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Books - बहन निवेदिता

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स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रणी निवेदिता

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निवेदिता का उदय धार्मिक पृष्ठभूमि में हुआ था, किंतु उन्होंने भारतीयों को धर्म और उनकी प्रसुप्त आध्यात्मिकता के लिए कुछ करने से पूर्व वातावरण को दुरुस्त करना अधिक उचित समझा। आवश्यकता इस बात की थी कि पहले भारतीय अपने स्वाभिमान को समझें, उनमें शिक्षा और संस्कृति का विस्तार हो। उनमें विचार आएँ, संकल्प जाग्रत् हों, पर इसमें प्रमुख बाधा थी-वह थी राजनैतिक पराधीनता। इसलिए भारतवर्ष को स्वतंत्र करना ही उस समय उनका मुख्य उद्देश्य बन गया और वे उसी में पूरी तरह व्यस्त हो गईं। यह ठीक भी था, जो उत्तरदायित्व सामने हो उसे ही ठीक तरह पूरा कर लें, तो एक महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न हो जाने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। इसके बाद उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश किया और स्वतंत्रता के आंदोलन में भाग लिया और भारत में यात्रा करना प्रारंभ किया। क्रांतिकारियों से संपर्क स्थापित करतीं। धार्मिक मिशन छोड़कर उन्होंने राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता की साधना प्रारंभ की। 
       नेविन्सन ने लिखा- ‘‘वह भारतीयता से अप्लावित थे।’’ स्वामी ब्रह्मानंद ने कहा- ‘‘विवेकानंद के सिवा किसी व्यक्ति ने भारत को प्यार नहीं किया।’’ रवींद्रनाथ ने कहा- ‘‘मैं निवेदिता को जनता की माता के रूप में देखता हूँ।’’ अनेक रूप से उन्होंने हमारी सुप्त आत्मा को जगाया। स्वयं स्वामी जी उन्हें राष्ट्रीयता के जागरण के लिए अपना समर्पण अन्य साधकों को मना किया था कि निवेदिता की स्वतंत्रता में बाधा न दें। 
        हम देखते हैं कि कभी वे नरम दिल वालों के साथ हैं तो कभी राष्ट्रवादियों के साथ, कभी युवकों का साथ दे रही हैं तो कभी पत्रकारों का। कभी स्वदेशी का प्रचार कर रही हैं तो कभी अकाल पीड़ितों की सहायता कर रही हैं। कभी वैज्ञानिकों के साथ अनुसंधान में लीन हैं तो कभी अभावग्रस्त कलाकारों की सहायता कर रही हैं। कभी साहित्यिक आंदोलन चला रही हैं तो कभी सांस्कृतिक। वे स्वयं एक संस्था बन गई थीं। उनकी अक्षय प्राण-शक्ति, आत्म-विस्तारक व्यक्तित्त्व आश्चर्यचकित करने वाला था जान पड़ता था कि उन्होंने स्वामी के साथ तपस्या कर, जो आध्यात्मिक शक्ति अर्जित की थी और जो अभी तक रुद्ध थी वह अचानक प्रवाहित हो गई है। 
