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Magazine - Year 1998 - Version 2

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नवधा भक्ति में निहित है सभी साधनाओं का सार

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भक्तियोग के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्रभु श्रीराम एवं भक्त शबरी के संवाद के माध्यम से जो प्रतिपादन श्रीरामचरितमानस में किया है, वह अपने आप में अनूठा है। शबरी जो कोलो की शबर जाति के मुखिया की बेटी थी, उसको भगवान ने पात्र बनाया नवधा भक्ति की व्याख्या के लिए, यह तथ्य चौंकाने वाला है आज के विषमता भरे युग में। प्रभु को पाने की आकुलता-विकलता हो तो लिंगभेद, जातिभेद, ऊँच-नीच का भेद कुछ भी आड़े नहीं आता।

भगवान इस नवधा भक्ति का वर्णन करने से पूर्व शबरी से कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति जाति-पाँति कुल-धर्म बड़प्पन, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता इन सभी की दृष्टि से ऊँचा होते हुए भी यदि भक्तिहीन बादल की तरह शोभारहित दिखाई पड़ता हैं इतना महत्व दिया है मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी ने।

प्रथम भक्ति इस नवधा भक्ति के अंतर्गत संतों के सत्संग के रूप में वर्णित की गयी है। साधुओं के, श्रेष्ठजनों के सत्संग से हमारी जड़ता-मूढ़ परंपरागत मान्यताएँ टूटती हैं एवं हमें होश आता है कि जिन्दगी कुछ अलग ढंग से अपने आपको सुव्यवस्थित बनाकर जी जा सकती है। सत्संग में प्रथम कोटि का सत्संग है, सत्य का, परमात्मा का संग। यह सर्वोच्च कोटि का सत्संग बताया गया है, जो कि समाधि की स्थिति में परमात्मसत्ता से एकात्मता स्थापित करके मिलता है। दूसरी कोटि का सत्संग वह है जो सत् तत्व से आत्मसात् हो चुके महापुरुषों के साथ किया जाता है। ऐसे व्यक्ति वे होते हैं, जिनके पास बैठने पर हमारे अंतःकरण में ईश्वर के प्रति ललक-जिज्ञासा पैदा होने लगे। आज ऐसे व्यक्ति बिरले ही मिलते हैं, अतः तीसरी कोटि का सत्संग उनके विचारों का सामीप्य, महापुरुषों द्वारा लिखे गए अमृतकणों का स्वाध्याय भी उसकी पूर्ति करता है।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि “गंगाजी की तरफ जाते ही शीतलता सहज ही मिलने लगती है।” महापुरुषों के चिन्तन की ओर उन्मुख होते ही तपते मन को शांति मिलती है। संतों के सत्संग की जब बात होती है और जब ‘प्रथम भक्ति संतन कर संग’ की व्याख्या करते हैं तो लगता हैं कि संत की परिभाषा भी होनी चाहिए। गोस्वामी जी के शब्दों में-

सठ-सुधरहिं सत संगति पायी। पारस परसि कुधातु सुहाई॥

अर्थात् संतों का संग पाकर जड़-मूर्ख-बदमाश भी सुधर जाते हैं यथा पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है। संत उन्हें कहा जाता है, जो व्यक्ति को परमात्मा का प्रकाश दिखा दें-उसे आत्मा की ओर उन्मुख कर दें, सद्गुरु से परिचय करा दें। संतों का हृदय नवनीत के समान होता है। जीवमात्र के प्रति उनके मन में दया होती है-अगाध प्रेम होता है। हम परमपूज्य गुरुदेव का स्मरण ऐसे संत के रूप में करते हैं, जिनके सान्निध्य में आकर अनेकों लोग बदलते चले गए, उनके दुख मिटते चले गए। सत्संग की महिमा अपरम्पार है एवं जिसे यह प्राप्त हो गया, वह नवधाभक्ति के प्रथम प्रसंग के माध्यम से भगवत्कृपा का पात्र बन गया।

