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Books - ऋषि युग्म की झलक-झाँकी

Media: TEXT
Language: HINDI
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वे तंत्र के भी मर्मज्ञ थे

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First 6 8 Last
      परम पूज्य गुरुदेव ने यूँ तो स्वयंको सबसे छिपाये रखा। किंतु आवश्यकता पड़ने पर अपने भक्तों के समक्ष उन्होंने स्वयं को प्रकट भी किया है। जब कभी किसी भक्त ने उन्हें कातर भाव से पुकारा तो वे उनके कृपा पात्र भी बने हैं। कहते हैं कि गायत्री साधना से ऊँची कोई साधना नहीं है। जिसने गायत्री को सिद्ध कर लिया है उसने सभी देवी- देवताओं को सिद्ध कर लिया। गायत्री के साधक के आगे भूत- प्रेत, तंत्र- मंत्र कुछ भी टिक नहीं सकते। ऐसे ही कुछ संस्मरण जब गुरुदेव ने तंत्र प्रयोगों से अपने बच्चों की रक्षा की और उन्हें आश्वस्त किया।

मारण प्रयोग निष्फल हुआ

    किंगल , कुमारसेन (शिमला) के एक कार्यकर्त्ता श्री ओमप्रकाश शर्मा जी बताते हैं, ‘‘उन दिनों वे बी.एस.एफ. में नौकरी करते थे अतः अधिकतर घर से बाहर ही रहते थे। एक बार रविवार को जब मैं अपने घर आया हुआ था, तो अपनी पत्नी को लेकर घूमने निकल गया। जब हम लौटे, तो अचानक पत्नी की तबियत बिगड़ गई। उनका शरीर अकड़ गया। वह सीढ़ियाँ ही चढ़ नहीं पा रही थीं। मैं सहारा देकर ऊपर चढ़ाने लगा, तब तक वह बेहोश हो गई। मैंने पत्नी को दोनों हाथों में लेकर ऊपर चढ़ाया और लिटा दिया। पास ही बैठकर सोचने लगा कि अचानक ये क्या हो गया? अब मैं क्या करूँ? मैं गायत्री मंत्र जपने लगा और गुरुजी को याद करने लगा। तभी मन में प्रेरणा हुई कि पीले चावल पूजा कक्ष से उठाकर गायत्री मंत्र पढ़कर पत्नी के ऊपर छिड़क दो। मैं तुरंत पूजा कक्ष से पीले चावल लाया और गायत्री मंत्र बोलते हुए पत्नी के ऊपर छिड़क दिया। ऐसा करते ही मुझे वहीं एक थाली तैरती हुई दिखाई दी। जो उड़ती हुई दरवाजे से बाहर निकली और सामने वाली पहाड़ी के पीछे चली गई। मुझे एहसास हुआ कि किसी ने पत्नी के ऊपर मारण प्रयोग किया था। मेरे मन में भय हुआ। गुरुजी से प्रार्थना की, ‘गुरुजी आज तो मैं यहाँ था, यही मेरे पीछे घटता, तो पत्नी को कौन बचाता?’ अचानक गुरुजी सूक्ष्म रूप में तैरते हुए कमरे में आये और कहा, ‘‘बेटा! मैं यहाँ बैठा तो हूँ। तू क्यों घबराता है?’’ कहते हुए अपने चित्र में समा गये। उस दिन से गुरुवर के प्रति मेरी श्रद्धा और भी प्रगाढ़ हो गई।’’

