बहन निवेदिता - भारतीय संस्कृति की अनन्य आराधिका
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कुमारी मार्गेरेट एलिजाबेथ नोबुल का जन्म आयरलैंड के एक प्रसिद्ध पादरी घराने में हुआ था, जिससे उन्हें धार्मिक प्रेरणा मिली। उनके नाना स्वाधीनता आंदोलन के एक नेता थे, जिनसे उन्हें स्वतंत्रता के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ। इनकी शिक्षा भी धार्मिक वातावरण में हुई, जिससे उनमें धर्म के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हुई। साथ ही इन्हें ईसाई मत के प्रति कुछ शंका भी उत्पन्न हो गई। अतः वे सत्य की तलाश में रहने लगीं। अध्ययन के बाद उन्हें १७ वर्ष की आयु में एक ऐसे क्षेत्र में अध्ययन का कार्य दिया गया, जहाँ गरीब मजदूरों की संख्या अधिक थी। अतः उनके संपर्क से उन्हें गरीबों की दशा सुधारने तथा सेवा करने का भी अवसर मिला। बाद में उन्होंने बालकों के लिए रूस्किन स्कूल भी खोला, जिसमें खेल- खेल में शिक्षा देने का नवीन प्रयोग चलाया। जब सन् १८८५ में वे स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आईं, तब स्वामी जी ने उस स्कूल को देखकर उनकी बड़ी प्रशंसा की। अपनी जिज्ञासा पूर्ण करने के लिए स्वामी जी ने उन्हें पूरा अवसर दिया और उनकी ८ वर्षों की लालसा पूर्ण हुई। स्वामी जी का प्रथम भाषण सुनने के बाद उन्होंने अपनी डायरी में लिखा-
"ऐसे चिंतनशील व्यक्ति का दर्शन मुझे आज तक कभी नहीं हुआ था।" दूसरे दिन स्वामी जी के वाक्य उनके हृदय में प्रवेश कर गये। "जो अनंत और असीम है वही अमृर्त है। वही शाश्वत है। उसे छोड़कर संसार की समस्त विषय वस्तु नाशवान् है, अस्थायी है, दुःखयुक्त है।" इतना होते हुए भी वे स्वामी जी के उपदेशों के बाद अपनी शंकाओं का समाधान कराती रहीं। उन्होंने इस विषय में लिखा- स्वामी जी के जीवन में ज्ञान, भक्ति और साधना का जो प्रकाश है, वह अनेकों पीड़ि़त, दुःखित और निराश व्यक्तियों को जीवन और आशाएँ प्रदान करने वाला है। इस तरह का धर्म और संस्कृति संयुक्त जीवन ही सच्चा जीवन और कल्याण का मार्ग हो सकता है।
जिस प्रकार श्रीकृष्ण को अर्जुन, बुद्ध को आनंद, श्री रामकृष्ण को विवेकानंद शिष्य रूप में प्राप्त हुए थे, उसी प्रकार विवेकानंद को भगिनी निवेदिता मिलीं। उनका असली नाम मार्गेरेट नोबुल था और वे आयरलैंड के एक फौजी अफसर की कन्या थीं। जन्म के समय ही उनकी भक्तिमयी माता ने निश्चय कर लिया था कि- इस कन्या को ईश्वर की सेवा में निवेदित कर दूँगी किंतु यह कार्य स्वामी विवेकानंद ने किया। जब वे विदेश यात्रा करते समय इंग्लैंड पहुँचे, तब अन्य महिलाओं के समान मार्गेरेट भी उनका भाषण सुनने पहुँची और इतनी अधिक प्रभावित हुईं कि उनके साथ ही भारत आने का आग्रह करने लगीं। उसी समय से उन्होंने स्वामी जी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया।