         गुप्त समितियों के साथ इनका संपर्क लोगों को आश्चर्य में डाल देता है। इस कार्य के लिए उन्होंने सारे भारत में यात्रा की। जब वे बड़ोदा आईं तो उनकी श्री अरविंद से भेंट हुई। वे भी उस समय गुप्त समितियों के संगठन में लगे थे। दोनों एक-दूसरे से परिचित थे। श्री अरविंद ने निवेदिता की पुस्तक ‘‘माँ काली’’ पढ़ी थी और  निवेदिता ने श्री अरविंद के लेख ‘‘इंदु प्रकाश’’ आदि पत्रों में पढ़े थे। निवेदिता ने सीधा प्रश्न किया-क्या आप काली के उपासक हैं? अर्थात् क्या क्रांति में विश्वास करते हैं। गायकवाड़ से भी उन्होंने क्रांति में सम्मिलित होने को कहा। निवेदिता खुले आम क्रांति का प्रचार करती-फिरती थीं। उन्होंने श्री अरविंद से भी बंगाल चलने को कहा, किंतु उन्होंने उत्तर दिया- "अभी समय नहीं आया, मैं क्षेत्र तैयार कर रहा हूँ।" 
       उसके बाद निवेदिता ने श्री अरविंद के राजनैतिक आंदोलन को आगे बढ़ाया प्रारंभ कर दिया। श्री अरविंद में उन्होंने विवेकानंद की छाया देखी। श्री अरविंद भी राष्ट्रीयता को अपना धर्म समझते थे। इसलिए दोनों एक दूसरे के समीप आकर सहयोगी बन गए। निवेदिता पूरी तौर से क्रांतिकारी थीं। क्रांति ही उनका स्वधर्म बन गया था। ‘‘माँ काली’’ पुस्तक में उन्होंने बड़े खुले शब्दों में रक्तमय क्रांति का प्रतिपादन किया है। 
   किंतु आंतरिक रूप से निवेदिता एक योगिनी, साधिका और कला-प्रेमी थी। स्टेशन से जाते समय धर्मशाला के भवन को देखकर वे कह उठीं-कितना सुंदर है? और जब कॉलेज के भवन को देखा तो बोलीं-कितना भद्दा है? इन्हीं परस्पर विरोधी गुणों  का मिश्रण होने के कारण बड़े-बड़े लोग भी निवेदिता को नहीं समझ पाए। श्री अरविंद ने उन्हें अच्छी तरह समझा था। एक दिन जब लोगों ने किसी क्रंातिकारी नेता के विषय में कहा कि, वे तो क्रांतिकारी थे, तब श्री अरविंद चुप रहे, किंतु जब निवेदिता की चर्चा आई तब वे बोल उठे-हाँ वे जरूर अग्निस्वरूपा थीं। विवेकानंद ने उन्हें सचमुच सिंहनी बना दिया था। साथ ही उनका सौंदर्य भी अप्रतिम था। जहाँ भी वे जातीं लोग उनके शक्तिमय सौंदर्य और प्रतिभा से प्रभावित हो जाते थे। उनके पवित्र सौंदर्य के सामने बड़े-बड़े दरबारों और शासकीय भवनों की सज्जित सुंदरियाँ भी लज्जित हो जाती थीं। उनका सौंदर्य पार्थिव न था, वरन् साधना एवं संयम की तेजस्विता दमदमाती थी। उस पर ज्ञान और वाणी के ओजस् ने मिलकर व्यक्तित्त्व को निखारा। वे कुछ ऐसी बन गई कि, वे जहाँ गई-वहीं लोगों ने प्रकाश की प्रेरणा पाई।         
       इसके साथ ही वे जितनी नम्र और कोमल थीं-सिद्धांतों के प्रति उतनी कठोर थीं। वे भारतीय युवकों से कहती थीं-इंगलैंड बमों की भाषा ही समझता है। तुम्हारी मिट्टी ने कितने ही वीरों को पैदा किया है। उन्हीं के समान तुम भी युद्ध करो। क्रांतिकारी जब कारागार में बंद थे, तब वे उनकी स्त्री बच्चों को देखकर करुणा से द्रवित हो जाती थीं और उनको अपना सब पैसा दे डालती थीं। इन सब कार्यों के कारण वे शासन की कुदृष्टि से नहीं बच पाई थीं, किन्तु वे न तो किसी शासन के भय से भयभीत होती थीं और न किसी की कृपा से द्रवित। परमात्मा को पाकर किसी को संसार से भय क्यों होने लगा? 
