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Magazine - Year 1984 - Version 2

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बुढ़ापा, जवानी से कम सुखद नहीं

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यह सोचना सही नहीं है कि जवानी में खुशी रहती है और बुढ़ापे में निराशा चढ़ी रहती है। दोनों का अपना अपना महत्व और रस है। उनमें थोड़ी भिन्नता तो है फिर भी गाड़ी के दो पहियों की तरह परस्पर जुड़ी हुई भी है। जवानी का उपार्जन बुढ़ापे को सुसम्पन्न बनाता है। और ढलती उम्र में उस सम्पदा के सदुपयोग का सही समय आता है जिसे जवानी में कमाया गया था। जवानी में पहाड़ पर चढ़ने जैसा जोश रहता है, पर बुढ़ापे पर उस शिखर पर पहुँचने के उपरान्त उन दूरवर्ती दृश्यों का सौंदर्य दीख पड़ता है जो चढ़ते समय दृष्टि में आया ही नहीं।

रात्रि महत्वपूर्ण या दिन, यह कहना कठिन है। यों दिन चमकता और श्रम करने का अवसर प्रदान करता है किन्तु यदि विश्राम वाली रात का अस्तित्व न रहे तो सभी थकान से जर्जर होकर मर मिटे। खाना लाभदायक है। पर उसे पचाने का समय और समर्थ तन्त्र भी तो चाहिए। बुढ़ापे में बढ़ी हुई बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और अनुभवशीलता इतनी गौरवमयी है कि शरीर पर थोड़ी थकान आने पर भी उसे जवानी में कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही उपयोगी माना जा सके।

उपार्जन और उपभोग के लिए जवानी का जोश आवश्यक होता है। ठण्डा पड़ने पर वे दोनों ही घट जाते हैं। इतने पर भी उनके स्थान पर जो दो नई चीजें उगती हैं। वे भी ऐसी नहीं है जिन्हें घटिया ठहराया जा सके। अनुभवों का संचय सही निर्णय तक पहुँचने में सहायता करता है। तब उचित और अनुचित की परख करने योग्य विवेक और सन्तुलन भी हस्तगत होता है। इनके अभाव में जवानी भूल पर भूल करती चली जाती है। जोश चढ़ती उम्र में रहता है। तो होश उसमें ढलान आने के बाद उत्पन्न होता है। दोनों का समन्वय एकीकरण तो कदाचित ही कहीं देखा जाता है। जीवन की सफलता में इन दोनों की ही आवश्यकता है।

शरीर की क्षमता ढलती उम्र में घटती है। इसलिए काम करना होता है। इसका लाभ यह है कि समय खाली बच जाता है और सोचने के साथ-साथ ऐसा कुछ करने का अवसर मिलता है जिसके लिए कठिन श्रम करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बौद्धिक कार्य ऐसे हैं जिन्हें करने के लिए कड़ी मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती। अनुभवहीनता के कारण युवावस्था पर अप्रामाणिकता की छाया रहती हैं। उस समय जो कहा जाता था उसे वजनदार होते हुए भी लड़कपन कहकर हँसी में उड़ाया जाता था पर बुढ़ापे के सम्बन्ध में यह बात नहीं है।

जवानी चले जाने पर उसके लिए पछताना ऐसा ही है जैसा कि जवानी आने पर चले गए बचपन के लिए रोना मचलना। जब विद्यार्थी अगली कक्षा में चढ़ने पर खुशी मनाता है और पिछली कक्षा छूट जाने का रंज नहीं करता तो वयोवृद्धों को भी क्यों इसका दुःख मनाना चाहिए कि जवानी चली गई। जो सामने है उसका महत्व समझना और सदुपयोग करना ही बुद्धिमानी है। बुढ़ापा उतना निरर्थक नहीं जिसके आगमन पर शोक मनाया जाये और सब कुछ छिन गया, ऐसा सोचा जाये।

बुढ़ापा तब भारी पड़ता है जब जवानी में उसके आगमन की पूर्व तैयारी नहीं की गई होती। अप्रत्याशित आधमकने वाले मेहमान से परेशानी हो सकती है, पर पूर्व सूचना मिलने पर प्रतीक्षा और तैयारी का अवसर देकर जो मेहमान आता है उससे प्रसन्नता ही होती है। बुढ़ापे को सम्मानित अभ्यागत माना जाय और उसके सत्कार का पूर्ण प्रबन्ध रखा जाय तो अनख लगने जैसे कोई बात होती नहीं।

जवानी की अनुभव हीनता में बरती गई हरकतों की उन दिनों दर-गुजर होती रहती है पर वयोवृद्धों को अपनी बढ़ी-चढ़ी हैसियत का ध्यान रखते हुए, गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता के उत्तरदायित्वों का अधिक मात्रा में निर्वाह करना पड़ता है। बुढ़ापे की गरिमा भी इसी में है। वह सुखद और सम्मानास्पद इसी आधार पर बनता है।

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