प्रथम दर्शन ही के साथ उनके भीतर छिपे हुए संस्कार जाग उठे। उन्होंने लिखा है- ‘‘मेरे गुरू ने मेरी उत्सुकता जाग्रत् कर दी। उस समय भी मेरा मन अध्यात्मिकता से पूर्ण नहीं था, बल्कि आधुनिक संस्कारों से युक्त था। उनके भाषण ने मेरे हृदय के तारों को नहीं छेड़ा, किंतु गुरु की कृपा से यह सब संभव हो सका।’’ गुरू की अप्रितम कृपा और प्रेम, शिष्य की नम्रता और भक्ति दोनों ने मार्गरेट को निवेदिता बना दिया। वे आयरलैंडमें उत्पन्न हुई थीं, किंतु उन्होंने भारत को अपनी जन्म- भूमि से भी अधिक प्रेम और सेवा अर्पण की। एक दृष्टि मेंविवेकानंद ने पहचान लिया कि- इस बालिका में कितनी प्रतिभा है? उसका क्या स्थान है और क्या भविष्य है? जिस प्रकार श्री रामकृष्ण ने विवेकानंद को तैयार किया था, उसी प्रकार विवेकानंद ने निवेदिता को अपने कार्य के लिए तैयार किया और केवल उनका नाम ही परिवर्तन नहीं किया, किंतु संपूर्ण जीवन को ही परिवर्तित कर, यह सिद्ध कर दिया कि महापुरुषों के संपर्क में आकर अपनी प्रतिभा और योग्यताओं को अद्भुत ढंग से विकसित किया जा सकता है।
भारत में गुरू और शिष्य का आध्यात्मिक संबंध सब संबंधों से श्रेष्ठ होता है। अन्य संासारिक संबंधों से ऊपर उठकर दो आत्माओं का यह आध्यात्मिक संबंध जन्म- जन्मांतर तक चलता रहता है। गुरू ईश्वर का रूप होता है। गुरू की आज्ञा शिष्य के लिए वेद- वाक्य के समान होती है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में- ‘‘गुरूका स्थान माता- पिता से भी ऊँचा है। वह आध्यात्मिक शिक्षक और सर्वोपरि ईश्वर दोनों का सम्मिलित स्वरूप है। गुरू शिष्य के हृदय के गुप्त तंतुओं और गहराइयों को समझता है।’’ शिष्य के जीवन में प्राण और प्रकाश फूँकने वाला गुरू ही सच्चा है, पर शिष्य में भी अनुरूप पात्रता आवश्यक है। जहाँ यह संयोग मिल जाता है, गुरू- शिष्य के संबंध सार्थक हो उठते हैं।
कभी-कभी शिष्य इन सब बातों को न समझकर उनके प्रति संशय और अविश्वास कर बैठता है। किंतु गुरू अपनी कृपा और प्रेम के कारण शिष्य के अपराधों को क्षमा कर, उसे सब आपत्तियों से बचाता है। गुरू कभी-कभी शिष्य के प्रति कठोर हो जाता है, किंतु वह कठोरता भी माता के समान उसके हित में ही होती है। विवेकानंद और निवेदिता का संबंध इसी प्रकार का था। उन्होंने एक पत्र में अपनी प्रिय शिष्या को लिखा था- ‘‘मैं मृत्यु पर्यंत तुम्हारे साथ रहूँगा। चाहे तुम भारत के लिए काम करो या न करो, चाहे तुम वेदांत को मानो या छोड़ दो।’’ हाथी के दाँत एक बार निकल आने पर फिर भीतर नहीं जाते।
मार्गेरेट की आत्मा सदा सत्य की खोज में ही रहती थी, उनकी प्रखर बुद्धि कभी आशा और कभी निराशा के बीच झूमती रहती थी, किंतु उन्हें कोई नहीं सूझ रहा था। चेतना की इस संकटमय और उत्तेजित स्थिति के समय वे स्वामी से मिलीं। उन्होंने प्रथम भेंट और विचार-विमर्श में यह अनुभव किया कि-मनुष्य जो लक्ष्य लेकर धरती पर अवतरित होता है, उसकी प्राप्ति में भारतीय अध्यात्म स्पष्ट रूप से सहायक हो सकता है। भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति एवं उपनिषदों में वह सामर्थ्य है, जो आत्मा को संतुष्टि और शाश्वत शांति प्रदान कर सकते हैं।
