पात्रत्व की परीक्षा
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मार्गेरेट ने अपने एक मित्र को लिखा- "कल्पना करो कि स्वामी जी मुझे न मिले होते ! वे केवल हिमालय पर ही ध्यानरत रहते, तो मैं कभी यहाँ नहीं होती।" स्वामी जी ने भी अंतर दृष्टि से समझ लिया कि भारत में मेरा कार्य करने के लिए यही महिला उपयुक्त है। जब उन्होंने अपना जीवन उनके कार्य में लगाने की इच्छा प्रकट की, तब स्वामी जी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, ‘‘हाँ ! तुम्हारा स्थान भारत में ही है, किंतु अभी उसका समय नहीं आया। अभी तो उसके लिए अपने को तैयार करो।’’ भारत लौटने पर स्वामी जी ने लिखा- ‘‘अब मुझे निश्चय हो गया है कि भारत में तुम्हारे लिए बहुत बड़ा भविष्य है। मुझे किसी पुरूष की नहीं, किंतु एक ऐसी स्त्री की आवश्यकता थी, जो भारतवासियों और विशेषकर स्त्रियों के लिए सिंहनी के समान काम करें। भारत अभी महान् महिलाओं को उत्पन्न नहीं कर सकता। अभी उसे दूसरे देशों से उन्हें उधार लेना होगा तुम्हारी शिक्षा, ईमानदारी, पवित्रता, प्रेम, निश्चय और सबसे ऊपर भारतीय संस्कृति के प्रति अडिग निष्ठा ऐसी आवश्यक महिला का रूप बना देता है, जो भारत के लिए आवश्यक है।’’
स्वामी जी का यह कथन आज भी ध्वनित होता है और सत्य प्रतीत होता है। मार्गेरेट बड़े उत्साह और आशा के साथ भारत में आईं। अपने गुरू के सम्मुख वे उनके कार्य में रहकर जी-जान से लग गईं। किंतु गुरू ने उन्हें कार्य के संबंध में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया। जब वे बहुत अधीर हो गईं, तो गंगाजी को इशारा करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘तुम्हारे चारों ओर जो कुछ हो रहा है, उसे देखो, उसे सुनो। कोई योजना मत बनाओ। पश्चिम के राजसिक क्रियाकलाप में पली हुई मार्गेरेट को भारतीय गुरू की यह शांति पसंद नहीं आई। भारतीय आध्यात्मिकता उनकी आत्मा में नहीं समाई। स्वामी जी तो अपनी शिष्या को दृढ़ आधार पर स्थापित कर रहे थे और भारतीय ढाँचे मे ढाल रहे थे। उनकी तेज प्रतिभा और स्वतंत्र आत्मा को भारतीय आदर्शों के अनुरूप परिवर्तित कर रहे थे। विदेशी संस्कारों और दोषों को निकाल कर उनमें भारत की सेवा और जीवन के आर्दश भर रहे थे।
मार्गेरेट के लिए मुख्य बाधा स्वामी जी का व्यक्तिगत आकर्षण ही था। उनके लिए स्वामी जी का व्यक्तित्व ही मुख्य था, भारत की सेवा नहीं। स्वामी जी की सेवा को ही वे भारत की सेवा समझती थीं। किंतु स्वामी जी चाहते थे कि मार्गेरेट इस संकीर्ण क्षेत्र में ऊपर उठकर अनंत और अव्यक्त चेतना के स्तर पर पहुँचे। इसलिए उन्होंने निवेदिता को साधना के पथ पर धीरे-धीरे आरूढ़ किया और कहा- ‘‘तुमको अपने पैरों पर खड़े होना हैं। मेरी या किसी अन्य की छाया में नहीं चलना है। प्रेम की उत्कृष्टता तो ठीक है, किंतु उसके साथ कोई बंधन उचित नहीं। किसी एक के प्रति अपना सब कुछ अर्पण करते ही हमारा कार्य समाप्त हो जायेगा। हमारा मार्गदर्शक शरीर नहीं, आत्मा; व्यक्त नहीं, अव्यक्त; कोई व्यक्ति विशेष नहीं, ब्रह्म होना चाहिए।’’
स्वामी जी का दूसरा प्रयत्न यह था कि निवेदिता भारतीय नारी की तरह शिक्षित हो। पश्चिमी शिक्षा और जीवन के संस्कारों से मुक्त होकर वे भारत को अपनी जन्म-भूमि के समान प्रेम करने लगे। अभी भारत को उन्होंने बाहर से देखा था। उसकी अशिक्षा, दरिद्रता आदि ने उन्हें दुःख अवश्य पहुँचाया था, किंतु वे उन्हें पश्चिमी सभ्यता के अनुसार ऊपरी तरीके से दूर करना चाहती थीं। किंतु स्वामी जी चाहते थे कि पहले वे अपने हृदय में गोता लगाकर अपनी आत्मा को पहचानें, उससे शक्ति ग्रहण करें और फिर कार्य क्षेत्र में निःस्वार्थ और फलाशा रहित ईश्वर सेवा में परिणत हों। उनका पहला कदम है-गुरू की आज्ञा का पालन। इसी अनुशासन से उनमें कार्य करने की स्वतंत्रता उत्पन्न होगी।
उन्होंने आज्ञा दी कि हिंदू स्त्री के समान रहो। वेश-भूषा, आहार-व्यवहार, रहन-सहन सभी में उनका अनुकरण करे। पुरूषों से संपर्क कम रखो, स्त्रियों से संपर्क बढ़ाओ। अपनी पश्चिमी धारणाओं और भावनाओं को नियंत्रित रखो। अपने मन को ध्यान और एकाग्रता में लगाओ। मार्गेरेट ने साड़ी पहनना, जमीन पर सोना और उँगलियों से खाना आदि सब भारतीय प्रथाओं का पालन करना प्रारंभ किया। मार्गेरेट ने सोचा-विलायत में भाषण देने वाले स्वामी विवेकानन्द और भारत में
