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Books - एक अनुरोध मतदाताओं से

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स्वर्गीय डा. राजेन्द्र प्रसाद जब स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने तो उन्होंने भव्य मुगल उद्यान के मध्य निर्मित एक विशाल और भव्य ‘वायसरीगल लॉज’ में रहने के लिए कहा गया। घुटनों से भी ऊंची धोती पहनने वाले गांधी के इस अनुयायी को यह बात कुछ जंची नहीं कि देश का जन सामान्य तो झोपड़ी में रहे और वे विशाल वायसरीगल लॉज में। उन्होंने अपने मन की बात कही—‘‘मेरे लिए तो एक साधारण सा मकान हो काफी है। इतने बड़े भवन की क्या आवश्यकता?’’ तब उन्हें तत्कालीन राजनेताओं ने बहुत समझाया कि इतने बड़े देश के राष्ट्रपति के लिए देश की शान के अनुरूप भवन में ही रहना ठीक होता है। इसमें देश की शान है। इस बात को उन्होंने अनमने ढंग से मान भी लिया। ज्यादा अड़ते तो लोग समझते कि उन्हें अपनी सादगी का प्रदर्शन करना है। बाहर से आने वाले अतिथि राजनेताओं और देश की मर्यादा समझ कर उन्हें इसे आपद् धर्म की तरह स्वीकार कर लिया।

डा. राजेन्द्र प्रसाद जैसे त्यागी-विरागी के लिए राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी अपनी सादगी का निर्वाह करना और उसके वैभव से अलिप्त रहना संभव भी था। वे महाराज जनक की तरह उसे भोगते हुए भी नहीं भोगते रहे। सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति भवन में कभी वर्षों तक एक साधु रहा था। ‘वायसरीगल लॉज’ को ‘राष्ट्रपति भवन’ का नाम भी उन्हीं ने दिया था।

अच्छी वकालत, हजारों रुपयों की आय और सुख-सुविधाओं को छोड़ वर्षों तक स्वतंत्रता संग्राम में आने वाले कष्ट, कठिनाइयों और जेल जीवन के अभ्यास ने उन्हें तो उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया था किन्तु आज के राजनेता तो उस स्थिति में नहीं होते। उनके मन में देश की सेवा की, निष्ठा की भावनाएं तो हो सकती हैं, देश की सेवा करने के ध्येय से भी वे राजनीति के क्षेत्र में आए हो किंतु उनका जीवन यदि सादा न रहा और वे आडम्बर और ऐश्वर्य पूर्ण वातावरण में रहे तो निश्चय ही उससे अलिप्त नहीं रह सकते। इस कारण वे राजनीतिज्ञ तो रहते हैं पर जननेता नहीं बन पाते। जन नेता नहीं रहने पर वे सामान्य जन के साथ अपना एकत्व नहीं जोड़ पाते और उनका एक प्रथक वर्ग ही बन जाता है। यह स्थिति देश के लिए बहुत घातक सिद्ध होती है।

स्वतंत्रता पाने के पूर्व के अधिकांश राजनेता जननेता पहले थे और राजनेता बाद में। डा. राजेन्द्र प्रसाद का उदाहरण दिया जा चुका है। राष्ट्रपति भवन में रहने वाली उनकी आत्मा उससे अलिप्त ही रही। राष्ट्रपति को मिलने वाले वेतन का एक चौथाई ही वे लेते रहे थे अपने राष्ट्रपति काल में।

स्व. लालबहादुर शास्त्री का जीवन तो राजनेताओं के लिए एक प्रशिक्षण-पुस्तिका सा है। उनका जीवन जननेता की खरी कसौटी है। प्रधान मंत्री बनने तक उनके पास अपना मकान नहीं था, न अपनी कार थी। प्रधानमंत्री बन जाने पर भी प्रधानमंत्री निवास में रहने नहीं गए क्योंकि उन्हें पता था कि हमारे देश का सामान्य जन आधे पेट भोजन करता है, अधनंगा रहता है, उसे सिर छिपाने को छप्पर मुश्किल से नसीब होता है। फिर उस देश का प्रधानमंत्री उससे भिन्न ढंग से सुख-सुविधा पूर्ण जीवन को कैसे भोगे?

