनःस्थिति से घिरे हुए व्यक्ति को यदि स्वार्थान्ध कहा जाता है और उस पर सर्वजनीन तिरस्कार बरसता है तो वह ठीक ही है। स्वार्थी अपने वैभव पर इतरा तो सकते हैं, उसके सहारे गुलछर्रे तो उड़ा सकते- किसी को सता या बहका भी सकते हैं। इतने पर भी अपनी या दूसरों की दृष्टि में अपनी गरिमा सिद्ध नहीं कर सकते। अनुदारताजन्य आम-प्रताड़ना और लोक भर्त्सना की दुहरी मार उन्हें निरन्तर सहनी पड़ती है। ऐसे व्यक्ति ठिठोली तो कर सकते हैं पर आत्म संतोष की साँस लेने, अन्तरंग की प्रफुल्लता अनुभव करने का कभी अवसर ही नहीं मिलता। अपराधियों की तरह उनकी आंखें नीची ही रहती हैं। यों मूंछें मरोड़ते तो दुष्ट दुरात्मा भी देखे जाते हैं, पर शान के साथ सिर उठाकर चलना और असंख्यों का श्रद्धा भाजन बनना मात्र सज्जनों के लिए सुरक्षित है। यहाँ एक बात और नोट करने की है कि सज्जनता, शिष्टाचार बरतने या मधुर बोलने तक ही सीमित नहीं है उसके साथ चारित्रिक पवित्रता और सेवा साधना स्तर की उदारता का भी समावेश रखना आवश्यक होता है। ऐसी वास्तविक सज्जनता ही आत्म-संतोष देने और जन-साधारण से स्नेह सहयोग खींच लेने में समर्थ होती है। संकीर्ण स्वार्थपरता में यही सबसे बड़ा दोष है कि अपने साथ उच्चस्तरीय सज्जनता के पैर ही नहीं टिकने देती। जिस पर सवार होती है उसकी नकेल पकड़कर भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण की कंटीली राह पर ही चलने के लिए विवश करती है। इस विवशता के रहते कोई न ऊँचा उठ सकता है और न आगे बढ़ सकता है। टोकरी में बन्द पड़े टमाटर की तरह स्वयं भी तेजी से गलता है और जिन्हें छूता है उन्हें भी अपने साथ-साथ ही गलाता चलता है। इस प्रकार स्वार्थ साधन प्रत्यक्षतः लाभदायक दीखते हुए परोक्षतः हानि ही हानि करता चला जाता है।