दूसरी भक्ति भगवान श्रीराम ने इस प्रसंग में बतायी है-दूसरी रति मम् कथा प्रसंगा। अर्थात् मेरे (भगवान के) कथा प्रसंगों में प्रेम-अभिरुचि भगवान ने श्रीमद्भागवत में कहा है-मैं वहाँ रहता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरी चर्चा करते हैं। भक्ति साधना में सबसे सुलभ मार्ग है-भगवान के लीला-प्रसंगों का चिंतन कर-गुणगान कर उनमें मन को लगा देना। देखा जाय तो आर्ष साहित्य में लोकमानस को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, पुराणों के कथा-प्रसंगों ने, जिनमें या तो भक्त की कथा है या भगवान की। आदमी के मन को भगवान के स्वरूप में लीन करने की इनमें जबर्दस्त शक्ति है। श्रीमद्भागवत सर्वाधिक लोकप्रिय है। देवी भागवत एवं रामचरितमानस का भी लगभग इसी के समकक्ष स्थान है। परमपूज्य गुरुदेव ने प्रज्ञापुराण को प्रचलित कर कथा-साहित्य को नए आयाम दिए। भगवद्भक्ति की ओर उन्मुख करने वाले कथा-प्रसंग लोकमानस को छूते हैं-भावसंवेदना जगाते हैं एवं कल्याण का पथ प्रशस्त करते हैं। इस भक्ति का एक श्रेष्ठतम उदाहरण अभिमन्यु पुत्र राजा परीक्षित द्वारा अपने जीवन के अंतिम क्षणों में श्रीमद्भागवत कथा को सुनकर मोक्ष को प्राप्त होना है। ऐसा कहा जाता है कि इनके युग में कलियुग आया एवं उनके द्वारा बताये चार स्थानों (द्यूतक्रीड़ा, व्यभिचार, चोरी, स्वर्ण) में से स्वर्णमुकुट में आकर विराजमान हो गया। कलियुग के अधिष्ठित होने का भाव है-बुद्धि का तापसी हो जाना। एक तपस्यारत ऋषि से पानी माँगने व उनकी समाधि में लीन स्थिति को उपेक्षा मानकर राजा परीक्षित द्वारा उनके गले में मरा सर्प डालने पर ऋषिपुत्र द्वारा श्राप दे दिया गया था कि एक सप्ताह में वे मृत्यु को प्राप्त होंगे। शाप अटल था। अब प्रश्न यह था कि मृत्यु को उत्तम कैसे बनाया जाय? परीक्षित सोचने लगे कि मरे तो ऐसी मृत्यु कि ईश्वर में लीन हो जाएँ। गीता में प्रसंग आया है।-

यं यं वापि स्परन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तकेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

अर्थात् जिस-जिस भाव स्मरण करते हुए प्राणी शरीर को छोड़ते हैं, उसी भाव को वे प्राप्त हो जाते हैं।

यही विचार कर ऋषिगणों से परामर्श कर शुकदेव जी से भागवत कथा सुनने का निश्चय किया। शुकदेव जी ने भक्ति में विभोर होकर कथा सुनायी। परीक्षित ने भी श्रद्धायुक्त होकर कथा सुनी। परीक्षित फूल में छिपे तक्षक द्वारा काटे जाने के बाद सायुज्य मुक्ति को प्राप्त हुए। तब से ही श्रीमद्भागवत सप्ताह का प्रचलन है। आज के युग में परिस्थितियाँ बड़ी विषम है। स्थान-स्थान पर कथा-आयोजन होते देखे जाते हैं, अनेकानेक कथावाचक व महात्मा आयोजनों में बोलते, टीवी पर भी कहते देखे-सुने जा सकते हैं, परन्तु कथा में प्रभाव नहीं है। कारण मात्र यह है कि कथावाचक का आदर्श शुकदेव समान हो, सुनने वाला भी परीक्षित जैसा होना चाहिए। भगवत् कथामृतों में भगवान के दिव्य लीलाओं का वर्णन ही है एवं यह भावपूर्वक सुनना, मनन करना नवधा भक्ति के दूसरे प्रसंग में आता है।