यह कहीं देखा है कि परिवार का नेता—कर्त्ता स्वयं तो अच्छा भोजन करे, मूल्यवान वस्त्र पहने, मोटरों में घूमे और उसके परिवार के सदस्यों को ढंग का भोजन, वस्त्र, आवास व अन्य जीवनावश्यक सुविधाएं भी न मिले। तो उसका कर्त्ता बनना कहां सिद्ध हुआ, वह परिवार का नेता कैसे मान लिया जाय? जिस राजनेता ने इस तथ्य को भुलाया नहीं वह सच्चा नेता बना रहा, जन-जन उसके प्रति श्रद्धावान, आस्थावान रहा।

क्या था गांधी जी के पास जिसने उन्हें राष्ट्रपिता बना दिया। उनके पास इतना बड़ा हृदय था कि वे सारे भारत को अपना परिवार मानते थे, सामान्य भारतीय की तरह रहते थे। इंग्लैण्ड के सम्राट से मिलने के लिए भी वे अधनंगे फकीरी वेश में ही गए थे और उनके लिए सम्राट को ही अपनी राज मर्यादाएं शिथिल करनी पड़ी थीं, पर गांधी जी अपने जननेता के पद से नीचे नहीं उतरे। एम. एल. ए., एम. पी., मंत्रीगण आदि भारतीय जनता के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति हैं। परिवार के मुखिया का सा आचरण उनसे भी अपेक्षनीय है। यदि वे ऐसा नहीं करते तो वे राजनीतिज्ञ तो माने जा सकते हैं लेकिन जन नेता नहीं।

जनतंत्र की सफलता के लिए जनता की श्रद्धा का राजनेताओं से जुड़ना बहुत आवश्यक है। यदि वह नहीं जुड़ती तो जनता और नेता के बीच की कड़ी टूटती है। नेता के प्रति जनता के मन में श्रद्धा तो तभी उपजेगी जब वह उसमें अपने प्रति प्रेम प्रदर्शित होता देखेगी। प्रेम की यह अभिव्यक्ति जनता के दुःख-सुख को अपना समझ कर उसमें सहभागी होने, उन्हीं का सा जीवनयापन करने से ही होती है। यदि राजनेता ऐसा नहीं करते तो उसकी जनता पर जो प्रतिक्रिया होती है, राष्ट्र की प्रगति में जो गतिरोध उत्पन्न होता है, वह अनिष्टकारी होता है।

हमारे देश के वर्तमान राजनेताओं को जन नेताओं की कसौटी पर कसा जाए तो उनमें से अधिकांश सोना नहीं, पीतल ही सिद्ध होते हैं। हमारे देश में केन्द्र और प्रदेश सरकारों में सैकड़ों की संख्या में मंत्री हैं। उन्हें प्रत्यक्ष रूप से वेतन तो मिलता ही है, साथ ही मुफ्त कार, मुफ्त आवास, मुफ्त के नौकर, मुफ्त की यात्रा और मुफ्त की चिकित्सा सुविधाएं भी मिलती हैं, यह रकम लाखों-करोड़ों रुपयों में होती है। सन 1973 में स्वतंत्र पार्टी के एम.पी. श्री दाण्डेकर ने मंत्रियों के खर्च के जो आंकड़े प्रस्तुत किए थे यदि उन्हें सत्य मान लिया जाए तो उस समय एक केन्द्रिय मंत्री की वार्षिक आय साढ़े चार लाख रुपये होती थी। यानि 37,000 रुपये प्रति माह जबकि हमारी प्रति व्यक्ति औसत आय मात्र 552 रुपये ही थी। मंत्रियों की यह आय जनता की आय से आठ सौ अड़तालीस गुना थी। इस अनुपात में ही उनके प्रति जन श्रद्धा का ह्रास भी हुआ है। मंत्रियों के इन शाही खर्चों का विवरण देने के पीछे आलोचना, निंदा करने का हमारा कोई अभिप्राय नहीं है। यहां तो केवल स्थिति का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने का प्रयोजन है। काम के अनुपात में साधन सुविधाएं पाना तो ठीक है किन्तु यदि वे औचित्य से अधिक हों तो उससे राष्ट्रीय संपदा का अपव्यय ही नहीं होता और भी कई अनिष्ट होते हैं।