   एक ओर युगांतर और वंदे मातरम् में श्री अरविंद के क्रांतिकारी लेख और दूसरी ओर निवेदिता के आग उगलने 
वाले भाषण, दोनों ने मिलकर बंगाल ही नहीं समग्र भारत को उत्तेजित कर दिया था। इसके कारण बहुत से निकट मित्रों से उनका मतभेद भी हो गया, किंतु देश के लिए इसकी कोई परवाह न की। वे युवकों को जगदीश बसु और प्रफुल्लयराय के पास बम बनाना सीखने तथा विदेशों से अस्त्र-शस्त्र संग्रह को भेजती रहीं तथा इधर शासन का दमन-चक्र भी तीव्र गति से चलता रहा। श्री अरविंद इस समय जेल में थे, किंतु शासन की इच्छा थी कि बाहर निकलते ही उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया जाए। इसका पता जैसे ही निवेदिता को चला तो इन्होंने उनको चंद्रनगर जाने की सलाह दी। श्री अरविंद को भी ईश्वरीय आदेश मिल गया था और वे कर्मयोगी का भार निवेदिता पर छोड़कर वहाँ चले गये। श्री अरविंद के इस प्रकार विदेश जाने के कारण क्रांतिकारी आंदोलन भी धीरे-धीरे शांत हो गया। निवेदिता में भी अब वह उत्साह नहीं रहा, उनमें भी अपने गुरू के समान स्वतंत्रता की अवैयक्तिक भावना उदय हो गई। उन्होंने भी आंदोलन से अलग होकर अपनी आत्मा के मंदिर में प्रवेश किया। 
      ब्रिटिश शासन के दुष्कृत्यों एवं स्वाधीनता की लहर के कारण १९०५ के प्रारंभिक दिनों में ही बंगाल की 
स्थिति एक सुप्त ज्वालामुखी की भाँति हो गई थी। तत्कालीन वाइसराय की उद्दंडतां ने उस ज्वाला में घी डालने का काम किया था। कलकत्ता नगरपालिका व विश्वविद्यालय में बिल का उग्र विरोध चल रहा था। ऐसे ही काल में ११ फरवरी सन् १९०५ को कलकत्ता विश्वव्रिद्यालय के दीक्षांत समारोह में लार्ड कर्जन स्वयं पधारने वाले थे। हठवादी वाइसराय ने अपने क्रोध को व्यक्त करने का यह अच्छा अवसर ढूँढ़ निकाला। अत्यंत असभ्य-अपमानजनक भाषा में स्नातकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-पश्चिम देश की तुलना में शारीरिक, बौद्धिक अथवा नैतिक दृष्टि से यदि पूर्व की प्रमुख विशेषता को यदि मुझे एक ही शब्द में कहना पड़े तो मुझे उसके लिए गप्प मारना या डींग मारना शब्द को ही प्रयोग में लाना होगा। यह देशी प्रेस के लिए और भी अधिक उपयुक्त है।’’ 
          विशाल मंडप में न्यायाधीश बनर्जी के निकट बैठीं निवेदिता धर्मप्रधान भारतीय जन-जीवन पर असत्यवादिता के भीषण आरोप को सुनकर क्रोध से आग-बबूला हो उठीं। यह असहनीय था। कार्यक्रम समाप्त होते ही बाहर आकर झल्लाकर वे बोल उठीं- "मैं सिद्ध कर दूँगी कि लार्ड कर्जन स्वयं झूठा व्यक्ति है।’’ विद्वत् मंडली उनके तमतमाये हुए चेहरे को चकित होकर देख रही थी, किंतु न्यायाधीश महोदय को विश्वास था कि तथ्यों के आधार पर बोलना निवेदिता का स्वभाव है। भगिनी उसी क्षण न्यायाधीश महोदय को लेकर इंपीरियल लाइब्रेरी में गईं तथा अलमारी में ढूँढ़कर एक पुस्तक निकाली और एक पृष्ठ खोलकर न्यायाधीश महोदय के हाथों पर रख दिया। श्रीयुत बनर्जी महोदय के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। जब उन्होंने देखा कि उक्त पुस्तक ‘‘प्रॉब्लम्स ऑफ फार ईस्ट’’ के लेखक लार्ड कर्जन स्वयं थे तथा उक्त पृष्ठ पर एक घटना का उल्लेख किया हुआ था, जिसमें उन्होंने जान-बूझकर झूठ बोला था। मन ही मन न्यायाधीश महोदय भगिनी के प्रकांड पांडित्य पर चकित थे। आज भगिनी में उन्होंने एक वीरांगना के दर्शन किए थे। दूसरे दिन अमृत बाजार पत्रिका में लार्ड कर्जन की पोल खोलते हुए ‘‘झूठा कौन’’ शीर्षक संपादकीय प्रकाशित हुआ, जिसकी प्रेरणा भगिनी निवेदिता ने ही दी थी। इससे जनता की दृष्टि में लार्ड कर्जन झूठे साबित हो गये।


बंग-भंग के आंदोलन में भगिनी निवेदिता ने अस्वस्थ होने पर भी खुलकर भाग लिया। इस विषय की प्रथम सभा में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘हम अपने संघर्ष को उस समय तक जारी रखेंगे जब तक कि भारतीय वीरों के बलिदान, बंग-भगं की इस अपमानजनक दीवार को तोड़कर हमारे प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए अंग्रेजों को बाध्य न कर लेंगे। 
           स्वदेशी के बारे में आपने एक बार कहा था कि- ‘‘एक समय आवेगा जब जो वस्तु स्वदेश में प्राप्त होती है, उसे विदेश से खरीदने वालों की गणना गौ हत्यारों में की जायेगी क्योंकि दोनों अपराध नैतिक दृष्टि से समान प्रतीत होते हैं।’’ 
         निवेदिता ने कलकत्ता कांग्रेस के अवसर पर बड़े परिश्रम के साथ स्वदेशी प्रदर्शनी का आयोजन किया था। जिसमें स्वदेशी हस्तकला के बहुत से संग्रहीत किये गये थे। इसी अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय झंड़े का एक रूप प्रस्तुत किया था। उसमें भगवे रंग के ऊपर वज्र का चिह्न अंकित किया था। राष्ट्रीय-पताका का यह प्रारंभिक रूप था जो कि विकसित होते हुए वर्तमान रूप में आया। 
         सन् १९०५ की कांग्रेस के अध्यक्ष श्री गोखले ने भगिनी निवेदिता का विशेष रूप से रूप से आमंत्रित किया था। उस समय विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव विशेष रूप से विचारणीय था, किंतु गोखले जी की अनुमति से निवेदिता को उस समय अनुपस्थित रहना पड़ा। वे प्रारंभ ही से क्रांतिकारी मनोवृति की थीं। अतः उन्हें कांग्रेस की शांतिपूर्ण नीति पसंद नहीं थी। देश भक्ति की प्रेरणा ग्रहण करने के लिए उन्होंने राजस्थान की यात्रा की और वीरों के बलिदान स्थलों पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पण की। 
       क्रांतिकारी आंदोलन पर शासन का दमन-चक्र जोरों से चल रहा था, किंतु निवेदिता का निवास स्थान उन सबके लिए आश्रय स्थान बन रहा था। उन्होंने न केवल क्रांतिकारियों को क्रांति की दीक्षा दी थी किंतु अनेक क्रांतिकारियों को बम बनाने तक की शिक्षा दी थी। कई तरुणों को तो उन्होंने इसी निमित विदेशों में भेजा था। जब भूपेंद्रनाथ दत्त(स्वामी जी के भाई) पर दस हजार का दंड किया गया तब निवेदिता ही उसे चुकाने में सहायक हुईं। 
