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Books - गायत्री की चमत्कारी साधना

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Language: HINDI
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गायत्री का अर्थ पूर्ण संदेश

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First 9 11 Last
गायत्री का मन्त्र रचना के आध्यात्मिक रहस्य पर पिछले पृष्ठों में कुछ प्रकाश डाला जा चुका है। इस मन्त्र का शाब्दिक अर्थ भी इतना महत्वपूर्ण है कि उसकी महत्ता असाधारण प्रतीत होती है। एक एक शब्द ऐसा नपा तुला है कि मानव जीवन में जिन तत्वों की सर्वोपरि आवश्यकता है उन्हीं की ओर मन्त्र में ध्यान दिलाया गया है, उन तत्वों को प्राप्त करने और सुरक्षित रखने की प्रेरणा की गई है।

अब आइये, गायत्री मन्त्र के एक-एक शब्द का अर्थ करें:— ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

ॐ—ब्रह्म
भूः—प्राण स्वरूप।
भुवः—दुःख नाशक।
स्वः—सुख स्वरूप।
तत्—उस।
सवितुः—तेजस्वी-प्रकाशवान्।
वरेण्यं—श्रेष्ठ को।
भर्गो—पाप नाशक।
देवस्य—देने वाले को, दिव्य को।
धीमहि—धारण करें।
धियो—बुद्धि।
यो—जो।
नः—हमारी।
प्रचोदयात्—प्रेरित करे।

अर्थात्—उस सुख स्वरूप, दुःख नाशक, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक, प्राण स्वरूप ब्रह्म को हम धारण करते हैं। जो हमारी बुद्धि को (सन्मार्ग की ओर) प्रेरणा देता है। ‘‘हम अपने अन्दर प्राण स्वरूप ब्रह्म को धारण करें’’, यह इस मन्त्र का मुख्य उपदेश है। असंख्य मनुष्य चलते फिरते पुतले की तरह जीते हैं। उनमें जान तो है पर प्राण नहीं है। निष्प्राण व्यक्ति का ‘जीवित मृतक’ बन कर जीवन को जीना मनुष्यता को कलंकित करना है। ऐसा जीवन भू-भार बढ़ाना है। जीव परमात्मा का अंश है उसे अपने आत्म स्वरूप को पहचान कर आत्म गौरव के अनुरूप नीति से जीवित रहना चाहिये।

प्राण युक्त-जीवन उदारता-महानता से भरा हुआ, जीवन जीना मनुष्य का कर्त्तव्य है। इस कर्त्तव्य की ओर ही वेद माता गायत्री ने संकेत किया है।

ब्रह्म—जिसको प्राप्त कराने के लिये योगीजन सदा प्रयत्न करते रहते हैं। वह ब्रह्म-कोई दूर की वस्तु नहीं है, वह प्राण स्वरूप है। जिसने प्राण को धारण कर लिया। जिसके पास प्राण है उसके पास ब्रह्म है। इस ‘जान’ और ‘प्रान’ के भेद को भली प्रकार समझने की आवश्यकता है। जान रहने से चलना, फिरना, सोना, उठना, बैठना, आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि की क्रियाएं होती रहती हैं। वृक्ष, वनस्पति, उद्भिज, कीट, पतंग आदि के जान होती है यह जानदार होते हैं परन्तु जिस प्राण का ‘भूः’ शब्द में संकेत किया गया है वह भिन्न प्रकार है। वह मानवोचित महत्ताओं का, आध्यात्मिक विशेषताओं का, द्योतक है। यह तत्व जिसमें जितनी अधिक मात्राओं में होता है, वह उतना ही उच्च उन्नतिशील गिना जाता है। शास्त्रों में ब्रह्महत्या को सर्वोपरि पाप माना गया है, वह इसलिये कि जिसमें ‘‘भूः’’ तत्व, प्राण तत्व, आध्यात्मिक उच्च तत्व, अधिक है, वह अति मानव है, महापुरुष है, साधारण जानदार जीवों से अधिक ऊंचा है, अज्ञानी और अविवेकी मनुष्यों से भी अधिक ऊंचा है। ब्रह्म को-सत्प्राण को-अधिक मात्रा में धारण करने वाला ही ब्राह्मण है। ऐसे ब्रह्मभूत ब्राह्मण की हत्या को ‘‘सर्वोपरि पाप’’ शास्त्रों ने ठीक ही कहा है। इन अति मानव ब्राह्मणों को सत्कारणीय और पूजनीय भी ठीक ही कहा है।