राष्ट्र भी एक बड़ा परिवार है। गरीब परिवार का मुखिया यदि अकेला जलेबियां खाए और दूसरे सदस्यों को नहीं दे तो उनके मन में मुखिया के प्रति असन्तोष तो उपजेगा ही, साथ ही वे किसी भी प्रकार जलेबी खाने का प्रयास करेंगे चाहे इसके लिए उन्हें परिवार का अहित ही करना पड़े क्योंकि जब परिवार का मुखिया ही घर की कमजोर आर्थिक स्थिति को ध्यान में न रखकर अपना स्वार्थ साधता है तो वह ही क्यों रखे? जिम्मेदार आदमी ही अपनी जिम्मेदारी नहीं निभता तो वह क्यों निभाए? यही बात राष्ट्र पर भी लागू होती है। यथा राजा तथा प्रजा की उक्ति में सच्चाई का अंश बहुत है। अतः जनता राज नेताओं का अनुकरण करे यह भी अस्वाभाविक नहीं है। ऐसी स्थिति में होता यह है कि व्यक्ति यह भी विचार करना नहीं चाहता कि उन्हें अतिरिक्त सुविधाएं इसलिए दी जाती हैं कि उन्हें अधिक काम करना पड़ता है। सच पूछा जाए तो बड़ा बनने के लिए सुविधाओं का नहीं, दायित्वों का ही अधिक ध्यान रखना पड़ता है। सारे परिवार की आंतरिक व्यवस्था का भार उठाने वाली मां से बच्चा यही आशा करता है कि वह स्वयं दूध नहीं पीकर मुझे पिलाएगी। ठीक वैसी ही आशा जनता नेता से जोड़े तो इसमें अस्वाभाविक ही क्या है। राजनीति कोई पेशा तो नहीं—सेवा है। पेशा बनाने पर तो देश की प्रगति- अगति से कोई सरोकार ही नहीं रहता। दुर्भाग्य से हमारे देश में कुछ ऐसा ही हो रहा है और यह चिंता का विषय है।

पैसे के साथ उच्चादर्श, उच्च भावनाएं नहीं जोड़ी जा सके तो वह व्यक्तित्व को धूमिल और नैतिकता की सफेद चादर को काली भी कर सकता है। ये शाही खर्चे आरंभ में सुविधा समझ कर भी स्वीकारे गए हों, प्रायः आगे चलकर धन में आवश्यक आसक्ति उपजा देते हैं और सुख-सुविधाओं से मोह भी। फिर व्यक्ति उच्चता की सीढ़ियों से लुढ़कने लगता है। विश्व के इतिहास में ऐसे राजनेताओं के सैकड़ों उदाहरण मिल जाते हैं जिन्होंने सामान्य सुख-सुविधाएं भोगते हुए तो देश और देश वासियों के लिए बहुत काम किए किन्तु सत्ता के हाथ में आने पर उन्होंने सच्चाई को नहीं समझा और वे अपने महान उद्देश्यों और गरिमामय चरित्र से पतित हो गए। हमारे राजनेताओं को भी इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए।

