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Books - गायत्री की चमत्कारी साधना

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


गायत्री का माहात्म्य

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गायत्री मन्त्र की महत्ता हिन्दू धर्म ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर भरी पड़ी है। इस मन्त्र का महत्व इतना अधिक है कि शास्त्रकारों ने जगह जगह उसका माहात्म्य वर्णन किया है। और गायत्री का जप करने के लिये विशेष रूप से आदेश किया है। नीचे ऐसे ही कुछ वचन दिये जाते हैं:—

अपां समीपे नियतो नैत्यिकं विधिमास्थितः। सावित्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः।। मनुस्मृति ।।1।104।।

अर्थात्—प्रतिदिन संध्या उपासना करते हुए गायत्री जप अवश्य करे।

जपन्नासीत सावित्रीं प्रत्यगा तारकोदयात्। संध्यां प्राक् प्रातरेव हि तिष्ठेदासूर्यदर्शनात्।। याज्ञवाल्क्य. आचार अ. ।।145

अर्थात्—सायंकाल में नक्षत्रों के दिखाई देने तक और प्रातःकाल में सूर्योदय तक गायत्री का जप करता हुआ ठहरे।

सहस्र परमां देवी शत मध्यां दशावराम्। गायत्री यो जपेद्विपो न स पापेन लिप्यते।। अत्रिस्मृति।।2।9।।

अर्थात्—जो ब्राह्मण गायत्री को 1110 बार प्रति दिन जपता है, वह पापों में लिप्त नहीं होता।

दर्मेष्वासिनो दर्मान् धार्यमाणः सोदकेन। पाणिना प्रत्यङ्मुखः सावित्री सहस्रकृत्वआवर्तयेत्।। बौधायन स्मृति।।2।4।5।।

जपेत् प्रणव पूर्वाभिः व्याहृतिमिः सहैव तु। तिसृभिर्भू प्रभृतिभिः गायित्रीं ब्रह्मरूपिणीम्।। ब्रह्मचारी गृहस्थश्च शतमष्टोत्तर जपेत्। कालत्रयेऽप्यशक्तश्चेदष्टाविंशतिमेव वा।। लब्ध्वाश्वलायन स्मृति।।2।।

अर्थात्—ब्रह्मचारी तथा गृहस्थी को ॐकार तथा ‘भूर्भुवः स्वः’ पूर्वक ब्रह्मरूपिणी गायत्री का 108 बार जप करना चाहिये। यदि 108 बार जप करने की सामर्थ्य न हो तो 28 बार तो अवश्य ही जाप करे।

सव्याहृतिकां सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह। ये जपन्ति सदा तेषां नं भयं विद्यते क्वचित।। शंख स्मृति।।12।14।।

जो सदा गायत्री का जाप व्याहृतियों और ॐकार सहित करते हैं उन्हें कहीं भी कोई भय नहीं सताता।

शतं जप्त्वा तु गायत्रीं दिन पाप प्रणाशिनीं। सहस्रं जप्त्वा तु तथा पातकेभ्यः समुद्धरेत्।। शंख. ।।12।15।।

गायत्री का सौ बार जप करने से दिन भर के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा दिन भर पापों की अधिकता नहीं होने पाती। एक हजार बार जप करने से यह गायत्री मन्त्र मनुष्य को पापों से ऊपर उठा देता है और उसके मन की रुचि पापों की ओर नहीं रहती।

दश सहस्रं जप्त्वा तु सर्वकल्मषनाशिनी। सुवर्णस्तय कृद्रिमा ब्रह्महा गुरु तल्पगः।। सुरापाश्च विशुद्धयत लक्ष जपयान्न संशय।। शंख. ।।12।16।। दश सहस्र बार जप करने से मनुष्य के सब कल्मष (मन के मैल) नष्ट हो जाते हैं। एक लाख बार जपने से महापापियों के भी अन्तःकरण पवित्र हो जाते हैं। हुता देवी विशेषेण सर्वकामप्रदायिनी। सर्वपापक्षयकरी वरदा भक्तवत्सला।। शंख. ।।12।19।।

यदि गायत्री मन्त्र के उच्चारण के साथ अग्नि में आहुतियां दी जावें तो मनुष्य के सब पापों को नष्ट करके गायत्री उस हवन करने वाले के समस्त मनोरथों को पूरा करती है।

शान्तिकमस्तु जुहुयात् सावित्रीमक्षतैः शुचिः। हन्तु कामोऽपमृत्युञ्च घृतेन जुहुयाद्यदा।।20।। श्री कामस्तु तथा पद्मैः धिल्वैः काञ्चन कामुकः। ब्रह्मसचस्कामस्तु पयसा जुहुयात्तथा।।21।।

यदि गायत्री मन्त्र के उच्चारण के साथ अक्षतों की आहुति दी जाय तो शान्ति प्राप्त होती है। घृत की आहुति देने से अपमृत्यु दूर होती है। कमल, बिल्व तथा दूध की आहुति देने से क्रमशः तेजस्विता, ओज, वीर्य और पराक्रम की वृद्धि होती है।

घृतप्लुतैस्तिलर्वन्हिः जुहुयातसु समाहितः। गायत्र्ययुत होमाञ्च सर्वपापैः प्रमुच्यते।।23।। पापात्मां लक्ष होमेन पातकेभ्यः प्रमुच्यते। अभीष्टं लोकमाप्नोति प्राप्नुयात् काममीप्सितम।।24

_______________________________________________________ PAGE MISSING _______________________________________________________ येगाऽयीतेऽहन्य हन्येतां स्त्रीणिं वर्षाणयतन्द्रितः। स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः स्व मूर्तिमान्।।82।। ॐकार तथा महा व्याहृति पूर्वक गायत्री को ब्रह्म मुख अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति का द्वार समझना चाहिये। जो मनुष्य तीन वर्ष तक प्रति दिन बिना किसी प्रमाद के गायत्री मन्त्र का जप करता है वह परमात्मा में वैसे ही लीन हो जाता है जैसे आकाश में वायु।

सावित्री जाप निरतः स्वर्गमाप्नोति मानवः। तस्मात् सर्व प्रयत्नेन स्नात् प्रयत मानसः।। गायत्रीं तु जपेद्भक्त्या सर्व पाप प्रणाशिनीम्। —शंख स्मृति

गायत्री जप में लगा हुआ मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है अतः मनुष्यों को चाहिये कि वह स्नान आदि से शुद्ध हो कर श्रद्धा भक्ति से प्रति दिन गायत्री का जाप किया करे, जो सारे पापों को नाश करने वाली है।

ओ३म् स्तुता मया वरदा वेद माता प्रचोदयंताम् पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणां प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मयं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्।।

अथर्व. का. 19 सू. 71 मं. 1

अर्थात्—वेद माता गायत्री वरों की दाता है। अपने उपासक को कुमार्ग से बचाकर सुमार्ग पर लाने वाली है। आयु, स्वास्थ्य, सन्तान, पशु, धन, सम्पत्ति, कीर्ति, यश और अन्ततः ब्रह्म का साक्षात् कराने वाली और उससे मिलाने वाली यही है।
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