यों तो ‘जान’ को भी प्राण कहते हैं। जानदार जीव को, प्राणी कहा जा सकता है परन्तु ‘भूः’ शब्द द्वारा जिस प्राण का गायत्री मन्त्र में उल्लेख है वह ब्रह्म स्वरूप है। इस प्राण को समझने में किसी प्रकार का भ्रम एवं सन्देह न रहे इसलिए उसके लक्षणों को भी मन्त्रकार ने स्पष्ट कर दिया है। दुःख नाशक, सुख स्वरूप, तेजस्वी, प्रकाशवान, श्रेष्ठ, पाप नाशक देने वाला-दिव्य, यह विशेषताएं जिस प्राण में हों वही भूः है, इन गुणों का अन्तःकरण में सुदृढ़ समावेश हो जाना ही ब्रह्म प्राप्ति है।

यदि हम गायत्री के उपदेशानुसार ‘भूः’ तत्व रूपी ब्रह्म को प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें उन गुणों को ढूंढ़ ढूंढ़ कर अपने अन्दर भरना होगा जो कि उनके गुण हैं। जिसमें असुरता के गुण अधिक हो जाते हैं वही असुर कहलाने लगता है। यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, योगी, यती, ब्रह्मचारी, पिशाच, हत्यारा, गायक, दुराचारी आदि विशेषण गुणों के आधार पर मिलते हैं, जिसमें जो गुण अधिक हो जाते हैं उसको उसी नाम से पुकारा जाने लगता है। उसके अन्दर दुराचार, पिशाचत्व, ब्रह्मचर्य आदि तत्वों की स्थिति मान ली जाती है। भूः तत्व धारण करना कोई आभूषण, वस्त्र, सूत्र, कवच, तिलक, कंठी आदि धारण करना नहीं है, जिसमें भूः तत्व के गुण आ गये समझ लीजिये कि उसमें प्राण स्वरूप ब्रह्म की धारणा हो गई। वायु में शीतलता, शरबत में मिठास, मिर्च में तीखापन दिखाई नहीं पड़ता, परन्तु गुणों को देखकर यह कहा जाता है कि इसमें वह पदार्थ विद्यमान है, इसी प्रकार भूः तत्व की धारणा हुई है या नहीं यह बात आंखों से दिखाई नहीं देती तो भी उस तत्व के गुणों का समावेश हुआ है या नहीं यह देखकर आसानी से जानी जा सकती है।

गायत्री के मतानुसार ब्राह्मी-स्थिति वह स्थिति है जिसमें मन में से दुःखों की समाप्ति हो जाती है और सुख का अनुभव होता रहता है, जिससे मन तेजस्वी और प्रकाशवान बनता है। कायरता, भय, झिझक को हटाकर स्वतन्त्रता की ओर बढ़ता है, अन्धकार अज्ञान और अविवेक को छोड़कर प्रकाश की ओर चलता है। जीवन को बहिर्मुखी बनाकर इन्द्रिय भोगों की सामग्री जुटाने तथा नीच वृत्तियों की तृप्ति करने में न लग कर उद्देश्यमय, सिद्धान्त सम्मत, कर्तव्य धर्म से परिपूर्ण, अन्तर्मुखी बनने की श्रेष्ठता ग्रहण करता है। वह दुर्भावनाओं को, अपवित्र विचार और कार्यों को अपने पास नहीं फटकने देता है। संसार को कुछ देते रहना दूसरों की सेवा करते रहना, परोपकार में रस लेना, उसका स्वभाव बन जाता है। देव लोग दिया करते हैं- साधारण वस्तुएं नहीं- दिव्य वस्तुएं, सद्ज्ञान, सदुपदेश, सन्मार्ग का प्रसार जो अपनी कथनी और करनी दोनों के द्वारा करता है वह देव है, ऐसा देवत्व भी भूः तत्व के धारण करने वालों में होता है।

