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Magazine - Year 1998 - Version 2

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कुण्डलिनी कामबीज के परिष्कार की साधना

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शरीर की उत्पत्ति कामबीज से है। फ्राइड के अनुसार वह बालकपन में दुग्धपान से लेकर साथियों की छेड़छाड़ के अनेक रूपों में विकसित होता है। किशोरावस्था में वह जोश बनकर उभरता है। होश को पीछे छोड़कर जोश की जो तूफानी लहरें उठती हैं, उनमें मनोविज्ञानी कामतत्व की प्रबलता देखते है। लड़कों में नये स्थानों पर नये केश उत्पन्न होने-जननेन्द्रिय में प्रौढ़ता बढ़ने के रूप में उसकी अभिवृद्धि प्रकट होती है। लड़कियों में रजो दर्शन तथा वक्षस्थल का उभार इसी का प्रमाण है कल्पनाक्षेत्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षक कल्पनाओं के आँधी-तूफान उठने लगते हैं। आगे चलकर इसकी परिणति प्रणय में होती है। दाम्पत्य सूत्र जुड़ते हैं, आदान-प्रदान के भावभरे रसास्वादन मिलते हैं और सन्तानोत्पत्ति का क्रम चल पड़ता हैं। एक नये गृहस्थ का नये परिवार का श्रीगणेश होता है और पति पत्नी को उसी विविध व्यवस्थाएँ जुटाने में अपनी लगभग पूरी शक्ति झोंकनी पड़ती है। यह ‘कामबीज’ से उत्पन्न वट-वृक्ष है, जिसका विस्तार भली या बुरी व्यस्त क्रिया-प्रक्रियाओं में होता है। जीवनसम्पदा का उत्सर्ग इसी वेद पर होता देखा गया है। बीच-बीच में उच्छृंखल यौनाचार की कल्पनाएँ अथवा क्रियाएँ अपना अलग ही कुहराम मचाती रहती है। उन पर सामाजिक नियन्त्रण न हो तो उस स्वेच्छाचार की प्रतिक्रिया से सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सभ्यता का मानवी प्रगति का अंत हुआ ही समझना चाहिए। अपराधों के घटना क्रम में काम-विग्रह का उसकी विकृत प्रतिक्रिया का जितना हाथ रहता है उतना सब अनाचारों से मिलकर भी नहीं होता। नीति मर्यादाओं का उल्लंघन इसी प्रबल प्रेरणा से आये दिन होता रहता है।

इतने प्रेरक तत्व को तुच्छ मानकर नहीं चलना चाहिए। उसकी सामर्थ्य असीम है। एक शरीर से दूसरे का उत्पन्न होना इसी सृष्टि का अभ्यस्त किन्तु अद्भुत आश्चर्य है। मानवतत्व की भावना, विचारणा एवं क्रिया को अपने जाल-जंजाल में समेट-बटोर कर बैठ जाना इसी आकर्षण का काम है। भव-बंधनों की चर्चा जब-तब होती रहती है। प्रकारान्तर से वह संकेत कामविग्रह के लिए किया गया होता है। गीता के कर्मयोग में निष्काम होने पर जोर दिया गया है। यों उसका मोटा अर्थ भावनाओं से पीछा छुड़ाकर कर्तव्यपरायण होना है। गहराई में उतरने पर उसमें ‘काम’ रहित होने पर उच्चस्तरीय आत्मिक प्रगति होने, आत्म-कल्याण एवं दर्शन का लाभ मिलने का तथ्य सामने आ खड़ा होता है।

