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Books - बहन निवेदिता

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ज्ञान-साधना और सेवा का श्रीगणेश

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स्वामी जी अचानक बीमार पड़ गये। कार्य की अधिकता ने स्वामी जी को कमजोर बना दिया। निवेदिता को घर भेजना आवश्यक था, किंतु आर्थिक प्रश्न सामने था। इसी समय अमेरिका से उन्हें निमंत्रण मिला और वे निवेदिता के साथ रवाना हो गये। उन्होंने कहा- ‘‘मैं तुम्हारा भूत और भविष्य दोनों देख रहा हूँ, किंतु इस समय तुम्हें नम्र और आज्ञाकारी बनना है।’’ जाते समय निवेदिता ने दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण की प्रिय पंचवटी में बैठकर प्रार्थना की- ‘‘माँ ! स्वामी जी को शांति और आराम दीजिए और उनका कष्ट मुझे दीजिए। मैं उनकी पूजा करती हूँ। उनसे प्रेम करती हूँ, उनके व्यक्तित्त्व से प्रेम करती हूँ। जीवनपर्यंत मैं उनके लिए जीऊँगी और काम करूँगी।’’


समुद्र की स्वास्थ्यप्रद वायु के प्रभाव से स्वामी जी का स्वास्थ्य सुधरने लगा। शिष्या भी प्रसन्न मुद्रा में रहने लगीं। उनके घनिष्ट संबंध से वे अपने को धन्य मानने लगी। चुपचाप उनके पास बैठने, उनके साथ डेक पर घूमने, उनके ज्ञान-भंडार से अमूल्य रत्न संग्रह करने से निवेदिता को बड़ा लाभ हुआ। उनका आध्यात्मिक प्रभाव अज्ञात रूप से निवेदिता पर पड़ता रहा। जो कि मन और वाणी से कहीं परे था। स्वामी जी उनके हृदय में प्रवेश कर उनके दोषों को एक-एक कर निकालना और विदेशी संस्कारों के बदले भारतीय संस्कार भरने का काम शुरू किया। इससे उनके जो भी रहे-सहे दोष थे-वे सब निकल गए, उनका मोह और वासनाएँ भी दूर हो गईं। यह स्वर्ण अवसर उनके लिए एक अलभ्य लाभप्रद सिद्ध हुआ। स्वामी जी से वे बार-बार पूछतीं-अपूर्णता किस प्रकार दूर की जाए? पूर्णता कैसे प्राप्त की जाए? शांति का आवरण किस प्रकार हो? स्वामी जी का यही उत्तर था-बिना किसी भावना के अपने आपको पहचानने का प्रयत्न करो, यही महान् रहस्य है। कोई चिंता मत करो, अशांति को दूर कर अपनी शक्ति में प्रतिष्ठित हो। मुक्ति आप से आप आयेगी, किंतु उसके लिए त्याग अनिवार्य है।    


छह सप्ताहों के बीच निवेदिता ने अपने गुरु के असीम ज्ञान भंडार को आत्मसात् कर लिया। तत्त्व ज्ञान, इतिहास, धर्म, संस्कृति, तपस्या, शिक्षा, मनुष्यता और साधना कोई भी ऐसा नहीं था, जिस पर गुरू-शिष्य में चर्चा न हुई हो। इन सबके ऊपर गुरु की वाणी ध्वनित होती थी। "माँ ! मैं निर्भय बनूँ-इसी उपनिषद् के मंत्र को मैंने बार-बार उच्चारण किया है यह आत्मा बलहीनों के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। मेरा आदर उस योद्धा संत के लिए है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में मरते समय कहा था '''''''''''तुम भी वहीं हो।" 

इस प्रकार जहाज लंदन पहुँचा और वहाँ से स्वामी जी अमेरिका चले गए । निवेदिता कुछ दिन बाद इनकी सेवा में पहुँची, वहाँ इनका काम धन संग्रह करना था और अपने भाषणों द्वारा काफी धन-संग्रह भी किया। पश्चिमी जनता में इस बात की उत्सुकता थी कि, एक विदेशी महिला भारत को किस प्रकार देखती है ? इस बीच स्वामी जी निवेदिता को अनेक विषयों की शिक्षा दिया करते थे। एक दिन उन्होंने कहा-देखो, एक तत्त्व है प्रेम और दूसरा तत्व है-मिलन। मिलन प्रेम से श्रेष्ठ है। जिसे हम प्रेम करते हैं, वह अभी अपना नहीं बना है। यही ज्ञान और भक्ति में अंतर है। किंतु निवेदिता एक ओर गुरू के वचनों से शक्ति-संग्रह करती जाती थीं और दूसरी ओर उन्हें यह भय लगता था कि गुरू के बिना मैं कैसे रहूँगी? अब उनका प्रेम गहन और शुद्ध हो गया था। वासना के स्थान पर उसमें उत्सुकता आ गई थी। उन्होंने कहा-अब वे मेरे संपूर्ण जीवन हैं, मैं कम होने के बदले अपने प्रेम में अधिक समीप हो गई हूँ।