हमें तुच्छ, मायाबद्ध, कुटिल, खल, कामी, नश्वर आदि विशेषणों वाले ‘जीव भाव’ से ऊंचा उठकर सतचित, आनन्दमयी ब्राह्मी-स्थिति में जागृत होना चाहिये। हम साधारण से सांसारिक हानि लाभों से अपने आपको दुःखी न बनावें, भौतिक पदार्थों का स्वभाव ही बिगड़ना, बदलना और परिवर्तन होना है, इस स्वभाव का कायम रखना सृष्टि संचालन के लिये अनिवार्य है। यदि वस्तुएं ज्यों की त्यों एक ही अवस्था में बनी रहें तो आगे का निर्माण कार्य रुक जायगा। यदि धन जहां का तहां रुक जाय तो सारे व्यापार बन्द हो जाय, यदि मृत्यु बन्द हो जाय तो नये प्राणी भी उत्पन्न न होंगे, यदि खेत में वर्तमान पौधे ही खड़े रहें तो आगे फसल कैसे उत्पन्न की जा सकेगी? सृष्टिकर्ता ने सृष्टि संचालन के लिये परिवर्तन का नियम बताया है। इस नियम के अनुसार हमारी किसी वस्तु या स्थिति में अरुचि कर परिवर्तन होता तो उस सीधी सी बात के लिये दुखी न होना चाहिये वरन् अपनी स्वाभाविक सच्चिदानन्द स्थिति के कारण सदा प्रफुल्ल, प्रसन्न, आनन्दित रहना चाहिये। ‘भुवः और स्वः’ शब्दों का हमारे लिये यही उपदेश है। सवितुः—सूर्य के समान तेजस्वी, प्रकाशवान हम बनें। अन्धकार चाहे जितना ही बड़ा क्यों न हो चाहे वह दिग्-दिगन्त में सुदूर देशों तक फैला हुआ हो, असंख्य प्राणी उस अन्धकारों में होशहवाश छोड़कर मूर्छित पड़े हुए हों, परन्तु फिर भी उसकी परवाह न करके उसे नष्ट करने का ही प्रयत्न करना चाहिये। सविता-सूर्य-अकेला ही अन्धकार से लड़ता है। कोई दूसरा साथी उसके साथ उसके कार्य में सहयोग नहीं आता तो भी वह अकेलेपन की परवाह न करके अपना काम जारी रखता है। पाप, अन्याय, अत्याचार, अविचार अन्धविश्वास, हानिकारक रीति रिवाज यह सब अन्धकार के रूप हैं। हमें तेजस्वी सविता बन कर इनका निवारण करने का प्रयत्न करते रहना चाहिये। अन्धकार का विस्तार अधिक देख कर डरने, पीछे हटने या कायरता मन में लाने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। निर्भीकता धारण करके तेजस्वी सूर्य के समान यथा शक्ति इनका विरोध ही करते रहना। अविचार या अन्याय की बड़ी से बड़ी शक्ति हो तो भी उसके विपक्ष में सत्य का प्रकाश करना चाहिये। हमें अपने मन के भीतरी कोनों में अन्धकार में, छिपे हुए काम क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर आदि शत्रुओं को अपने आत्मिक प्रकाश द्वारा ढूंढ़ निकालना चाहिये और अपनी दृढ़ तेजस्विता के साथ उन्हें मन के पवित्र प्रांगण में से निकाल कर बाहर कर देना चाहिए। हमारा सांसारिक जीवन निर्भीक, स्पष्ट, खरा, एवं तेजस्वी होना चाहिए। हमारे विचार और कार्यों से दूसरों को प्रकाश मिले, अपने बौद्धिक प्रकाश द्वारा उपयोगी तथ्यों को ही चुनें ‘‘सवितुः’’ शब्द का हमारे लिये यही संकेत है।

