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Books - ऋषि युग्म की झलक-झाँकी

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT TEXT


भागीदारी की, नफे में रहे

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        परम पूज्य गुरुदेव ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि बेटा मैं किसी का ऋणी नहीं रहूँगा। वे अति विनम्र होकर कहते हैं, ‘‘ जिनने भी हमारी कुछ सेवा सहायता की है, उनकी हम पाई- पाई चुका देंगे। न हमें स्वर्ग जाना है न मुक्ति लेनी है। चौरासी लाख योनियों के चक्र में एक बार भगवान से प्रार्थना करके इसलिये प्रवेश करेंगे कि इस जन्म में जिस- जिस ने जितना- जितना उपकार हमारा किया हो, जितनी सहायता की हो उसका एक- एक कण ब्याज सहित हमारे उस चौरासी लाख चक्र में भुगतान करा दिया जाय।’’ ‘‘इच्छा प्रबल है कि अपना हृदय कोई बादल जैसा बना दे और उसमें प्यार का इतना जल भर दे कि जहाँ से एक बूँद स्नेह की मिली हो, वहाँ एक प्रहर की वर्षा करते रह सकें।’’ प्रेम तो पूज्यवर ने इतना लुटाया कि हर कोई उनका गुणगान करते नहीं थकता। अनुदान वरदान भी कम नहीं दिये। यहाँ कुछ ऐसे प्रसंग दिये जा रहे हैं जब उन्होंने साधारण से व्यक्ति को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया।

25 फ़ीसदी निष्ठापूर्वक लगाते रहे

    पालीताणा (भावनगर) के श्री जनकभाई सोमपुरा एक मामूली मूर्तिकार थे। जब पूज्यवर से जुड़े, तब मात्र 1400 रुपये में घर के पाँच सदस्यों का जीवन निर्वाह मुश्किल से होता था। उन्होंने श्रद्धा भावना से अंशदान देना शुरू किया। पहले थोड़ा- थोड़ा देते थे। फिर महीने में एक दिन का वेतन देने लगे। जैसे- जैसे पूज्यवर के कार्य में उन्होंने धन लगाना शुरू किया, वैसे- वैसे उनके घर में भी समृद्धि बढ़ने लगी। वे एक ठेकेदार बन गये। अब जैन मन्दिर बनाने के बड़े- बड़े ठेके भी मिलने लगे। वे अपनी शुद्ध कमाई का 10 परसेण्ट निकालने लगे। गायत्री शक्तिपीठ के निर्माण एवं व्यवस्था से लेकर पूज्यवर की पुस्तकें गुजराती भाषा में छपवाने एवं उनके प्रचार- प्रसार में काफी धन लगाते रहे। फिर निश्चय किया कि मैं 25 परसेण्ट लगाया करूँ गा। इस प्रकार जितना लगाते उससे कई गुना गुरुजी उन्हें देते रहे। उन्हें बड़े- बड़े मन्दिरों के ठेके मिलने लगे। वे लाखों रुपये गुरुजी के कार्य में खर्च करने लगे।
  
  एक बार उनके मन में कंजूसी के विचार आये, ‘‘कोई और तो इतना पैसा लगाता नहीं है। मैं ही इतना पैसा क्यों लगाऊँ ?’’ फिर उनके छोटे- छोटे काम जो सहज होते जाते थे, कभी पता ही नहीं चलता था, अटकने लगे। वे घबराये। फिर एक दिन आत्म चेतना ने झकझोरा, ‘‘तुमने निश्चय किया था, 25 परसेण्ट लगाने का। तुमने पूज्यवर को 25 परसेण्ट का पार्टनर बनाया था। सो तुम्हारे काम में घाटा या बाधा कैसे आ सकती थी? सब काम सहज होते रहते थे। अब तुम गुरुजी के साथ कंजूसी करोगे, तो वे क्यों न करेंगे? तुम अपने संकल्प से हट रहे हो, इसीलिए छोटे- छोटे काम अटक रहे हैं।’’ उन्होंने अपनी भूल सुधारी और पुनः 25 परसेण्ट निकालने लगे। अब पुनः उनके सब काम सहज ढँग से होने लगे।