अमेरिका में विविध कार्य-कलाप में व्यस्त रहने के कारण स्वामी जी का स्वास्थ्य फिर गिरने लगा था। वे भारत लौटने के लिए उत्सुक हो रहे थे। उन्होंने एक दिन निवेदिता से पूछा- "और कितने दिन यहाँ रहोगी, अपना असली कार्य कब शुरू करोगी?" प्रश्न सुनकर निवेदिता स्तब्ध रह गई। उन्होंने शांत स्वर में कहा-मैं आपकी आज्ञा से यहाँ आई थी। मैं तुरंत चलने को तैयार हूँ।" उन्होंने एकाएक श्रीमती बुल के कमरे में निवेदिता के साथ प्रवेश किया। सब शिष्याएँ चकित हो गईं। उन्होंने दोनों हाथ पसारकर कहा- "मेरी पुत्रियों, मैं आ गया हूँ !" फिर श्रीमती बुल की कमर में अपना शाल लपेटते हुए कहा- "तुम संन्यासी हो।" फिर दोनों के सिरों पर हाथ रखते हुए कहा- "मैं अपनी सारी शक्ति जो मुझे गुरू से मिली थी, तुम्हें दे रहा हूँ अब मैं शांति में रहने जा रहा हूँ ।" निवेदिता उनके चरणों में गिर गईं उन्हें लगा कि एक सर्वग्रासी शक्ति उसमें प्रवेश कर रही है। उनका शरीर तर्क, विवेक और चेतना सब लुप्त हो गई हैं। अपने सिर पर उन्होंने गुरू के गरम, भारी और शक्तिशाली हाथों का अनुभव किया, मानो सर्वोपरि सूर्य के समान हाथ हों। उन्हें लगा कि वह सचमुच ब्रम्हाचारिणी है। गुरू ने आदेश दिया था कि-तुम्हें जीवन भर ब्रह्मचारिणी रहना है ।


इसी प्रकार एक दिन श्री रामकृष्ण ने विवेकानंद के सिर पर हाथ रखकर कहा था-आज मैंने सब कुछ दे डाला है और मैं फकीर हो गया हूँ । 

निवेदिता हर्ष से विह्वल हो गईं, किंतु उनमें एक भय भी समा गया। "इतनी शक्ति अपने शिष्य को देने के बाद श्री रामकृष्ण केवल डेढ़ वर्ष तक ही जीवित रहे थे। क्या मेरे गुरू भी ऐसा ही करना चाहते हैं? मैं जानती हूँ कि वे कितने कष्ट में रह रहे हैं। यदि यही उनकी इच्छा है तो मैं कभी उनके रास्ते मैं न जाऊँगी। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि उनकी सेवा में कुछ धन अर्पण कर सकूँ।" इस प्रकार निवेदिता अपने गुरू से तन्मय हो गई थीं। उनकी इच्छा केवल उनके कार्य में सहायता करने की थी। धन संग्रह बहुत कठिनाई से हो रहा था। निराशा ने उन्हें घेर लिया, फिर गुरू के वचनों का उन्हें स्मरण हुआ- "अपनी शक्ति पर भरोसा रखो। याद रखो, जिसके पास कुछ मौलिक तत्व हैं, उसे संसार अवश्य सुनेगा। धीरे-धीरे सब बाधाएँ दूर हो गईं। निवेदिता की कीर्ति चारों ओर फैलने लगी और धन एकत्रित होने लगा। निवेदिता के मुख से भारत की वाणी सुनकर गुरू का हृदय गद्गद् हो गया।


अमेरिका में काम समाप्त कर निवेदिता फ्रांस गई। वहाँ स्वामी जी के दर्शन हुए, साथ ही प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु भी मिले, जो कि विज्ञान परिषद् में भाषण देने आए थे। इस अवसर पर स्वामी जी ने एक ऐसी बात की कि जिससे निवेदिता को बहुत धक्का लगा। प्रसिद्ध गायिका ऐमा कालवे का गायन सुनने जा रहे थे। निवेदिता ने उसका विरोध करते हुए कहा-स्वामी जी, यदि आप ओपेरा में जायेंगे तो लोगों को बहुत धक्का लगेगा और आपके विरुद्ध आंदोलन कर बैठेंगे। स्वामी जी को बहुत आश्चर्य हुआ, किंतु कोई उत्तर न देकर वे केवल मुस्करा दिए। बाद में वे जब कालवे स्वयं स्वामी जी से मिलने आईं, तो उससे फ्रांस का राष्ट्र-गीत गाने को कहा। इसमें बंदूकों की गड़गड़ाहट और योद्धाओं की चीख-पुकार के सिवाय और कुछ नहीं है। इस पर स्वामी जी ने उत्तर दिया-

