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Books - गायत्री की चमत्कारी साधना

Media: TEXT
Language: HINDI
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चालीस दिन की गायत्री साधना

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गायत्री मन्त्र के द्वारा जीवन की प्रत्येक दशा में आश्चर्यजनक मनोवांछित फल किस प्रकार प्राप्त हुए हैं और होते हैं। यह मन्त्र अपनी आश्चर्य जनक शक्तियों के कारण ही हिन्दू धर्म जैसे वैज्ञानिक धर्म में प्रमुख स्थान प्राप्त कर सका है। गंगा, गीता, गौ, गायत्री, गोविन्द, यह पांच हिन्दू धर्म के केन्द्र हैं। गुरु शिष्य की वैदिक दीक्षा गायत्री मन्त्र द्वारा ही होती है।

नित्य प्रति की साधारण साधना और सवालक्ष अनुष्ठान की विधियां पिछले पृष्ठों में पाठक पढ़ चुके हैं। यहां पर चालीस दिन की एक तीसरी साधना उपस्थित की जा रही है। शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से इस साधना को आरम्भ करना चाहिये। साधक का निम्न नियमों को पालन करना उचित है (1) ब्रह्मचर्य से रहे, (2) शय्या पर शय न करे, (3) अन्न का आहार केवल एक समय करे, (4) सेंधा नमक और काली मिर्च के अतिरिक्त अन्य सब मसाले त्याग दे, (5) लकड़ी की खड़ाऊं या चट्टी पहिने, बिना बिछाये हुए जमीन पर न बैठे इन पांच नियमों का पालन करते हुए गायत्री की उपासना करनी चाहिये।

प्रातःकाल सूर्योदय से कम से कम एक घण्टा पूर्व उठकर शौच स्नान से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख होकर कुशासन पर किसी स्वच्छ एकान्त स्थान में जप के लिए बैठना चाहिये। जल का भरा हुआ पात्र पास में रक्खा रहे। घी का दीपक तथा धूप बत्ती जला कर दाहिनी ओर रख लेनी चाहिए। प्राणायाम तथा ध्यान उसी प्रकार करना चाहिये जैसा कि पिछले पृष्ठों में सवालक्ष अनुष्ठान के सम्बन्ध में बताया गया है। इसके बाद तुलसी की माला से जप आरम्भ करना चाहिए। एक सौ आठ मन्त्रों की माला अट्ठाईस बार नित्य जपनी चाहिये। इस प्रकार प्रति दिन 3024 मन्त्र होते हैं। एक मन्त्र आरम्भ में और एक अन्त में दो मन्त्र नियत मालाओं के अतिरिक्त अधिक जपने चाहिये इस प्रकार 40 दिन में सवालक्ष मन्त्र पूरे हो जाते हैं।

‘गायत्री तंत्र’ में ऐसा उल्लेख है कि ब्राह्मण को तीन प्रणव युक्त, क्षत्रिय को दो प्रणव युक्त, वैश्य को एक प्रणव युक्त मन्त्र जपना चाहिये। गायत्री में सबसे प्रथम ॐ अक्षर है उसे ब्राह्मण तीन बार, क्षत्रिय दो बार और वैश्य एक बार उच्चारण करे। तदुपरान्त ‘भूर्भुवः स्वः तत्सवितु.........’ आगे का मन्त्र पढ़े । इस रीति से मन्त्र की शक्ति और भी अधिक बढ़ जाती है।

लगभग तीन साढ़े तीन घण्टे में अट्ठाईस मालाएं आसानी से जपी जा सकती हैं। यह प्रातःकाल का साधन है। इसे करने के पश्चात् अन्य कोई काम करना चाहिये। दिन में शयन करना, नीच लोगों का स्पर्श, पराये घर का अन्न, इन दिनों वर्जित है। जल अपने हाथ से नदियां या कुएं में से लाना चाहिये और उसे अपने लिये अलग से सुरक्षित रखना चाहिये। पीने के लिये यही जल काम में लाया जाय। तीसरे पहर गीता का कुछ स्वाध्याय करना चाहिये। सन्ध्या समय भगवत् स्मरण और सन्ध्या—वन्दन करना चाहिये। रात को जल्दी सोने का प्रयत्न करना उचित है जिससे प्रातःकाल जल्दी उठने में सुविधा रहे। सोते समय गायत्री माता का ध्यान करना चाहिए और जब तक नींद न आवे मन ही मन बिना होठ हिलाये—मन्त्र का जप करते रहना चाहिये। दोनों एकादशियों अमावस्या, और पूर्णमासी को केवल थोड़े फलाहार के साथ उपवास करना चाहिये। पूर्णमासी से आरम्भ करके पूरा एक मास और आगे के मास में कृष्णपक्ष की दशमी या एकादशी को पूरे चालीस दिन होंगे जिस दिन यह अनुष्ठान समाप्त हो उस दिन गायत्री मन्त्र से कम से कम 108 आहुतियों का हवन करना चाहिये और यथा शक्ति सदाचारी विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये गौओं को आटा और गुड़ मिले हुए गोले खिलाने चाहिये। साधना के दिनों में तुलसीदल को जल के साथ दिनों में दो तीन बार नित्य लेते रहें।

इन चालीस दिनों में दिव्य तेल युक्त गायत्री माता के स्वप्नावस्था में किसी न किसी रूप में दर्शन होते हैं। यदि उनकी आकृति प्रसन्नता सूचक हो तो सफलता हुई ऐसा अनुभव करनी चाहिये यदि उनकी भ्रू-भंगी अप्रसन्नता सूचक, नाराजी से भरी हुई, क्रुद्ध प्रतीत हो तो साधना में कुछ त्रुटि समझनी चाहिये और बारीकी से अपने कार्य-क्रम का अवलोकन करके अपने अभ्यास को अधिक सावधानी के साथ चलाने का प्रयत्न करना चाहिये। नेत्र बन्द करके ध्यान करते समय, मन्त्र जपते समय मानसिक नेत्रों के आगे कुछ चमत्कार गोलाकार प्रकाशपुंज से दृष्टिगोचर हो तो उन्हें जप द्वारा प्राप्त हुई आत्म शक्ति का प्रतीक समझना चाहिये।

चालीस दिन की यह साधना अपने को दिव्य शक्ति से सम्पन्न करने के लिये है। साधना के दिनों में मनुष्य कृश होता है, उसका वजन घट जाता है परन्तु दो बात बढ़ जाती हैं—एक तो शरीर की त्वचा पर पहले की अपेक्षा कुछ चमकदार तेज दिखाई पड़ने लगता है, दूसरे एक विशेष प्रकार की गन्ध आने लगती है। जिसमें यह दोनों लक्षण प्रगट होने लगें समझना चाहिए कि उस साधक ने गायत्री के द्वारा अपने अन्दर दिव्य शक्ति का संचय किया है। इस शक्ति को वह अपने और दूसरों के अनिष्टों को दूर करने एवं कई प्रकार लाभ उठाने में खर्च कर सकता है। अच्छा तो यही है कि इस शक्ति को अपने अन्दर छिपा कर रखा जाय और सांसारिक सुखों की अपेक्षा आध्यात्मिक पारलौकिक आनन्द प्राप्त किया जाय।
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