तपस्या में निरत और प्रशांत विवेकानंद में कितना अंतर है? किंतु अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति और भक्ति के कारण वे सब कठोर साधनाओं का पालन कर स्वामी जी की कठिन कसौटी पर खरी उतरीं। दो माह बाद स्वामी जी ने मार्गेरेट को अपनी शिष्या के रूप पर दीक्षित कर उनका नाम निवेदिता रखा। उनकी माँ का संकल्प पूरा हुआ और वे सचमुच में निवेदिता बन गईं।
गुरूजन शिष्यों की योग्यताएँ परखते हैं और फिर उन्हें विकसित करने का मार्ग दर्शाते हैं। सुषुप्त शक्तियों का जागरण इसी तरह होता है। उन्हें निवेदिता की वक्तृत्त्व शक्ति का पता था, अतः उन्होंने निवेदिता को भाषण देने के लिए प्रेरित किया। जब पहले-पहल कलकत्ते के एलबर्ट हाल में भगिनी निवेदिता का सुंदर और ऊँचा व्यक्तित्व भारतीय वेष-भूषा में जनता के सामने आया तब वह मंत्रमुग्ध हो गईं। स्वामी जी ने उनका परिचय कराते हुए कहा- "भगिनी निवेदिता भारत को इंगलैंड की नई देन है।" इसके बाद वे कालीघाट और ब्रह्म-समाज की सभाओं में भाषण देने लगीं और पत्रों में लेख भी लिखने लगीं। वक्ता और लेखिका के रूप में उनकी कीर्ति चारों ओर फैलने लगी, किंतु इससे उनकी शांति तनिक भी भंग न हुई।
अब स्वामी जी ने निवेदिता को भारत का परिचय कराना शुरू किया। स्वामी जी अपने शिष्यों के साथ हिमालय की ओर रवाना हो गए। वहाँ के प्राकृतिक दृष्यों, शांति तथा नीरवता से निवेदिता के मन पर गहरा प्रभाव पडा़। स्वामी जी के अधिक निकट संपर्क में वे रहने लगीं, किंतु साथ ही उनके मन पर एक उदासीनता-सी छाने लगी, क्योंकि स्वामी जी उनसे बहुत कम बोलते और उनके काम में भी कोई रस न लेते थे। इससे उन्होंने अपने मन की व्यथा एक दिन स्वामी जी से कही। उसके उत्तर में उन्होंने कहा- "बात ठीक है, अब मैं वन में एकांत सेवन के लिए जा रहा हूँ। लौटकर अपने साथ शांति लाऊँगा।" तब निवेदिता की समझ में आया कि अपने साथ मोह तोड़ने के लिए ही स्वामी जी ऐसा कर रहे हैं। जब स्वामी जी लौटे तो उनके साथ निवेदिता की शांति ही लौट आई। अपने एक मित्र को उन्होंने लिखा- "मुझे आध्यात्मिकता की शिक्षा मिल रही है, जो कि सबसे अधिक प्राप्तव्य वस्तु है। मनुष्य-प्रेम के समान ईश्वर-प्रेम प्राप्त करना आत्मा के लिए आवश्यक है।"
इसी शिक्षा के लिए स्वामी जी ने यह सुशांत स्थान और समय चुना था। निवेदिता को अपने पैरों पर खडे़ होना आवश्यक है। इसी विचार से उन्होंने ऊपर से यह कठोरता धारण की थी। हिमालय में उन्होंने जो शांति प्राप्त की थी, वही वे अपने शिष्यों को प्राप्त कराना चाहते थे। अभी निवेदिता की परीक्षा पूरी नहीं हुई थी। तपस्या पूरी करने के लिए स्वामी जी ने अमरनाथ की कठिन यात्रा की और अपने पैर बढा़ए। निवेदिता उनके पीछे-पीछे चलीं। गुरू प्रसन्न और आनंदित शिष्या शांत और थकित। अमरनाथ की तुषार-निर्मित अंधेरी गुफा में प्रवेश कर स्वामी जी शिवजी को प्राणम कर निवेदिता के रूप में एकमात्र भेंट समर्पित की। इस सबका कोई अर्थ निवेदिता की समझ में नहीं आया कि उन्हें नंगे पैरों बर्फ पर चलाकर ऊँचे पर्वतों को पार कराकर इस अंधेरी गुफा में क्यों लाया गया? और उन्होंने गुरू से कडे़ शब्दों में इसका प्रतिवाद किया। आँखों में आँसू भरकर स्वामी जी ने शांत भाव से कहा- "निवेदिता मुझ में वह शक्ति नहीं कि जो तुम चाहती हो और वह तुम्हें दे सकूँ। अभी तुम्हें यात्रा का महत्त्व नहीं मालूम होगा। किंतु बाद में इसका रहस्य प्रकट होगा। माँ काली को पुकारों, वे तुम्हारे पास आकर तुम्हें शक्ति देंगी।"
ये शब्द कहकर स्वामी जी अज्ञातवास में चले गए। अब निवेदिता ने काली माँ का ध्यान करना शुरू किया। उन्हें अपनी गलती अनुभव होने लगी और समझ में आया कि उनके गुरू किस प्रकार उनके दोषों का निराकरण कर उन्हें अपनी ओर खींचते जा रहें हैं। अपने दोषों को देखना भी महत्त्वपूर्ण साधना है। इस साधना से पूर्वकृत पापों और मानसिक दुर्भावों का परिमार्जन होता है। आत्म-चिंतन और शोध की यह प्रक्रिया ही व्यक्ति को आत्म-सत्ता की महत्ता और सन्निध्यता तक पहुँचा देती है। साधक अपने आपको शक्ति का अकूत भंडार अनुभव करने लगता है। काली के ध्यान से निवेदिता की सब निराशा और दुःख दूर होकर हृदय में आनंद भर गया। स्वामी जी के लौटने पर निवेदिता ने अपना सिर उनके चरणों पर रखकर कहा- "अब मैंने अपनी दिव्य माता को पहचान लिया है।" निष्कलुष हुई उनकी आत्मा ही माँ काली थी, जिसे पाकर वे विभोर हो उठीं।