   ‘‘मैं तो इसी प्रकार का गीत चाहता हूँ। तुम नहीं देखतीं कि इस गीत में कितनी वीरता, कितना देश प्रेम और और कितना त्याग भरा है? इसमें एक साहस की भावना है। देश प्रेम और त्याग की भावना भरी हुई है। मैं यह गीत अपने मठ के साधुओं को भी सिखाऊँगा।’’ यह बात निवेदिता को अनुचित लगीं और वह अपने काम से उदासीन होने लगी। स्वामी जी ने केवल यह कहा- ‘‘अब मैं स्वतंत्र हो गया हूँ। मैं जन्म-जात स्वतंत्र हूँ। मैं फिर बालक बन गया हूँ।’’


गुरू और शिष्या के बीच मतभेद बढ़ता ही गया। एक दिन स्वामी जी ने कहा-तुम बहुत हठीली हो गई हो, तुम्हारे कार्यों में इच्छा-शक्ति प्रकट होती है, अब दैवी माता तुम्हें संभाहालेगी। कुछ दिन एकांत वास करो, क्योंकि तुम अच्छे और बुरे का भेद करने लगी हो, तुम्हारे भीतर के रूपों के सभी ढाँचे फूटने चाहिए-तभी तुम्हारी आध्यात्मिकता प्रवाहित होगी। इस फटकार से निवेदिता की आँखें खुलीं, गुरु-भक्ति और उसके पूर्वाग्रहों में क्या भेद है? इसका उन्हें पता लगा। अपने कार्यों में वे ईश्वर प्राप्ति के बदले स्वयं अपनी संतुष्टि चाह रही थीं। गुरू को असंतुष्ट करने की वजह आत्म-संतोष पाना चाहती थीं। उनका अहम् बहुत बढ़ गया था, इस कारण गुरू के कार्य में भी गुण-दोष देखने लगी थीं। एक पत्र में उन्होंने अपनी भावना प्रकट की, उसके उत्तर में स्वामी जी ने लिखा-तुम समझती हो कि-मैं तुम्हारे साथियों से ईर्ष्या कर रहा हूँ, किंतु तुम्हें मालूम होना चाहिए कि, मैं बिना ईर्ष्या, लोभ और शासन की इच्छा के उत्पन्न हुआ हूँ। चाहे जो दोष मुझमें हों उनमे सिर्फ चुनाव कर सकती हो।

प्रश्न यह था कि निवेदिता सरीखी शिष्या जो कि गुरू के प्रति इतनी अनुरक्त हो, उनके गुण-दोषों को देख सकती हैं। वैसे गुरू ने उन्हें आत्म-विकास के लिए काफी स्वतंत्रता दे रखी थी। अपने गुरू श्री रामकृष्ण ही के समान वे अपनी शिष्या को तैयार कर रहे थे। यह सच है कि मनुष्य बिना स्वतंत्रता के आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता। वे कुछ राजनैतिक विचारों और शासन प्रणालियों के कट्टर विरोधी थे। दूसरे निवेदिता का प्रेम और श्रद्धा चाहे जितनी अधिक हो, उसकी चेतना में गुरू से अभी तक एकरूपता प्राप्त नहीं की थी। श्री अरविंद जिस बात को चेतना की एकता कहते हैं, उसी को विवेकानंद ज्ञान कहते थे-एक ऐसा ज्ञान जिसके द्वारा एक व्यक्ति की चेतना दूसरे व्यक्ति की चेतना में मिल जाती है। निवेदिता की चेतना अच्छे और बुरे भावों से ऊपर नहीं उठ सकी थी। उसके परिवर्तन के बाद भी निवेदिता के स्वभाव में पुराने संस्कारों की छाप अवश्य थी।


 आधुनिक विचार वालों के लिए स्वामी जी के कुछ कार्य शिष्यों को युक्तियुक्त नहीं जान पड़ते थे। निवेदिता ने अपने गुण-दोष स्वामी जी को बताए। किंतु उन्हें भी उसके दोष बताने चाहिए थे। न बताने का कारण यह हो सकता है कि उन्हें ऐसा भाष होने लगा था कि उनका जीवन-कार्य समाप्त होने को है। इसलिए वे शिष्यों की मानसिक शुद्धि पर बल देते थे।