तीसरी भक्ति है-अभिमानरहित होकर गुरु के चरणकमलों की सेवा। (गुरुपद पंकज सेवा तीसरी भक्ति अमान) गुसाईं जी का इस भक्ति के वर्णन से तात्पर्य है-गुरु ही ब्रह्मा-शिव-विष्णु हैं उनके प्रति सर्वस्व समर्पण जब तक नहीं होगा, भक्ति नहीं सधेगी। गुरु की पहली चोट भक्त के, साधक के अहंकार पर ही होती है। सामान्यतया हम गुरु को सामान्य मनुष्य मान बैठते हैं। गुरु इन्सान जैसा दीखता अवश्य है, क्योंकि उसे संवाद स्थापित करने के लिए, लीलासंदेह के लिए मानवी चोला पहनना ही पड़ता है। श्री अरविंद कहते थे-गुरु की चेतना का शिष्य में अवतरण होता है। यह तभी हो पाता है जब शिष्य की चेतना भी शिखर पर हो। गुरु के लिए उनने ‘डिसेण्डिंग कांशसनेश तथा शिष्य के लिए ‘एसेण्डिंग कांशसनेश शब्द इसीलिए प्रयुक्त किया है। जब तक अहं नहीं गलेगा, अभीप्सा तीव्रतम नहीं होगी, गुरुकृपा अवतरित नहीं होगी। गुरु अपने धरातल से काफी दलदल में फँसे शिष्य को उबारकर ऊपर ले जाता है। गुरु की सेवा अर्थात् स्वयं भगवान की, सच्चिदानन्द परमेश्वर की सेवा। ऐसा व्यक्ति स्वयं ईश्वर को पा जाता है। उसके लिए कुछ भी असंभव-असाध्य नहीं रहता।

श्री अरविंद के एक शिष्य थे चंपकलाल। उनका स्वभाव था श्री अरविंद के दैनन्दिन कार्य में उनकी सेवा में ही स्वयं को नियोजित करना। १९२६ का प्रसंग है-उनने श्री अरविंद से पूछा-एक शिष्य के नाते हमारा क्या कर्त्तव्य हैं हमारे लिए निर्देश बतायें। योगीराज बोले-तुम्हारे लिए एक ही काम है, तुम हमेशा चुप रहना। बहुत कम बोलना। हमारे पास रहते हो तो लोग तुम से हमारे बारे में पूछेंगे। कुरेद-कुरेद कर जीवनचर्या के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे। तुम चुप ही रहना। चंपकलाल ने इसे गिरह बाँध लिया। १९२६ से १९५० तक वे मौन रहे। जब श्री अरविंद ने समाधि ली तो उनने उठकर चंपकलाल को छाती से लगाया- चंपकलाल, मेरे बेटे! मैं तुम्हें आशीर्वाद देकर जा रहा हूँ।” इस कृपास्पर्श ने चंपकलाल को महायोगी-सिद्धसाधक बना दिया। श्री अरविंद के महाप्रयाण के बाद अमेरिका की ‘श्री अरविंद सोसायटी’ ने श्री चंपकलाल को वार्षिक बैठक में बुलाया। श्री माँ ने कहा-तुम चले जाओ। बोलोगे तुम अपने व्रत के कारण बिल्कुल नहीं। मात्र खड़े होकर श्री अरविंद का ध्यान कर लेना। उनने ऐसा ही किया। सभी को अनूठी तृप्ति मिली। संदेश मिला कि उनको क्या युगधर्म निबाहना चाहिए। चंपकलाल की वाणी’ नामक पुस्तक जो श्री अरविंद आश्रम से प्रकाशित हुई है, पढ़कर अनुमान लगाया जा सकता है कि गुरु की सेवा से बिना पढ़ा-लिखा भक्त भी कैसे साधना की उच्चतम सोपानों पर पहुँच सकता है। मानरहित गुरु की भक्ति साधक को सब कुछ दे सकने में समर्थ है गुरु शिष्य के, भक्त के बने बनाए व्यक्तित्व को कूट-कूट कर मिट्टी बनाकर उससे एक नया खिलौना बनाता है, यदि वह उसके प्रति पूर्ण समर्पित हो जाय। परमपूज्य गुरुदेव इसी को गलाई-ढलाई धुलाई-रँगाई नाम से संबोधित करते थे।