वरेण्यं—श्रेष्ठ। हम श्रेष्ठ बनें। पैसे की सर्व भक्षी हविस ने आदमी को शैतान बना दिया है। जिव्हा के चटोरेपन के ऊपर करीब आधी जिन्दगी बलिदान कर दी जाती है। भोगविलासों की तृष्णा में पतंगे की तरह लोग जले जा रहे हैं। भोग सामग्री जुटाना यही एक कार्यक्रम लोगों के सामने है, पाशविक वृत्तियों को तृप्त करने तक की ही अभिलाषाएं मनोभूमि में उठती हैं। यह बहिर्मुखी प्रवृत्तियां अभद्र हैं, अश्रेयष्कर हैं, श्रेष्ठता से रहित हैं। गायत्री कहती है कि हम वरेण्य प्राण को धारण करें, अपने अन्दर श्रेष्ठता, महानता, विकसित करें। आत्मा परमात्मा का अंश है, इसका अवतार परमात्मा के कार्यक्रम को पूरा करने के लिए इस संसार में होता है। जीवन धारण करने का अभिप्राय प्रभु की पवित्र सृष्टि में उसकी आज्ञाओं और इच्छाओं का सन्तुलन ठीक रखना और दूसरों से रखवाना है। जीवन कायम रखने के लिये भौतिक पदार्थों की इतनी कम मात्रा में आवश्यकता है कि बिना किसी प्रकार का पाप किये बड़ी आसानी के साथ, सुविधा पूर्वक, पूरी ईमानदारी के साथ उन्हें कमाया जा सकता है। यह कहना गलत है कि पेट के लिये पाप करते हैं। पेट की मर्यादा इतनी छोटी है कि वह बिना पाप के आसानी से भर सकता है—पाप तो तृष्णा के लिये किया जाता है। अनन्त तृष्णाओं के लिए अनन्त पाप करते जाना अश्रेष्ठ है। हमें श्रेष्ठ बनना चाहिये। संयमित, अपरिग्रही, संतोषी रह कर जीवन को उच्च, उद्देश्यमय सिद्धांत सम्मत, कर्तव्य धर्म से परिपूर्ण बनाना चाहिये। आध्यात्मिक सत् सम्पत्तियां एकत्रित करने के लिये वैसा ही उद्योग करते रहना चाहिये जैसा कि माया बन्धन में बंधे हुए जीव, माया के लिये खून पसीना एक करते हैं। यही श्रेष्ठता है—हमें ऐसा ही ‘वरेण्य’ होना चाहिये।

भर्गो—पापनाशक। सृष्टि में मैल निरन्तर पैदा होते रहने का नियम है। गति शीलता के साथ मल उत्पन्न होने का घनिष्ठ सम्बन्ध है। शरीर में जब तक जीवन है, छिद्रों द्वारा मल निकलते रहने का क्रम भी जारी रहेगा। अवतार या देव-दूतों के छूने से संसार पवित्र हो जाता है बाद में फिर उसमें मैलों की वृद्धि होने लगती है। मन का भी यही स्वभाव है, नित्य उसमें नये मल उत्पन्न होते रहते हैं। इन मैलों का नाम ही पाप है। इन पापों को नित्य हटाते रहना हमारे दैनिक कार्यक्रम में शामिल होना चाहिये। एक बार सफाई कर देने से एक बार पवित्रता स्थापित कर देने से ही काम नहीं चल सकता, क्योंकि सृष्टि के नियमानुसार मल की उत्पत्ति कभी बन्द नहीं हो सकती। सफाई के दूसरे क्षण बाद ही मल उत्पन्न होने शुरू हो जाते हैं। इसलिये मलों की सफाई की ओर, उनको हटाने, नाश करने की ओर सदा सतर्कता पूर्वक प्रयत्न जारी रखना चाहिये। मन को जरा ही ढील मिली कि कुविचार आये, जीवन पर से जरा सा अंकुश हटाया कि दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्ति हुई, शरीर की ओर जरा सी लापरवाही की कि बीमारियों का प्रकोप हुआ। इसी प्रकार समाज की सामूहिक या व्यक्तिगत बुराइयों, बदमाशियों की ओर से निगाह चूकी कि उनका आक्रमण अपने ऊपर हुआ। पापों की सेना क्षण-क्षण में चारों ओर से अपने ऊपर आक्रमण करती है, इन आक्रमणकारियों से निरन्तर युद्ध जारी रखने का ही गीता के 18वें अध्याय में उपदेश है। गायत्री ने एक शब्द ‘भर्गो’ के द्वारा हमसे कहा है कि पापों से सावधान रहो, उनके आक्रमण से सतर्क रहो और इन दुष्टों का नाश करने के लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहो।