इस यात्रा में स्वामी जी अपने शिष्यों को धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय कराते। अपनी ज्ञान-दृष्टि से वे निवेदिता के हृदय में प्रवेश कर उनकी शंकाओं का समाधान करते और उनके पश्चिमी संस्कारों को उखाड़कर भारतीय संस्कारों को जमाते रहते थे। एक दिन निवेदिता ने भारत से अपने देश की तुलना की, तो स्वामी जी ने फटकारा। तुम इस प्रकार क्यों तुलना करती हो, जो वहाँ के लिए उपयुक्त है, वह यहाँ के लिए नहीं हो सकती। इस प्रकार की देश-भक्ति एक पाप है। क्या यह हमारी संकीर्णता नहीं है कि हम केवल आयरलैंड, इंगलैंड या भारतवर्ष को ही अपनी जन्म-भूमी मानें? विशाल पृथ्वी हमारी माता और संपूर्ण विश्व की आत्मा ही हमारा उपास्य है। उस महत्त्व की ओर उन्मुख होकर अपने देश, भाषा और भूमि की संकीर्णता का परित्याग करना ही उचित है।
कुछ ही दिनों बाद निवेदिता ने लिखा- ‘‘मेरी शिक्षा अभी चल रही है। दृष्टिकोण साफ होता जा रहा है। गुरू की कृपा से मैं प्रकाश पा रही हूँ। मेरे जो भ्रम रास्ते को रोक रहे थे, वे जाग्रत् प्रतिभा के प्रकाश में दूर होते जा रहें हैं। आश्चर्य तो यह है कि गुरू केवल प्रकाश देते हैं, अपने विचार लादते नहीं हैं। यही उनकी शिक्षा का मुख्य सिद्धांत है।’’
स्वामी जी का दूसरा उद्देश्य निवेदिता के राजनैतिक विचारों में परिवर्तन करना था। वे समझती थी कि भारत अंग्रेजी साम्राज्य का स्थायी अंग है। इस विचित्रता और विविधतापूर्ण देश की एकता बाहरी शक्ति के द्वारा ही संभव है। अंग्रेजी राज्य ने भारत का बहुत उपकार किया है। भारत का स्वतंत्रता चाहना स्वाभाविक है, किंतु उसे प्राप्त करने में सैकड़ों वर्ष लग जायेंगे। इसलिए उनके जीवन का उद्देश्य भारत और इंगलैंड के बीच प्रेम संबंध स्थापित करना था। इस पर स्वामी जी ने कहा कि- ‘‘काम करो, अभीप्सा करो, शायद तुम्हें रास्ता मिल जाय। दो साल पहले मैं भी ऐसे ही विचार रखता था।’’ और बहुत जल्दी इस विषय में निवेदिता का स्वप्न दूर हो गया। ज्यों-ज्यों निवेदिता भारत में अंग्रेजों के संपर्क में आती गईं त्यों-त्यों वे उनकी साम्राज्य-लिप्सा को समझने लगीं। सबसे पहले धक्का तब लगा, जब शासन ने विवेकानंद द्वारा संस्कृत कॉलेज के लिए भूमि देने से इनकार कर दिया। इससे अंग्रेजों का अभिमान स्पष्ट हो गया। साथ ही कारखानों के मजदूरों, रेल के यात्रियों आदि के साथ किए गये दुर्व्यवहार भी उनके सामने आए, तब उनकी आँखें खुलीं।
स्वामी जी का यह तो बाहरी शिक्षण था, वे तो निवेदिता के अंतरगं को बदलना चाहते थे। भीतर हृदय बदल जाने से बाहरी परिवर्तन में देर नहीं लगती। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि तुम्हें आंतरिक और बाह्य जीवन में एक ब्राह्मण ब्रह्मचारिणी के समान रहना होगा और अपने जीवन को अपने भूतकाल और उसकी स्मृति को ईश्वर के चरणों में अर्पित करना होगा।
यात्रा समाप्त होने पर निवेदिता कलकत्ता लौट आईं। वे श्री शारदामणि देवी के समीप रहने लगीं। उनकी साधुता, पवित्रता और मधुरता से वे बहुत प्रभावित हुईं। अब तो स्वामी जी ने उन पर और भी कठिन तपस्या के नियम लगा दिए और कहा- ‘‘अब तुमको एक हिंदू विधवा के समान जीवन-यापन करना होगा। तुम्हें किसी से मिलना-जुलना बंद कर एकांत में रहना होगा। अपने मन की चंचलता को नियंत्रित करो और चेहरे पर कोई भाव प्रकट न होने दो। बिना किसी भावना के अपने आपको पहचानो।’’
कुछ दिनों बाद लड़कियों के लिए पाठशाला खोली गई और निवेदिता को अपने मन का काम मिल गया। अब स्वामी जी ने उनसे कहा कि-तुम्हें अब कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए कि प्रार्थना और ध्यान के लिए अब समय नहीं मिलता। कार्य ही को अपने जीवन का ध्येय समझो। इसी लक्ष्य की ओर तुम्हें ले जाना चाहता हूँ। मेरा ध्येय न तो रामकृष्ण का है, न वेदांत का है, वरन् जनता में मनुष्यता को जगाना है। विदेशों में यह कार्य स्त्रियों ने किया है। वह दिन कब होगा जब भारतीय नारियाँ अपनी कमजोरी को दूर कर अपना ध्येय पूरा करेंगी।