नवधा भक्ति के अंतर्गत चौथी भक्ति है-कपट छोड़कर गुणसमूह का गान। (मम गुण गण करइ कपट तजि गान) श्रीमद्भागवत में परीक्षित से श्री शुकदेव जी ने कहा है-हे राजन! कलियुग में अनेकों दोष हैं, पर एक महान गुण है। इस युग में भगवान के संकीर्तन से व्यक्ति मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है। भगवद् गुणगान संकीर्तन की चार पारस्परिक पद्धतियाँ हैं- हनुमदीय शाँभवीय, नारदीय, वैयासकीय। हनुमदीय पद्धति में भगवन्नाम जप मस्ती में मस्त होकर किया जाता है। स्वरताल बिगड़ जाय, कोई बात नहीं। प्रेम का मूल्य ज्यादा होता है शाँभवीय पद्धति में स्वरताल के साथ नृत्य का भी योगदान होता है। नारदीय पद्धति में वाद्ययंत्रों के साथ ताल-मृदंग आदि के साथ झुण्ड बनाकर संकीर्तन किया जाता है। वैयासकीय पद्धति में कथा के साथ-साथ बीच में संकीर्तन भी चलता है।

भगवान ने गीता में कहा है-

अपिचेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभक्। साधुरेव स मन्तव्यः सभ्यग्व्यसितो हि सः॥

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रति जानीहि न में भक्तः प्रणश्यति॥

अर्थात् यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है। वह भजन के प्रभाव से शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और परमशान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन! मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

संकीर्तन भक्ति से कैसे लोग बदलते हैं, वातावरण बदलता है-इसका सबसे बड़ा उदाहरण है-चैतन्य महाप्रभु द्वारा की गयी बंगक्षेत्र में महाक्रान्ति। बंगाल को कीकर देश माना जाता था। कहा जाता था कि समस्त तीर्थों का फल बंगाल जाने से समाप्त हो जाता है। भगवन्नाम संकीर्तन ने बंगाल की भूमि को उर्वर बना दिया।

वहाँ महामानव जन्म लेने लगे। पापी व्यक्ति भी भावों के प्रवाह से उबर गए। वस्तुतः कपट छोड़कर भक्ति की जो बात भगवान ने कही है उसे समझना जरूरी है। कपट छोड़ने के बाद ही अंदर से भावों का समुद्र उमड़कर आता है। भावसमाधि सर्वोच्च अवस्था है जो भगवत् कीर्तन से शीघ्र ही प्राप्त हो सकती है।

पाँचवीं भक्ति है-मेरे (भगवान के) मंत्र का जाप और मुझमें (परमात्मा में) दृढ़ विश्वास। (मंत्र जाप दृढ़ विश्वास-पंचम भजन सो वेद प्रकाश)। मंत्र का माहात्म्य समझकर भावपूर्वक परमात्मसत्ता में विश्वास रख जब जप किया जाता है, तो वह भक्ति का पाँचवाँ सोपान ही नहीं बन जाता-सिद्धि का मूल भी बनता है जप में लम्बी साधना की नहीं, गहरी साधना श्रद्धा-विश्वासपूर्वक किये जाने की सर्वाधिक आवश्यकता है।

मंत्र की व्याख्या हेतु महार्थमंजरी में वर्णन आया है-शक्ति के वैभव विकास में मननयुक्त अपूर्णता से त्राण करने वाली, विश्व-विकल्प (दुनियादारी) की झंझटों से मुक्ति दिलाने वाली अनुभूति ही मंत्र है।”

भगवान कहते हैं- जपात सिद्धि जपात सिद्धि जपातसिद्धिर्नसंशया। (जप से निश्चित ही सिद्धि ही मिलती है, इसमें कोई संशय नहीं।)

ईश्वर को संबोधित-निवेदन ही मंत्र है। चाहे वह नमो भगवते वासुदेवाय हो, नमः शिवाय हो अथवा गायत्री मंत्र के रूप में सद्बुद्धि की अवधारणा की प्रार्थना-जप यदि विश्वासपूर्वक किया जाय तो निश्चित ही फल देता है।

योगदर्शन का सूत्र है-तद् जपस्य तदथ्रभावनम्’ अर्थात् मंत्र का जप उसकी भावना, उसके देवता पर प्रगाढ़ भक्ति रखकर करना चाहिए। यदि मंत्र की सामर्थ्य पर जिस गुरु ने मंत्र दिया है, उसकी सत्ता पर एवं मंत्र के देवता पर विश्वास रख निरन्तर जप किया जाय, तो मंत्र की सामर्थ्य असंख्य गुनी हो जाती है।