देवस्य—देने वाला, दिव्य। यह गुण सर्वोपरि है। यदि तरह तरह की योग्यताएं, शक्तियां, सामर्थ्यें मनुष्य में हों परन्तु उनका उपयोग और किसी को कुछ न मिलता हो तो वह निष्फल है। समुद्र के गर्भ में लाखों मन रत्न भरे पड़े हैं, जमीन के अन्दर लाखों मन सोना दबा पड़ा है पर यदि वह किसी के काम नहीं आता तो उसके होने न होने से किसी को क्या प्रयोजन? शक्ति और योग्यता की शोभा उसके बांटने में है। देने वाले को देवता कहा जाता है। यह देना-दिव्य होना चाहिए, जिससे सुख शान्ति की वृद्धि हो। पाप-तापों के दुःखदायी परिणाम उपस्थित करने वाले उपहार तो असुर भी दिया करते हैं, देवता दिव्य वस्तु देते हैं। सद्ज्ञान सर्वश्रेष्ठ दिव्य वस्तु है। अपने विचार और कार्यों द्वारा दूसरों को ऐसा मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा देनी चाहिये जिससे ये सत् की ओर कदम बढ़ावें। वह वाणी निरर्थक है जिसके पीछे आचरण का बल न हो, दूसरों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा-शिक्षा जितनी वाणी या लेखनी द्वारा दी जाती है उससे कई गुनी अधिक आचरण द्वारा दी जा सकती है। आचरण ऊंचे बनाने चाहिये, दूसरों को अच्छी, ऊंची, सत्पथगामी सलाह देनी चाहिये, संसार में सुख शांति को सत्य, धर्म को पढ़ाने के लिये जितना कुछ भी परिश्रम अपने से किया जा सके करना चाहिये। सेवा-जीवन का सर्वश्रेष्ठ पुनीत काम है, अपने आपे की तथा दूसरों की सेवा करना हमारे हर एक काम में रहे तो हम दिव्य-देने वाले देवत्व को धारण कर सकते हैं। धीमहि—धारण करें। केवल तोते की तरह रटें नहीं, वाचक ज्ञानी न बनें। लम्बी चौड़ी हांकने वाले परोपदेश में पाण्डित्य दिखाने वाले, सिंह की खाल ओढ़ कर अपने असली ढांचे को छिपाये रखने वाले सियार, इस दुनिया में बहुत हैं। धर्म ग्रन्थों को वर्षों तक घोट घोट कर पीने वाले, नित्य धर्म चर्चा करने और सुनने वालों में से भी अनेक ऐसे होते हैं जिनका अन्तःकरण बड़ा मैला होता है। उनकी गुप्त करनी-प्रकट कथनी के बिलकुल विपरीत होती है। ऐसी वंचकता दुनिया में स्वार्थ सिद्धि के लिये किसी हद तक कारगर भले ही हो पर यथार्थ में वह व्यर्थ है, उसका कुछ भी महत्व नहीं है। आत्मा पर संस्कार वाचालता से नहीं पड़ते वरन् श्रद्धा एवं विश्वास से पड़ते हैं। सत्-मार्ग की श्रेष्ठता पर इतनी गहरी श्रद्धा होनी चाहिये कि उसका लोभ कभी त्यागा ही न जा सके। असत्-मार्ग से इतनी घृणा होनी चाहिये कि उधर आंख उठाकर देखने को भी कभी जी न करे। गहरे अन्तराल में, हृदय के अन्तरंग गह्वर में, दुःख नाशक, सुख स्वरूप, तेजस्वी, श्रेष्ठ, पाप नाशक, दिव्य, प्राण स्वरूप ब्रह्म की धारणा होनी चाहिये। गायत्री माता हम मनुष्यों को उपदेश करती है कि—‘‘पुत्रो! ऐसी ही धारणा करो, आत्माओ! अपने वास्तविक रूप में, आत्म भाव में अवस्थित होओ! तभी तुम्हारा जीवन लक्ष पूरा होगा।’’ इस उपरोक्त महान् अनुष्ठान की साधना के लिये क्या कार्य करना चाहिये? किस प्रकार यह सब सम्भव है? इस प्रश्न का उत्तर गायत्री के अन्तिम चरण में दिया हुआ है-‘धियो या नः प्रचोदयात्’। इस पद में बुद्धि को प्रेरणा देने की बात कही गई है। कल्पना की तरंगों में अनेक व्यक्ति आकाश में उड़ते फिरते रहते हैं। वाचालता की तरह यह काल्पनिकता भी दिल बहलाने की वस्तु है। उपरोक्त ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करने के लिए कल्पना मात्र करके न रह जाना चाहिये, वरन् बुद्धि का उपयोग करना चाहिये। बुद्धि में प्रेरणा होती है। बुद्धि वह तत्व है जिसकी प्रगति जिस भी दिशा में हो जाती है उधर ही मोर्चे पर मोर्चे फतह करती चलती है। यह तलवार जिस क्षेत्र में उतर पड़ती है उधर ही रास्ता साफ करती चली जाती है। जीवन के जिस क्षेत्र में भी मनुष्य अपनी बुद्धि को प्रवृत्त करता है उधर ही असाधारण सफलताएं प्राप्त करता है। छोटे-छोटे आदमियों ने इस संसार में बड़े बड़े काम किये हैं, इन सफलताओं का रहस्य यह है कि उन्होंने अपनी बुद्धि को एक निश्चित मार्ग में जुटा दिया था। एकाग्र होकर जिस मार्ग में भी इच्छा शक्ति को लगाया जाता है उधर ही सफलता देने वाले अनेकों उपाय प्राप्त होने लगते हैं। ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करने के लिये भी बुद्धि की प्रेरणा आवश्यक है। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज कहा करते थे कि ‘‘जितने मनोयोग और परिश्रम में एक विद्यार्थी मैट्रिक पास करता है, उतने ही प्रयास से एक साधक परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।’’ बुद्धि का ऐसा चमत्कार है कि वह कठिन कार्यों को हल कर सकती है, फिर परमात्मा का प्राप्त करना तो एक सरल कार्य है क्योंकि वह वास्तविक, स्वाभाविक, सच्चा और आवश्यक है। इस प्रकार के सच्चे कार्य सदा सरल ही होते हैं।