           सन् १९०७ में निवेदिता ने फिर इंगलैंड की यात्रा की और वहाँ अपने परिवार वालों से पाँच वर्ष बाद मिलने पर भी अपने लेखन-कार्य को जारी रखने के साथ ही संसद के प्रमुख सदस्यों से मिलकर उन्हें भारत का समर्थक बनाया। इतना ही नहीं किंतु वहाँ के प्रमुख पत्र-संपादकों को भी भारत के पक्ष में लिखने को प्रेरित किया। इससे भी संतुष्ट न होकर उन्होंने पेरिस से ‘‘इंडियन नेशनलिस्ट’’ बर्लिन से ‘‘तलवार’’ तथा जिनेवा से ‘‘वंदे मातरम्’’ पत्रों के प्रकाशन की प्रेरणा दी।

इसके बाद उन्होंने अमेरिका में तीन मास निवास कर प्रमुख नगरों की यात्रा की। विशेष राजनैतिकों और पत्रकारों से मिलकर उन्होंने भारत का समर्थन करवाया। अमेरिका प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों से भेंट कर उनके लिए चंद्रनगर में निवास करने की व्यवस्था की। इसके अतिरिक्त अपने विद्यालय के लिए धन संग्रह और स्वामी जी के पत्रों को एकत्र करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। भारत के आंदोलन का उन्हें सदा ध्यान रहता था। अपनी मरणासन्न माता के दर्शन करने के लिए वे १९०९ में विलायत लौटीं, किंतु उसी वर्ष जुलाई में भारत के लिए प्रस्थान कर दिया। यहाँ भारत में कई क्रांतिकारी हत्याएँ हो चुकी थीं और क्रांतिकारी जेलों में सड़ रहे थे। उनकी सेवा और सुरक्षा के लिए निवेदिता ने अपने बंधु-बांधवों का मोह भी त्याग दिया। 
     अमेरिका की श्रीमती बुल स्वामी जी की अन्यतम शिष्याओं में से थीं। उन्हीं की सहायता से बैलूर मठ, निवेदिता बालिका विद्यालय तथा बोस अनुसंधान संस्था स्थापित की जा सकी थीं। उनको स्वामी जी धीरा माता कहा करते थे। इनकी बीमारी का समाचार पाकर निवेदिता सन् १९१० में बोस्टन नगर पहुँचीं और उन्होंने उनकी अथक सेवा की, किंतु वे उन्हें मृत्यु के मुख से न बचा सकीं। उसके पहले वे अपनी प्रिय संस्थाओं को सहस्त्रों पौंड अपनी वसीयतनामे के द्वारा दान कर गई थीं। वहाँ से लौटकर निवेदिता ने भी अपने कार्य से विश्राम ले लिया। उनके देखते ही एक के बाद एक स्वामी जी के सभी साथी उन्हें छोड़ते चले जा रहे थे। उन्होंने भी जलवायु परिवर्तन के लिए दार्जलिंग की ओर प्रस्थान किया। वहाँ वे स्वास्थ्य लाभ न कर सकीं। धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती ही गई। मृत्यु के ४ दिन पूर्व उन्होंने एक बड़ा मार्मिक लेख लिखा, जिससे आगामी घटना का स्पष्ट पता लगता है। उनके मुख से अंतिम प्रार्थना निकली- 
                                       असतो  मा  सद्गमय। 
                                       तमसो  मा  ज्योतिर्गमय। 
                                       मृत्योर्मा मृतं  गमय। 
                                       (वृह०उप०१३.२८) 

         मृत्यु के पूर्व उन्होंने अपनी डायरी में ये चिरस्मरणीय शब्द लिखे- ‘‘मेरा प्रियतम, वह चिरानंद सर्व प्रिय है, जो इस खिड़की से झाँक रहा है, जो इस द्वार को खटखटा रहा है।’’ "ओ प्रियतम ! मेरा सार सर्वस्व तुम्हारा ही है।’’ 