  तांत्रिक से बचाया

सीतापुर उ. प्र. की एक कार्यकर्त्ता बहिन ने नाम न छापने का आग्रह करते हुए बताया कि विवाहोपरांत वह अपने ससुराल में बहुत पीड़ित रहने लगी। कोई तांत्रिक उनके जीवन में बाधाएँ उत्पन्न कर रहा था। मुझे विचित्र प्रकार की परेशानियाँ होने लगीं। जैसे मेरी साड़ी चीर- चीर हो जाना। सिर से बालों के गुच्छे निकल जाना और भी नये- नये ढंग से चित्र- विचित्र परेशानियाँ नित्य ही आती रहतीं। मुझे कोई रास्ता सूझ नहीं पड़ रहा था। मैं उपासना में गुरुजी के पास बैठकर रोती, प्रार्थना करती कि गुरुदेव मुझे बचा लो। मुझे मार्ग दिखाओ। हर पल मन ही मन उनसे प्रार्थना करती रहती। कुछ दिन बाद गुरुजी ने मेरी प्रार्थना सुन ली। एक दिन मुझे ऐसा लगा जैसे गुरुजी कह रहे हैं, ‘उठ! कापी- पेन पकड़ और लिख।’ मैं लिखने लगी और देखा कुछ मंत्र हैं। फिर गुरुजी ने उनका प्रयोग व आहुति आदि देने के लिये बताया। मुझे जैसी- जैसी प्रेरणा हुई थी, मैंने वैसा ही किया। मेरी परेशानियाँ घटने लगीं। अब अक्सर ऐसा होता कि वह तांत्रिक जब भी कोई प्रयोग करता, उपासना के समय मुझे लगता जैसे गुरुजी कह रहे हैं, ‘‘कापी- पेन पकड़ और लिख, आज उस तांत्रिक ने अमुक प्रयोग किया है। तुम इस प्रकार की आहुतियाँ देकर उसकी काट करो।’’ मैं वैसा ही करती और संकटों का निवारण होता जाता।
    एक दिन मैंने गुरुजी से प्रार्थना की, ‘‘गुरुजी! मुझे छाती में बड़ा चुभने वाला शूल होता है। उसका क्या उपाय करूँ?’’ तब गुरुजी ने बताया कि घर की पीछे वाली दीवाल में अमुक जगह पर तांत्रिक ने एक कील ठोंकी है। उसे निकाल दो। मैंने जब वह कील निकाली, तो मेरी छाती का दर्द भी ठीक हो गया। इस प्रकार तांत्रिक अपने मंसूबों में सफल नहीं हो पाता था, उल्टे वही चोटें खाता रहता।

   एक दिन तांत्रिक ने छल विद्या का प्रयोग किया। वह मेरे पति के वेश में साइकिल लेकर आया और कहीं चलने के लिए कहा। मैं उसे अपना पति समझकर साइकिल पर उसके पीछे बैठकर जाने लगी। रास्ते में गायत्री शक्ति पीठ पड़ा। मुझे गायत्री माता को प्रणाम कर लेने की इच्छा हुई। मैंने उसे साइकिल की रफ्तार धीरे करने के लिये कहा। जैसे ही मैंने साइकिल से उतरकर झुककर गायत्री माता को सड़क से ही प्रणाम किया और पीछे मुड़कर देखा तो मुझे तांत्रिक का असली रूप दिखायी दिया। वह जिसके साथ मैं साइकिल पर बैठकर आयी हूँ, वह मेरा पति नहीं, तांत्रिक है! देखकर, मैं घबरा गई और झट से गायत्री शक्तिपीठ की ओर दौड़ गई। तांत्रिक को इस बात का अहसास हो गया कि मुझे सब पता चल गया है तो वह, ‘‘तेरे गुरु बड़े सबल हैं।’’ चिल्लाते हुए भाग गया और फिर कभी मुझे परेशान नहीं किया।

जब सिद्ध तांत्रिक तड़प उठा

      एक परिजन ने बताया कि वे हरिद्वार में ‘हरि की पौड़ी’ क्षेत्र में रोज बुक स्टॉल लगाने जाते थे। जहाँ वे बुक स्टॉल लगाते थे, वहीं एक साधू स्नान करने आता था। वह उन्हें कहता, ‘‘यहाँ से दूर चले जाओ, यहाँ ये सब मत लगाओ।’’ पर वे माने नहीं। वहीं बुक स्टॉल लगाते रहे। एक दिन उस साधू ने अंजलि में जल लेकर मंत्र पढ़कर उनके ऊपर दो बार छोड़ा। तीसरी बार मंत्र पढ़कर जब वह छोड़ने जा रहा था, तभी उसका पूरा शरीर गर्मी से जलने लगा। वह तड़प उठा, और वहाँ से भाग ही खड़ा हुआ।

अगले दिन जब वह परिजन गुरुजी को अपनी बात सुनाने जा रहे थे, तो उनके कुछ कहने से पहले ही गुरुजी ने कहा, ‘‘बेटा उनकी बात मान लेनी चाहिये थी, नहीं तो वह इतना सिद्ध तांत्रिक था कि वह तुम्हें जला सकता था।’’ तब उन्हें ज्ञात हुआ कि पूज्य गुरुजी ने ही उन्हें बचाया था।

उसे तुरंत लेकर आ
श्रीमती मुक्ति शर्मा, शान्तिकुञ्ज

मेरी ननद की शादी थी। उन दिनों हम शान्तिकुञ्ज में ही रहते थे। हम लोग शादी में आगरा गये। खूब धूमधाम से शादी सम्पन्न हो गई। जिस दिन ननद की विदाई हुई, उस दिन मैंने बस थोड़ी सी मिठाई ही खाई थी और कुछ मुझसे खाया ही नहीं गया। उसके बाद अचानक मेरी तबियत बहुत खराब हो गई। मेरे पेट में भयंकर दर्द होने लगा। मुझे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। दर्द का कारण कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैं बेहोश जैसी हालत में पड़ी थी, और दर्द से छटपटा रही थी कि मुझे ऐसा आभास हुआ, जैसे माताजी मेरे सिर पर हाथ फिरा रही हैं। उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘किसी से तेरा कोई झगड़ा हुआ है क्या?’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं माताजी, ऐसी तो कोई बात नहीं हैं।’’ तब माताजी बोली, ‘‘ठीक है बेटी, मैं देख लूँगी। तुझे कुछ नहीं होगा। तू अच्छी हो जायेगी।’’ उसके बाद मेरी तबियत में थोड़ा सुधार होने लगा। मुझे अस्पताल से वापिस घर ले आये।

