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Books - गायत्री महामंत्र की अद्भुत सामर्थ्य

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Language: HINDI
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ज्ञान-विज्ञान की जननी

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ज्ञान का पक्ष गायत्री का कौन- सा है? यह भारत के सारे के सारे फिलॉसफी और तत्त्वज्ञान और ब्रह्म- विज्ञान से जुड़ा हुआ है। यह उसका ज्ञानपक्ष है। ज्ञानपक्ष में क्या जाता है? ज्ञानपक्ष में वेद आते हैं। वेद कैसे? आपको पुराणों की कथा शायद मालूम नहीं है। पुराणों की कथा है कि ब्रह्मा जी विष्णु के नाभि से निकले कमल के फूल से पैदा हुए। ब्रह्मा जी बैठे हुए थे, विचार कर रहे थे कि अब हमें क्या करना चाहिए और हमने किसलिए जन्म लिया है? आकाश से आकाशवाणी होती है, आकाशवाणी से निर्देश मिलता है कि आपको गायत्री मंत्र की उपासना करनी चाहिए। इससे आपको ज्ञान मिलेगा और विज्ञान मिलेगा। इसके आधार पर आपके जिम्मे जो दो काम सौंपे गए हैं, उन दोनों कामों को आप पूरा करने में समर्थ हो सकेंगे।    

मैं यह पुराण की कथा कह रहा हूँ। विज्ञान वाला भाग वह है, जिसके आधार पर ब्रह्माजी ने सारी सृष्टि को बनाया। सारी सृष्टि को बनाया, पदार्थ को बनाया, पंचतत्त्वों को बनाया, सत्, रज्, तम को बनाया, जाने क्या से क्या बनाया? ये सृष्टि जो कुछ भी दिखाई पड़ती है, जिन वस्तुओं से बनी हुई है, विज्ञान वाला भाग है। गायत्री मंत्र की उपासना से विज्ञान पैदा हुआ। विज्ञान को बना देने के बाद में उसका क्या उपयोग होना चाहिए? अगर गलत उपयोग होने लगा, तब? गलत उपयोग होने लगा तो मुसीबत आ जाएगी। आग का गलत उपयोग होने लगे तब? तब तो मुसीबत आ जाएगी। बिजली का गलत उपयोग होने लगे तब? तब तो बेटे मुसीबत आ जाएगी। अगर कहीं से कोई एक तार लीक करने लगे तो सारे के सारे टीन शेड में करेण्ट फैल जाएगा और जहाँ आप और हम बैठे हुए हैं, एक- दूसरे से चिपक करके सारे आदमी एक सेकेण्ड के भीतर खत्म हो सकते हैं। यदि सदुपयोग करें तो बिजली का पंखा चला लीजिये, माइक लगा लीजिये और चूक गए तो एक सेकेण्ड के अन्दर आपका सफाया कर सकती है।   

विज्ञान को बना दिया, लेकिन विज्ञान की सामर्थ्य इतनी भयानक थी कि अगर उसका ठीक उपयोग न किया जा सका तो क्या से क्या हो सकता था? इसीलिए ब्रह्माजी को दूसरे चरण के रूप में आकाशवाणी फिर हुई और फिर कहा गायत्री का तप करना चाहिए। गायत्री का तप ब्रह्माजी ने किया और दूसरे पक्ष में ज्ञान बनाया। ज्ञान क्या बनाया? ज्ञान का सारे संसार में सबसे पहले विस्तार कहाँ से हुआ? उसका नाम है वेद। वेद क्या हैं? वेदों के बारे में पुराणों के जो उपाख्यान हैं- उनमें से बताया गया है कि ब्रह्माजी ने सबसे पहले गायत्री के चार चरणों की व्याख्या अपने चार मुखों से चार वेदों के रूप में की है। चार वेद क्या हैं? गायत्री के चार चरणों की व्याख्या।

गायत्री के चार चरण कौन- से हैं? तीन चरण वे हैं, जो आठ- आठ अक्षरों के तीन टुकड़ों में बँटे हुए हैं और एक हिस्सा वह है, जिसको हम कहते हैं शीर्ष। शीर्ष क्या है? प्रथम पद (ॐ भूर्भुवः स्वः) इसका शीर्ष है और फिर तीन इसके चरण हैं। चारों को मिला करके गायत्री को चार पाद वाली भी कहा है। तीन पाद वाली भी कहा है। चार वेद क्या? चार वेद उस गायत्री के व्याख्यान के रूप में हैं जिस गायत्री मंत्र को हम आप ले करके चले हैं। गायत्री मंत्र के आधार पर हम प्राचीन खोई हुई संस्कृति को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। गायत्री मंत्र वह जो कि नये युग का संदेश ले करके आया है। गायत्री मंत्र वह जो हमारी प्राचीनकाल की सारी की सारी गरिमा को अपने गर्भ में छिपाये बैठा है। वह गायत्री मंत्र जिसकी हम और आप उपासना करते हैं और सारे विश्व को जिसकी उपासना करने के लिए प्रभावित करना चाहते हैं वह है गायत्री मंत्र।