सराहनीय निष्ठा एवं समर्पण

      लखनऊ के श्री लोकनाथ रुद्रा जी की पूज्यवर के कार्यों में बड़ी अद्भुत निष्ठा एवं समर्पण भावना थी। उन्होंने सन् 1958 के सहस्र कुण्डीय यज्ञ में भाग लिया था। वे गुरुजी के पास गए और कहा, ‘‘गुरुजी! मैं क्या सेवा करूँ?’’ तो गुरुजी ने कहा, ‘‘तुम, लंगर की व्यवस्था सँभाल लो।’’ तब वे बोले, ‘‘गुरुजी! तब तो मैं यज्ञ नहीं कर पाऊँगा। सुबह से रात तक उसी में लगना पड़ेगा।’’ गुरुजी बोले, ‘‘बेटा! वही असली यज्ञ है। तुम्हें यज्ञ का सम्पूर्ण पुण्य उसी से मिल जायेगा।’’

         उस समय तक स्टोर में केवल बीस बोरे चावल ही इकट्ठे हो पाये थे। सुबह सब निकाल लिये गये। हमें चिंता हुई कि अभी तो पहला ही दिन है, आगे कैसे काम चलेगा? गुरुजी से कहा, तो गुरुजी बोले, ‘‘चिंता मत करो। बस काम करते रहो।’’ लोग यज्ञ करने आते, साथ में अपने घर से पोटली बाँध कर लाते, शाम तक पूरा भण्डार भर जाता। रोज ऐसा ही होता रहा। यज्ञ पूरा हो गया था। भण्डार फिर भी भरा था। यज्ञ पूरा होने पर मैंने गुरुजी से पूछा, ‘‘गुरुजी! अब मेरे लिए क्या आदेश है?’’ तो गुरुजी ने कहा, ‘‘बेटा! मेरा काम करोगे? तो मेरी गायत्री को घर- घर पहुँचा दो।’’ मैंने गुरुजी से पूछा, ‘‘इसके लिए मुझे क्या करना होगा?’’ गुरुजी ने कहा, ‘‘बेटा! इसके लिए अपना आपा ही उड़ेल दो। बेटा, जो भी छुट्टी मिले, उसे हमारे काम में लगाना।’’
    वे कहते हैं, ‘‘हमने गुरुजी का आदेश माना। जो भी छुट्टी मिलती, उसे पूरी निष्ठा से गुरुजी के काम में ही लगाते रहे। कभी ऐसा नहीं हुआ, कि हम कभी छुट्टी में पत्नी को स्कूटर पर बिठाकर कहीं घुमाने ले गये हों। शनिवार, रविवार और जो भी छुट्टी मिलती, उसमें गुरुजी के कार्य हेतु लखनऊ शहर के मुहल्ले- मुहल्ले, गली- गली में निकल जाते। आसपास के गाँवों में निकल जाते।’’

     गुरुजी ने उन्हें इतना सम्मान दिया कि शान्तिकुञ्ज से जो भी कार्यकर्त्ता लखनऊ जाते, उससे गुरुजी कहते, ‘‘बेटा! वहाँ मेरे जैसी एक तड़पती आत्मा बैठी है। उससे जरूर मिलकर आना।’’ जीवन के अन्तिम समय तक, बिस्तर पर रहते हुए भी गुरुजी के कार्य के प्रति उनके अन्दर बड़ी तड़पन बनी रहती थी। सन् 2008 में वे गुरुजी में विलीन हो गये।

