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Books - गौ संरक्षण एवं संवर्द्धन एक राष्‍ट्रीय कर्तव्‍य

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गाय की महिमा गाई और गरिमा समझी जाती है। इसका कारण यह नहीं है कि अन्य पशुओं की अवज्ञा या उपेक्षा की गई है। सभी प्राणी अपने स्थान पर अपनी-अपनी स्थिति में उपयोगी हैं। उपयोगिता की दृष्टि से ही उन्हें पाला जाता है। जो इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते, उन्हें वन्य जीवन जीने के लिए छोड़ दिया जाता है। गाय को सर्वप्रथम पाला गया। उसकी महिमा का वेद-शास्त्रों में गुणगान भी है। गौदान का बढ़-चढ़कर माहात्म्य बताया गया है। उसे अनिन्द्य और पूजा के योग्य कहा गया है। गाय का दूध, उसके बछड़ों का श्रम, उसके शरीर का चर्म कितने काम आता है। मरने के उपरान्त भी उसके सभी अवयव खाद आदि के काम आते हैं। गौमय और गौमूत्र की अपनी अलग उपयोगिता है। ऐसे अनेक कारणों को ध्यान में रखते हुए गौपालन, गौ संवर्द्धन, वृषोत्सर्ग को पुण्य माना गया है। उपयोगितावाद के इस युग में गाय की उपेक्षा कर भैंस को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। दूध का दाम वसूलने तक ही जिनकी दृष्टि सीमित है, वे भैंस ही पसन्द करते हैं क्योंकि वह दूध अधिक मात्रा में देती है और उसके दूध में चिकनाई भी अधिक मात्रा में रहती है। परन्तु सोचने का यह बहुत ही संकुचित दृष्टिकोण है। यदि विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किया जाय तो भैंस गाय के सामने टिक ही नहीं पाती। गौवध की बात आती है तो कुछ लोग निहित स्वार्थ छिपाने के लिए यह कहने लगते हैं कि यदि इसका वध न किया जाये तो कुछ दिन में इसकी संख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उसके लिए चारे का, निवास का प्रबन्ध करना कठिन हो जायेगा। जनसंख्या वृद्धि के कारण मनुष्यों का ही पेट भरना मुश्किल है, फिर फालतू गाय-बैलों के लिए चारा कहां से आएगा। सच बात तो यह है कि इस तरह गौवध का बहाना खोजने वाले और गौ प्रेम दिखाने वाले-दोनों ही भ्रम में हैं और दूसरों को भी भ्रमित करने का प्रयत्न करते हैं। कई बार समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता है कि गाय-बैलों से भरी हुई ट्रकें पकड़ी गईं। कहा गया है ये सारे पशु कसाईखाने भेजे जा रहे थे। कसाईखानों के मालिक आमतौर से मुसलमान बंधु होते हैं। इसी आधार पर गौवध को साम्प्रदायिक रूप रंग भी दे दिया जाता है। इस संबंध में एक मुसलमान सज्जन के ये उद्गार विचार करने योग्य हैं— ‘‘गौवध के लिए मुसलमानों, कसाइयों और चमड़े के कारखाने वालों को दोष दें, इससे पहले हम अपने दायित्व पर विचार क्यों न करें? यदि गायों के प्रति हमारी सही निष्ठा होती तो क्या मांस, क्या चमड़ा-किसी के लिए भी गायें कट्टीखाने न पहुंचती।’’ वास्तविकता यह है कि न तो हिन्दू भाइयों के मन में गौमाता के प्रति पहले जैसी निष्ठा ही है और न ही हमारे सम्पूर्ण भारतीय समाज को—हिन्दु, मुसलमान, ईसाई सभी को—गौ वंश की उपयोगिता की सही-सही जानकारी है। योरोप और अमेरिकावासी गौ वंश को जितना मान-सम्मान दे रहे हैं, उसको देखते हुए अपने देशवासियों की अज्ञानता और मूढ़ता पर बड़ा दुख होता है, पीड़ा होती है। गौवंश के प्रति निरन्तर बढ़ता हुआ उपेक्षा का भाव आज एक चिन्ता का कारण बन गया है। हमारे पूर्वजों ने गौ को माता का दर्जा यों ही नहीं दे दिया था। गाय एक अति संवेदनशील और अति उपयोगी प्राणी है। उसकी इन दोनों विशेषताओं को हमारे पूर्वजों ने समझा और उसे अपनी भाव संवेदना प्रदान की। बदले में गौवंश ने इस देश में दूध-दही की नदियां बहाई और सारी भूमि को हरीतिमा से भर दिया। हम आज अपने पूर्वजों की उपयोगितावादी दूर दृष्टि को भुला बैठे हैं और अपने प्रत्यक्ष स्वार्थ के घेरे में कैद होकर अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर उतारू हो गए हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो आगामी पीढ़ियों के लिए कष्टकर स्थिति की नींव अभी से पड़ जाएगी। अतः आवश्यकता है कि गौवंश के महत्व और उपयोगिता को अविलम्ब समझा और समझाया जाय। इस कार्य में पंथ, सम्प्रदाय, मजहब आदि को रोड़ा न बनने दिया जाय। हम अपने पूर्वजों की दूरदृष्टि को समझें और साथ ही योरोप-अमेरिका वासियों से भी प्रेरणा ग्रहण करें। गौवंश की उपयोगिता, महत्व, आवश्यकता आदि को ध्यान में रखकर इस संकलन में थोड़े से लेखों का संग्रह किया गया है। इसका जितना अधिक प्रचार-प्रसार हो सके उतना ही हितकर होगा। —लीलापत शर्मा 
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गौ संरक्षण एवं संवर्द्धन एक राष्‍ट्रीय कर्तव्‍य
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