मानवी प्रगति एकाकी प्रयत्नों से नहीं बन पड़ती। प्रगति तो दूर निर्वाह तक का हित साधन नहीं जुटता। कौन है जो जीवन की सभी आवश्यकताएँ स्वयं पूरी करले, अभीष्ट वस्तुएँ स्वयं ही उपार्जित करले। अन्न, वस्त्र, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, वाहन जैसी दैनिक आवश्यकताएँ भी अन्य लोगों के श्रम सहयोग से ही उपलब्ध कर सकना सम्भव होता है। गृहस्थी जमाने के लिए पत्नी की आवश्यकता होती है। वह भी किसी उदारमना ने कन्यादान करके दी होती है। आजीविका उपार्जन का तारतम्य तय बैठता है जब श्रमिकों का- ग्राहकों को सहयोग मिले। कोई पूँजी या नौकरी प्रदान करे। यह सब साधन कोई जन्म से साथ लेकर नहीं आता। समाज से ही उपलब्ध करता है। अभिभावक स्वतंत्र सज्जन उन्हें उदारतापूर्वक देते हैं और बाजार में उन्हें आदान-प्रदान के आधार पर उपलब्ध किया जाता है। जब सामान्य जीवन तक बिना जन सहयोग के नहीं चलता तो उच्चस्तरीय अभ्युदय के लिए तो उसके बिना काम नहीं चलता। महामानवों में से हर किसी को इसी राह पर चलना पड़ा है कि चरित्र निष्ठा और सेवा साधना के आधार पर अपनी गरिमा सिद्ध करें और बदले में जन सहयोग के सहारे ऊँचे उठें। सच्चा और सार्थक जन समर्थन ही महामानवों के उच्च पद पर प्रतिष्ठित कराता रहा है। तलवार के बल पर तो मात्र दैत्य ही आतंक जमाते और लूट-खसोट करते देखे गये हैं। इतने पर भी वे सद्गुणों के अभाव में न तो सुरक्षित रख पाते हैं और न उपयुक्त उपयोग कर सकने के कारण उसके सहारे कुछ सुख-चैन ही पाते हैं। इस समूची वस्तुस्थिति का पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष तक पहुँचना पड़ता है कि चिरस्थायी, महत्वपूर्ण और वजनदार प्रगति के लिए जन सम्मान और सहयोग अर्जित किया जाय। इस कमाई का एक ही सुनिश्चित उपचार है। अपनी प्रमाणिकता का परिचय देना। इसकी तीन कसौटियाँ हैं। एक चिन्तन की उत्कृष्टता, दूसरी चरित्रगत- आदर्शवादिता, तीसरी- व्यवहार में उदार आत्मीयता। इन प्रश्न-पत्रों को हल किए बिना किसी को भी इतना प्रामाणिक नहीं माना जा सकता कि जन समुदाय उसके सम्मुख श्रद्धा से मस्तक झुकाये, भावभरी श्रद्धांजलि चढ़ाये और कन्धों पर बिठाकर ऊँचा उठाये।

कौशल और वैभव का चमत्कार दिखाकर चकाचौंध भर उत्पन्न किया जा सकता है। उस कौतुक कौतूहल पर लोग तालियाँ भी बजा सकते हैं। अचम्भा देखने के लिए जमघट भी लगा सकते हैं पर जब प्रश्न श्रद्धा और सहयोग का आता है तो उठकर चले जाते हैं। नाटक अभिनय और सरकस के कारीगर कलाकार अपने नट विद्या के कारण आकर्षण के केन्द्र तो बनते हैं पर उनमें से किसी को भी उच्च पदासीन नहीं किया जाता। लाल बहादुर शास्त्री जैसे प्रामाणिक व्यक्तित्व ही लोक श्रद्धा अर्जित करते और बिना धन लुटाये, षड़यंत्र बनाये उच्चतम पद प्राप्त करते हैं। गान्धी, बुद्ध, लिंकन जैसों की व्यक्तिगत विशिष्टता ही उन्हें मूर्धन्य बनाती रही है। यह विशिष्टता और कुछ नहीं चरित्र और व्यवहार ने आदर्शों का सघन समावेश रहना भर है। महान व्यक्तित्व में सत्प्रवृत्तियां अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती हैं। दूरदर्शी सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए जो स्वार्थ सिद्धि की जो रूपरेखा बनाई जाती है उसी को परमार्थ कहते हैं।