पूज्यवर ने नये युग का नया इतिहास रचा है।

    गारियाधार (भावनगर) के कार्यकर्त्ता दामजी भाई एस. पटेल पूज्यवर के कार्यों हेतु बहुत समर्पित थे। वे बताते थे, सन् 1999 में 87 वर्ष की उम्र में उन्हें सीवियर हार्ट अटैक हुआ था। जल्दी से अस्पताल ले गये। वहाँ डॉक्टरों ने नब्ज देखी, तो पाया कि वे शरीर छोड़ चुके हैं। उन्होंने बताया, ‘‘जैसे ही मेरी मृत्यु हुई, मैंने देखा, मेरी चेतना सीधे पूज्य गुरुजी के पास गयी। गुरुजी मुझे छाती से लगाकर खूब प्यार देने लगे। उन्होंने कहा, ‘बेटे तुमने हमारा खूब काम किया है, मैं बहुत खुश हूँ, तुम्हारे काम से।’ मैंने गुरुजी से कहा, ‘गुरुजी हमने आपका काम किया है, तो उसका प्रमाण क्या है?’ बोले, ‘बेटा! प्रमाण माँगता है? तो देख!’ उन्होंने एक मोटी इतिहास की पुस्तक आगे की। (वह इतिहास अभी लिखा नहीं गया है, पूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्म स्तर पर वह नये युग का नया इतिहास लिख कर रख दिया है।) उसमें लिखा था, ‘गारियाधार के सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्त्ता, श्री दामजी भाई एस. पटेल के सम्पूर्ण त्याग- पुरुषार्थ की सारी कथा- गाथाएँ।’ मैं पढ़कर बहुत खुश हुआ। फिर गुरुजी कहते हैं, ‘बेटा! इस निन्यानवे के वर्ष में, मैं तुम्हें एक उपहार देता हूँ, नया जीवन दान। जा, तू हमारा काम करना।’

तुरन्त मेरी चेतना वापस शरीर में लौट आयी, कुछ पल ही बीते थे, मैं मृत से फिर जीवित हो उठा था। सभी आश्चर्यचकित थे।’’
(फिर इस उम्र में भी वे नाती- पोतों के मोह में नहीं फँसे। जब तक जिये, पूज्यवर का कार्य निष्ठापूर्वक घर- घर जाकर करते रहे। लगभग आठ वर्षों के उपरान्त उनकी मृत्यु सुखद रूप से हुई।)

पाँच फ़ीसदी (Percent) का पार्टनर बनाया

    चेन्नई के तेजराजसिंह राजपुरोहित जी ने नई दुकान खोली। वन्दनीया शैल जीजी से बात की, ‘‘जीजी, मैं नई दुकान खोल रहा हूँ, टोपी की।’’ जीजी ने कहा, ‘‘तुम्हारी टोपी बहुत चलेगी। चिन्ता मत करना। कमाई का एक अंश गुरुजी के चरणों में रखते जाना।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हाँ जीजी! मैंने गुरुजी को पाँच परसेण्ट का पार्टनर बनाया है।’’ फिर पहले वर्ष ही उन्हें बीस लाख का फायदा हुआ। दूसरे वर्ष चालीस लाख का। इस प्रकार तीसरे, चौथे वर्ष भी उन्हें फायदा हुआ। वे निष्ठापूर्वक अपनी कमाई का 5 परसेण्ट गुरुदेव के कार्यों हेतु निकालते रहते हैं। उनका कार्य बढ़ता ही गया, क्योंकि उन्होंने गुरुजी को पार्टनर जो बना दिया था, वे दुकान में मंदी कैसे होने देते?

यह तो ब्याज भी नहीं है

    जयपुर के श्री वीरेन्द्र अग्रवाल जी मिशन के कार्यों के लिये खूब अनुदान देते रहते हैं। उनकी पत्नी से शान्तिकुञ्ज की एक कार्यकर्ता बहन ने चर्चा के दौरान कहा, ‘‘आप तो खूब दान करते रहते हैं।’’ इस पर उन्होंने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘हम क्या दे सकते हैं? गुरुजी ने हमें जो दिया है, यह तो उसका ब्याज भी नहीं है।’’

ऐसे लाखों कार्यकर्ता हैं, जो यह कहते हैं कि गुरुजी ने उन्हें दुकान, मकान, तरक्की, संतान, स्वास्थ आदि जिसकी उनके पास कमी थी, वह दिया। ऐसे औघड़दानी हैं पूज्य गुरुदेव। उनके खेत में जिसने भी कुछ बोया है, गुरुजी ने उसे हजारगुना करके लौटाया है।
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