इस गायत्री मंत्र में दोनों ज्ञान और विज्ञान का सब कुछ बीज रूप में भरा हुआ- पड़ा है। ज्ञान ! ज्ञान को हम क्या कह सकते हैं? ज्ञान तो इसमें इतना भरा हुआ पड़ा है कि आदमी को, नर को नारायण तक पहुँचाने वाला रास्ता खोलने वाला सूत्र है यह और विज्ञान, विज्ञान भी बहुत कुछ है। वेदों में विज्ञान है, आप वेदों को पढ़िए सारा का सारा विज्ञान पक्ष है इसमें, पूरी की पूरी साइन्स है इसमें। पूरा अथर्ववेद केवल विज्ञान का पक्ष है। जर्मन वालों को जब मालूम पड़ा कि हम हैं आर्य। आर्यों का मूल ग्रन्थ कौन- सा हो सकता है वेद? जर्मन वालों ने मैक्समूलर को हिन्दुस्तान में भेजा और वह 17 साल तक वेदों का पता लगाते रहे, वेदों की खोज करते रहे। उन्होंने ऋग्वेद का भाष्य जर्मन भाषा में सबसे पहली बार किया। 15- 16 वर्ष हिन्दुस्तान में रहने के पश्चात् वे ऋग्वेद ले गये थे। लोग कहते हैं कि विज्ञान की बहुत- सी जानकारियाँ उन्होंने वेदों से प्राप्त की थी।

मैं कह नहीं सकता कि जो वर्तमान विज्ञान है, वह भी वेदों से निकला कि नहीं निकला। लेकिन प्राचीनकाल में वेद अपने आप में विज्ञान था, उसका अपने आप में शोध था। यह जरूरी नहीं है कि आज का जो विज्ञान है और जिस पहलू से मनुष्य अपनी व्याख्या करता है और अपने प्रतिपादन करता है, प्राचीनकाल में उसी तरह का आज से तालमेल खाता हुआ विज्ञान रहा हो? विज्ञान की दूसरी धाराएँ भी हैं, दूसरे तरीके भी हैं, दूसरे ढंग भी हैं। जो आज हमारे हाथ में आ गया वही एक ही ‘मेथड’ नहीं है विज्ञान के और भी ‘मेथड’ (तरीके) हैं, जिसके आधार पर किसी पदार्थ के किसी हिस्से की जाँच के द्वारा न जाने कितनी शक्तियों का प्रतिपादन कर सकते हैं, कितने उभार पैदा कर सकते हैं? यह साइंस का एक पक्ष है, जो आज हमारे हाथ में हैं? साइंस का यह एक छोटा पक्ष है।

साइंस के क्या और पक्ष हैं? हाँ, और पक्ष हैं और वे पक्ष खोजे जाने बाकी हैं। अभी आपको ‘एंटीमैटर’ और ‘एण्टीयूनिवर्स’ के बारे में मालूम ही नहीं है। ‘एण्टीमैटर’ और ‘ एण्टीयूनिवर्स ’ की जानकारियाँ लोगों को जब मालूम पड़ेंगी तो लोगों को पता चलेगा कि आज का जो विज्ञान है, यह एक मजाक है, एक दिल्लगीबाजी है, एक छोटा- सा बच्चों के हाथ का खिलौना जैसा है। अभी तो बहुत सारी साइंस छिपी पड़ी है। वेदों में ज्ञान वाले पक्ष, विज्ञान वाले पक्ष- दोनों पक्ष हैं। वेदों की व्याख्या कर रहे हैं आप। नहीं बेटे, वेदों की व्याख्या नहीं कर रहा। वेद गायत्री माता के चार बालक हैं, क्योंकि उनको वेद माता कहते हैं। बच्चे कैसे मजबूत हैं? बच्चे कैसे अच्छे हैं? बच्चों के हिसाब से उनकी पालनकर्त्री माता का हवाला दे रहा हूँ।