            तेरह अक्टूबर को उनका प्रयाण दिवस आ गया। बैलूरमठ से श्री गानेन महाराज प्रसाद लेकर पहुँच गये। मानो निवेदिता के प्राण इसी के लिए अटके थे। प्रसाद पाने के बाद वे बोल पड़ीं- ‘‘टूटी नाव अब डूब रही है, परंतु मेरा विश्वास है कि उदय होते ही दर्शन अवश्य करूँगी।’’ और वह दिव्य वाणी सदैव के लिए मूक हो गई। 
     सारे देश में इस समाचार के साथ शोक छा गया। बड़े समारोह के साथ उनका अंतिम-संस्कार संपन्न हुआ। उनकी समाधि पर ये शब्द अंकित हैं- 
   ‘‘यहाँ चिर शांति में लीन हैं-भगिनी निवेदिता’’-जिन्होंने भारत के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया। 
       एक बार किसी ने श्री अरविंद से पूछा किनिवेदिता ने अपना आध्यात्मिक कार्य छोड़कर क्रांतिकारी आंदोलन में क्यों प्रवेश किया? श्री अरविंद ने उत्तर दिया-अपने गुरू के आदेश से। निवेदिता की आध्यात्मिक साधना के विषय में पूछने पर उन्होंने कहा- ‘‘उनमें समाधि लगाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति थी।’’ 
         आज चाहे भारत भले ही निवेदिता को भुला दे, किंतु उनका अक्षय ऋण भारत के धर्म, राजनीति, शिक्षा नीति और समाज सुधार के क्षेत्र में सदा अमर रहेगा। विवेकानंद के आदर्श के अनुसार एक दिन भारत फिर से संसार के गुरू का स्थान ग्रहण करेगा। निवेदिता की प्रेरणा से उनके गुरू को दी हुई शक्ति से भारत की सुप्त कुंडलनी शक्ति जाग्रत् हो गई। उन्होंने शिक्षा की नवीन पद्धति का प्रयोग किया, नारी जागरण को बल दिया, भारतीय चित्रकला तथा हस्तकलाओं के क्षेत्र भर मे योगदान दिया, पत्रकारिता को नई दिशा दी, विदेशों को भारतीय संस्कृति का परिचय दिया तथा भारत को भक्तिपूर्ण दिव्य वाणी से माँ काली के स्वरूप का ज्ञान कराया। स्वतंत्रता आंदोलन को नवीन शक्ति प्रदान की तथा अपनी लेखनी से अपार साहित्य का सृजन किया। इन कारणों से संसार में वे सदा अविस्मरणीय रहेंगी। 
        इस संदर्भ में रवींद्रनाथ ठाकुर का एक चित्र सामने आता है, उसमें भारत माता के हृदय में निवेदिता खड़ी हैं। उनके सिर पर विवेकानंद हैं और उनके ऊपर घ्यान मग्न रामकृष्ण हैं। निवेदिता के दोनों ओर जगदीश बोस और एक ओर स्वयं अवनींद्रनाथ हैं और एक ओर रामानंद, मोतीलाल, तिलक तथा गोखले आदि नेता हैं। यह चित्र प्रतीकात्मक है। 
    निवेदिता के संबंध में श्री अरविंद का एक वाक्य उद्धृत हैं-भगिनी निवेदिता के प्रति हमारे ऋण का कोई अंत नहीं है।" 