उसी समय से मार्गेरेट के मन में भारत के प्रति श्रद्धा और हिंदू धर्म के प्रति आस्था उत्पन्न हो गई। उसका कारण बताते हुए वे लिखती हैं-मैंने उनके मुख से किसी मत-विशेष का प्रतिपादन कभी नहीं सुना। समस्त मतों में निहित आधारभूत तत्त्वों को समझाने का प्रयास उन्होंने अवश्य किया था। उनके नाना ने एक बार भारत में ईसाइयत का प्रचार करने की प्ररेणा दी थी, किंतु स्वामी जी ने उन्हें भारत के निर्धनों की सेवा और निरक्षरों में ज्ञान की ज्योति जगाने तथा भारतीय नारियों को जाग्रत् करने की प्रेरणा दी। इसके लिए मार्गेरेट तुरंत भारत जाने को उत्सुक थीं, किंतु स्वामी जी उनकी उत्सुकता को सुदृढ़ बनाने के लिए उन्हें रोकते रहे। एक पत्र में भारत से उन्होंने लिखा था- ‘‘यह निश्चित है कि संसार को एक बार झकझोर डालने की सामर्थ्य तुम्हारे अंदर सुप्त रूप से विद्यमान है। स्वाध्याय और साधना द्वारा उसे जाग्रत् करने की मेरी हार्दिक इच्छा है, ताकि तुम भारतीय नारियों को वर्तमान कुंठाओं और रूढ़िवादिताओं से बचाने में मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर सको। तुम्हें देखकर इस देश की महिलाएँ अपने आपको भीतर से झकझोरेगी और कहेंगी- ‘‘यदि कोई विदेशी नारी इस धर्म और संस्कृति से प्रेरित होकर सेवा के लिए अपना सब कुछ त्याग सकती है, तो हम क्यों पीछे रहें? भारतीय संस्कृति के अभ्युत्थान और भावी संतति को तेजस्वी बनाने के पुण्य मिशन में हम पीछे क्यों रहें?’’
भारत के कार्यों की कठिनाइयों की चर्चा भी स्वामी जी समय-समय पर किया करते थे, जिससे मार्गेरेट अपने मन को और भी पक्का करती जाती थीं। जब सब प्रकार से वे तैयार हो गईं तब उन्होंने उनकी परीक्षा लेने के लिए लिखा- "हम सभी के लिए तुम भारत आने की अपेक्षा इंगलैंड में बैठकर उन्नति का कार्य कर सकती हो।" किंतु उससे निराश न होकर मार्गेरेट भारत आने को बैचेन हुईं। उन्होंने लिखा- ‘‘मुझे स्पष्ट बताएँ कि क्या मेरा जीवन भारत के काम आ सकता है? मेरी इच्छा है कि भारत मुझे जीवन की पूर्णता की शिक्षा को प्रदान करे।" इस उत्कृष्टता की भावना को देखकर अंत में स्वामी जी ने लिख दिया- ‘‘अब मैं निश्चित इस मत का हूँ कि, भारत में कार्य की दृष्टि में तुम्हारा भविष्य उज्जवल है।’’ आवश्यकता एक मनुष्य की नहीं, वरन् एक महिला की है, जो सिंहनी के समान हो।
इसी पत्र में उन्होंने कठिनाइयों का भी जिक्र किया था, किंतु मार्गेरेट रुकने वाली नहीं थी। उसके पिता ने मानो भविष्यवाणी कर दी थी-जबकि उनकी माता को निर्देश दिया था- ‘‘भगवान् की ओर से मार्गेरेट को एक आह्वान आवेगा। उस समय तुम बाधक न बनना, बल्कि उसकी सहायता करना।’’ उनकी माता ने मार्गेरेट के जन्म के पहले ही प्रार्थना कर ली थी- ‘‘यदि संतान सकुशल होती है तो तेरी इच्छा। मैं तो अपने बच्चे को तुम्हें समर्पित करती हूँ।’’ और उन्होंने सच्चे हृदय से अपनी पुत्री को भारतवर्ष की सेवा करने की अनुमति प्रदान कर दी।