अपनी बुद्धि को अपने अन्दर प्राणशक्ति भरने के कार्य पर जुटाना चाहिए। यही सच्ची साधना है। अपनी आध्यात्मिक स्थिति को ऊंचा करके, सात्विक सद्गुणों को धारण करने का प्रयास जब सद्बुद्धि द्वारा आरम्भ होता है तो स्वल्पकाल में आत्मा-परमात्मा के निकट पहुंच जाता है और लौकिक एवं पारलौकिक अनेक सिद्धियां उसके करतल हो जाती हैं। इस जीवन में ही वह स्वर्ग और मोक्ष के आनन्द का रसास्वादन करने लगता है। गायत्री माता की उपासना के वरदान से उसके लिये कोई भी आवश्यकता अपूर्व नहीं रह जाती।

गायत्री में ईश्वर प्रार्थना भी है। परमात्मा से याचना करने योग्य केवल एक ही पदार्थ है—वह हमें सद्बुद्धि प्रदान करे। शेष सांसारिक पदार्थ तो अपने पुरुषार्थ से उपार्जन किये जा सकते हैं या अपनी मनोभूमि को ऐसा बनाया जा सकता है कि उन पदार्थों के बिना भी काम चल सके। परमात्मा जिस पर प्रसन्न होता है उसे सद्बुद्धि प्रदान करता है अथवा यों कहना चाहिये कि जिसकी सद्बुद्धि होती है उस पर परमात्मा प्रसन्न रहता है।

गायत्री में बहुवचन का प्रयोग हुआ है। मेरी बुद्धि को प्रेरित कीजिये ऐसा नहीं है वरन् हमारी बुद्धि को प्रेरित कीजिये ऐसा है। मनुष्य को ‘मैं’ ‘एकांगी’ ‘अकेला’ की स्वार्थमयी दृष्टि रख कर अपने को संकुचित नहीं बनाना चाहिये वरन् ‘हम सब’ के स्वार्थ की उदार दृष्टि से हर बात पर विचार करना चाहिए। जिसमें सबको लाभ हो उसमें अपना लाभ और जिसमें सबकी हानि हो उसमें अपनी हानि समझनी चाहिये। अपने को समाज का एक अंग मानना, आत्मा को परमात्मा का एक भाग मानना, खुदी को खुदा में जोड़ना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।

जैसे जैसे गायत्री की अनुपम शिक्षाओं पर आप विचार करेंगे वैसे ही वैसे नये नये सद्विचार आपको प्राप्त होते जायेंगे।
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