नवधा भक्ति में छठवीं भक्ति हैं-इंद्रियों का निग्रह, अच्छा चरित्र, बहुत कार्यों से वैराग्य और निरन्तर संतपुरुषों के आचरण में निरत रहना। (षट् दम शील-विरति बहुकर्मा-निरति निरन्तर सज्जन धर्मा)। दम का अर्थ है-संकल्पपूर्वक हठ के साथ अपने ऊपर नियंत्रण। मानसिक संयम सधते ही शारीरिक स्वयमेव सध जाता है। दम अर्थात् आत्मानुशासन प्रबलतम स्तर पर। इंद्रियों पर ताले लगा लेना ताकि अंतर्मुखी होकर इंद्रियों की संरचना में हम फेर-बदल कर सकें। इसी पक्ष की महत्ता बताते हुए, परमपूज्य गुरुदेव ने विचारसंयम, इन्द्रियसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम चारों पर जोर दिया एवं अस्वाद व्रत के माध्यम से उसका शुभारंभ करने को कहा, ताकि सभी क्रमशः सध सकें। दम के बाद ही अंतर्जगत में शान्ति का पथ प्रशस्त हो पाता है। दम के बाद इस भक्ति में भगवान श्रीराम ने शील की चर्चा की है। अश्लील का उलटा है शील। शील अर्थात् शालीनता का निर्वाह। शीलव्रत की चर्चा शास्त्रों में आती है। जब पति-पत्नी सद्गृहस्थ के रूप में परस्पर सहमति से संयम-पूर्वक जीवनयापन करते हैं, तो इसे शीलव्रत कहते हैं। अमर्यादित काम को मर्यादित करते हुए जीवनयापन शीलव्रत का पहला चरण है। दूसरा चरण है- काम का ऊर्ध्वारोहण आध्यात्मिक प्रगति के लिए। यह भारतीय संस्कृति के बहुआयामी एवं सबके लिए सुलभ एक दार्शनिक प्रतिपादन का परिचायक है।

अगला पक्ष इस भक्ति में हैं बहुत कर्मों से, बहुत सारी आकांक्षाओं से विरक्ति-दूर रहना। भगवान ने कर्मों से साथ जुड़ी कामनाओं के त्याग को संन्यास कहा है-काम्यानाँ कर्मणा न्यासं सन्यासं कवयोः विदु। काम्य कर्मों से विरति अर्थात् न लोभ करें, न भय से। लोकहित के लिए कर्म करें-फल परमात्मा को अर्पित करें। स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि एक साधक के, भक्त के कर्म आत्मकल्याण व जगहित के लिए अर्पित होने चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव की जीवनशैली हम देखें तो पाते हैं कि उनके सभी कर्म लोकहित के लिए समर्पित हुए। लेखनी जीवन भर उनने चलायी। विचारक्रान्ति का कार्य अंतिम समय तक लेखनी से करते रहे। एक कोठरी में बंद होकर भी सारे विश्व को प्रचण्ड झंझावात से आंदोलन किया जा सकता है, यह उनने विरति बहुकर्मा की अपने भक्तिसाधना वाले स्वरूप से दर्शाया। इस भक्ति का चौथा चरण है- संतपुरुषों के आचरण में लगे रहना-संतपुरुषों के आचरण में लगे रहना-संतपुरुषों में क्रोध नहीं होता, वे सदैव क्षमाशील होते हैं। हम यदि ये दोनों गुण अपना लें-तो संतों का आचरण हमें भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचा सकता है।

नवधा भक्ति में सातवीं है- जगतभर को समभाव से परमात्म में ओत-प्रोत मानना और संतों को ईश्वर से भी अधिक करके मान्यता देना। (सप्तम सम मोहिमय जग देखे, मोते संत अधिक करि लेखा।) यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कही है-

