सामूहिक गायत्री हवन
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
छोटी तीन आने वाली संक्षिप्त गायत्री हवन पद्धति में दैनिक छोटे हवनों का विधान है। गायत्री यज्ञ विधान में द्वितीय भाग में वृहद यज्ञों का परिपूर्ण विधान छपा है। अब इस पुस्तक में छोटे मध्यम व्यवस्था के सामूहिक यज्ञों का विधान दे रहे हैं।
जल—यात्रा
14 वर्ष से अधिक आयु की देवियां पीले वस्त्र धारण करके किसी पवित्र जलाशय से जल लेने जावें। मंगल कलश जितने अधिक हों उतने ही उत्तम हैं। उनकी संख्या कम से कम 5 और अधिक से अधिक 108 हो सकती हैं।
जलाशय पर जाकर महिलाएं पवित्रीकरण, आचमन, न्यास, पृथ्वी पूजन, स्वस्ति वाचन, देव पूजन, कलश पूजन करें। वरुण सूक्त के साथ जल भरा जाय। कलावा बांधा जाय, तिलक किया जाय, आशीर्वाद दिया जाय। कलश लेकर गायन वाद्य करती हुई महिलाएं यज्ञ शाला पर वापिस आवें तो उनकी आरती उतारी जाय और आशीर्वाद दिया जाय।
समय-समय पर काम आने वाले मंत्र
आचार्य वरण
ॐ व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्य माप्यते ।।
आचार्य तिलक
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
इष्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ।।
यजमान वरण
ॐ यदा वध्नन्दाक्षायणाहिरण्य शतानी काय सुमनस्य मानाः ।
तन्मऽआवध्नामि शत शारदा या युष्मांजरदष्टिर्षथासम् ।।
यजमान तिलक
ॐ स्वस्तिन इन्द्रो वृद्ध श्रवाः स्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः ।।
स्वस्ति नास्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु ।।
आशीर्वाद
ॐ श्रीर्वचस्वमायुष्यमारोग्यमाविधाच्छोभमानं महीयते । वनं धान्यं पशुं बहु पुत्र लाभं शत संवत्सरं दीर्घमायुः ।।
यज्ञोपवीत धारण
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहज पुरस्तात् । प्रायुष्यमग्र यं प्रति मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।।
यज्ञोपवीत निकालना
ॐ एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया ।
जीर्णत्वात्त्वत् परित्यागो गच्छ सूत्र यथा सुखम् ।।
अभिसिंचन
ॐ आपोहिष्ठा मयो भुवस्तान ऊर्जे दधातन । महेरणाय क्षसे योवः शिव तमो रसः ।। तस्य भाजयते हनः उशतीरिव शातरः । तस्माऽअरङ्गमामव यस्य क्षयाय जिन्वथ आपो जन था चनः।।
संकल्प
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ॐ तत्सदद्य श्रीमद्भगवतो महा पुरूषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य ब्रह्मणोद्धितीयेपरार्द्धे श्रीश्वेत राह कल्पे सप्तमे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे जम्बू द्वीपे भरतखंडे आर्यावर्तैकदेशान्तर्गते (अमुक) देशे पुण्य (अमुक) क्षेत्रे बौद्धावतारे विक्रम सम्वत्सरे (अमुक) संख्यके शालिवाहनशाके (अमुक) नाम सम्वत्सरे अमुकायनेऽमुकऋतौ अमुक मासेऽमुक पक्षेऽमुकतिथौ अमुकवासरेऽमुकनक्षत्रेऽमुकगोत्रोत्पन्नोऽमुक नामाहं ममकायिक वाचिक मानसिक ज्ञाताज्ञात सकलदोष परिहारार्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं अमुक कर्म करिष्ये वा ब्राह्मण द्वाराकारयिष्ये ।।