    हमें उसी दिन शान्तिकुञ्ज लौटना था। मेरी तबियत खराब होने के कारण शर्मा जी मुझे घर पर ही छोड़कर स्वयं रात की बस से शान्तिकुञ्ज चले गये। सुबह 6 :00 बजे के लगभग वे शान्तिकुञ्ज पहुँचे। पहुँचते ही गुरुजी के पास गये। जैसे ही उन्होंने गुरुजी को प्रणाम किया, गुरुजी ने पूछा, ‘‘मुक्ति कहाँ है?’’ उन्होंने बताया कि उसकी तबियत थोड़ी बिगड़ गई थी, इसलिए घर पर ही छोड़ आया हूँ। सुनते ही गुरुजी बहुत नाराजगी भरे स्वर में बोले, ‘‘वहाँ किसके पास छोड़ आया? वहाँ कौन है? तुरंत जा और उसे लेकर आ। मर भी गई होगी तो भी तू उठा लाना, यहाँ हम उसे जिंदा कर लेंगे। भास्कर को गाड़ी निकालने को कह और तुरंत जा।’’

    इनकी समझ में कुछ नहीं आया, इन्होंने कहा, ‘‘गुरुजी, अभी तो आया ही हूँ चाय तो पी लूँ।’’ गुरुजी बोले, ‘‘चाय भी तू रास्ते में ही पी लेना। तू मेरी लड़की को छोड़कर आया कैसे? उसे तुरंत लेकर आ।’’

   उन्होंने नीचे माताजी को प्रणाम किया और सब बात बताई। माताजी ने कहा, ‘‘गुरुजी ने अगर ऐसा कहा है, तो बेटा तुरंत जा और मुक्ति को लेकर आ।’’ और माताजी ने भास्कर जी को गाड़ी लेकर जाने के लिए कहा। ये उसी समय मुझे लेने के लिये निकल पड़े। शाम को आगरा पहुँचे, मुझे गाड़ी में बिठाया और उन्हीं पैरों लौट आये।

शान्तिकुञ्ज आ जाने के कुछ दिनों बाद मेरी तबियत अचानक फिर बहुत ज्यादा खराब हो गई। मुझे पेट में भयंकर दर्द होने लगा। मेरा पेट जैसे फूल गया था। मुझे किसी तरह भी चैन नहीं पड़ रहा था। गुरुजी के पास सूचना पहुँचाई गई। उस समय गुरुजी गोष्ठी ले रहे थे। उपाध्याय जी, मेरे पतिदेव आदि सभी लोग गुरुजी के पास ही बैठे थे कि शिव प्रसाद मिश्रा जी भाई साहब ने जाकर सूचना दी कि मुक्ति दीदी की तबियत बहुत खराब है। गुरुजी ने तुरंत गोष्ठी समाप्त की और मेरे पतिदेव से कहा, ‘‘महेन्द्र, तू जल्दी जा, मुक्ति को देख, मैं भी आता हूँ।’’

     मुझे देखने के लिए डॉ. प्रणव, डॉ. दत्ता, डॉ. राजेन्द्र आदि सब लोग मेरे चारों ओर इकट्ठा हो गये। मुझे दवा दी गई, लेकिन किसी दवा से आराम नहीं हो रहा था। डॉक्टरों का कहना था कि इनकी किडनी फूल गई है। बर्स्ट होने की स्थिति में पहुँच गई है। किसी भी पल कुछ भी हो सकता है। इतने में गुरुजी आ गये। आते ही बोले, ‘‘मुक्ति, क्या हो गया? बता कहाँ दर्द हो रहा है?’’ मैंने गुरुजी को बताया। गुरुजी ने कहा, ‘‘ले, मेरा हाथ पकड़ और बता कहाँ- कहाँ दर्द हो रहा है?’’ उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, मैंने जहाँ- जहाँ बताया वे वहाँ- वहाँ हाथ फिराते रहे। लगभग बीस- पच्चीस मिनट उन्होंने मेरे पेट पर हाथ फिराया। उसके बाद खड़े हो गये और बोले, ‘‘लड़को! आज तुम लोगों में से कोई भी सोयेगा नहीं। सब लोग बारी- बारी से यहीं ड्यूटी देना।’’
    
