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Magazine - Year 1998 - Version 2

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सेवा-साधना से पूर्णता की प्राप्ति

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आत्मविकास की ओर अभिमुख गतिविधियों; क्रिया-प्रणालियों को नाम साधना है। इसकी अनेकों प्रणालियाँ अनेकों स्थानों पर प्रचलित हैं। विभिन्न मत-पंथ अपने अनुरूप इसका विशिष्ट महत्व घोषित करते हैं। सभी का अपना महत्व भी है, पर समग्रता की दृष्टि से विवेचना-विश्लेषण करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः एकाँगी मानना पड़ता है। समूची मानव प्रकृति को रूपान्तरित कर सके, ऐसी प्रणाली ढूँढ़ने पर शायद ही एक-आध मिले। जो मिलेगी भी, वह किसी विशिष्ट योग्यता की अपेक्षा रखती हुई।

सम्पूर्णता के सवाल पर विचार करने पर सर्वजन सुलभ साधना प्रणालियों का अन्वेषण, कर विभिन्न विचारकों, महापुरुषों, श्रेष्ठतम योगियों की दृष्टि एक ही बिन्दु पर टिकती है और वह बिन्दु है-सेवा व्यक्ति विशेष की नहीं समाज की-अथवा यों कहें समाज के रूप में विराट पुरुष की। आधुनिक समय में जबकि समाजसेवा एक फैशन के रूप में उभर चुकी है, अनेकों संस्थाएँ यम हो चुकी हैं। ऐसी स्थिति में आध्यात्मिकता का भाव कुछ विचित्र-सा लगता है, क्योंकि इससे यदि आध्यात्मिकता उभरती होती तो समाज-सेवियों की संख्या के अनुरूप साधकों और योगियों की बाढ़ आयी होती, पर स्थिति ऐसी नहीं है।

विचार करने पर स्थिति स्पष्ट है-यदि समाजसेवियों की संख्या के अनुरूप साधन दिखाई नहीं देते तो साधना के लिए घर से निकलने वालों की संख्या के अनुरूप आत्मोत्कर्ष के धनी कहाँ? इसका सीधा तात्पर्य यह है कि प्रणाली की समग्रता का मर्म नहीं समझा गया। उसे यथारीति अपनाया नहीं गया।

किसी भी साधनाप्रणाली में प्रवेश हेतु अनिवार्य योग्यता है, नैतिकता। पतंजलि हों चाहे गोरखनाथ या फिर कृष्ण, बुद्ध, लाओत्से, ताओ कोई भी क्यों न हों, इस अनिवार्य योग्यता के बिना अपनी साधनापद्धति में प्रवेश नहीं देते। प्रवेश के बाद शुरू होता है, साधनाक्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना पूरा ध्यान शरीर पर जमाता है, वहीं राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्यपद्धतियाँ प्राणिजगत में परिवर्तन व रूपान्तरण का रुख अपनाती है, किन्तु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, वे शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती हैं।

समाजसेवा जिसे साधना की समग्र प्रणाली माना गया हैं, इसमें नियोजित व्यक्ति के तीनों ही आधार न केवल सशक्त होते हैं, वरन् समूची अंतर्शक्तियाँ अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त होने लगती हैं। उदाहरण के लिए, देह का स्वाभाविक गुण है जड़ता। इस तमस् का सत्व में रूपान्तरण ही अभीष्ट है। समाजसेवा की साधना पद्धति अपनाने वाले इसे प्रथम चरण में पा लेते हैं, क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यशविहीन क्रियाशीलता चाहिए। इसे ही सत्व का रूपान्तरण समझा जा सकता है। सारे आवेग-कामुकता क्रोध, मोह, लोभ आदि प्राणिक स्तर पर जड़ जमाए रहते हैं। प्रचलित योगों के किसी भी साधक को इनकी जड़ें उखाड़ने में पसीने आ जाते हैं। फिर भी कभी-कभी असफलता हाथ लगती है। विश्वामित्र और दुर्वासा की कहानियाँ प्रचलित हैं। वर्षों की तपश्चर्या के बाद भी अनेकों बार काम-क्रोध के हाथों पराजित होना पड़ा, जबकि अपने भाव में निष्ठसमाजसेवी इस दुरूह स्तर को कुछ ही वर्षों में रूपान्तरित करने में सफल हो जाते हैं।

योग के विभिन्न मार्गों की चरम परिणति कैवल्य, स्थितप्रज्ञता, समत्व, एकात्मभाव को ही माना गया है। इसी की विभिन्न स्थितियाँ मुक्ति, जीवन-मुक्ति विदेह मुक्ति के नाम से जानी जाती है। विभिन्न योगियों को ये स्थितियाँ कब मिलती हैं, यह तो पता नहीं, पर सेवानिष्ठ अपने वर्तमान जीवन में ही इस परमलाभ से लाभान्वित होता देखा जाता है। लोभ, मोह, अहं से छुटकारा मिला कि उपर्युक्त स्थितियाँ मिलीं। जिसने सर्वहित में अपने स्वार्थों की बलि दे दी उसे लोभ कैसा? जो सारे समाज को अपना परिजन, समूचे विश्व को अपना परिजन, समूचे विश्व को अपना घर मानता घर मानता है, उसे मोह की गुँजाइश कहाँ रही? सुहृदं सर्वं भूतानां में जिसकी स्थिति है, जो स्वयं को विनम्र सेवक और दूसरों को सेव्य मानता है, उसके पास अहंकार भला कैसे फटक सकता है। यही कारण है कि वह इसी जीवन में मुक्ति का परमलाभ प्राप्त कर जीवनमुक्त की स्थिति में आनन्दित रहता है।

साधना की इस समग्र प्रणाली के रहते और अपने ऊपर समाजसेवी का लेबल चिपकाने पर भी जो लोग इसके लाभों से वंचित हैं, इसका कारण प्रणाली की गड़बड़ी नहीं, अपितु स्वयं की खामी है। गरीबों को गले लगाने तथा कष्ट-पीड़ितों की मदद करने की बात हर कोई करता है, लेकिन अपने आस-पास के ऐसे लोगों पर ध्यान देना अनावश्यक लगता है, जिन्हें वस्तुतः सहायता की आवश्यकता है। स्वाभाविक है ऐसे लोग समाजसेवा का सिक्का अपनी प्रतिष्ठा जमाने के लिए उपयोग करते हैं। जिसके पास करने को कोई काम नहीं अथवा जो यह समझते हैं कि इसी प्रकार समाज में कुछ इज्जत कमा लेंगे, ऐसे लोग समाजसेवा का मुखौटा लगा लेते हैं।

कहने का आशय यह है कि निष्ठा-वान समाज-सेवक आत्मप्रचार और अपनी सेवाओं का ढोल पीटने के स्थान पर मूकभाव से अहर्निश जनसेवा में लगे रहते हैं। इसकी शुरुआत वे अपने से करते है। अपने से करते हैं। अपने से शुरुआत करने का अर्थ है कि जिन आदर्शों की स्थापना हम समाज में होते हुए देखना चाहते हैं, उन आदर्शों को स्वयं हम अपने जीवन में उतारें। कथनी-करनी से अपने जीवन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करें।

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