यहाँ विवाहित रहने या अविवाहित रहने की उपयोगिता के पक्ष-विपक्ष में कुछ नहीं कहा जा रहा है। व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति, परिस्थिति एवं कार्य पद्धति को देखते हुए दोनों ही मार्ग उपयोगी हैं, जिन्हें उच्च आदर्शों में निरत रहना है उन्हें अपनी शक्तियाँ बचाकर लक्ष्य के लिए अधिक कुछ कर सकना तभी हो सकता है, जब गृहस्थ का भार ढोने से अवकाश मिले। प्राचीनकाल से साधु परम्परा यह रास्ता अपनाती रही है। परिव्राजक कार्यपद्धति में न्यूनतम निर्वाह में, चिंता मुक्त रहने में उन्हें सुविधाएँ अविवाहित रहकर ही मिलती थीं। इसके विपरीत जिन्हें आश्रम चलाने पड़ते, वे ब्राह्मण गृहव्यवस्था के लिए पत्नी के सहयोग की सुविधा देखते थे। जो भी हो यह प्रसंग यहाँ नहीं उठना है। चर्चा कामप्रक्रिया की हो रही थी। वह शरीरक्षेत्र से कम और मनः क्षेत्रों से अधिक सम्बन्धित है। शरीर का ब्रह्मचारी मन व्यभिचारी रहे तो उसे इस प्रति-बन्धन की विडम्बना का काई लाभ न मिल सकेगा। इसके विपरीत यदि मन पवित्र रहे, तो गृहस्थ भी एक योगी बन सकता है। तब घर में तपोवन का वातावरण बना देना कुछ कठिन न होगा। वासना और विलासिता का स्थान यदि स्वच्छ, सहकार और बालकोपम हास्य-विनोद ग्रहण कर ले तो उसे बाधित ब्रह्मचर्य से कम नहीं अधिक लाभदायक ही कहा जाएगा।

समस्या यहाँ आकर अटक जाती है कि यदि कामबीज जीव-चेतना की इतनी गहराई में घुसा बैठा है - उसकी शक्ति इतनी प्रबल और जड़ इतनी गहरी है तो फिर उससे बच सकना कैसे हो सकता है? तब ब्रह्मचर्य के लाभों से लाभान्वित कैसा हुआ जा सकता है? यदि संयम न बरता जाए, तो ओजस की क्षति होती है। यदि बरता जाए तो दमित मानस विकृत ग्रंथियों का हानिकारक संग्रह करता है। इधर खाई उधर कुआँ आखिर किया जाय तो क्या किया जाए?

मनीषियों ने इसका उत्तर कुण्डलिनी जागरण की साधना के रूप में दिया है। इसका कर्मकाण्ड और विधि विधान जितना चमत्कारी है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसका तत्त्वदर्शन। कुण्डलिनी विधान जानने से पहला उसका दर्शन जानना आवश्यक है। प्रतिपादन यह है कि काम -कला को ब्रह्मविद्या के रूप में परिवर्तित किया जाए। इसे विज्ञान की भाषा में ट्रान्सफॉर्मेशन-रूपान्तरण कहते हैं। काम को कला में परिणत किया जा सकता है। भक्ति-भावना उसी प्रयास का उत्कृष्ट रूप है। ललित कलाओं में उद्देश्यपूर्ण शौर्य-साहस में परमार्थिक सेवासाधना में जो उच्चस्तरीय उल्लास उपलब्ध होता है, उसे ‘काम’ तत्व की परिष्कृत भाव भूमिका कह सकते है। चिंतन की दिशा-धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी- नाले के माध्यम से बाँध बनाकर संग्रह किया जाए और नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुँचाया जाए तो इससे हर प्रकार लाभ-ही-लाभ है। अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है। उसे हठपूर्वक नष्ट कर देने की बात न सोची जाए वरन् ऐसे प्रयोजन लगा दिया जाए, जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।

पौराणिक कथा में कामदेव भगवान शंकर पर प्रकोप करता है। शिवजी के अपने दूरदर्शी विवेक से-तृतीय नेत्र से कामदेव जलकर भस्म हो जाता है। यह विवेकशीलता की पशु-प्रवृत्ति पर प्रत्यक्ष विजय है। कुविचारों को सद्विचारों से ही निरस्त किया जाता है। लोहे से लोहा कटता है। कामुकता के दुष्परिणामों और संयम के सत्परिणामों पर विस्तारपूर्वक विचार किया जाए तो विवेक का निर्णय औचित्य के पक्ष में होगा। चोरघात तो तब लगती है जब घरमालिक सोये हुए हो, जब उनमें से कोई बच्चा रोने लगे- बुड्ढा खाँसने लगे तो बलिष्ठ चोर की भी हिम्मत टूट जाएगी और उसे उलटे पैरों भागना ही पड़ेगा। कामुकता सम्मत कुविचारों के सम्बन्ध में यही बात लागू होती है। यदि आदर्शवाद के समर्थक तर्कों, तथ्यों, प्रमाण और उदाहरणों की सेना सजा ली जाए और जब भी शत्रु सिर उठाये तभी वह सेना लड़ा दी जाए, तो समझना चाहिए औचित्य ही जीतेगा। कल्मषों के उन्मूलन का यही एकमात्र मार्ग है। शिवजी का काम-दहन भी इसी तथ्य के समर्थन में एक प्रेरणाप्रद प्रसंग है। पीछे कामपत्नी, रति सरसता विलाप करती है। विधवा के दुःख को भगवान आशुतोष सहन नहीं कर पाते। वे द्रवित होते हैं और वरदान देते है। भस्मसात् कामदेव शरीर समेत तो जीवित नहीं हो सकते, पर वे सूक्ष्म रूप में फिर सजीव हो जाएँगे और उच्च कही जाने वाली आत्माओं पर भी अपना अस्त्र छोड़ने की अपनी कामना पूरी करेंगे। इस वरदान का अभिप्राय यही है कि पशु-प्रवृत्तियों को भड़काने वाली और जीवन सम्पदा को कुमार्गगामी बनाने वाली कामुकता को परिष्कृत किया जा सकता है। उसे भावनात्मक श्रेष्ठ संवेदनाओं से लगाकर स्थूल यौनाचार के आकर्षण से विरत किया जा सकता है।

