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Magazine - Year 1984 - Version 2

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मस्तिष्कीय अन्तराल का रहस्यमय संसार

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विद्वान, लेखक, कलाकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक, व्यवसायी, उद्योगपति, राजनेता आदि के रूप में मनुष्य का बाह्य स्वरूप उसके चेतन मस्तिष्क की चमत्कृति भर है। भौतिक जगत में इन विभूतियों की सामर्थ्य से हर कोई परिचित है। परन्तु इससे परे अचेतन मस्तिष्क का भी अस्तित्व है, जिसे रहस्यों का पिटारा कहा जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों ने भी इस बात को स्वीकारा है कि अचेतन मस्तिष्क चेतन मस्तिष्क से कहीं अधिक रहस्यपूर्ण और विलक्षण क्षमताओं से सम्पन्न है। इन्हें अभी जाना नहीं जा सका, न इनके कारणों का विश्लेषण सम्भव हो पाया है।

जैसा कि सुविदित है, अचेतन मस्तिष्क की सामर्थ्यों का मात्र सात प्रतिशत ही अब तक मनोवैज्ञानिकों को ज्ञात है। उनके अनुसार यह कहा जाता है कि अभिरुचि, प्रकृति, सीखा हुआ स्वभाव और चिरसंचित आदतों की मूलभूमि अचेतन मस्तिष्क ही है। पर मनोवैज्ञानिकों ने इसे संसार का सर्वाधिक रहस्यमय, अद्भुत तथा शक्तिशाली यन्त्र बताया है तथा यह कहा है कि यदि इसके गूढ़तम अविज्ञात रहस्यों को प्रकट किया जा सका तो उस मनःशक्ति के सहारे संसार की आज की तुलना में हजार गुनी अधिक प्रगति सम्भव हो सकेगी। व्यक्ति की मनःशक्ति के सहारे ही वह कार्य सम्भव हो सकेगा जो आज याँत्रिकी के द्वारा किया जाता है। इसे वैज्ञानिक साइकोसाइबर्नेटिक्स विधा नाम देते हैं।

अतींद्रिय विद्या के ज्ञाताओं ने अपने अनुभवों के आधार पर बताया है कि प्रायः चेतन मस्तिष्क में उथल-पुथल मची रहने के कारण हमें अचेतन मस्तिष्क की सामर्थ्यों का बोध भी नहीं हो पाता है। समुद्र में ऊपर तो तरंगें नजर आती हैं लेकिन उनके विकराल रूप से न घबराकर गहराई में डुबकी लगाकर जाने वाले गोताखोर बहुमूल्य रत्नराशि खोज निकालते हैं जो जानकारी के अभाव में समुद्र तल में पड़ी रहती है। लगभग यही स्थिति मस्तिष्क की है। उसका उपयोग तो हम कर भी नहीं पाते। परन्तु चेतन मस्तिष्क को शाँत व नियन्त्रित किया जा सके तो अचेतन मस्तिष्क की जागृति हो सकती है तथा उसकी विलक्षण विभूतियों से लाभान्वित होने का अवसर हमें मिल सकता है। अभी जो कुछ भी ई.ई.जी. द्वारा ज्ञात किया जा सका है, वह चेतन मस्तिष्क का विद्युत तरंग प्रवाह मात्र है। इसे मस्तिष्कीय विद्युत का 13 प्रतिशत भाग माना जाता है।

आमतौर से दैनिक जीवन में शब्द, ध्वनि और दृश्य का बोध हमारा चेतन मस्तिष्क ही करता है। परन्तु कभी ऐसा भी अवसर आता है जब चेतन मस्तिष्क को इसका बोध नहीं हो पाता है। ऐसी स्थिति चेतन मस्तिष्क की सामर्थ्य से परे की ध्वनि या दृश्य प्रकट होने अथवा उसके सुषुप्तावस्था में होने पर उत्पन्न होती है। इस अवस्था में अचेतन मस्तिष्क जागृत रहता है। उसे ही शब्द, ध्वनि अथवा दृश्य का गहरा बोध होता है। तथा उसका प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। साथ ही इस माध्यम से मानसोपचार भी सम्भव हो सकता है।