इसी बीच कलकत्ता में भयानक प्लेग फैला और निवेदिता ने निर्भीकता, आत्म-त्याग और एकाग्रता से जनता की सेवा की। उनकी व्यवस्था को देखकर एक शिष्य से स्वामी जी ने कहा-उस पर तरस मत खाओ, अब वह सब बातों से ऊपर उठकर भारत के प्रति निवेदित हो गई है। मैंने उसे बनाने में इतना समय दिया है, जितना किसी को नहीं दिया। अब निवेदिता पत्रों को लेख लिखने लगीं। उनके द्वारा लिखित प्लेग का हाल पढ़कर जनता स्तंभित रह गई। वे ब्रह्म-समाज के साथ काम करने लगीं। रवींद्रनाथ ठाकुर के साथ भी इनका संपर्क स्थापित हो गया ।
भारत में स्त्रियों के लिए काम करने की प्रेरणा भगिनी निवेदिता को किस प्रकार मिली, इस पर वे लिखती हैं कि-
एक बार बातचीत करते समय मेरी तरफ उन्मुख होकर उन्होंने कहा- ‘‘अपने देश की स्त्रियों के लिए मैंने योजनाएँ बनाई हैं, जिनसे मुझे बड़ी सहायता मिल सकती है।’’ मैंने योजना के बारे में उस समय नहीं-किंतु कुछ दिन बाद जब मैंने उनसे ‘नंदन’ को स्वच्छ बनाने की बात कही, तब वे बोल पड़े- ‘‘तुमने नगर को सुंदर बनाने के लिए बहुत से नगरों पर बमबारी की है।’’ ये शब्द अब तक मेरे कानों में गूँजते रहे। एक बार उन्होंने फिर कहा- ‘‘अंग्रेज लोग एक छोटे-से द्वीप में पैदा हुए हैं और वे उसी में सुंदर जीवन बिताना चाहते हैं।’’ तब मुझे यह बात अपने संबंध में ठीक लगी कि, मेरे विचार कितने संकुचित हैं? इसी के बाद मैंने स्वामी जी कार्य में सहायता देने की इच्छा प्रकट की। उन्हें कुछ आश्चर्य हुआ, किंतु वे बोले- ‘‘मैं तो अपने कार्य को पूरा करने के लिए २०० बार जन्म लेने को तैयार हूँ।’’ अभी तक ये विचार मेरे मन में बैठे हुए हैं।
नारी शिक्षा का श्रीगणेश एक कन्या विद्यालय से कराया गया। काली पूजा की पुण्य तिथि से बोसपारा लेन से इसका शुभ आरंभ हुआ। माँ शारदा देवी ने आर्शीवाद दिया, किंतु कट्टरपंथियों ने इसका कम विरोध नहीं किया। एक विदेशी महिला को कोई अपने मकान में प्रवेश देने को तैयार न था और उसके संरक्षण में अपनी लड़कियों को पढ़ाना कोई पसंद न करता था। बड़ी कठिनाई से दो-चार विवेकशील अभिभावकों ने अपनी कन्याएँ भेजीं। पर जब लोगों ने नारी-शिक्षा के महत्त्व को समझना शुरू किया तो यह संख्या भी बढ़ने लगी, किंतु बड़ी बाधाओं को पार कर ही इस शाला की संख्या बढ़ी। इस प्रकार जिस दिन कालीघाट के कालीमंदिर में स्वामी जी ने निवेदिता को भाषण देने के लिए निमंत्रित किया, उस दिन कट्टरपंथियों का विरोध और भी बढ़ गया। किंतु स्वामी जी के आदेशों के अनुसार जब उन्होंने नंगे पैर से मंदिर में प्रवेश किया और अपने भाषण में महाशक्ति के प्रति अपने हृदय के भावों को व्यक्त किया तब कहीं लोगों का विरोध शांत हुआ। बाद में चलकर ‘‘काली दी मदर’’ नामक पुस्तक की रचना की तो लोगों की श्रद्धा और बढ़ गई।
प्लेग के समय निवेदिता ने अपने प्राणों को हथेली पर रखकर लोक-सेवा की। उसके संबंध में सर जगदीशचंद्र बसु ने अपनी पत्नी को एक पत्र में लिखा था- "अनेक लोगों को स्मरण होगा कि इस समय कितना भयंकर आतंक फैल गया था। रेलें तथा स्टीमर भागने वाले लोगों से भरे रहते थे। जिस समय आतंक अपनी चरम सीमा पर था-उस समय भगिनी निवेदिता सहायता कार्य में जुटी थीं। उन्होंने नवयुवकों के एक दल का संगठन किया।’’
श्री रवींद्रनाथ ठाकुर उनके स्थान पर काव्य चर्चा करने आए, इसी बीच बैलूर मठ से उनके लिए बुलावा आया। हर्ष के साथ उन्होंने वह समाचार गुरूदेव को सुनाया। गुरूदेव ने मन में कहा-निवेदिता को अपना चुना हुआ ईश्वर मिल गया। ब्रह्म-समाज के साथ उनका संपर्क अधिक समय तक नहीं चला, इससे सुरेंद्रनाथ, जगदीशचंद्र बसु तथा अवनींद्रनाथ ठाकुर सरीखे मित्र अवश्य प्राप्त हुए, जिनके द्वारा उनका संबंध स्वदेशी आंदोलन से हो गया।