सीता के दो बच्चे थे लव- कुश, जिनकी बड़ी प्रशंसा की गयी है, लेकिन आपको उनकी माँ की प्रशंसा भी मालूम होनी चाहिए। भरत की प्रशंसा? भरत अपने आप में बड़े शानदार आदमी थे, लेकिन आपको भरत की प्रशंसा मालूम होने से पहले उनकी माँ शकुन्तला की गरिमा की भी जानकारी होनी चाहिए। विनोबा, बालकोबा, शिवोवा (शिवाजी) तीनों बहुत शानदार थे। ठीक है, आपको ये जानना चाहिए, पर साथ ही यह भी जानना चाहिए कि इनको बनाने वाली क्षमता कौन थी? वह थी इनकी माँ। जिन्होंने तीनों बच्चों को बाल- ब्रह्मचारी बना दिया, ऋषि और तपस्वी बना दिया। चारों वेदों को बनाने वाली माँ, जिसका नाम है गायत्री मंत्र।

गायत्री मंत्र बहुत शानदार मंत्र है। हम उसे भूल गए थे। पिछले दिनों अंधकार के युग से हमने बहुत सारी चीजें गँवा दी थीं, उसमें से एक चीज यह भी गँवा दी थी, जो हमारी मूल संस्कृति थी। अंधकार युग में मत- मतान्तर पैदा होते चले गए, सम्प्रदाय पैदा होते चले गए। अनेक तरह के विचार आते चले गए। कितना- कितना बिखराव पैदा होता चला गया? बिखराव पैदा होते हुए भी मूल सत्ता जहाँ की तहाँ है, मूल बात जहाँ की तहाँ है। अगर हिन्दू धर्म अर्थात् विश्व धर्म, भारतीय संस्कृति अर्थात मानव संस्कृति के मूल का अध्ययन करना हो तो आपको वेदों के अन्दर जाना होगा, वेदों की गहराई में उतर करके आपको गायत्री मंत्र में प्रवेश करना होगा।

गायत्री मंत्र हमारी बहुत शानदार सम्पत्ति है। साँप के माथे पर मणि की बात कही जाती है। हाथी के माथे पर मणि की बात कही जाती है। मालूम नहीं हाथी और साँप के माथे पर मणि होती है कि नहीं, पर मैं जानता हूँ कि मानवीय गरिमा की एक मणि है, जब तक वह मणि हमारे पास रही हमारा भविष्य बहुत शानदार बना रहा और हमारा ध्येय बहुत शानदार बना रहा, परन्तु जब से ये मणि हमारे हाथ से चली गई, ढीली हो गई, उपेक्षा की जाने लगी तब से हम सब कुछ गँवा बैठे। मध्यकाल में ऐसा हुआ सम्प्रदायवाद ऐसा तेजी से पनपा कि जो भी आदमी  आया, जो भी बाबाजी जरा होशियार- सा हुआ वह अपने नाम का मजहब चलाता चला गया। बिखराव होते चले गए और मूल सत्ता से ध्यान हटाने और बँटाने के लिए उन्होंने ऐसे- ऐसे इल्जाम लगाए गायत्री मंत्र के ऊपर जिससे इसकी उपेक्षा होने लगी, जबकि वह हमारा मेरुदण्ड था। उपेक्षा होने के साथ- साथ यह भी कहा जाने लगा कि गायत्री मंत्र को श्राप लग गया है। अच्छा? गायत्री मंत्र ब्राह्मणों का है- अच्छा? गायत्री मंत्र को स्त्रियाँ नहीं जप सकतीं- अच्छा? गायत्री मंत्र को कान में ही कहा जा सकता है- अच्छा? न जाने क्या से क्या, बताते चले गये ताकि इस ओर से आदमी का ध्यान बँटे। सम्प्रदायवादियों द्वारा अपनी- अपनी ओर से बनाई गई पुस्तकें ,, मंत्र, ग्रन्थ, देवता उनकी ओर ध्यान खींचते चले गए।

ये मध्यकाल का जमाना था, लेकिन अब फिर से नवयुग आ गया है, फिर प्रातःकाल हो रहा है। फिर नवयुग का सूर्य उदय होकर सामने आया और वे चमगादड़, वे उल्लू और वे निशाचर जो रातभर घूमते रहते थे, उन्होंने अपने आपको मोड़ लिया है। प्रातःकाल का दृश्य सामने है, हम फिर से पुरानी संस्कृति की ओर लौट कर आ रहे हैं। अब फिर हमें नया संदेश, वही जो ऋषियों ने ब्रह्माजी से लेकर देवताओं को दिया था, उसको स्वीकार करने के लिए व स्वीकार करवाने के लिए कदम बढ़ रहे हैं। हमारा आपका प्रयास यही है।
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