      भगिनी निवेदिता अपने समय के जिन-जिन महापुरुषों के संपर्क में आईं। उन सभी ने उनके प्रति उच्च भाव प्रगट किये हैं। श्री रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा- "वास्तव में निवेदिता जगत् जननी थीं। हमने शायद ही कभी इतने मातृ स्नेह के दर्शन किये होंगे, जो अपने परिवार क्षेत्र से बाहर एक संपूर्ण देश को आत्मसात् कर सकता हो।" श्री विपिनचंद्र पाल ने कहा था- "वे हमारे मध्य आत्म-समर्पण के भाव से प्रेरित होकर आई थीं। श्री यदुनाथ सरकार के शब्दों में- "राष्ट्रवादियों में वे अग्रगण्य थीं।" श्री मोतीलाल बोस ने लिखा है- "वे दग्ध मानवता को सुख प्रदान करने के लिए मानव रूप में एक देवी थीं।" श्री दिनेशचंद्र सेन ने लिखा है- "निःस्पृही व्यक्तित्व का केवल आज ही मैं दर्शन कर सका हूँ।" 
     प्रसिद्ध दार्शनिक रोम्याँरोलाँ ने उनके संबंध में लिखा था- "जिस प्रकार सैंट क्लारा का नाम सैंटफ्रांसिस से जुड़ा है, इसी प्रकार दक्षिणेश्वर की काली के साथ विवेकानंद का तथा उनके साथ भगिनी निवेदिता का नाम सदैव जुड़ा रहेगा।" 
        मानवमात्र से आत्मीयता की भावना, सेवा-धर्म की सर्वोपरिता और परोपकार के महान् आदर्श की प्रेरणा तो हम भगिनी निवेदिता के चरित्र से ग्रहण कर ही सकते हैं, पर उनकी एक बडी़ शिक्षा जिसकी तरफ अभी तक हमने थोडा़ ही ध्यान दिया है-यह है कि भारतीय नारी को ऊँचा उठने के लिए उचित अवसर और सुयोग्य प्रदान किया जाय। नारी क्या कर सकती है? इसका एक बहुत बडा़ और अकाट्य उदाहरण उन्होंने अपने चरित्र और कार्यों से दिखाया। धार्मिक, शिक्षा संबंधी, कला संबंधी, राजनैतिक, आध्यात्मिक-सभी क्षेत्रों में उन्होंने ऐसा काम कर दिखाया, जिसकी तुलना सुप्रसिद्ध पुरुष कार्यकर्ता भी बहुत कम कर सकते हैं। इस पर भी उनके समाने एक अपरिचित समाज, विदेशी भाषा भिन्न जलवायु और सर्वथा भिन्न वातावरण आदि की अनेकों बाधाएँ थीं। बहुत बडे़ योग्य और शक्ति-साधन संपन्न व्यक्ति भी ऐसी विपरीत परिस्थितियों में बहुत कम ठहर पाते हैं। पर भगिनी निवेदिता ने एक बार निश्चय करके जिस मार्ग को एक बार अपनाया, उस पर वे जीवन के अंत तक स्थिर रहीं और इतना ठोस काम कर दिखाया कि जिसको कभी भुलाया नहीं जा सकता। 

         उनका उदाहरण भारतीय नारियों के लिए निश्चय ही अत्यंत प्रेरणादायक है। जब एक ओर हम भगिनी निवेदिता के सार्वभौम एकता और दूर देश वालों के हितार्थ तन, मन, धन को समर्पण कर देने की सर्वोत्कृष्ट मनोवृति को देखते हैं और दूसरी ओर अपने -पराये की हीन भावना, अंधपरंपराओं तथा रूढ़ियों का अनुगमन आदि पर ध्यान देते हैं तो एक असंतोष का भाव स्वयंमेव उत्पन्न होता है। यहाँ की स्त्रियों ने तो शिक्षा पाकर अगर कुछ सीखा भी है तो विदेशी फैशन और श्रृंगार-प्रसाधन आदि की नकल करना ही सीखा है। उनके गुणों की तरफ उनकी दृष्टि नहीं जाती। इंगलैंड निवासी एक नारी ने सैकड़ों विध्न-बाधाओं के होते हुए भारतवर्ष में आकर कितने बड़े-बड़े काम कर दिखाए, इसे सुन और समझकर अगर भारतीय नारियों में से भी कुछ आगे आवें और समाज के दोषों का निराकरण करके कुछ रचनात्मक कार्य द्वारा देश को ऊपर उठाने के लिए परिश्रम करें तो यह भगिनी निवेदिता के प्रति वास्तव में उनकी एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी
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