अब तो निवेदिता की सार्वजनिक सभाओं में बोलने का निमंत्रण मिलने लगा, इतने दिनों तक दबी हुई शक्ति एक प्रवाह के रूप में निकलने लगी। स्वामी जी ने आज्ञा दी कि, तुम्हें काली माँ के विषय में बोलना है। शांत भाव से निवेदिता ने भाषण दिया, जिसकी श्रोताओं ने बड़ी प्रशंसा की। कालीघाट के पुरोहितों ने भी उन्हें बोलने के लिए बुलाया। स्वामी जी की अध्यक्षता में भाषण होना था, किंतु उन्होंने निवेदिता को अकेले ही जाने का आर्शीवाद देकर भेजा- ‘‘सदा याद रखना कि तुम माँ काली की सेविका हो। निवेदिता नंगे पैरों से चलकर कालीघाट पहुँची। उनके भाषण से जनता मंत्रमुग्ध हो गई। निवेदिता को भी विश्वास हो गया कि माँ काली की कृपा हमें प्राप्त हो गई है। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने बड़ी सावधानी, प्रेम और संयम के साथ निवेदिता को आंतरिक और बाह्य संसार में भविष्य में अपना कार्य करने के लिए तैयार किया।
स्वामी जी का यह कथन आज भी ध्वनित होता है और सत्य प्रतीत होता है। मार्गेरेट बड़े उत्साह और आशा के साथ भारत में आईं। अपने गुरू के सम्मुख वे उनके कार्य में रहकर जी-जान से लग गईं। किंतु गुरू ने उन्हें कार्य के संबंध में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया। जब वे बहुत अधीर हो गईं, तो गंगाजी को इशारा करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘तुम्हारे चारों ओर जो कुछ हो रहा है, उसे देखो, उसे सुनो। कोई योजना मत बनाओ। पश्चिम के राजसिक क्रियाकलाप में पली हुई मार्गेरेट को भारतीय गुरू की यह शांति पसंद नहीं आई। भारतीय आध्यात्मिकता उनकी आत्मा में नहीं समाई। स्वामी जी तो अपनी शिष्या को दृढ़ आधार पर स्थापित कर रहे थे और भारतीय ढाँचे मे ढाल रहे थे। उनकी तेज प्रतिभा और स्वतंत्र आत्मा को भारतीय आदर्शों के अनुरूप परिवर्तित कर रहे थे। विदेशी संस्कारों और दोषों को निकाल कर उनमें भारत की सेवा और जीवन के आर्दश भर रहे थे।
मार्गेरेट के लिए मुख्य बाधा स्वामी जी का व्यक्तिगत आकर्षण ही था। उनके लिए स्वामी जी का व्यक्तित्व ही मुख्य था, भारत की सेवा नहीं। स्वामी जी की सेवा को ही वे भारत की सेवा समझती थीं। किंतु स्वामी जी चाहते थे कि मार्गेरेट इस संकीर्ण क्षेत्र में ऊपर उठकर अनंत और अव्यक्त चेतना के स्तर पर पहुँचे। इसलिए उन्होंने निवेदिता को साधना के पथ पर धीरे-धीरे आरूढ़ किया और कहा- ‘‘तुमको अपने पैरों पर खड़े होना हैं। मेरी या किसी अन्य की छाया में नहीं चलना है। प्रेम की उत्कृष्टता तो ठीक है, किंतु उसके साथ कोई बंधन उचित नहीं। किसी एक के प्रति अपना सब कुछ अर्पण करते ही हमारा कार्य समाप्त हो जायेगा। हमारा मार्गदर्शक शरीर नहीं, आत्मा; व्यक्त नहीं, अव्यक्त; कोई व्यक्ति विशेष नहीं, ब्रह्म होना चाहिए।’’
स्वामी जी का दूसरा प्रयत्न यह था कि निवेदिता भारतीय नारी की तरह शिक्षित हो। पश्चिमी शिक्षा और जीवन के संस्कारों से मुक्त होकर वे भारत को अपनी जन्म-भूमि के समान प्रेम करने लगे। अभी भारत को उन्होंने बाहर से देखा था। उसकी अशिक्षा, दरिद्रता आदि ने उन्हें दुःख अवश्य पहुँचाया था, किंतु वे उन्हें पश्चिमी सभ्यता के अनुसार ऊपरी तरीके से दूर करना चाहती थीं। किंतु स्वामी जी चाहते थे कि पहले वे अपने हृदय में गोता लगाकर अपनी आत्मा को पहचानें, उससे शक्ति ग्रहण करें और फिर कार्य क्षेत्र में निःस्वार्थ और फलाशा रहित ईश्वर सेवा में परिणत हों। उनका पहला कदम है-गुरू की आज्ञा का पालन। इसी अनुशासन से उनमें कार्य करने की स्वतंत्रता उत्पन्न होगी।
उन्होंने आज्ञा दी कि हिंदू स्त्री के समान रहो। वेश-भूषा, आहार-व्यवहार, रहन-सहन सभी में उनका अनुकरण करे। पुरूषों से संपर्क कम रखो, स्त्रियों से संपर्क बढ़ाओ। अपनी पश्चिमी धारणाओं और भावनाओं को नियंत्रित रखो। अपने मन को ध्यान और एकाग्रता में लगाओ। मार्गेरेट ने साड़ी पहनना, जमीन पर सोना और उँगलियों से खाना आदि सब भारतीय प्रथाओं का पालन करना प्रारंभ किया। मार्गेरेट ने सोचा-विलायत में भाषण देने वाले स्वामी विवेकानन्द और भारत में
तपस्या में निरत और प्रशांत विवेकानंद में कितना अंतर है? किंतु अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति और भक्ति के कारण वे सब कठोर साधनाओं का पालन कर स्वामी जी की कठिन कसौटी पर खरी उतरीं। दो माह बाद स्वामी जी ने मार्गेरेट को अपनी शिष्या के रूप पर दीक्षित कर उनका नाम निवेदिता रखा। उनकी माँ का संकल्प पूरा हुआ और वे सचमुच में निवेदिता बन गईं।