बीज गलकर घाटे में रहा या नफे में। इसका उत्तर तात्कालिक और दूरगामी परिणामों की कसौटी पर कस कर ही दिया जा सकता है। बीज अच्छा-खासा, गोल-मटोल, चमकदार, वजनदार था। बोये जाने पर वह सड़ गल गया इसमें प्रत्यक्षतः हानि ही दृष्टिगोचर होती है। किन्तु जब इस पूँजी नियोजन के दूरगामी परिणामों पर विचार किया जाता है तो दूसरे ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। बीज राई भर आकार का था। एक सप्ताह से भी कम समय में वह कई गुने आकार वाला अंकुर बन गया। महीना पूरा भी न होने पाया था कि पत्र पल्लवों से लदा पौधा बन गया। समय बीतते देर न लगी कि उसने आश्चर्यजनक ऊँचाई तक प्रगति कर ली और फल फूलों से लद गया। एक ही फसल में सैकड़ों हजारों फल लगे और उनमें से प्रत्येक में कई-कई बीज थे। एक बीज ने गलकर यदि एक ही फसल में अपने सदृश हजारों बीज कमा लिए और हर फसल में उतनी ही उपलब्धि हस्तगत होते रहने का सिलसिला जमा लिया तो उस दूरदर्शी परिणति को देखकर यही कहा जायेगा कि बीज ने गलने की हिम्मत जुटाकर बुद्धिमता ही दिखाई। वह घाटे में नहीं रहा जैसा कि बोये जाते समय प्रतीत होता था। स्वार्थ और परमार्थ की बुराई अच्छाई इसी आधार पर परखी जानी चाहिए। एक है जो तत्काल लाभ तो देता है, पर बदले में भविष्य को अन्धकारमय बना देता है, दूसरा है जो आरम्भ में संयम बरतने और उदार बनने की कसौटी प्रस्तुत करता है, किन्तु साथ ही सही सिद्ध होने पर खरे सोने की तरह उचित मूल्य तथा सम्मान मिलता है। कसौटी से बचने पर तो खरे-खोटे दोनों का गुड़-गोबर हो जाता है। काँच और हीरा एक जैसा दीखता है।

मैत्री, श्रद्धा, प्रशंसा, आत्मीयता, सद्भावना, सहायता जैसी विभूतियों को भी यदि उपलब्धि माना जा सके। और उनके बदले अनेक कष्टों से बचने और अनेक अभ्युदयों का सुयोग बनने की बात यदि समझ में आ सके तो फिर उन्हें लूटने की नहीं खरीदने की ही बात सोचनी चाहिए। लूटने के लिए प्रपंच भी रचे जा सकते हैं। इस धूर्तता के जमाने में ऐसा ही होता भी रहता है। धर्मात्मा, सदाचारी, योगी, तपस्वी, पराक्रमी, देशभक्त, सिद्ध पुरुष के रूप में दृष्टिगोचर होने के लिए लोग कई प्रकार के प्रदर्शन, पाखण्ड रचते रहते हैं। सभा सम्मेलनों में मंच पर बैठने वाला झटकने और प्रशंसा कराने और अपने को तीस मारखां होने की डींग हाँकने की विडम्बना अब आम फहम बात हो गई है। उस फिराव में कितने ही लोग रहते हैं और इस आडम्बर को खड़ा करने में कुछ तो जेब से भी खर्च करते हैं। किन्तु देखा जाता है कि इससे कुछ नहीं बनता नहीं। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी में इतनी गिरह की अवल होती है कि वे छद्म को ताड़ सके और विडम्बना को पर्दा उठाकर देख सकें। कइयों का बहरूपियापन अनजान लोगों के बीच कुछ समय काम भी दे जाता है किन्तु मुखौटा तो मुखौटा ठहरा। पीतल के बर्तन पर चढ़ी हुई चाँदी की कलई कुछ दिन ठहरती है और असलियत प्रकट होने पर बहुत दे नहीं लगती। घटिया को बढ़िया बताने वाले कभी-कभी तो किसी-किसी पर हाथ साफ भी कर लेते हैं किन्तु भेद खुलते ही ऐसी धुनाई होती है कि सिर पर पैर रखकर भागना पड़ता है और किसी नई जगह जाल बिछाना पड़ता है। चिड़ीमार धन्धे की तरह लोक श्रद्धा बटोरने के लिए विशिष्टता की छद्म प्रवंचना इस स्तर का लाभ नहीं दे सकता, जिसके सहारे कि कोई प्रगाढ़ विश्वास प्राप्त कर सके। चिरस्थायी एवं गहरा जन सम्मान और सहयोग अर्जित करने के लिए सच्चे अर्थों में सज्जनता अपनानी पड़ती है। इसका उपाय मात्र एक ही है- अपने सम्बन्ध में कड़ाई बरतना और दूसरों के साथ उदारता का परिचय देना।