प्रयोगकर्ताओं के एक दल द्वारा 1977 के ग्रीष्म काल में फोर्टली- न्यूजर्सी के ग्राहकों को एक प्रोजेक्टर के माध्यम से ‘लावा खाओ और कोका-कोला पीओ’ का सन्देश प्रत्येक पाँच सेकेंड पर पूरे फिल्म के दौरान प्रेषित किया गया। चेतन मस्तिष्क के लिए यह सन्देश उतना महत्वपूर्ण नहीं था परन्तु अचेतन मस्तिष्क में यह अत्यन्त विस्मयकारी परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हुआ। शीघ्र ही बाजार में लावा की बिक्री में 5.75 प्रतिशत तथा कोका कोला में 38 प्रतिशत की वृद्धि आँकी गई।

लुइसियॉना विश्व विद्यालय के मेडिकल इलेक्ट्रानिक्स के वैज्ञानिक डा. हॉल ब्रेंकर ने अपने इस तरह के प्रयोग के लिए “टैकिस्टोस्कोपीक प्रोजेक्शन” नामक उपकरण का विकास किया है। उनने अपने रोगियों के ऊपर “आई एम ऑनेस्ट, आइ विल नॉट स्टील। इट इज रांग टू स्टील। इफ आइ स्टील आइ विल गैट कॉट।” ( मैं ईमानदार हूँ, मैं चोरी नहीं करूंगा। चोरी करना पाप है। यदि मैंने चोरी की, तो पकड़ा जाऊँगा।” ) का सन्देश सम्प्रेषित करवाया। परिणाम स्वरूप रोगियों के व्यवहार में अभूतपूर्व अनुभव किये गये। इसे स्वसम्मोहन प्रक्रिया कही जाय अथवा अचेतन का प्रशिक्षण, वस्तुतः यह आध्यात्म प्रयोगों की क्रिया पद्धति की ही एक अनुकृति है।

मिशिगन विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक हॉवर्ड शेवरीन ने अचेतन रूप में प्राप्त विभिन्न सन्देशों का मस्तिष्कीय तरंगों के ऊपर प्रभाव का अध्ययन एक संवेदनशील ई.ई.जी. मशीन से किया। ब्रूकलीन कॉलेज के मनोवैज्ञानिक मैथ्यू इरडेली ने भी ऐसे सन्देशों के पुनः आवर्तन का प्रयोग अनेक रोगियों के ऊपर सम्भाषण तथा दिवा स्वप्न के दौरान किया है। उक्त दोनों ही प्रयोगों से अचेतन मस्तिष्क की क्षमताओं की यथार्थता प्रामाणित की जा सकी है। ई.ई.जी. उपकरण से डी.सी. पोटेन्सियल ज्ञात कर बायोफीड बैक द्वारा विधेयात्मक परामर्श बार-बार विद्युत तरंगों के रूप में देने का प्रयास अब किया जा रहा है, जिसकी सफलता बताती है कि योग साधनाओं में अचेतन मस्तिष्क का नियन्त्रण सुनियोजन कितना तर्क सम्मत व वैज्ञानिक है।

न्यूयार्क विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक लॉयड सिल्वरमैन ने “मम्मी एण्ड आइ आर वन” (माँ और मैं एक हैं) का सन्देश कई रोगियों को नित्य पाँच मिनट सम्प्रेषित किया। स्क्रीन के ऊपर यह सन्देश इतनी तीव्रता से दिखाया जा रहा था कि चेतन मस्तिष्क के ऊपर उसका कोई प्रभाव नहीं होता परन्तु ऐसे दस वर्ष के प्रयोग का प्रतिफल शरीर का वजन कम करके मनोविकारों से मुक्ति दिलाने, मद्य-धूम्रपान की आदत छुड़ाने तथा पढ़ाई में अच्छी प्रगति करने के रूप में दृष्टिगोचर हुआ है। 1975 में किए गये एक प्रयोग में 30 महिलाओं का मोटापा घट गया एवं वे तनावमुक्त भी हुईं। 1979 में मोन्टाना विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों ने सिल्वरमैन प्रणाली अपनाकर कितनों को इसी प्रकार का सन्देश दे-देकर सिगरेट पीना छुड़वाया।