गुरूजन शिष्यों की योग्यताएँ परखते हैं और फिर उन्हें विकसित करने का मार्ग दर्शाते हैं। सुषुप्त शक्तियों का जागरण इसी तरह होता है। उन्हें निवेदिता की वक्तृत्त्व शक्ति का पता था, अतः उन्होंने निवेदिता को भाषण देने के लिए प्रेरित किया। जब पहले-पहल कलकत्ते के एलबर्ट हाल में भगिनी निवेदिता का सुंदर और ऊँचा व्यक्तित्व भारतीय वेष-भूषा में जनता के सामने आया तब वह मंत्रमुग्ध हो गईं। स्वामी जी ने उनका परिचय कराते हुए कहा- "भगिनी निवेदिता भारत को इंगलैंड की नई देन है।" इसके बाद वे कालीघाट और ब्रह्म-समाज की सभाओं में भाषण देने लगीं और पत्रों में लेख भी लिखने लगीं। वक्ता और लेखिका के रूप में उनकी कीर्ति चारों ओर फैलने लगी, किंतु इससे उनकी शांति तनिक भी भंग न हुई।
अब स्वामी जी ने निवेदिता को भारत का परिचय कराना शुरू किया। स्वामी जी अपने शिष्यों के साथ हिमालय की ओर रवाना हो गए। वहाँ के प्राकृतिक दृष्यों, शांति तथा नीरवता से निवेदिता के मन पर गहरा प्रभाव पडा़। स्वामी जी के अधिक निकट संपर्क में वे रहने लगीं, किंतु साथ ही उनके मन पर एक उदासीनता-सी छाने लगी, क्योंकि स्वामी जी उनसे बहुत कम बोलते और उनके काम में भी कोई रस न लेते थे। इससे उन्होंने अपने मन की व्यथा एक दिन स्वामी जी से कही। उसके उत्तर में उन्होंने कहा- "बात ठीक है, अब मैं वन में एकांत सेवन के लिए जा रहा हूँ। लौटकर अपने साथ शांति लाऊँगा।" तब निवेदिता की समझ में आया कि अपने साथ मोह तोड़ने के लिए ही स्वामी जी ऐसा कर रहे हैं। जब स्वामी जी लौटे तो उनके साथ निवेदिता की शांति ही लौट आई। अपने एक मित्र को उन्होंने लिखा- "मुझे आध्यात्मिकता की शिक्षा मिल रही है, जो कि सबसे अधिक प्राप्तव्य वस्तु है। मनुष्य-प्रेम के समान ईश्वर-प्रेम प्राप्त करना आत्मा के लिए आवश्यक है।"
इसी शिक्षा के लिए स्वामी जी ने यह सुशांत स्थान और समय चुना था। निवेदिता को अपने पैरों पर खडे़ होना आवश्यक है। इसी विचार से उन्होंने ऊपर से यह कठोरता धारण की थी। हिमालय में उन्होंने जो शांति प्राप्त की थी, वही वे अपने शिष्यों को प्राप्त कराना चाहते थे। अभी निवेदिता की परीक्षा पूरी नहीं हुई थी। तपस्या पूरी करने के लिए स्वामी जी ने अमरनाथ की कठिन यात्रा की और अपने पैर बढा़ए। निवेदिता उनके पीछे-पीछे चलीं। गुरू प्रसन्न और आनंदित शिष्या शांत और थकित। अमरनाथ की तुषार-निर्मित अंधेरी गुफा में प्रवेश कर स्वामी जी शिवजी को प्राणम कर निवेदिता के रूप में एकमात्र भेंट समर्पित की। इस सबका कोई अर्थ निवेदिता की समझ में नहीं आया कि उन्हें नंगे पैरों बर्फ पर चलाकर ऊँचे पर्वतों को पार कराकर इस अंधेरी गुफा में क्यों लाया गया? और उन्होंने गुरू से कडे़ शब्दों में इसका प्रतिवाद किया। आँखों में आँसू भरकर स्वामी जी ने शांत भाव से कहा- "निवेदिता मुझ में वह शक्ति नहीं कि जो तुम चाहती हो और वह तुम्हें दे सकूँ। अभी तुम्हें यात्रा का महत्त्व नहीं मालूम होगा। किंतु बाद में इसका रहस्य प्रकट होगा। माँ काली को पुकारों, वे तुम्हारे पास आकर तुम्हें शक्ति देंगी।"
ये शब्द कहकर स्वामी जी अज्ञातवास में चले गए। अब निवेदिता ने काली माँ का ध्यान करना शुरू किया। उन्हें अपनी गलती अनुभव होने लगी और समझ में आया कि उनके गुरू किस प्रकार उनके दोषों का निराकरण कर उन्हें अपनी ओर खींचते जा रहें हैं। अपने दोषों को देखना भी महत्त्वपूर्ण साधना है। इस साधना से पूर्वकृत पापों और मानसिक दुर्भावों का परिमार्जन होता है। आत्म-चिंतन और शोध की यह प्रक्रिया ही व्यक्ति को आत्म-सत्ता की महत्ता और सन्निध्यता तक पहुँचा देती है। साधक अपने आपको शक्ति का अकूत भंडार अनुभव करने लगता है। काली के ध्यान से निवेदिता की सब निराशा और दुःख दूर होकर हृदय में आनंद भर गया। स्वामी जी के लौटने पर निवेदिता ने अपना सिर उनके चरणों पर रखकर कहा- "अब मैंने अपनी दिव्य माता को पहचान लिया है।" निष्कलुष हुई उनकी आत्मा ही माँ काली थी, जिसे पाकर वे विभोर हो उठीं।