जिस चौराहे पर मनुष्य खड़ा है, उसकी सड़क दो दिशाओं में जाती है। एक शरीरगत तात्कालिक लाभों के आकर्षणों से सजी हुई जिसमें विलासिता, तृष्णा और अहन्ता की गठरी सिर पर लादकर चलना पड़ता है। अनुदार, निष्ठुरता, अपनानी और ‘मतलब से मतलब’ रखने की नीति अपनानी पड़ती है। उसका आरम्भ आकर्षक और अन्त भयावह है। चौराहे से दूसरी सड़क चलती है- आरम्भ में अपने को कसने के उपरान्त दूरगामी सत्परिणामों के लक्ष्य तक पहुँचाने वाली। इन्हीं में से एक को स्वार्थ या नरक कहते हैं और दूसरी को परमार्थ या स्वर्ग कहा जाता है। बात जादू के खेल जैसी है, जिसमें भ्रमवश कुछ का कुछ दीखता है। उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए जब लोहा भट्टी में प्रवेश कर सकता है, जननी को प्रसव पीड़ा सहने और छाती का दूध निचोड़ने में आपत्ति नहीं होती तो जिन्हें समझदारों जैसी सूझ-बूझ उपलब्ध है, वे भी बचत करने, बैंक में डालने और हर पाँच वर्ष में पूँजी दूनी करते-करते बीस-तीस वर्षं में हजार को लाख बना लेने वाली नीति अपनाते हैं। परमार्थ में थोड़ा-सा लगाकर स्वार्थ सिद्धि का ऐसा लाभ दिलाते हैं जिस पर गर्व किया जा सके।

बाजार में कोई भी वस्तु मुफ्त नहीं मिलती। सभी को कीमत चुकानी पड़ती है, यदि प्रगाढ़ मित्रता और सघन सहकारिता अर्जित करने में किसी को कमाई एवं भलाई दीखती हो तो उसे लूटने, झपटने की चतुरता बरतने से काम न चलेगा। वरन् सही मूल्य पर सही वस्तु खरीदने की नीति अपनानी पड़ेगी। यह कार्य परमार्थ की पूँजी लगाकर ही सम्भव हो सकता है। स्वार्थी के पास कितनी ही सुविधाएँ क्यों न हों उससे कभी भी किसी को सघन आत्मीयता का रसास्वादन करने जैसा सुयोग मिलता नहीं। निष्ठुरता और उद्दण्डता अपनाकर जिनके लिए कमाई की गई थी वे कुटुम्बी तक उनके प्रति आन्तरिक सद्भावना नहीं रखते। मतलब सिद्ध होने में कमी पड़ने पर आंखें बदलने लगते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि स्वार्थ परायण वस्तुतः किसी का सगा नहीं होगा। तथाकथित अपनों का भी नहीं- मित्र, कुटुम्बियों का भी नहीं। इस निकृष्टता से अवगत रहने के कारण ऐसे लोगों को अपनों द्वारा भी बारम्बार ठगा, दबाया और सताया जाता है। उन्हें हमेशा हरेक से यही शिकायत रहती है कि दुनिया स्वार्थियों से भरी है और जेब काटने फिरती है।

वस्तुतः ऐसा होता नहीं। यह दुनिया का एक बड़ा दर्पण है जिसमें हम अपना ही स्वरूप देखते हैं। यह संसार एक पोला गुम्बज है जिसमें अपनी ही आवाज प्रतिध्वनि बनकर गूँजती रहती है। हम यदि स्वार्थी हैं तो उसी प्रकृति के लोगों से घिरे रहेंगे और उनसे जिस प्रकार के व्यवहार की सम्भावना रहती है वैसा ही कुछ भुगतते रहेंगे। परमार्थ का चुम्बकत्व सज्जनता को खींच डालता है वह अपने लिए एक ऐसे संसार, समुदाय एवं वातावरण की रचना करता है जिसके सहारे सुख-शान्ति और प्रगति प्रसन्नता का अनुभव हर घड़ी होता रहे।

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