अपने प्रयोग-प्रतिफलों को देखकर सिल्वरमैन ने उन लोगों को चुनौती दी है, जिनने फ्रायड के अचेतन मस्तिष्क की प्रभाव क्षमता से सम्बन्धित सिद्धान्त को एक कल्पना बताया है, कोई आविष्कार या प्राप्ति नहीं। दूसरी तरफ वेसिलयन विश्वविद्यालय के डा. नाथन ब्रोडी ने अपनी ‘एनुअल रिव्यु ऑफ साइकोलॉजी 1980’ नामक पुस्तिका में तो अचेतन मस्तिष्क को मनोविश्लेषण प्रक्रिया में अत्यन्त सहायक बताया। उनका कथन है कि “फ्रायड के मनोविज्ञान के एकाँगी पक्ष यौन प्रवृत्ति को ही उभारा गया जबकि अचेतन सम्बन्धी उनका मत अपने विधेयात्मक रूप में काफी हद तक सही भी ठहराया जा सकता है। उभारा उसे जाना चाहिए था जिससे व्यक्तित्व का विकास होता है न कि उसे जिससे कुण्ठाएँ पनपती हों।”

प्राचीन काल से ही संगीत का उपयोग भी मनःचिकित्सा के लिए इसी रूप में किया जाता रहा है। वैदिक काल में सामवेद की रचना संगीत के मन पर विलक्षण प्रभाव को देखकर ही की कई थी। ऋषियों ने संगीत का प्रयोग अपने ही मन को नियंत्रित करने से लेकर अन्तराल में छिपी ऋद्धि-सिद्धियों के जागरण हेतु किया था तथा महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की थी। ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व ज्यामिती के विद्वान पाइथागोरस ने मनःचिकित्सा में संगीत की उपयोगिता प्रामाणित की थी। सीरिया के एक प्रवक्ता लैम्बलीकस ने कहा था कि मानसिक तनाव तथा आतुरता के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई व्याधियों के उपचार में संगीत की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कैम्पवेल ने अपने प्रयोगों के आधार पर बताया है कि विभिन्न दृश्यों का भी मनुष्य के अवचेतन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उनने कहा कि दृश्यों के आधार पर अवचेतन मस्तिष्क एक विशेष प्रकार की विद्युतीय रसायन प्रक्रिया सम्पन्न करता है, जिससे समस्त शरीर प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।

कैम्पवेल ने प्रज्ज्वलित दीपक के समक्ष किसी व्यक्ति को बिठाकर यह प्रामाणित किया कि गहन आनन्द की आवृत्तियां उतने समय में बनती हैं एवं मनुष्य परम शान्ति का अनुभव करता है। त्राटक प्रयोग में वस्तुतः बिन्दु साधना द्वारा यही किया जाता है। एकाग्रता तल्लीनता सम्पादन के साथ-साथ उच्छृंखल विचारों पर नियन्त्रण एक बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अमेरिका के लेसली एम. लीक्रान ने भी प्रयोगोपरान्त प्रज्वलित दीप शिखा का रोगोपचार तथा मनःचिकित्सा में महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध किया है, चर्चों में मोमबत्ती जलाकर उपासना करने एवं पारसियों द्वारा अग्नि पूजा के पीछे यही मनोवैज्ञानिक महत्व है।

भारतीय योग विद्या के आचार्यों ने प्राचीन काल में ही प्रत्याहार, ध्यान-धारणा जैसी प्रक्रियाओं को अपनाकर अचेतन मस्तिष्क को जागृत करने में सफलता अर्जित की थी। इससे उनने दूर-दर्शन, दूर श्रवण, विचार सम्प्रेषण, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्षीकरण आदि कितनी ही अद्भुत क्षमताएँ हस्तगत की थीं। बाह्य तथा अंतर्जगत दोनों ही क्षेत्रों में वे समर्थ एवं सिद्ध साबित होते थे। पुनः उन्हीं प्रक्रियाओं का अवलंबन लेकर आज भी इसकी पुनरावृत्ति सम्भव है। तभी आज का, मन की दृष्टि से दीन-हीन व्यक्ति, अपने अन्तरंग में सन्निहित शक्ति के विशाल भण्डार से परिचित हो सकता है तथा उसका उपयोग करके देवोपम जीवन जी सकता है।

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