इस यात्रा में स्वामी जी अपने शिष्यों को धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय कराते। अपनी ज्ञान-दृष्टि से वे निवेदिता के हृदय में प्रवेश कर उनकी शंकाओं का समाधान करते और उनके पश्चिमी संस्कारों को उखाड़कर भारतीय संस्कारों को जमाते रहते थे। एक दिन निवेदिता ने भारत से अपने देश की तुलना की, तो स्वामी जी ने फटकारा। तुम इस प्रकार क्यों तुलना करती हो, जो वहाँ के लिए उपयुक्त है, वह यहाँ के लिए नहीं हो सकती। इस प्रकार की देश-भक्ति एक पाप है। क्या यह हमारी संकीर्णता नहीं है कि हम केवल आयरलैंड, इंगलैंड या भारतवर्ष को ही अपनी जन्म-भूमी मानें? विशाल पृथ्वी हमारी माता और संपूर्ण विश्व की आत्मा ही हमारा उपास्य है। उस महत्त्व की ओर उन्मुख होकर अपने देश, भाषा और भूमि की संकीर्णता का परित्याग करना ही उचित है।
कुछ ही दिनों बाद निवेदिता ने लिखा- ‘‘मेरी शिक्षा अभी चल रही है। दृष्टिकोण साफ होता जा रहा है। गुरू की कृपा से मैं प्रकाश पा रही हूँ। मेरे जो भ्रम रास्ते को रोक रहे थे, वे जाग्रत् प्रतिभा के प्रकाश में दूर होते जा रहें हैं। आश्चर्य तो यह है कि गुरू केवल प्रकाश देते हैं, अपने विचार लादते नहीं हैं। यही उनकी शिक्षा का मुख्य सिद्धांत है।’’
स्वामी जी का दूसरा उद्देश्य निवेदिता के राजनैतिक विचारों में परिवर्तन करना था। वे समझती थी कि भारत अंग्रेजी साम्राज्य का स्थायी अंग है। इस विचित्रता और विविधतापूर्ण देश की एकता बाहरी शक्ति के द्वारा ही संभव है। अंग्रेजी राज्य ने भारत का बहुत उपकार किया है। भारत का स्वतंत्रता चाहना स्वाभाविक है, किंतु उसे प्राप्त करने में सैकड़ों वर्ष लग जायेंगे। इसलिए उनके जीवन का उद्देश्य भारत और इंगलैंड के बीच प्रेम संबंध स्थापित करना था। इस पर स्वामी जी ने कहा कि- ‘‘काम करो, अभीप्सा करो, शायद तुम्हें रास्ता मिल जाय। दो साल पहले मैं भी ऐसे ही विचार रखता था।’’ और बहुत जल्दी इस विषय में निवेदिता का स्वप्न दूर हो गया। ज्यों-ज्यों निवेदिता भारत में अंग्रेजों के संपर्क में आती गईं त्यों-त्यों वे उनकी साम्राज्य-लिप्सा को समझने लगीं। सबसे पहले धक्का तब लगा, जब शासन ने विवेकानंद द्वारा संस्कृत कॉलेज के लिए भूमि देने से इनकार कर दिया। इससे अंग्रेजों का अभिमान स्पष्ट हो गया। साथ ही कारखानों के मजदूरों, रेल के यात्रियों आदि के साथ किए गये दुर्व्यवहार भी उनके सामने आए, तब उनकी आँखें खुलीं।
स्वामी जी का यह तो बाहरी शिक्षण था, वे तो निवेदिता के अंतरगं को बदलना चाहते थे। भीतर हृदय बदल जाने से बाहरी परिवर्तन में देर नहीं लगती। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि तुम्हें आंतरिक और बाह्य जीवन में एक ब्राह्मण ब्रह्मचारिणी के समान रहना होगा और अपने जीवन को अपने भूतकाल और उसकी स्मृति को ईश्वर के चरणों में अर्पित करना होगा।
यात्रा समाप्त होने पर निवेदिता कलकत्ता लौट आईं। वे श्री शारदामणि देवी के समीप रहने लगीं। उनकी साधुता, पवित्रता और मधुरता से वे बहुत प्रभावित हुईं। अब तो स्वामी जी ने उन पर और भी कठिन तपस्या के नियम लगा दिए और कहा- ‘‘अब तुमको एक हिंदू विधवा के समान जीवन-यापन करना होगा। तुम्हें किसी से मिलना-जुलना बंद कर एकांत में रहना होगा। अपने मन की चंचलता को नियंत्रित करो और चेहरे पर कोई भाव प्रकट न होने दो। बिना किसी भावना के अपने आपको पहचानो।’’
कुछ दिनों बाद लड़कियों के लिए पाठशाला खोली गई और निवेदिता को अपने मन का काम मिल गया। अब स्वामी जी ने उनसे कहा कि-तुम्हें अब कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए कि प्रार्थना और ध्यान के लिए अब समय नहीं मिलता। कार्य ही को अपने जीवन का ध्येय समझो। इसी लक्ष्य की ओर तुम्हें ले जाना चाहता हूँ। मेरा ध्येय न तो रामकृष्ण का है, न वेदांत का है, वरन् जनता में मनुष्यता को जगाना है। विदेशों में यह कार्य स्त्रियों ने किया है। वह दिन कब होगा जब भारतीय नारियाँ अपनी कमजोरी को दूर कर अपना ध्येय पूरा करेंगी।
इसी बीच कलकत्ता में भयानक प्लेग फैला और निवेदिता ने निर्भीकता, आत्म-त्याग और एकाग्रता से जनता की सेवा की। उनकी व्यवस्था को देखकर एक शिष्य से स्वामी जी ने कहा-उस पर तरस मत खाओ, अब वह सब बातों से ऊपर उठकर भारत के प्रति निवेदित हो गई है। मैंने उसे बनाने में इतना समय दिया है, जितना किसी को नहीं दिया। अब निवेदिता पत्रों को लेख लिखने लगीं। उनके द्वारा लिखित प्लेग का हाल पढ़कर जनता स्तंभित रह गई। वे ब्रह्म-समाज के साथ काम करने लगीं। रवींद्रनाथ ठाकुर के साथ भी इनका संपर्क स्थापित हो गया ।