दुनियां में जहां भी लोकतंत्र का पतन हुआ और तानाशाही उत्पन्न हुई या सैनिक शासन स्थापित हुआ, उसके मूल में प्रायः लोक नेताओं की लूट खसोट व भ्रष्ट आचरण भी बहुत बड़ा कारण था। होता यह है कि जन सामान्य के आर्थिक स्तर को ध्यान में रखे बिना राजनेता आवश्यकता से अधिक साधन सुविधाएं भोगते हैं, अधिक वेतन पाते हैं। उस जीवन से उन्हें मोह हो जाता है। फिर वे पुनः उस पद को पाने के लिए औचित्य अनौचित्य का विवेक छोड़ बैठते हैं। पांच वर्ष बाद यह पद मिले न मिले तो फिर ये सुख-सुविधाएं स्वप्न हो जाएंगी। अतः यदि नहीं भी चुने गये तो इन्हें भोगने के लिए धन-सम्पदा बटोर लें। ऐसी कमजोरी कई लोगों में उत्पन्न होती देखी जाती है। वे आचरणों से भ्रष्ट हो जाते हैं। अतः इस माया से पहले ही सावधान रहना चाहिए कि वह सिर पर न चढ़ बैठे।

जिस देश के अधिकांश नेताओं को यह बीमारी लग जाती है तो वहां सैनिक शासन या एक तंत्र स्थापित हो जाता है। यूनान इसका स्पष्ट उदाहरण है। वहां सत्ता के भागीदारों के अतिरिक्त राजा ने भी अपनी रॉयलिस्ट पार्टी अलग बना ली थी। संसद सदस्यों ने अपने परिवार के लोगों को उच्च पदों पर नियुक्त करा दिया था। जनता के धन को नेताओं ने खूब निर्दयता से अपने लिए खर्च किया। परिणाम यह हुआ कि जनता की श्रद्धा समाप्त हो गई। पैंतीस वर्ष में वहां चौंतीस सरकारें बदली और अन्त में सैनिक शासन स्थापित हो गया।

राजनेताओं के लिए सीधा मार्ग यही है कि वे चुने जाने पर भी अपने को सामान्य नागरिक की हैसियत से ही लें। जो नेता जनता में पूजे गए हैं और उन्होंने देश की अविस्मरणीय सेवा की है उन्होंने इसी पथ का अनुसरण किया है। यदि इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा गया तो स्वयं तो पतित होंगे ही, देश का भी अनिष्ट करेंगे। लोकतंत्र की सफलता के लिए जन नेता चाहिए, राजनीति व्यवसायी नहीं। इस बात को जनता भी गांठ बांध कर रखे। हमारा दृष्टिकोण जो निरन्तर संकुचित होता जा रहा है वह बहुत घातक है। मत देने के साथ यही आग्रह जोड़ा जाए कि देश के साथ हमारी भी प्रगति है। यह दुराग्रह न हो कि अमुक व्यक्ति सत्ता में आ गया तो हमारा लाभ हो जाएगा या अमुक दल का सदस्य जीत गया तो हमारे क्षेत्र का विकास हो जाएगा। इन सब संकीर्णताओं को छोड़े बिना लोकतंत्र के सजग नागरिक की कसौटी पर हम खरे उतर नहीं सकते।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता नैतिक पुनरुत्थान की है। व्यक्ति की कसौटी का मापदंड हमें बदलना ही पड़ेगा। व्यक्ति को उसकी योग्यता, प्रतिभा और सम्पदा से नहीं उसके उच्च विचारों और सत्कर्मों से मापना होगा। योग्यता, प्रतिभा आदि के साथ ही उनका सदुपयोग कराने के इन आवश्यक गुणों को भी देखना आवश्यक है। राजनेता को इसी कसौटी पर कसने के बाद समझ आने पर ही उसे वोट देना चाहिए। आज राजनीति जो व्यवसाय बनती जा रही है उसे नया मोड़ देना होगा। योग्य अनुभवी, प्रतिभावान और भावनाशील लोगों की कमी नहीं है। कमी तो निस्पृह नेताओं को ढूंढ़कर उनके हाथों में देश की बागडोर देने की है। राजनेता यदि जन नेता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते तो उन्हें गढ़कर जन नेता नहीं बनाया जा सकता। उनके स्थान पर वास्तविक जन नेताओं को प्रतिष्ठित किया ही जाना चाहिए।
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