यो माँ पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च में न प्रणश्यति॥

अर्थात् जो मुझे सर्वत्र संव्याप्त देखता है-सबको मुझमें देखता है उसके लिए मैं अदृश्य नहीं हूँ-नष्ट नहीं हूँ, न वह मेरे लिए अदृश्य है- (नष्ट नहीं होता)। सोना एक धातु है। उससे बने विभिन्न आभूषणों में अँगूठी-कंगन-बाजूबंद को हम अलग-अलग रूप में देखते हैं, किंतु सुनार को आभूषणों में सोना ही दिखाई देता है। भक्त भी सभी को प्रभु में-प्रभु को सभी में देखता है। वह किस का अहित करे-नुकसान पहुँचाए सोच ही नहीं पाता। आत्मवत् सर्वभूतेषु की साधना परमपूज्य गुरुदेव ने १९७०-७१ की अखण्ड ज्योति में वर्णित की है कि किस तरह इस साधना से उनने आत्मिक प्रगति के सोपान चढ़े। हमें भक्ति के इस स्वरूप को इसी रूप में समझना चाहिए।

इस भक्ति के दूसरे प्रसंग में भगवान कहते हैं-मुझसे अधिक मेरे भक्तों को मानना। गोस्वामी जी ने कहा है-रात ते अधिक रामकर दासा। जो तप-जप-योग से संभव नहीं है वह भक्ति से संभव है। चाहे हम भक्त अम्बरीष की कथा में देखें-चाहे मीरा-प्रहलाद के प्रसंगों में, भक्त की महिमा ही चारों ओर झलकती दिखाई देती है। सर्वस्व का समर्पण कर देने वाले भक्त की भगवान रक्षा करते हैं एवं सदा उनके साथ रहते हैं।

आठवीं भक्ति है- (यथा लाभ संतोषा। सपनेहु नहिं देखहिं परदोषा) जो कुछ मिल जाय उसी में संतोष, स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना। कबीरदास जी ने कहा है- ‘साईं इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय।’ परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है-जिन्हें वैभव का संरक्षक होकर रहना पड़ा है, वे भी निजी जीवन में जनक की तरह परिश्रमी एवं मितव्ययी किसान जैसी रीति-नीति अपनाते रहे हैं। चाणक्य एक चक्रवर्ती शासक के प्रधानमंत्री और विश्व-विद्यालय के सूत्र-संचालक थे। फिर भी इस अमानत में से अपने निजी प्रयोजन के लिए मात्र सूखी रोटियाँ ही उपलब्ध करते थे।” (नवं/दिस. १९८२ प्रज्ञा अभियान)

गोस्वामी जी के इस भक्ति के प्रतिपादन के दूसरे भाग में सपने में भी दूसरों का दोष न देखने की बात जो कही गयी है-वह आत्मिक प्रगति की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। यह मानवी स्वभाव है कि सामान्यतया जीवन व्यापार में असफलता का दोष मनुष्य दूसरों पर मढ़ देता है। बहिर्मुखी दृष्टि होने के कारण दूसरों के दोष अधिक दिखाई देते हैं, अपने आपको निर्दोष मान बैठते हैं। दूसरों के दोषों का चिन्तन करते-करते हमारा अंतःकरण भी दूषित होता चला जाता है। एक प्रसंग है-श्यामाचरण लाहिड़ी के जीवन का। वे हिमालय में महावतार बाबा के दर्शन कर लौटे। इलाहाबाद कुंभ में स्नान हेतु आए। वहाँ देखा गांजा–सुलफा पीने वाले साधुओं को, उनकी लोकसेवा के स्थान पर अधिक पाने की कामना को। सोचने लगे ये तो इस लोक से भी गए-परलोक से भी। विचार आया-मेरा बस चले तो इन दुष्टों को मार डालूँ। तभी एक दृश्य दिखाई पड़ा-एक सुलफा पी रहे साधु के पैर उनके गुरुदेव महावतार बाबा स्वयं दवा रहे हैं। आँखें मलीं-दृश्य वही था-उनके ही गुरु थे। थोड़ी देर में दृश्य बदला गया। घर पहुँचे-पूजा में उपासनास्थली पर महावतार बाबा प्रकट हुए-सूक्ष्मशरीर से संकेत किया कि-आत्मविकास करना है, तो दूसरों को सुधारों, अपने प्रगतिपथ को अवरुद्ध क्यों करते हो।” यह संदेश हम सबके लिए है। श्रीरामकृष्ण कहा करते थे-दोषे गुणे मानुस।” एक-दूसरे के गुणों को देखें-दोषों को नहीं, क्योंकि दोष-गुण तो हर मनुष्य में होते हैं। यही दृष्टि हर भक्त की होनी चाहिए।