भारत में स्त्रियों के लिए काम करने की प्रेरणा भगिनी निवेदिता को किस प्रकार मिली, इस पर वे लिखती हैं कि-
एक बार बातचीत करते समय मेरी तरफ उन्मुख होकर उन्होंने कहा- ‘‘अपने देश की स्त्रियों के लिए मैंने योजनाएँ बनाई हैं, जिनसे मुझे बड़ी सहायता मिल सकती है।’’ मैंने योजना के बारे में उस समय नहीं-किंतु कुछ दिन बाद जब मैंने उनसे ‘नंदन’ को स्वच्छ बनाने की बात कही, तब वे बोल पड़े- ‘‘तुमने नगर को सुंदर बनाने के लिए बहुत से नगरों पर बमबारी की है।’’ ये शब्द अब तक मेरे कानों में गूँजते रहे। एक बार उन्होंने फिर कहा- ‘‘अंग्रेज लोग एक छोटे-से द्वीप में पैदा हुए हैं और वे उसी में सुंदर जीवन बिताना चाहते हैं।’’ तब मुझे यह बात अपने संबंध में ठीक लगी कि, मेरे विचार कितने संकुचित हैं? इसी के बाद मैंने स्वामी जी कार्य में सहायता देने की इच्छा प्रकट की। उन्हें कुछ आश्चर्य हुआ, किंतु वे बोले- ‘‘मैं तो अपने कार्य को पूरा करने के लिए २०० बार जन्म लेने को तैयार हूँ।’’ अभी तक ये विचार मेरे मन में बैठे हुए हैं।
नारी शिक्षा का श्रीगणेश एक कन्या विद्यालय से कराया गया। काली पूजा की पुण्य तिथि से बोसपारा लेन से इसका शुभ आरंभ हुआ। माँ शारदा देवी ने आर्शीवाद दिया, किंतु कट्टरपंथियों ने इसका कम विरोध नहीं किया। एक विदेशी महिला को कोई अपने मकान में प्रवेश देने को तैयार न था और उसके संरक्षण में अपनी लड़कियों को पढ़ाना कोई पसंद न करता था। बड़ी कठिनाई से दो-चार विवेकशील अभिभावकों ने अपनी कन्याएँ भेजीं। पर जब लोगों ने नारी-शिक्षा के महत्त्व को समझना शुरू किया तो यह संख्या भी बढ़ने लगी, किंतु बड़ी बाधाओं को पार कर ही इस शाला की संख्या बढ़ी। इस प्रकार जिस दिन कालीघाट के कालीमंदिर में स्वामी जी ने निवेदिता को भाषण देने के लिए निमंत्रित किया, उस दिन कट्टरपंथियों का विरोध और भी बढ़ गया। किंतु स्वामी जी के आदेशों के अनुसार जब उन्होंने नंगे पैर से मंदिर में प्रवेश किया और अपने भाषण में महाशक्ति के प्रति अपने हृदय के भावों को व्यक्त किया तब कहीं लोगों का विरोध शांत हुआ। बाद में चलकर ‘‘काली दी मदर’’ नामक पुस्तक की रचना की तो लोगों की श्रद्धा और बढ़ गई।
प्लेग के समय निवेदिता ने अपने प्राणों को हथेली पर रखकर लोक-सेवा की। उसके संबंध में सर जगदीशचंद्र बसु ने अपनी पत्नी को एक पत्र में लिखा था- "अनेक लोगों को स्मरण होगा कि इस समय कितना भयंकर आतंक फैल गया था। रेलें तथा स्टीमर भागने वाले लोगों से भरे रहते थे। जिस समय आतंक अपनी चरम सीमा पर था-उस समय भगिनी निवेदिता सहायता कार्य में जुटी थीं। उन्होंने नवयुवकों के एक दल का संगठन किया।’’
श्री रवींद्रनाथ ठाकुर उनके स्थान पर काव्य चर्चा करने आए, इसी बीच बैलूर मठ से उनके लिए बुलावा आया। हर्ष के साथ उन्होंने वह समाचार गुरूदेव को सुनाया। गुरूदेव ने मन में कहा-निवेदिता को अपना चुना हुआ ईश्वर मिल गया। ब्रह्म-समाज के साथ उनका संपर्क अधिक समय तक नहीं चला, इससे सुरेंद्रनाथ, जगदीशचंद्र बसु तथा अवनींद्रनाथ ठाकुर सरीखे मित्र अवश्य प्राप्त हुए, जिनके द्वारा उनका संबंध स्वदेशी आंदोलन से हो गया।
अब तो निवेदिता की सार्वजनिक सभाओं में बोलने का निमंत्रण मिलने लगा, इतने दिनों तक दबी हुई शक्ति एक प्रवाह के रूप में निकलने लगी। स्वामी जी ने आज्ञा दी कि, तुम्हें काली माँ के विषय में बोलना है। शांत भाव से निवेदिता ने भाषण दिया, जिसकी श्रोताओं ने बड़ी प्रशंसा की। कालीघाट के पुरोहितों ने भी उन्हें बोलने के लिए बुलाया। स्वामी जी की अध्यक्षता में भाषण होना था, किंतु उन्होंने निवेदिता को अकेले ही जाने का आर्शीवाद देकर भेजा- ‘‘सदा याद रखना कि तुम माँ काली की सेविका हो। निवेदिता नंगे पैरों से चलकर कालीघाट पहुँची। उनके भाषण से जनता मंत्रमुग्ध हो गई। निवेदिता को भी विश्वास हो गया कि माँ काली की कृपा हमें प्राप्त हो गई है। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने बड़ी सावधानी, प्रेम और संयम के साथ निवेदिता को आंतरिक और बाह्य संसार में भविष्य में अपना कार्य करने के लिए तैयार किया।