कुण्डलिनी के स्वरूप निर्धारण में यह तथ्य और भी स्पष्ट है। कामकेन्द्र मूलाधार चक्र को बताया गया है। यह जननेन्द्रिय के मूल में है। इसे अग्निकुण्ड अग्निसमुद्र भी कहा गया है। उमंगें और उत्साह भरने की क्षमता वहाँ केन्द्रित है। इस स्थिति में उसकी संकाय सर्पिणी की है। सर्पदंश और सर्पविष की भयानकता सर्वविदित है। सामान्य मनःस्थिति अधोगामी और बहिर्मुखी रहती है। उसके क्षरण-स्राव जननेन्द्रिय मार्ग से नीचे की ओर टपकते हैं। उसका प्रत्यक्ष रूप त्वचा तल से ऊपर उभरा होता है। नर और नारी की जननेन्द्रियों की स्थिति इस दृष्टि से लगभग एक जैसी ही है। इसे कुण्डलिनी की गर्हित, मूर्च्छित, अधःपतित स्थिति समझा जाना चाहिए।

कुण्डलिनी जागरण साधना में समुद्र मंथन जैसे प्रयत्न करने पड़ते हैं। फलतः प्रसुप्ति जाग्रति में बदलती है। तप की ऊष्णता पाकर अन्तःऊर्जा उभरती है और ऊपर की ओर चलने का प्रयत्न करती है। गर्मी से वायु, जल आदि सभी का विस्तार होता है। वे ऊपर की ओर उठते हैं। ग्रीष्म में चक्रवात गरम हवा के द्वारा ही उठते हैं। पानी से भाप गर्मी ही ऊपर की ओर उठाती है। मूलाधार से जगी हुई व्यक्तिऊर्जा, प्राणशक्ति कुण्डलिनी ऊपर उठती है, मेरुदण्ड मार्ग से सर्पिणी की तरह, लहराती हुई ब्रह्मरंध्र की ओर चलती है, बिजली की यही चाल है। यह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुँचती है। सहस्रार कमल से सम्बन्ध बनाती है और उसी में लय हो जाती है। कमल सात्विकता का कला का दिव्य सौंदर्य का केन्द्र माना गया है। मस्तिष्क के मध्य क्षेत्र में ब्रह्मरंध्र में-सहस्रार कमल अवस्थिति है। उस पर कहीं विष्णु की कहीं शिव की, कहीं सद्गुरु की स्थापना और ध्यान का उल्लेख है। यह प्रतिपादन यही इंगित करता है कि कामुकता में संलग्न अंतःऊर्जा को उस पतन के गर्त से निकाल कर ब्रह्मचेतना में-उत्कृष्ट उल्लास प्रदान करने वाली ब्रह्मविद्या में नियोजित किया जाना चाहिए।

इसी परिवर्तन-परिष्कार को उत्कर्ष-उन्नयन को कुण्डलिनी जागरण कहा गया है। ब्रह्मचर्य की तात्त्विक साधना यही है। इसी में अध्यात्म तत्त्वज्ञान के समस्त सूत्र सँजोये हुए हैं। इस ट्रान्सफॉर्मेशन का-रूपान्तरण का सत्परिणाम, महान जागरण, महान परिवर्तन दिव्य जीवन के रूप में सामने आता है। कामबीज का यह ब्रह्मसमर्पण कितना श्रेयस्कर होता है इसे कुण्डलिनी महाविज्ञान की जागरण साधना एवं तत्वभावना को अपनाकर जाना जा सकता है।

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