स्वामी जी के पत्र ने निवेदिता को बहुत लज्जित किया, वे पश्चात्ताप की अग्नि में जलने लगीं, किंतु इस तपस्या से उनका पुनर्जन्म ही हुआ। भारत लौटने के पहले स्वामी जी ने आर्शिवाद देते हुए कहा- ‘‘नेता को चाहिए कि जब कार्यकर्ता तैयार हो जाएँ, तब उन्हें दूसरी जगह चले जाना चाहिए। अपने सामने वह उन्हें स्वतंत्र नहीं बना सकता। अब मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं रहा। मैंने अपनी सारी शक्ति तुम्हें दे दी, संसार के सामने जाओ, यदि मैंने तुम्हें बनाया हो तो समाप्त हो जाओ और यदि दैवी माता ने बनाया है तो जीती रहो।’’ यह कार्य निवेदिता का आज्ञा भंग करने का पहला उदाहरण था। इसके बाद निवेदिता एक मंत्र-मुग्ध सर्प के समान बन गईं। अब वे योरोप में अकेली रह गईं, जगदीशचंद्र बसु लंदन ही में थे। वे रॉयल सोसायटी में अपना निबंध पढ़ना चाहते थे। निवेदिता का साथ उन्हें ईश्वर का वरदान सरीखा मिला। अपने कार्य के संबंध में उन्हें उत्साह और उत्सुकता थी। निवेदिता ने रमेशचंद्र दत्त से भी संपर्क स्थापित किया और वे राजनीति में भी रस लेने लगीं। उनको अंग्रेजों के प्रति इसलिए घृणा हो गई कि वे भारतीयों के प्रति न्याय नहीं करते, केवल धर्म और शिक्षा ही उनके रुचिकर विषय हैं, किंतु राजनीति मुख्य विषय बन गया। वह भारत लौटीं तब उन्होंने स्वामी जी की बीमारी का हाल सुना।


निवेदिता को पाकर स्वामी जी बहुत प्रसन्न हुए। अपनी योग दृष्टि से उन्होंने निवेदिता की आत्मा का प्रकाश देख लिया। उस समय कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था और भारत भर के नेता एकत्रित थे। बीमारी का हाल सुनकर सब लोग उनके पास आते और मार्गदर्शन प्राप्त करते। इस समय निवेदिता को भारतीय नेताओं से परिचय प्राप्त करने का अच्छा अवसर मिला।


अंतिम दिवस निवेदिता बैलूर गई हुई थीं। स्वामी जी ने स्वयं उन्हें भोजन परोसा और हाथ धुलाये। उनकी आँखों में अनंत प्रेम बरस रहा था। मन ही मन समझ गई कि स्वामी जी अब विदा होने वाले हैं। दो दिन बाद स्वामी जी ने समाधि ले ली। समाचार सुनकर वे बैलूर लौटीं, उसके पहले ही वे प्रकृति में उनका अनुभव कर चुकी थीं। दिन भर वे उनके पास रहीं। उनका सिर अपनी गोद में रखकर बैठी प्रार्थना करती रहीं, प्रभु तेरी इच्छा पूर्ण हो। अग्नि-संस्कार के समय एक अद्भुत घटना घटी। स्वामी जी के गेरुए वस्त्र का अधजला टुकड़ा हवा में उड़ता हुआ आया और निवेदिता की गोद में गिर पड़ा, मानो स्वामी जी का उत्तराधिकार ही उनको मिल गया।


अब निवेदिता बिल्कुल अकेली रह गई, अब उनके सामने विस्तृत कार्य क्षेत्र था। गुरू अपने अपूर्ण कार्य का भार छोड़कर विदा हो गये थे। कितनी सावधानी, कितनी कोमलता, कितनी कठोरता, कितने प्रगट और कितने प्रच्छन्न रूप से कितनी दूरी और कितने समीप से स्वामी जी ने उन्हें प्रशिक्षण दिया था? कभी वे कठोरता धारण करने और कभी उदासीनता और कभी परमप्रिय मित्र अथवा स्नेहमय पिता के समान बर्ताव करते। जिस प्रकार कोई शिल्पी किसी मूर्ति या भवन को तोड़ता-फोड़ता, उठता-गिरता उसका निर्माण करता है, उसी प्रकार गुरू ने इस स्वतंत्रवेत्ता आधुनिक शिष्या का निर्माण किया था। आध्यात्मिकता के इतिहास में यह एक अद्भुत उदाहरण था।


निवेदिता अकेली थीं, किंतु असहाय नहीं। उनके विचार और व्यक्तित्त्व गुरू की शक्ति से ओत-प्रोत थे। उन्हें आदेश मिला था कि केवल भारतीय नारी जाति का उन्नयन ही नहीं, किंतु सारी जनता की सेवा और उसके साथ ही आत्म-साधना उनका कार्य है।


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