मुझे देखने के लिये बहनें भी सब पहुँच गई थीं। उन्हें देखकर गुरुजी बोले, ‘‘महिलाओं का यहाँ कोई काम नहीं है। यह नहीं संभाल पायेंगी। इनको सबको अपने- अपने घर भेज दो।’’ वह रात इतनी भारी थी कि आज भी मैं उसे भूली नहीं हूँ। मैं न सो पा रही थी, न बैठ पा रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे प्राण खिंच रहे हों। सब लोग मुझे पकड़कर रातभर टहलाते रहे। उपाध्याय भाई साहब ग्लूकोज़ का घोल बनाकर गिलास हाथ में पकड़े- पकड़े घूम रहे थे। थोड़ी- थोड़ी देर बाद कहते, ‘‘ले बहना! एक चम्मच पी ले।’’ ऐसा करते- करते पूरी रात गुजर गई। लगभग 4 बजे के करीब डॉ. प्रणव भाई साहब आये और बोले कि रात तो गुजर गई। अब इन्हें नींद का इंजेक्शन दे देते हैं, तो इन्हें थोड़ी नींद आ जायेगी। मुझे नींद का इंजेक्शन देने से थोड़ी देर नींद आ गई। लगभग 8 बजे के करीब गुरुजी मुझे देखने आये। आते ही उन्होंने पूछा, ‘‘मुक्ति! अब कैसी है?’’ मुझे उस समय बस कमजोरी लग रही थी, बाकी सब ठीक था। मैंने मुस्कुराकर कहा कि ठीक हूँ गुरुजी। गुरुजी ने मज़ाक करते हुए कहा, ‘‘रात को तो तू मर रही थी। अच्छा! अब आराम कर, उठना नहीं। माताजी भी तुझे याद कर रही थीं। अभी थोड़ी देर में आयेंगी।’’ मैंने कहा, ‘‘गुरुजी माताजी को मत भेजिये। बस, आप आ गये हैं न, आप ही उन्हें मेरी कुशल- क्षेम बता दीजियेगा।’’

    जब महेन्द्र शर्माजी माताजी को प्रणाम करने गये तो माताजी ने उनसे मेरी तबियत पूछी और बताया, ‘‘बेटा, आज रातभर हम लोग भी नहीं सोये। मैं जब सब काम निबटाकर गुरुजी के पास गई, तो देखा कि गुरुजी चिंता मग्र हैं। मैंने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि मुक्ति के प्राण संकट में हैं। आज रात तुमको और मुझे दोनों को साधना करनी पड़ेगी। हमें उसकी रक्षा करनी है। बेटा! रातभर हम दोनों ने भी साधना की। अब संकट टल गया है।’’
गुरुजी ने प्रणव भाई साहब को बुलाया और कहा कि बी.एच.ई.एल. से डॉ. तनेजा को बुलाकर दिखा दो, और हाँ! काली मंदिर वाले स्वामी जी के पास भी चले जाना। डॉ. तनेजा को बुलाया गया।

    उस समय शान्तिकुञ्ज में आठ डॉक्टर थे। रात को सबने मुझे देखा था और सबकी एक ही राय थी कि इनकी किडनी बर्स्ट होने वाली है। सुबह तक सब नार्मल हो गया था। जिसे देखकर सभी डॉक्टर हैरान थे। गुरुजी ने डॉ. तनेजा जी से पूछा, ‘‘कैसी है हमारी बेटी, सब ठीक है न?’’

    डॉ. तनेजा ने कहा कि सब कुछ ठीक है और डॉ. प्रणव जी की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘‘आप कैसे कह रहे हैं कि इनकी किडनी बर्स्ट होने वाली थी। किडनी तो नार्मल है।’’ प्रणव भाई साहब ने बताया, ‘‘केवल मैं ही नहीं, साहब! हम आठ डाक्टर थे, सबने देखा था। हाँ, गुरुजी जरूर आये थे। उन्होंने कुछ चमत्कार किया होगा।’’

    उस दिन के बाद मेरी तबियत ठीक होने लगी। बाद में गुरुजी ने मुझे आगरा जाने के लिए बिल्कुल मना कर दिया। कहा कि तू आगरा नहीं जायेगी। तू यहीं रहेगी।

हमें तो कुछ समझ नहीं आया, क्या हुआ था? पर लम्बे अर्से बाद पता चला कि मुझे खाने में कुछ दिया गया था और मेरे ऊपर मारण प्रयोग किया गया था। बताने वाले ने यह भी बताया कि आप के गुरु बहुत समर्थ हैं अन्यथा प्रयोग इतना जबरदस्त था कि आपको कोई बचा नहीं सकता था।
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