नवधाभक्ति में नवीं भक्ति है- (नवम सरल सब सन छल हीना। मम भरोस हिय दरष न दीना।) सरलता-सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में परमात्मा का भरोसा एवं किसी भी स्थिति में हर्ष व दैन्य का भाव न होना। भगवान इस अंतिम भक्ति प्रकरण में सर्वाधिक जोर देते हैं-सरल व निष्कपट होने पर। ऐसा वही हो पाता है जिसकी भावनाएँ ईश्वरोन्मुख हों-कामनाएँ न के बराबर हों। ईश्वर भक्ति के माध्यम से मिलता ही उसे है, जो बुद्धि के सारे मानदण्डों, कुचक्रों से भरे षड्यंत्रों से उबर चुका है। बुद्धि से प्रज्ञा के धरातल पर पहुँच गया है।

परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा है-दूसरे क्षुद्र लोगों की तरह हमने भी गुरु-शिष्य का ढोंग बनाकर अपनी कामनापूर्ति की माँग-पर-माँग रखी होती और प्रेम को लाभदायक धंधे के रूप में मछली पकड़ने का जाल बनाया होता तो निराशा और शिकायतों भरा मस्तिष्क लेकर ही खाली हाथ लौटना पड़ता। दिव्य तत्व में आखिर इतनी अक्ल होती है कि मनुष्य की स्वार्थपरता और प्रेम भावना की वस्तुस्थिति का अंतर समझ सके।” (अखण्ड ज्योति अप्रैल ६९, पृष्ठ ६२)। वस्तुतः जब हृदय निष्कपट बच्चों की तरह सरल हो जाता है, तो उसमें वह चुम्बकत्व पैदा होता है, जो परमात्मा को स्वयं आकृष्ट कर सके।

इस भक्ति के दूसरे प्रसंग ‘मम भरोस’ की जहाँ चर्चा की गयी है-वहाँ गीता का वह वाक्य ठीक लगता है जिसमें कहा गया है-तेषां नित्याभियुक्तानाँ-योगक्षेम वहाम्यहम्।” मेरे से युक्त-मेरे में लीन भक्तों की जिम्मेदारी मैं वहन करता हूँ। हमें इतना विश्वास होना चाहिए कि प्रभु ही हमारे रक्षक हैं। हमें उन पर पूरा भरोसा है। सफलता है तो प्रभु की, हमारी नहीं। हमें हर्षोन्मत्त हो श्रेय स्वयं को नहीं प्रभु को देना चाहिए। दैन्यभाव भी नहीं रखना चाहिए। जो भगवान का अपना है-वह किसी से डरेगा क्यों। आत्म-अवमानना का भाव क्योंकर रखेगा। भक्त दुख-सुख से परे हो जाते हैं, जब भगवान पर भरोसा दृढ़ होता है।

सच्चा भक्त वही है जो हर परिस्थिति में, सुख-दुख में भी उनका ही होकर रहे। बच्चा गिरकर माँ की गोद में ही शान्ति पाता है। सच्चे भक्त को भगवान की गोद में शिशुवत रहने का अभ्यास पालना चाहिए। इसी में दूसरे चरण की व्याख्या हो जाती है।

नवधा भक्ति का प्रसंग शबरी को सुनाते हुए अंत में भगवान श्रीराम कहते हैं-नवमहँ जिनके एकौ होई। नारी पुरुष सचराचर कोई। इन नौ में से एक भी जिनके पास होती है, वह स्त्री पुरुष, जड़-चेतना कोई भी हो तर जाता है। नवधा भक्ति में से हम एक भी अपने जीवन में उतर लें, तो हमारे जीवन को कुसंस्कारों से, प्रारब्ध कर्मों के अंतःकरण से मुक्त होने में कोई देरी नहीं लगती। भक्ति ही कलियुग में साधने योग्य है। उसमें यदि नवधा भक्ति का सूत्र भी हमारे जीवन में उतर जाय तो हमारा कल्याण हो जाएगा।

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